Wednesday, December 31, 2008
रंगीला रतन,भाग-63
रंजना- यह सुनकर तुम्हें बुरा नहीं लग रहा है ?
शारीक- जी नहीं, बिल्कुल नहीं... मैं तो यह सोचकर खुश हूँ की मुझे ऐसी प्रेमिका मिली है जो हर बात को खुले दिल से मानती है... मैं ऐसे लोगों से ज्यादा ताल्लुकात नहीं रख सकता मन में कुछ और होता है, कहते कुछ अलग ही हैं... मैं ऐसे लोगों से ज्यादा नहीं घुल -मिल सकता... सच तो ये है की चाह कर भी मैं ऐसे लोगों को अपना मित्र नहीं बना सकता जिनकी कथनी और करनी में अन्तर होता है...
रंजना- सुनकर अच्छा लगा, अब समझी की एक विचारधारा के लोग किस तरह मिल जाते हैं,... दुनिया में करोड़ों लड़कियां हैं, लड़के हैं मगर तुम्हारा और हमारा मिलन ये बताता है की हम दोनों के विचार भी काफी मिलते-जुलते हैं... तन और मन तो मिल ही चुके हैं , मगर इसके पीछे हमारी आत्माओं का पूर्व मिलन है...
शारीक- अब रमेश से कभी मुलाक़ात होती है की नहीं ?
रंजना- नहीं, अब वह किसी से मुलाक़ात के लायक ही नहीं रहा... उसको एड्स की बीमारी लग चुकी है...
शारीक -ओह, तो ? क्या मर गया ? या अभी तक साँसें चल रही हैं... ?
रंजना- जिसको यह बीमारी एक बार लग गयी फ़िर वह मरने से भी बदतर स्थिति में हो जाता है... यह सबसे खतरनाक बीमारी है... लोग जिस नर्क का जिक्र करते हैं ,यह उसी का दूसरा नाम है...
रंजना अपनी हियो धुन में कहती जा रही थी और शारीक का मारे डर के बुरा हाल था... ऐ सी की ठंडी
हवा में भी उसको पसीने आ रहे थे... उसने नहीं सोचा था की उसके साथ एसा हादसाभी हो सकता है... शारीक यह सोच-सोच हलकान हो रहा था की जिस रमेश के साथ रंजना ने अवैध सम्बन्ध बनाये थे, उसीको एड्स हो गया है, उसके दिमाग में तेजी से यह सवाल कौंधा- तो क्या रानाजना भी इस बीमारी की चपेट में आ गयी होगी ? कहीं ऐसा तो नहीं की अब वह भी... ? नहीं--नहीं... ऐसा कैसे हो सकता है ? वह उस पल को कोस रहा था जब उसने बिना कंडोम के ही रंजना के साथ जिस्मानी सम्बन्ध बाए थे... उसको परेशान देख रंजना ने पुछा-
- क्या सोच रहे हो ? इतना अच्छा रोमांटिक मूड हो रहा था तुमने व्यर्थ ही क्या सोचना शुरू कर दिया ?
शारीक - मैं सोच रहा हूँ की हमको बचाव का इस्तेमाल करना चाहिए था... यह बीमारी संसर्ग से ही होती है न ?
रंजना- अच्छा, अब समझ गयी तुम्हारी चिंता का कारण ... मैं बिल्कुल फिट हूँ, तुम टेंशन मत लो... जब तक रमेश मेरे संपर्क में था तब उसको कोई बीमारी नहीं थी... मुझसे संपर्क तोड़ने के बाद वह बुरी तरह बिगड़ गया... वह ग़लत महिलाओं के संपर्क में आया और एड्स का शिकार हो गया... मैंने सुना है की शायद वह मर भी चुका है... उसने मुझे धोखा दिया, मेरा दिल तोडा , पहले प्यार किया फ़िर बेवफाई की... उसीने मुझे पीने के की आदत दी ... उसीने रात-रात को इस तरह भटकना सिखा दिया...
Tuesday, December 30, 2008
रंगीला रतन, भाग-63
रंजना- आज तुमने बहुत आनंद दिया है... मन खुश है , तन खुश है...यहाँ तक की आत्मा तक खुश हो गयी है ... मैंने भी कहाँ सोचा था की तुम जैसा हैन्दस्म लड़का मेरा दोस्त बनकर मेरे साथ प्रणय क्रीडा को अंजाम देगा॥
शारीक- तुम्हारे सहयोग के बिना यह सम्भव नही था ... क्योंकि मैं तो इस खेल का बिल्कुल नया खिलाड़ी हूँ... मैंने कभी किसी लड़की के साथ इससे पहले जिस्मानी सुख नहीं उठाया था... आह, शुक्रिया...
रंजना- दोस्ती में शुक्रिया का नही, प्यार का आदान -प्रदान किया जाता है... जितना चाहो प्रेम करो , मोहब्बत पर कोई पाबंदी नहीं है ...
शारीक- एक बात पूछूं? हांलाकि आपने सब पर पाबंदी लगा राखी है, फ़िर भी कोशिश करता हूँ, मैं यह जानने का इच्छुक हूँ की तुमने कभी किसी से प्यार किया है की नहीं ?
रंजना- हाँ, झूठ नहीं कहूँगी... मैंने रमेश नाम के एक लड़के से प्यार किया था , मगर मेरे अनुभव अच्छा नहीं रहा ...उसने मेरे तन-मन और धन लूटकर भी मेरे साथ वफ़ा नहीं की... मेरा दिल तोड़ दिया... उस बेवफा को भुलाने की कोशिश कर रही हूँ... तुम भी मिल गए हो, हो सकता है, तुमसे मिलकर उस दर्द के जख्म कुछ कम हो जाएँ;; घावों पर मरहम लगाने के लिए ही तो तुमको यहाँ बुलाया है... तुम तो जानते ही हो, एक बार जब किसी का दिल टूट जायर तो वह हर कदम सोच समझकर ही रखता है... और तुम हो की उसी को बार-बार पाबंदी का नाम दे रहे हो... मुझे चिढा रहे हो न ?
शारीक- मैं मजाक करता रहता हूँ, बोझिल माहोल मुझे बिल्कुल पसंद नहीं...अब तुम्हीं बत्तो, अगर तुमसे मजाक नहीं करुगा तो किस्से करूँगा... अब तो मेरा सब कुछ तुम ही हो...
रंजना- इतना भावुक होने की जरूरत नहीं है... तुम हँसते मुस्कराते ही अच्छे लगते हो... जितना चाहो मजाक करो, कभी बुरा नहीं मानूंगी... अब तो खुश हो , चलो अब मुस्क्रादों... तुमने फ़िल्म देखि है -एक बार मुस्करादों ...
शारीक- नहीं, अब देख लूँगा... घर जाते ही पहला काम यही करूँगा... तुम्हारी हर बात मानूंगा... जो कुछ पहले नहीं जानता था तुमने वह सब सिखा दिया है... जो बचा है, वह भी सीख लूँगा...
रंजना- तुम कुछ जानने के लिए बेताब थे, कहो न , मैं तुम्हारे हर सवाल का जवाब दूंगी... मैं बहुत खुश हूँ...
शारीक - रमेश के साथ तुमने शारीरिक सम्बन्ध भी स्थापित किए थे?
रंजना- हां , बहुत आनंद आया... उसके साथ जिस्मानी ताल्लुकात बनाने का अलग ही मजा था... धीरी-धीरे तुम भी सीख जाओगे... हर काम सीखते- सीखते ही सीखा जाता है... अगर वह सेक्स में माहिर नहीं होता तो मैं उस पर इस हद तक फ़िदा नहीं होती... मैं सच्चाई में यकीन करती हूँ...
