कुंवारी सुहागिन , भाग -१९
बाद में अगर चाहोगी वह फिल्म भी दिखा दी जायेगी. मजा तो लेना ही है. सिर्फ एक दिन का काम तो है नहीं. अब तो तुम रोजाना आओगी और आना ही होगा. इश्क का रोग जिसे एक बार लग जाए तो वह
फिर कभी ठीक नहीं हो पाता. मेरी जान ये मेरा दावा है की आज अगर तुम मेरे साथ जिस्मानी सुख भोग लेती हो तो कल तुम्हें फिर यहाँ आना होगा, मेरी ना करने के बावजूद तुम यहाँ आओगी . आना ही
होगा. मेरा दावा कभी गलत नहीं हो सकता. लीजिए , मैंने फिल्म स्टार्ट करदी है , अब इसका लुत्फ़ उठाइये.
फिल्म का पहला ही द्रश्य बेहद गर्म था. एक बाबा नग्न अवस्था में दिखाई दिया. उसके गुप्त अंग को एक सुन्दर महिला प्यार कर रही थी, उसे सहला रही थी, कभी-कभी चूम रही थी और देखते ही देखते
उस बाबा को खतरनाक अंग लगातार बढ़ता जा रहा था. अमृता ने एक निगाह पूजन के गुप्त अंग पर भी डाली , इसके बाद स्क्रीन पर नजर दौडाई . वह देखना चाहती थी की उन दोनों के अंग में से ज्यादा बड़ा
अथवा मोटा अंग किसका है. मगर एक बार में उसे आइडिया नहीं हो पाया तो उसने दोबारा निगाह दौडाई. पूजन उसका आशय समझ गया. फ़ौरन बोला-
- क्या देख रही हो मेरी जान ? देखलो कोई दिक्कत नहीं है. मगर डरना मत. मेरा यौवनांग उतना बड़ा नहीं है. आह, यह सीन देखते ही इच्छा होती है की अपने यौवनांग को तुम्हारे यौवन द्वार पर लेजाकर
नृत्य करवाऊं , मेरे अधर तुम्हारे गुलाबी होठों का स्पर्श करने के लिए बेताब हैं, लेकिन इससे पहले सिगरेट और शराब का आनंद भी लेना है. अगर यह आनंद नहीं मिलेगा तो मन नहीं भरेगा . पूरा लुत्फ़
नहीं उठा पायेंगे हम. जबकि अपने आप से यह वादा कर चुअका हूँ की आज मैं तुम्हें स्वर्ग से ज्यादा सुख देकर रहूंगा .
अमृता- बेचैन मैं भी हूँ, दिल अधीर हो रहा है. यह यौवन की तरंगें इस कदर उठती हैं की जीना दुश्वार होने लगा है, आह इस अगन को शांत कीजिये. जैसे ये बाबा अपनी महबूबा को सुख दे रहा है, मुझे भी ऐसा
सुख दे दीजिए ताकि मुझे शान्ति मिल सके, मुक्ति मिल सके.
पूजन- तुमने मेरे दिल की बात छीन ली हैं, मैं भी वही चाहता हूँ जों तुम मुझसे चाहती हो .कैसी लगी फिल्म ?
अमृता- यह फिल्म नहीं अंगार है. जिस्म में आग सी सुलग उठी है. क्या ये सब द्रश्य सच्चे हैं ?
पूजन- दावा तो यही किया गया है, दिखने से लगते भी सही हैं, किसी भी द्रष्टिकोण से ऐसा नहीं लगता की यह सीडी सच्ची नहीं है.
अम्रात- क्या कोई महिला अपने पृष् साथी के यौवन अंग को इस तरह चूस सकती है ?
पूजन- हाँ, हाँ क्यों नहीं ? अगर उसका एंड ठीक तारह से साफ़ किया गया है, उसमे कोई चोट नहीं है , किसी तरह का कोई इन्फेक्शन नहीं है, तो क्यों नहीं ? इस क्रिया का अभी एक अपना अलग सुख होता है.
अमृता- क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है ? आपकी किसी महिला साथी ने इसे चूमा है ?
पूजन- हां, कई बार ऐसा हुआ है. महिला साथी की बात तो छोडिये, मैं तो पुरुष साथी के साथ भी इस आनंद को भोग चुका है .
अमृता- पुरुष साथी ? कैसे ? और कब ये सब करते हो ?
पूजन- जब हम होस्टल में रहकर पढाई करते थे तो एक रूम में दो लोग सोते थे, उस समय मेरा एक साथ मेरे अंग के साथ मजा लेता था और मैं उसके साथ.
अमृता- - कभी अपराध बोध नहीं होता ?
पूजन- किसके लिये ? हम किसीका दिल तो नहीं दुखा रहे ? किसीके साथ जोर जबरदस्ती तो नहीं कर रहे ? किसी का नुक्सान तो नहीं कर रहे ?
अमृता- लेकिन है तो अप्राकृतिक कार्य ही न ,....
पूजन- कैसे कह सकते हैं / और कैसे मानें ? सब लोग अपने -अपने तरीके से चीजों को परिभाषित करते हैं. हमें भी ऐसा करने का अधिकार होना चाहिए . इन सब क्रियाओं से शरीर में गजब का जोश पैदा होता
है, जिस्म का प्रत्येक अंग एकाग्रचित्त होकर सिर्फ जिस्मानी सुख भोगने की तरफ अग्रसर हो जाता है. इससे बहुत ऊर्जा मिलती है .
अमृता- तुम तो सच्ची के गुरु हो. सब कुछ जानते हो. बहुत कुछ सीखना होगा. मेरे ख़याल से यह बाबा भी इतना नहीं जानता होगा जितना की सेक्स के बारे में तुम जानते हो .
पूजन- अब तुम मुझे चने के झाड पर चढ़ा रही हो . आजकल के लोग सब कुछ समय से पहले ही जान जाते हैं, मेरा ख़याल है की तुम्हें भी इस सबका ज्ञान होगा ही.
अम्रात- नहीं यार , मैं तो सीख रही हूँ, मुझे अपनी शिष्य बना लीजिए, ताकि मैं भी ज्ञान प्राप्त कर सकूं.
पूजन- मेरी जान, मैं तो तुम्हें हमेशा-हमेशा के लिए अपनी बनाना चाहता हूँ और तुम सिर्फ शिष्या बनना चाहती हो ?
Monday, March 21, 2011
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