Wednesday, March 16, 2011

कुंवारी सुहागिन , भाग--15
पूजन- अब यह बड़े से बड़ा तो हो सकता है मगर छोटा करना भूल जाइए.
अम्रात- मेरा इतना कहना भी नहीं मानोगे ?
पूजन- तुम्हारे लिए तो अपनी जन भी दे सकता हूँ मेरी जान, मगर समझने की कोशिश तो करिये . प्राकृतिक तौर पर ऐसा हो नहीं पाता है.
अमृता- तो इसे दूर ही रखिये, ऐसा तो हो सकता है ?
पूजन- कुछ देर के बाद तुम इससे एक पल के लिए दूर भी नहीं हो पाओगी . यह एक ऐसा हथियार है जों सीने पर चुभने पर भी अच्छा लगता है. बड़ा मस्त अंग है ये. इस पर हाथ फिराकर तो देखिये.
ऐसा आनंद आएगा की सपने में भी यही दिखाई देगा . तुम्हें देखते ही मजा आ जाएगा, देखो आँखों में चमक तो दिखाई देने ही लगी है.
अमृता- मुझे डर सा लगने लगा है, दिल जोर-जोर से धड़कने लगा है. अब तो मैं यहाँ से जाना ही चाहती हूँ, फिर किसी दिन आ जाउंगी.
पूजन ने उसकी यौवन की गली में उंगली डाल दी , अमृता थोड़ी सी उछल गयी , उसको ज़रा सी तकलीफ हुई थी. मगर वह विचलित नहीं हुई. मौक़ा मिलते ही पूजन ने उसके यौवन द्वार में पूरी उंगली ही
घुसादी , अब स्थिति ये हो गयी की अमृता चाहते हुए भी वहाँ से हट नहीं सकती थी, पूजन ने उसको इसी तारीके से जकड लिया था . वह कसमसाकर रह गयी, पूजन का दूसरा हाथ इस समय अम्राता की
गोलाइयों पर था. वह उनको आहिस्ता-आहिस्ता मसल राह तह. इससे काम वासना की चिंगारी सी उठने लगी, पूजन ने अमृता के नाजुक होठों से अपने होठ सटा दिए और उन्हें चूसने लगा. अमृता का सारा
नशा ढीला हो गया. उसे लगा जैसे की वह आसमां में उस रही है. अपने होठों को छुडाते हुए वह बोली-
- आज तुमने वादा किया है की मेरे साथ जिस्मानी रिश्ता नहीं बानाओगे .
पूजन- अब तो दुनिया की कोई भी ताकत ऐसा करने से नहीं रोक सकती, अगर मैं भी चाहूँ तो भी नहीं, क्योंकि तुम्हारे मन में भी काम ज्वाला भड़क उठी है. जब तक यह शांत नहीं होती तब तक तुम्हें चैन नहीं आएगा
. तुम्हारा बदन इसी अग्नि में जलाता रहेगा. अब तुम खुद इस आग को शांत करना चाहोगी .
अमृता- क्या कोई और तरीका नहीं है,. मैं चाहती थी की मेरा पति ही इस जिस्म के साथ खिलवाड करे, किसी गैर व्यक्ति के साथ मैं सम्बन्ध नहीं बनाना चाहती . आज तुम मेरा यह निश्चय तोड़ डालोगे .
पूजन- तुम बेवजह परेशां हो रही हो. मैं किसी भी हालत में तुम्हें कोई दिक्कत देना नहीं चाहता , बल्कि मैं तो चाहता हूँ की मेरी वजह से युम्हें आनंद की अनुभूति हो, परम सुख की अनुभूति हो और तुम चरम सुख
को आसानी से प्राप्त कर सको. मैं क्यों चाहूँगा की तुम्हारा निश्चय टूट जाए.
अमृता- तो फिर क्या रास्ता है ? आप ही बाताएं, मैं कैसे अपने आप से वफ़ा कर सकती हूँ.
पूजन- मुझसे शादी करके, मैं तुम्हें अपनी धर्मपत्नी स्वीकार कर चुका हूँ, तुम भी मुझे अपनी पति मानलो और मेरे साथ सुहागरात मनाओ , ऐसा करने से तुम्हारे दिल को बोझ भी हट जाएगा , तुम्हें फिर ये
काम क्रीडा एक उत्सव लगने लगेगा, पाप नहीं लगेगा.
अमृता- लेकिन यह सब इतनी जल्दी कैसे हो सकता है, मेरी और तुम्हारी उम्र को देखते हुए मुझे कभी भी भी इस बात की परमीशन नहीं दी जायेगी. घरवाले यह प्रस्ताव सुनते ही भड़क जायेंगे , बात का बतंगड
बन जाएगा. मीडिया वालों को तो ऐसा ही मैटर चाहिए , चारों तरफ ढोल पिट जाएगा.
पूजन- ऐसा कुछ नहीं होगा. अभी हम अपनी शादी की बात को गुप्त रखते हैं. सही समय आने पर सबको बता दिया जाएगा. सिर्फ ढोंग रचने भर से ही देवता प्रसन्न नहीं होते, बल्कि देवता तो हर जगह मौजूद होते
हैं, आओ हम सभी देवी -देवताओं और ईश्वर को साक्षी मानकर एक दूसरे को अपना जीवन साथ मान लेते हैं.
अमृता उसे ऐसी आँखों से निहारने लगी मानो पूजन के पास सभी समस्याओं का समाधान मौजूद हो. पूजन अपने कपडे उतारने में मशगूल था, जब वह बिलकुल नग्न हो गया तो उसने अम्राता को भी नग्न करना
शुरू कर दिया, थोड़ी सी नानुकर करने के बाद वह भी चुप हो गयी. जब पूजन ने बिना कपड़ों की अम्राता को देखा तो पागलों की तारह देखता ही रह गया. वह बेहद सुन्दर नजर आ रही थी. उसके यौवन के
उभारों ने पूजन के दिल में खलबली मचादी . यह ऐसी उथल-पुथल थी जिसे बताना भी मुश्किल था और छिपाना भी मुश्किल था. पूजन का गुप्त अंग पूरी तरह से तैयार हो चुका था, उसकी सख्ती बता रही थी
की वह भूखे भेडिये की तारह अपने शिकार पर टूट पड़ने के लिए तैयार है. पूजन उसे बांहों में भरकर बोला-
-अब हम दोनों सुहागरात के लिए तैयार हैं.

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