शारिक- मैंने कभी नहीं सूना की किसी लड़की ने इस तरह कभी स्वीकार किया है...
रंजना- ओह, अब मस्का लगा रहे हो ?
Monday, December 29, 2008
रंगीला रतन, भाग-62
रंजना- अच्छा , अगर ऐसी बात है तो लिघत जला दो ... आज मैं तुम्हारी हर इच्छा पूरी करना चाहती हूँ... अपनी हर हसरत पूरी कर लेना... मैं कुछ कहने वाली नहीं हूँ...
रंजना की इजाजत मिलते ही शारीक ने लाईट जलादी... रंजना का खूबसूरत चेहरा देखते ही वह बेहोश होते-होते बच्चा... उसने कल्पना भी नहीं की थी की उसका वास्ता इतनी सुंदर हसीना से होगा... उसका मुह खुला का खुला रह गया... उसको बाद हवास देख रंजना बोली-
- पागलों की तरह ये क्या देख रहे हो, यह भी कोई नई चीज देखली की अभी तक तुम्हारा मुह फटा हुआ है...
शारीक- आज जाना की सुन्दरता क्या होती है, इससे पहले मैंने तुम जैसी हूर नहीं देखी... वाह... जितनी तारीफ करूं, उतनी कम है... मैं तो होश में ही नहीं आ रहा हूँ....
रंजना- तुम सब लड़के एक जैसे होते हैं... लड़की की झूठी तारीफ़ करके उसके दिल में जगह बनाना चाहते हो...
शारीक - मैं सबसे अलग हूँ, झूठी तारीफ करना मेरी फितरत नहीं... जो सच बात है ,वही बता रहा हूँ... तुम ख़ुद भी मेरी हालत देखकर यह अनुमान लगा सकती हो...
रंजना- ठीक है, तुम जीते , मैं हारी ... अब टाइम बरबाद करना ठीक नहीं है... प्यार की गाडी पर सवार होने के बाद तब तक नहीं रुकना चाहिए जब तक की मंजिल तक न पहुच्ज जाएँ... समझे ?
शारीक सब समझ रहा था... वह ख़ुद भी तो उतना ही बेचैन था, बल्कि उससे ज्यादा परेशान था... रंजना ने उसके सभी कपड़े उतारकर फेन दिए, शारीक की बॉडी जबरदस्त थी, लेकिन दिल्ली वाले रवि जैसी नहीं... अचानक उसे रवि याद आ गया... वह सीधा था, गरीब था मगर ईमानदार था... कम पढ़ा लिखा था लेकिन वाकी जवान मर्द था...
उसने रंजना को बिस्तर पर खूब सुख दिया था, इतना आनंद पाकर वह भाव विभोर हो गयी थी... अब मामला शारीक का था... शारीक भी अनाडी था... रवि भी सेक्स से बिल्कुल अपिरिचित था... रंजना को अब जो भी मिल रहा था, वह नया लड़का ही मिल रहा था... उनको कामक्रीड़ा का पाठ सिखाना भी रंजना का ही काम था... उसने शारीक का हाथ अपने सीने पर रख दिया... वह शुरू हो गया... रंजना को मजा आने लगा ... इसी प्रकार आहिस्ता-आहिस्ता वह शारीक को हर तरीके सिखाने लगी... जब वे दोनों मंजिल पर पहुचे तो शारीक ने उसे अपनी बांहों में जकड लिया, रंजना के होठों को चूमता हुआ बोला-
- अब हम दो जिस्म एक जान बन चुके हैं , मुझे कभी भूल मत जाना... तुम मेरा पहला प्यार हो , और तुम्हीं आखिरी भी... मैंने इससे पहले किसी लड़की का नग्न बदन भी नहीं देखा... किसी के जिस्म को टच भी नहीं किया...
रंजना- क्या कहते हो, तुम्हें भुलाना अब आसान नहीं होगा... अपने आपको एक बार के लिए भुला सकती हूँ मगर तुम्हें नहीं
Sunday, December 28, 2008
रंगीला रतन, भाग-61
-यह मुझे क्या हो गया है ?अब मालिश नहीं कर सकता , अब तो मन में कुछ अलग ही तरंगें उठ रही हैं... ये कैसा दीवानापन है, ये कैसा सुख है , क्या इसी को लूटने के लिए सब बेताब रहते है,मैं अकेले में हमेशा यही सोचता था की आखिरकार लोग लड़कियों पर इतने पागल क्यों होते हैं ? उन्हें देखते ही हमारे दिल में घंटियाँ क्यों बजने लगती हैं , दिल बेताब क्यों होने लगता है , अब जाकर इस राज का पता चला है... ओह, मुझमे समा जाओ ....
रंजना- तुम खुश तो मैं भी खुश... मुझे ये एहसास होने लगा था की जरूर कुछ गड़बड़ है, तुम्हारे चेहरे पर अजीब से भाव सब कुछ बयान कर रहे थे... तब मैंने निर्णय लिया की तुम्हें खुश किया जायेगा... तुम्हारे दिल को दुखी होते हुए मैं नहीं देख सकती... शायद इसीको प्यार कहते हैं... मैं भी तुमसे प्रेम करने लगी हूँ...
शारिक- तुमने तो मेरे मन की बात छीन ली... बस मैं भी यही कहने वाला था... मैं तुम्हारे इश्क में ऐसा गिरफ्तार हुआ हूँ की कह नहीं सकता... मेरे पास शब्द तो शब्द कहने की क्षमता भी नहीं है ...सोचता हूँ की किस तरह करुँ मोहब्बत का इजहार ... तभी तुमने कह डाला मेरा काम हो गया...
रंजना- दिल से दिल की राह होती है... मैं सब कुछ समझ गयी हूँ... यूं समझो की मेरे दिल से तुम्हारे दिल का कनेक्शन जुड़ चुका है... अब हम सिर्फ़ कहने भर के लिए ही अलग -अलग हैं...
शारिक- सच ? सच कह रही हो तुम ? मुझे यकीन नहीं आता ....ऐसा कैसे हो सकता है... या तो मैं सपना देख रहा हूँ... या फ़िर मुझ पर पागलपन सवार हो गया है... इन दोनों बातों के अलावा और कुछ हो ही नहीं सकता ... अचानक मैं तुमसे मिलता हूँ, कुछ पल साथ में बिताते हैं और प्यार हो जाता है... सब कुछ फिल्मी इस्टाइल में, वो भी उस स्थिति में, जबकि मैंने तुम्हारा चेहरा तक नहीं देखा... पहले तो तुमने में नकाब में चेहरा छूपा रखा था , अब हलकी रोशनी में कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा है...
रंजना- जो कुछ होता है , इस दिल से होता है, चेहरे की ज्यादा अहमियत नहीं होती... तुम्हें मालूम है, लैला का रंग काला था जिस पर मजनू जी जान न्यौछावर करता था... भगवान् श्री कृष्ण का कलर भी तो काला था, जिनकी दुनिया दीवानी है... तो मेरे कहने का अर्थ है की रंग से कुछ नही होता ... अच्छा ये बताओ की मेरा भी रंग अगर काला हुआ तो तुम क्या करोगे ? क्या तुम्हारी मोहब्बत में कुछ कमी आ जायेगी ?
शारीक - सवाल ही नही उठता, बल्कि प्यार और बढ़ जायेगा...
रंजना- फ़िर चेहरा देखने के लिए क्यों बेताब हो ?
शारीक- कमाल है, लोग चाँद पर जाकर करीब से देख रहे हैं और मैं अपनी चाँद सी महबूबा को भी नहीं देख सकता... यह तो सरासर जुल्म है हम पर...
Saturday, December 27, 2008
रंगीला रतन, भाग-60
शारिक ने ये बातें इतने दिल से कही थीं की रंजना मोहित हो गयी... अब तक वह शारिक को इसलिए सता रही थी ताकि वह उसके चरित्र पर शक न करे तथा महिलाओं की मर्यादा भी बची रहे ... वह क्या जानती थी की उसकी इस बात से शारिक इतना व्यथित हो जायेगा... वह तो बेवफा रमेश की सताई हुई थी... रमेश की गडारी के कारण रंजना के कदम ऐसे डगमगाए की अभी तह संभालने का नम नहीं ले रहे थे... रंजना अब नए- नए लड़कों को अपने रूप जाल में या फ़िर दौलत के जाल में फंसाती थी और फ़िर अपना काम निकालने के बाद उसको भूल जाती थी... ऐसा करने में उसको बहुत आनंद आता था... वह समझती थी की लड़कों को मूर्ख बनाकर उसने बहुत बड़ा काम किया है... एक तरह से वह प्रतिशोध ले रही थी... उसके साथ रमेश ने जो किया था, उसका बदला वह तमाम पुरुषों से लेना चाहती थी... जब भी वह किसी लड़के को देखती तो उसमें वह बेवफा रमेश का प्रतिबिम्ब पाती थी... वह हर उस लड़के से बदला लेने की खातिर उसको अपने पास बुलाती, प्यार के झूठे जाल में उलझाती और फ़िर जिस्मानी प्यास बुझाने के बाद उसको झटक दिया करती थी... शारिक के विषय में भी उसने यही धारणा बना राखी थी,। सोचा था की उसको होटल में बुलाएगी और जिस्मानी भूख शांत कराने के बाद उसे छोड़ देगी... मगर शारिक की बातों को सुनकर वह बोली-
-तुम बहुत भोले हो शारिक , मैं कभी किसी से शिकायात नहीं करुँगी... यह शरीर अब तुम्हारा है, इसका जैसे इस्तेमाल करना चाहो कर सकते हो... मैं बिल्कुल नहीं रोकूंगी... बल्कि तुम्हारा साथ दूंगी...तुम्हें भी आनंद दूंगी और ख़ुद भी भोगुंगी, आओ, मेरे करीब आकर मेरे इन रस भरे होठों को चूम लो...आओ न , शर्माना छोड़ दो, घबराना छोड़ दो... मुझमे समा जाओ मेरे यार ...
इसके बाद रंजना ने उसके सांड हा आयल के एक शीशी दे दी... वह कुछ समझ पाटा , इससे पहले ही रंजना ने उस तेल की मालिश शारिक के संवेदन शील अंग पर करनी शुरू करदी, रंजना डॉक्टर तो थी ही, वह जानती थी की कौन सी दावा किस मर्ज में ज्यादा कारगर साबित होती है... सांड हा आयल ने जब अपना कमाल दिखाना शुरू किया तो रंजना बी ही चौंक गयी और वह ख़ुद भी... उसके अंग का आकार तो बढ़ ही गया इसके साथ-साथ वह गज़ब की उत्तेजना का शिकार होने लगा... काम वासना की जोरदार आंधी चलने लगी... उसने रंजना के होठों का रस चूसना शुरू कर दिया...
Friday, December 26, 2008
रंगीला रतन, भाग-59
रंजना- मुझसे कहो न , आख़िर दिक्कत क्या है ? क्यों अपने आपको कोसने में लगे हुए हो ?
शारिक- कुछ कहूं तो आफत , न कहूं तो मुसीबत ... समझो न फंस गया हूँ... मेरा मन अब मेरे काबू में नहीं है ... ऐसा लगता है जैसे मेरे दिल में शैतान बैठ गया है... कोई मुझे अन्दर से उकसा रहा है... अगर कोई गुनाह हो गया तो क्या होगा ? मैं तो कहीं का नहीं रहूँगा... पुलिस स्टेशन, कोर्ट कचहरी और फ़िर अखबार टी.वी का लफडा... आजकल ऐसे मामलों में मीडिया कुछ ज्यादा ही सतर्क हो गया है ...
रंजना- जो तुम्हारे मन में चल रहा है , उसे पूरा करके देखो... यकीन मानो, कुछ नहीं होगा... प्रयोग तो करके देखो, एक बार मेरी बात मानकर तो देखो ...
शारिक -कभी किसी ने मरकर यह जानने का प्रयास किया है की मरने के बाद कैसा अनुभव होता है ? अगर किया भी होगा तो क्या वह अनुभव उसके किसी काम आया ? बेचारा चला गया ...
रंजना- तुम बेवजह डर रहे हो... चलो , मालिश करो... अच्छा थोडी देर तक करो, फ़िर यदि जाने की इच्छा हो तो तुम्हें रोकूंगी नहीं, सिर्फ़ थोडी सी देर...
शारिक का गुप अंग दहाडें मार रहा था... एक हाथ से वह कभी -कभी उस अंग को दबाने का प्रयास कर लेता था, इस प्रयास का असर उल्टा ही होने लगा ... वह उसको दबाने की जितनी कोशिशें करता, वह उतना ही दहाड़ मारने लगता... वासना के गर्मी में वह अपने वजूद को पिघलता हुआ महसूस कर रहा था...एक पल वह भी आया जब उसका विशेष अंग रंजना की कमर से जा टकराया ... स्पर्श होते ही रंजना के बदन में बिकली सी कौंध गयी... काम भावनाएं जाग्रत हो उठीं ... अब वह हाथ घुमाकर उसे अपने हाथों से स्पर्श कर आनंद की अद्भुत अनुभूति करना छाती थी, तब ही शारिक पीछे हट गया ... रंजना ने उसको अपनेकरीब बुलाया , इतना करीब की आसानी से वह अपने मन की इच्छा पूरी कर सके ... आखिरकार उसकी हार्दिक इच्छा पूरी हो गयी... शारिक भी बदहवास हो गया और रंजना भी... वह कहने लगी-
- शारिक, क्या तुम मुझसे प्यार करने की इच्छा रखते हो, मगर कहने में झिझक रहे हो ?
शारिक- ये सब तुम कैसे जानती हो ... तुम्हारी कांपती हुई आवाज यह बताने के लिए काफ़ी है... मैं ग़लत तो नही कह रही हूँ...
शारिक -असली नब्ज़ पकड़ ली तुमने... मैं इसी बात को बताने से डर रहा था... तुमने पहले हियो इतना दारा दिया था की कुछ भी कहने या करने सेपहले ही डर लग रहा था... जुबान काँप रही थी...
रंजना- तुम्हारा हाल देख कर मैंने निर्णय किया है की आज तुम्हें रोकूंगी नहीं, तोकुंगी नहीं... तुम जो चाहो,जैसे चाहो कर सकते हो... इस जवानी का जी भरके आनंद उठा सकते हो... हाँ , मैं कुछ नहीं कहूँगा...
शारिक - बाद में ऐसा तो नहीं होगा जैसे यहाँ मुंबई में एक बार एक विदेशी महिला ने किया था...
रंजना- क्या किया था उस विदेशी महिला ने ?
शारिक- पहले तो उसने अपने साथी के साथ सम्भोग किया और बाद में कंडोम लेकर पुलिस स्टेशन चली गयी ... उसके साथी को बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था...
Wednesday, December 24, 2008
रंगीला रतन , भाग-57
- अरे यह तो सोमरस है, इसे पी लो, खूब आनंद आएगा... सारी झिझक दूर हो जायेगी... अब तक जिस लुत्फ़ से वंचित थे जब वह मिलेगा तो रूखी जिन्दगी में बहार आया जायेगी... पहले किसी गर्ल फ्रेंड के साथ मौज मस्ती की हैं या नहीं? चेहरे से तो शातिर लगते हो ... शरीफ नहीं... सच -सच बताओ...
शारिक- कभी नहीं, लडकियां इतनी आसानी से मिलती हैं क्या ? तुम्हारी बात अलग है, यूँ समझो की अंधे के हाथ में बटेर लग गयी है , वरना मुझे कौन घास डालती है... जो लड़के बनावटी बातें करते हैं... बे सर पैर का काम करते हैं, लडकियां भी उन्हीं के साथ घूमती हैं... मैं न तो ग़लत बात बर्दाश्त कर सकता हूँ और न ही किसी से बोल सकता हूँ...इसी कारण मेरी हर किसी से पटती नहीं है.... यही एक वजह है की मेरी गर्ल फ्रें बहुत कम हैं जितनी हैं ,उनसे एक सीमित रिश्ता ही बना हुया है... कभी सेक्स या मौज मस्ती के बारे में मैंने किसी से चर्चा नहीं की... अगर किसी ने प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया और यह बात सार्वजनिक करदी तो बड़ी बदनामी होगी... मैं उस तरह का लड़का हूँ की कम खाना पसंद है मगर कम कायदा बिल्कुल पसंद नहीं है...
रंजना- बातें तो अच्छी करते हो... लगता तुमसे पाकी दोस्ती करनी ही पड़ेगी... अच्छा... किसी गर्ल फ्रेंड के बारे में बताओ... किसी को देखकर तो लगता होगा की वह कम सेक्सी है, तो कोई बहुत ज्यादा या बिल्कुल नहीं...अकेले में तो सोचते हिंगे यार... अच्छा चलो, पहले एक पैग मारो ... इसके बाद मालिश भी करते रहना और बात भी करते रहना....
शारिक - मगर पियूं कैसे ? कभी पी नहीं है ... एक काम करो , मेरे हिस्से की तुम्ही चढ़ा जाओ , मैं समझूंगा मैंने ही पी ली है... जब दोस्त मान ही लिया है तो दोस्त के लिए इतना भी ने अहं कर सकती ?
शारिक - क्यों नहीं यार, सब कुछ किया जायेगा... फिलहाल भाषण छोड़कर चीअर्स बोलो...
शारिक ने जाम थाम लिया... जाम से जाम टकराने लगे... शराब का नशा उसके सर चढ़कर बोलने लगा... रंजना को उसकी किसी बात का कोई एतराज नहीं था... वह तो उसकी हर बात का आनंद उठा रही थी... शारिक कह रहा था-
आज तो खुदा ही खैर कर सकता है... घर जाने पर अम्मी को तुंरत पता चल जायेगा... अब्बू की तो कोई टेंशन नहीं है, वे तो पी खाकर रात को देर से आते हैं....
रंजना- उसका इलाज है न मेरे पास ... अभी फोन करके कोई अच्छा सा बहाना बनादो, कहदो की आज रात घर नहीं आ सकते... फ़िर आज की रात मेरे साथ गुजारना...
शारिक- तो क्या मुझे रात भर मालिश करनी पड़ेगी ? मैओं थाकुंगा नही ? कैसे कर पाऊंगा इतनी मेहनत ?
रंजना- मैं क्या जानूं ? तुमने ही तो कहा है की तुम मालिश कर सकते हो ? अरे बुद्धू ... मालिश बस आधा घंटा ही करनी है... उसके बाद तुम्हें जवानी के जलवों से वाकिफ करा उंगी ... कभी सुहागरात का नाम सूना है ?
शारिक - हाँ , बहुत बार ...
रंजना- आनंद उठाया है ?
शारिक - नहीं, मगर उठाना चाहता हूँ ...
Monday, December 22, 2008
रंगीला रतन , भाग -56
शारिक- आप तो मेरा ही डायलोग मेरे ही ऊपर मार रही हैं... मैं तो पहले से ही गरीबों के अधिकारों की बात करता हूँ... क्या गरीबों के पास लेपटोप होता है , इंटर नेट का कनेक्शन भी होता है , और इसके बावजूद भी बह गरीब ही रह जाता है क्या ? फ़िर तो गरीबी की परिभाषा ही बदलनी पड़ेगी ....
रंजना- हो सकता है जिस लेपटोप पर मैं काम कर रही हूँ, वह तुम जैसे अमीर का हो.... ये भी हो सकता है की ....?
शारिक - की तुम झूठ बोल राजी हों, हैं न ? हांलाकि मुझे भरोसा हो गया तुम पर...झूठ नहीं बोल पाओगी तुम ...
रंजना- मस्का लगा रहे हो ? पटाने का यह तरीका अच्छा है...
शारिक- अब नहीं , मस्का तो पहले लगा रहा था... जब बिना देखे ही तुम्हारे हुस्न की तारीफ़ कर था ... अब जो कह रहा हूँ वह तो मेरे दिल की आवाज है... और इस बारे में फ़िर कभी कुछ नहीं कहूँगा...
रंजना- जानती हूँ... तुम सब लड़के लोग ऐसे ही होते हैं... नई-नई बातें तो ऐसे ईज़ाद कर लेते हैं की हम सोच भी नहीं सकते... चलो , ठीक है ... और कुछ कहो.... अपनी पसंद या नापसंद के विषय में बताओ...
शारिक-इस वक्त तो पहली पसंद तुम ही तुम हो... भले ही तुम्हें देख नहीं पाया मगर तुम्हारी सूरत मैं अपने दिल में बसा चुका हूँ... तुम्हारा जिस्म भी मालिका शेरावत की तरह ही होगा... ये मेरा दावा है... फर्क ये है की चेहरा गोल होगा... मेरे अनुमान के मुताबिक तुम बेहद सेक्सी हो...
रंजना- अंधेरे में तीर मारकर अपने आपको तीसमारखां समझ रहे हो ?
शारिक - चाहे जो हो , मगर बात सच है... इनकार करके देखो... कर ही नही पाओगी, मेरा दावा है... तुम्हें रोजाना एक नए मर्द की जरूरत पड़ती होगी... भले ही वह उपलब्ध न हो, या तुम उसे न बुलाओ मगर जरूरत जरूर पड़ती होगी... मेरा चैलेन्ज है , जो मेरी बात को झूठा साबित करेगा ,उसको ५० रुपये का नकद इनाम दूंगा...
रंजना- तो मैं कहूँगी की तुम शर्त हार गए... निकालो ५० रुपये...
शारिक- मैं आज तक कभी किसी से नहीं हारा...तुम अपने आपको इस तरह धोखा नहीं दे सकतीं....
रंजना- आज दोपहर तीन बजे हम होटल ग्रेट में मुलाक़ात करेंगे... अब खुश हो?
शारिक- इस खुशी को मैं कैसे सहन कर पाऊंगा... जी तो चाहता है की तुमसे बात करता रहूँ । मगर अब तैयार हो जाता हूँ... ओके बाय ....
फोन डिस्कनेक्ट हो गया... रब्न्जना उस लड़के के बारे में सोचती रह गयी... वह उससे आधी उम्र का लड़का था... जनरेशन गेप का मतलब वह अच्छी तरह से समझती थी... नहा धोकर उसने खाना खाया और हल्का मेकप करने के बाद बताये गए होटल की तरफ़ रवाना हो गयी ... उसने रास्ते में शारिक को बताया की योजना बदल चुकी है... ग्रेट की की बजाय उसने शारिक को दूसरे होटल में बुलाया... यह कदम उसने सुरक्षा की द्रष्टि से उठाया था...
Sunday, December 21, 2008
रंगीला रतन, भाग-55
रंजना- अभी तो प्यार का खेल चल रहा है... शुरुआत ही हो रही है और इतने में ही तुम बुरी -बुरी बातें करने लगे... ऐसा कैसे चलेगा... कुछ अच्छी बात करो ... ऐसे मौसम में निराश भरी बातें नहीं की जातीं...
शारिक- फ़िर ये तो कहो की मैं क्या कहूं ? कैसे कहूं ? जब कुछ कहने जाता हूँ तो तुंरत डांटदेती हो... तुम टीचर हो क्या ? टीचर लोग ही ऐसी डांट पिलाती हैं... सुन रही हो न , मैं क्या कह रहा हूँ ?
रंजना- हाँ -हाँ सुन रही हूँ, ज़रा नाश्ता करने लगी थी... तुमने किया क्या ?
शारिक- हाँ , सुबह आठ बजे ही कर लिया...
रंजन- वैरी गुड ... क्या लेते हो नाश्ते में?
शारिक- वक्त पर डिपेंड करता है... आज तो आमलेट के साथ चपाती खाई है... ये मेरा फेवरेट है...
रंजना- अच्छा है, मगर मैं मोर्निंग में नोंवेज नहीं खाती हूँ... अच्छा ये बताओ तुम्हें एक्ट्रेस कौन सी अच्छी लगती है ? नए दौर की या पुराने दौर की ?
शारिक- पुराने दौर की कोई चीज मुझे नहीं भाति ... मेरी पसंद मल्लिका शेरावत थी, मगर अब ख़ुद ही मेरी पसंद बदल गयी है... अब मुझे कोई और बहाने लगी है... सच कहूं तो वही दिन में भी ख्यालों में आने लगी है...
रंजना- कौन है वो खुशनसीब ? ज़रा हम भी तो जाने ? नाम बताकर देखो...
शारिक - नाम कैसे बतायूं ... उसने अभी तक नहीं बताया है.... जब वो बताएगी तो बता दूंगा... वैसे यह कम चांस नजर आता है... मुझे नहीं लगता की वह कभी अपना सही नाम बताएगी... वैसे भी नाम में क्या रखा है ? बस काम होना चाहिए ... मनोरंजन होना चाहिए ... जिनके पास दौलत होती है, वे लोग अपना दिल खुश करने के लिए कुछ भी कर सकते हैं ... किसी भी हद तक जा सकते है, और जिनके पास सिर्फ़ दिल होता है, उनका धर्म-कर्म सब कुछ बड़े लोगों का दिल बहलाना ही होता है...
रंजना- अरे वाह, अच्छा डायलोग है, तुमने ख़ुद लिखा क्या ? आजकल भोजपुरी फिल्में खूब बन रही हैं... वहाँ भी अब अच्छे लेखकों का अभाव होने लगा है... मेरी मानो, कोशिश करो कहीं न कहीं काम जरूर मिल जायेगा... पार्ट टाइम में मालिश करने से बेहतर यही काम रहेगा...
शारिक- देखो, मैंने कहा था न ? दौलत का असर दिखने लगा न ? अब तुम मुझसे चिढ रही हो ... बातों ही बातों में आखिरकार तुमने बता ही दिया की मैं मालिश कतरने वाला एक मामूली सा इंसान हूँ और मुझे न कुछ कहने का हक़ है, न पूछने का... मैं मूकदर्शक बना तमाशा देखता रहूँ...अगर यह सच नहीं है तो अपने दिल पर हाथ रखकरकर इनकार कर दो... कहदो की मैं झूठ बोल रहा हूँ...
रंजना- मैं तुम्हारा मजाक नहीं उड़ा रही हूँ ... तुम्हें यह जानकर आश्चर्य होगा की मैं बेहद मामूली और गरीब घर से ताल्लुक रखने वाली हूँ... तुमने कैसे जान लिया की मेरे पास पैसा है... सिर्फ़ इसलिए अंदाजा लगा लिए की मैंने मालिश करवाने का विज्ञापन दिया है... तो क्या गरीब लोग जिन्दगी का लुत्फ़ नहीं उठा सकते ?

Dec 21, 01:29 am
गाजियाबाद, जागरण संवाद केंद्र : प्रदेश के परिवहन मंत्री रामअचल राजभर ने कहा कि जल्द ही रोडवेज में 11 हजार नई बसें शामिल की जाएंगी, जिनमें 1725 वातानुकूलित होंगी।
उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार की योजना ब्लाक व गांव को जिले से जोड़ने की है। उन्होंने लोड फैक्टर और आय के मामले में गाजियाबाद रीजन के रोडवेज अधिकारियों की पीठ भी थपथपाई।
परिवहन राज्य मंत्री शनिवार को रोडवेज बस अड्डे से सर्वजन हिताय बस सेवा के तहत 15 नई बसों को हरी झंडी दिखाने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार के सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय सिद्धांत को साकार करने के लिए यह बस सेवा शुरू की गई है। उन्होंने बताया कि सर्वजन हिताय बस सेवा के पहले चरण में प्रदेश के सभी जिलों में 426 बसें दी जा चुकी हैं और दूसरे चरण में सभी मंडलों को 30-30 बसें दी जा रही हैं।
परिवहन मंत्री ने कहा कि गाजियाबाद रीजन में 141 मार्गो पर 495 बसें संचालित हो रही हैं तथा इस क्षेत्र की बसें प्रतिदिन 1.80 लाख किमी चल रही हैं। यह बसें प्रतिमाह 47 लाख रुपये कमा रही हैं, जो प्रदेश में सर्वाधिक है। उन्होंने कहा कि गाजियाबाद क्षेत्र ने एक वर्ष में 4.75 करोड़ रुपये का सर्वाधिक लाभ अर्जित करने का भी रिकार्ड बनाया है, जो प्रदेश में सर्वाधिक है।
श्री राजभर ने बताया कि आगामी वर्षो में 7200 करोड़ रुपये खर्च करके पुरानी बसों के स्थान पर 18 हजार नई बसें संचालित करने की योजना पर काम शुरू कर दिया गया है। भविष्य में इंटरनेट से टिकट बुकिंग व्यवस्था की जाएगी व बस अड्डों पर यात्री सुविधाओं पर 280 करोड़ रुपये खर्च करने की योजना है।
श्री राजभर ने बताया कि मशीन से टिकट वितरण कुछ स्थानों पर लंबी दूरी की बसों में शुरू किया गया है, अब इसे प्रदेश भर में लागू किया जाएगा। उन्होंने बताया कि बसों में व्हीकल ट्रैकिंग सिस्टम लगाया जाएगा, जिससे पता चल सकेगा कि कौन सी बस कहां है। बसों की समय सारिणी के लिए साफ्टवेयर तैयार किया जा रहा है और एलसीडी स्क्रीन लगाकर यात्रियों को बसों के समय की जानकारी दी जाएगी।
इस मौके पर प्रदेश के कृषि शिक्षा एवं कृषि अनुसंधान मंत्री राजपाल त्यागी ने कहा कि कोई भी घटना होने पर सरकारी बसों पर गुस्सा उतारा जाता है, यह बंद होना चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकारी बसें जनता के धन से ही खरीदी जाती हैं, इसलिए वे स्वयं बसों का ध्यान रखें। कार्यक्रम में मोदीनगर विधायक मास्टर राजपाल सिंह ने भी विचार व्यक्त किए।
अतिथियों का स्वागत क्षेत्रीय प्रबंधक अशोक कुमार, सहायक क्षेत्रीय प्रबंधक अतुल जैन आदि ने किया।
जल्द दूर की जाएगी सीएनजी फिलिंग स्टेशन की समस्या
परिवहन राज्य मंत्री रामअचल राजभर ने जल्द ही जिले में सीएनजी फिलिंग स्टेशन लगवाने का आश्वासन दिया। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि नगर बस सेवा रूट की बसों को हर हाल में चलवाया जाएगा।
Saturday, December 20, 2008
रंगीला रतन, भाग-54
रंजना- बस-बस अब रहने भी दो, इतने सवालों का जवाब मैं कैसे दे पाउंगी ? एक साथ थकाने का इरादा है क्या ? हौले-हौले पूछा करो, हौले -हौले सब का जवाब मिल जायेगा... उत्सुकता अच्छी बात है मगर हद भी न होने पाये...
शारिक- कमाल करती हैं आप ... सब्र करने को कहती हैं ... यहाँ जान अटकी पडी है ,और आप ,आप हैं की मुझ पर तरह -तरह की पाबंदियां लगा रही हैं... जब मैं आपको देख ही नहीं पाऊंगा, अंधेरे में तुम्हारे जिस्म की मालिश करनी पड़ेगी ,तो तुम भी मुझे नहीं देख पाओगी... इस तरह तो गज़ब हो जायेगा... अआप कैसे पह्चानेंगी मुझे ? आपको ऐसे तो आनंद ही नहीं आएगा...
रंजना- ओह, अब तुम आप पर आ गए ... पहले तो बड़े तुम-तुम कर रहे थे...
शारिक- हाँ, मैं कुछ परेशानी का अनुभव कर रहा हूँ... मेरे ख़याल से मुझे अब फोन रख देना चाहिए... तुम्हें तकलीफ हो रही होगी... ऐसा ठीक रहेगा न ?
रंजना- कैसा ठीक रहेगा ? ये सब सवाल मुझसे क्यों कर रहे हो ? जो भी चाहते हो, वो करो... जब फैसला कर ही लिया है तो फ़िर पूछने की क्या जरूरत आन पडी ?
शारिक- तो अब फोन पर तुम्हारी राजी पूछने में भी ऐतराज होने लगा... फोन गरम होने लगा था, इसलिए कह रहा था, अब नहीं कहूँगा... लेकिन अगर ऐसे ही बात करते रहे तो तुम तैयार कैसे होंगी ? अरे हाँ, एक बात ये बताओ की तुम मुझे पहचानोगी कैसे ? अंधेरे में तो तुम भी नहीं देख पाओगी न?या
अंधेरे में चेहरे पहचानने की कला भी जानने लगी हो क्या ?
रंजना- मेरे चेहरे पर मुखौटा लगा रहेगा... मैं तुम्हें देख पाउंगी, मगर तुम मुझे नहीं देख पाओगे ...
शारिक- ये क्या कह रही हो... दोस्त भी कहती हो और दोस्तों के साथ ये जासूसों जैसा व्यवहार भी करती हो ... यह सब सुनने में भी बेहद अजीब सा लग रहा है तो प्रत्यक्ष में कैसा लगेगा?
रंजना- तुम्हें क्या ऐतराज है ? मेरे ख्याल से तुमको सिर्फ़ अपने काम पर ध्यान देना चाहिए... आगे तुम्हारी इच्छा ... अगर चाहो तो हाँ करो , ना चाहो तो मैं किसी और से अपना काम करा लुंगी...
रंजना- नहीं , मुझे कोई ऐतराज नहीं है... मैं हर हाल में सेवा करने का इच्छुक हूँ.... आज तक मैंने किसी लड़की के बदन को टाच नहीं किया है... मैं महसूस करने का इच्छुक हूँ की उस वक्त कैसा लगता है ?
आह, बस उसी क्षण का इन्तजार है ... मैंने जबसे तुम्हारा एड पढा है ,तभी से यह सोचना शुरू कर दिया है मिलने पर ये बात कहूँगा, वो कहूँगा ... मगर तुम बीच में ही ये गजब कर रही हो...
रंजना- तो फ़िर नियम क़ानून भी तो मानने पड़ेंगे ही... तुम्हें उसके लिए भी तैयार रहना चाहिए
शारिक- तुम्हारे जिस्म को स्पर्श करने के लिए अब अगर फांसी पर भी चढ़ना पड़े तो गम नहीं ...
Friday, December 19, 2008
रंगीला रतन ,भाग-५३
रंजना- कोई बात नहीं... मैं फ़िर भी बुरा नहीं मानूंगी... जो भी कहना है कहो, तभी तो दिल के अन्दर की आवाज को मुझ तक पहुचा पाओगे... वैसे इस वक्त तुम कर क्या रहे हो ?
शारिक- कंप्यूटर के सामने बैठा चैटिंग कर रहा हूँ... एक पाकिस्तान की लड़की है ... बार-बार आती है और थोडी सी बात करके फ़िर गायब हो जाती है... मैं भी आज फुर्सत में हूँ...
रंजना- अच्छा, एक ही टाइम में डबल गेम खेल रहे हो ... समझ गयी... उँगलियाँ कंप्यूटर पर और मोबाइल कान पर ... मान गए उस्ताद... क्या नाम है जिससे चैट कर रहे हो ?
शारिक- नाम तो फरजाना बताया है, पर कौन जाने उसका असली नाम क्या होगा ? हो सकता है उसका नाम और यहाँ तक की पहचान भी नकली हो... ये भी हो सकता है की वह महिला ही न हो ... आजकल नेट पर ऐसा ही गोलमाल चलता है... ज्यादातर प्रोफाइल फर्जी होते हैं... सब गोरखधंधा चल रहा है...
रंजना- जान बूझकर भी जाल में क्यों फंस रहे हो ?
शारिक - आदत जो पड़ चुकी है... नेट का नशा ऐसा है की एक बार जिसको आदत लग गयी उसको समझो लग गयी... फ़िर खाना भी अच्छा नहीं लगता... मुझे मालूम है की जिससे बात हो रही हैं वह व्यक्ति जालसाज भी हो सकता है , इसके बावजूद रोजाना बेसब्री से इन्तजार रहता है... कितने ही लोग बरबाद हो रहे हैं... फ्री चैट की बात तो खैर ठीक है, अब यहाँ पर रुपयों के बदले बात कराई जा रही हैं... क्रेडिट कार्ड जिंदाबाद .... बेवजह पैसे की बर्बादी हो रही है... वहाँ पर भी सच्चाई कम और ठगी ज्यादा हो रही है.... हम जैसे लोग जान कर भी अनजान बन रहे हैं...
रंजना- ओह, ये बात है, मतलब आदत से मजबूर हो चुके हो ?
शारिक -मैं सिर्फ़ अपनी नहीं , सभी लड़कों की बात कर रहा हूँ... मैं भी हांलाकि उसमे शामिल हूँ मगर बहुत कम समय से ... दोस्तों को देख-देखकर ही इस लफडे में फंसा हूँ... अब सब ठीक हो जायेगा... तुम जो मिल गयी हो...
रंजना- अभी तो बात ही हुईं हैं, मुलाक़ात नहीं.... अगर मैं भी नेट जैसी चीटर निकली तब क्या करोगे ?
शारिक- मेरा दिल कहता है की ऐसा नहीं होगा... जिसके विचार सुंदर होते हैं वे ख़ुद भी बेहद हसीं होते हैं... मैं तो सुन्दरता का पैमाना भी अच्छे विचार और सिद्धांत के आधार पर मानता हूँ...
रंजना- बातें अच्छी बना लेते हो ?
शारिक- तुम्ही से सीखने की कोशिश कर रहा हूँ... मुझसे मुलाक़ात करते समय तुम्हें डरने की कोई जरूरत नहीं है... मेरा उद्देश्य कुछ ग़लत नहीं है.... मैं भरोसेमंद भी हूँ... तुम आँख बंद कर मुझ पपर भरोसा कर सकती हो... मैं प्रतिष्ठित परिवार से ताल्लुक रखता हूँ...
रंजना- इसका अर्थ ये हुआ की बहुत जिद्दी भी हो ? मानोगे नहीं मिले बिना ?
कामयाबी के नए आसमान पर सचिन दुबे , फोटो

मुंबई, श्री बालाजी मार्केटिंग के सर्वेसर्वा सचिन दुबे आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। अपने कैरियर की शुरुआत सचिन ने मामूली सी नौकरी से की , मगर अथाह मेहनत , लगन और कुछ कर गुजरने की तमन्ना ने सचिन दुबे को कामयाबी की नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया है। आयुर्वेदिक दवा बनाने वाली कम्पनियों में उनका नाम बड़े ही सम्मान और स्नेह के साथ लिया जाता है। उनकी दवाएं "दन्तावली ", "पाईलोरा ", "टॉप गन " , "रूमों हर्ब " और " नित्य्सेवी" आज पूरे देश में लोगों को लाभ पहुचा रही हैं। सचिन दुबे ने बताया की जय श्री फार्मास्युतीकल और श्री बालाजी मार्केटिंग कम्पनी दस वर्ष पूरे कर ग्यारहवे वर्ष में प्रवेश कर चुकी हैं। आज उनका टर्न ओवर पाँच करोड़ तक पहुच चुका है। आज उनकी कम्पनी के उत्पादन गुजरात , महाराष्ट्र , मध्य प्रदेश, छत्तीस गढ़ , राजस्थान , हरयाणा , पंजाब आदि राज्यों में लोकप्रिय हो रहे हैं। विनम्र स्वभाव के सचिन दुबे अपनी सफलता का श्रेय अपने विक्रेताओं, डिस्ट्रीब्यूतार्स और साथियों को देते हैं। सचिन दुबे अब महिला उपयोगी दवाओं का उत्पादन करने की योजना बना रहे हैं। मुंबई दौरे पर आए सचिन दुबे ने एक विशेष बातचीत में बताया की दन्तावली एक गम मसाज पावडर है। इससे दांतों के दाग धब्बे बिल्कुल साफ़ हो जाते हैं तथा दांत हीरे की तरह चमकने लगते हैं। टॉप गन कैप्सूल तथा तेल से काम समस्याओं का समाधान होता है। जो लोग बिस्तर पर अपनी पार्टनर को संतुष्ट नहीं कर पाते , उनके लिए यह टॉप गन नामक दवा वरदान साबित हो रही है। रूमों हर्ब कैप्सूल और तेल में उपलब्ध है। यह जोडों के दर्द में रामबाण साबित हो रही है। पेट की गैस और कब्ज दूर करने के लिए नित्य सेवी चूर्ण बेहद मशहूर साबित हो रहा है। सचिन दुबे ने बताया की उनकी कम्पनी लोगों की समस्याओं का समाधान जड़ से करने में विश्वाश रखती है। सचिन दुबे कहा की जिन लोगों को बबासीर की परेशानी है, उसके लिए पायालोरा से अच्छी कोई दवा हो ही नही सकती।
Thursday, December 18, 2008
रंगीला रतन , भाग--52
मनाया जा सकता है ? अगर एक बार मिल लूँगा तो सब जान जाऊँगा... मेरा यकीन करो, मैं फ़िर तुम्हें तुमसे भी जयादा जानने लगूंगा... इसीलिए तो मैं मुलाक़ात करने का इच्छुक हूँ...
रंजना- तुम बच्चों जैसी हाथ कर रहे हो ... मैं कोशिश करती हूँ... तुम चाहो तो फोन काट सकते हो... तुम्हारा चार्ज लग रहा होगा, मैं अपनी तरफ़ से फोन करती हूँ...
शारिक- इसकी कोई जरूरत नहीं है... मेरे पास ऐसा कार्ड है जिसका बिल नहीं भरना पड़ेगा... भले ही मैं कितना भी यूज करुँ... तभी तो तो मैं इतनी देर से बिंदास बात कर रहा हूँ... बिल देना पड़े तो हालत ख़राब हो जाए...
रंजना- अच्छा ये बात है , मगर ऐसा करना बुरी बात है... ये तो धोखाधड़ी है...
शारिक - ऐसे खांचा कार्ड मार्केट में आजकल खूब बिक रहे हैं... मैं अकेला थोड़े ही हूँ...
रंजना- किसी और के गुनाह करने से हमारा अपना गुनाह तो कम नहीं हो जाता शारिक... ग़लत हमेशा ग़लत ही होता है... अगर और लोग भी यह धोखाधड़ी कर रहे हैं तो इसका अर्थ यह नहीं की हमको भी ऐसा करने का लाइसेंस मिल जाता है... समझ रहे हो न तुम ?
शारिक को उस वक्त रंजना की बातें बहुत बुरी लगीं , उसे लगा जैसे किसी ने उसको खुली सड़क पर नंगा कर दिया हो... लेकिन अगले ही पल रंजना की बात सुनकर वह चौंक पड़ा... वह कह रही थी-
- मैं तुम्हारे फोन का बिल हर महीने चुका दिया करुँगी... तकलीफ उठाने की जरूरत नहीं है... इसके लिए किसी कम्पनी को धोखा देने की भी जरूरत नहीं... तुम नहीं जानते, यह कितनी बुरी आदत होती है... शुरुआत में लगता है की यह सामान्य सी बात है ... इसी कारण वह अपनी गलती को दोहराता रहता है... बाद में जब उसको अपनी भूल का एहसास होता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है... इसलिए मैं तुम्हें ऐसी सलाह दे रही हूँ... आगे से अगर तुम्हें पता चले की कोई बाजार में इस तरह का कार्ड बेच रहा है तो इसकी शिकायत तुंरत पुलिस के पास करना...
शारिक- ठीक है , मैं यह भी मंजूर करता हूँ... मगर मुलाक़ात आज और अभी करनी पड़ेगी... मालिश भले ही कभी करवाना , एक बार दर्शन दे दो...
रंजना- तुम्हारे मन में कोई फर्क तो नहीं आ रहा है... मेरा मतलब , नीयत तो साफ़ है ?
शारिक - हाँ, मैं ;;;; मैंने क्या कहा ? मैंने तो कुछ कहा भी नहीं...
रंजना- मैं कहने की नहीं सोचने की बात कर रही हूँ.... तुम्हारे दिल में पाप तो नहीं पनप रहा ? ध्यान रहे , तुम्हें मालिश अंधेरे में करनी होगी... मेरे शरीर का कोई भी अंग नहीं देख पाओगे... यहाँ तक की चेहरा भी नहीं...
शारिक- मुझे मंजूर है... मैं तो ख़ुद भी यही चाहता हूँ...
रंजना-- काया ? की तुम मुझे न देखो ?
शारिक- नहीं ...हाँ, ओह, यह मुझे क्या हो रहा है?
Wednesday, December 17, 2008
रंगीला रतन, भाग-५१
रंजना- नहीं शारिक , इसमें नाराजगी की क्या बात है ? मैं तो खुश हूँ इस बात से ... तुम इतनी दिलचस्पी ले रहे हो , क्या यह कम है ? अच्छा अपने बारे में कुछ बताओ... क्या पढाई के अलावा भी कुछ करते हो ? मेरा मतलब ,प्यार मोहब्बत से है... कोई लड़की -विद्की है क्या ?
शारिक -आज के जमाने में अच्छी लडकियां मिलती कहाँ हैं? सब तो सिर्फ़ मतलबी ही होती हैं...
रंजना- इसका मतलब चोट खाए हुए लगते हो ... दिल लगाकर पछतावा तो नहीं हो रहा ?
शारिक- ज्यादा तो नहीं, बस थोड़ा बहुत ...
रंजना- फ़िर तुम्हारी -हमारी खूब जोड़ी जमेगी...जरूर हमारा मिलन रंग लाएगा... तुम मालिश भी करते रहना और बातचीत भी करते रहना... मुझे तुम जैसे ladke बहुत पसंद हैं... इसी कारण तो मैंने अखबार का सहारा लिया है... बस इतनी सी प्रार्थना है की मेरे सिवाय किसी और टोपिक पर कभी बात मत करना... जानकारी करने की कोशिश भी मत करना...
शारिक- क्या प्यार - मोहब्बत की तरफ़ इशारा है ?
रंजना- उसकी कोई परेशानी नही... उस प्रकार की बातों से नहीं,परहेज इस बात से है की ये न पूछना की मैं कहाँ रहती हूँ, क्या करती हूँ , कौन हूँ... सिर्फ़ इतना ही काफी होना चाहिए की मुलाक़ात के बाद अगर हमने तुम्हें मालिश के लिए चुन लिया तो मेरे जिस्म से ही ताल्लुक रखना पड़ेगा... बात जितनी कम और मोहब्बत जितनी ज्यादा होगी, उतना ही ठीक रहेगा...
शारिक- वादा रहा ... मैं अपनी तरफ़ से कभी कोई ऐसी बात नहीं करूँगा जो तुम्हें बुरी लगे... मुझे पेमेंट की भी जरूरत नहीं है... मैं मुफ्त में सेवा करने का इच्छुक हूँ....
रंजना- ओह, ऐसी बात है... मगर ये कैसे हो सकता है ? तुम्हारा मेहनताना तो तुम्हें स्वीकार करना ही पडेगा...
शारिक - दुनिया में दौलत ही सब कुछ नहीं होती ... मोहब्बत भी मायने रखती है... अगर प्यार मिल गया तो और फ़िर क्या बचता है ? मैं तो प्यार को देखते ही सर झुका देता हूँ...
रंजना- बहुत दिलचस्प बातें करते हो .... लगता है मुलाक़ात का समय बदलना पड़ेगा...
शारिक - खूब आनंद आएगा... चलो, चलते हैं... आज ही मिलते हैं....
रंजना - इतनी बेचैनी भी ठीक नहीं है ... मैं अभी -अभी सोकर जगी हूँ...
शारिक- अब तो तड़प सी महसूस हो रही है....
रंजना- इतना तड़पना भी ठीक नहीं है.... अभी से ही इतने उतावले हो तो आगे क्या होगा ?
शारिक- तुम्हारी बातों ने दिल में खलबली सी मचा दी है... अब जुदाई सहन नहीं होती.... आह,
रंजना-- शरारती लड़के, मुझे उत्तेजित कर रहे हो ?
शारिक- शाम की बजाय मिलने का समय दोपहर में रखो न ? प्लीज।
Tuesday, December 16, 2008
रंगीला रतन, भाग-50
वहाँ से उसको मायूसी हाथ लगी... उसको बताया गया की अखबार कापेज छूट चुका है... कल कोई विज्ञापन नहीं प्रकाशित नहीं किया जा सकता... रंजना ने इन्तजार करना ही बेहतर समझा... उसने एक महीने का विज्ञापन अग्रिम बुक करा दिया और साथ ही क्रेडिट कार्ड से पेमेंट भी कर दिया ... वे दो दिन रंजना ने बड़ी बेचैनी के साथ गुजारे... आखिरकार वो दिन भी आया जब उसका विज्ञापन प्रकाशित हुआ... बड़ा अखबार था, रिस्पोंस आना स्वाभाविक था... सुबह से ही फ़ोन आने शुरू हो गए... पहला फ़ोन बांद्रा से था-
-हेलो, मैं
Monday, December 15, 2008
रंगीला रतन, भाग-49
ठीक तभी रवि की दूकान मालिक ने रवि को झकझोरकर कहा-
- तू सचमुच सपना देख रहा है रवि, अरे तुझे तो बुखार चढ़ रहा है... ये लोग कह रहे हैं की यहाँ पर एक लड़की आई थी, कहीं ऐसा तो नहीं उसी चुडैल ने तुझे कुछ खिला दिया हो ?पुलिस में शिकायत दर्ज करादूं?
रवि- नहीं सेठ जी, उसके ख़िलाफ़ शिकायत लिखवाने की कोई जरूरत नहीं है... इसमें उसकी कोई कमी नहीं है...
सेठ- मगर तू तो अभी कह रहा था की वह जादूगरनी है...
रवि- सपने में बुदबुदा रहा होउंगा ... वो बातें छोडिये... मुझे थोड़ा सा आराम करने दीजिये... मैं ख़ुद ही ठीक हो जाउंगा... सचमुच मुझे तन्हाई की जरूरत है...
सेठ- चल, किसी डॉक्टर से दवा दिल्वादूं ?
रवि -इस वक्त मुझे दवाओं की नहीं, दुआओं की जरूरत है... मेरा मतलब है तुम्हारे आशीर्वाद से मैं जल्द ही अच्छा हो जाऊँगा... अब तुम दुकान संभालो... सुबह से मैं ख़ुद दुकान पर बैठना शुरू कर दूंगा...
सेठ समझ नहीं पाया की रवि आख़िर क्या कह रहा है ? वह तो अपनी ही उलझनों का शिकार था... ऊपर से यह नई मुसीबत आ गयी... उसका दिमाग भन्ना गया... वह चुपचाप अपनी दुकान पर जा बैठा... रवि अपने मीठे सपनों में खो गया... उधर रंजना मुंबई पहुच गयी ... मुंबई में उसका मन नहीं लग रहा था... रवि की याद रह-रह कर सता रही थी... वह डॉक्टर जैसे सम्मानित पेशे से ताल्लुक रखती थी, इसी कारण समाज में उसको एक विशेष इज्जत प्राप्त थी... वह नहीं चाहती थी की लोग उसके चरित्र पर कीचड उछालें ... यही वजह थी की वह दूर-दूर के रवि जैसे लड़कों के साथ अपने जिस्म की प्यास बुझाया करती थी... मुंबई में उसको ऐसे लड़के मिलने मुश्किल हो रहे थे जो शारीरिक रूप से मजबूत हों और भरोसेमंद भी , किसी से इन संबंधों की चर्चा न करे... दिक्कत ये थी की ऐसा लड़का मिलेगा कहाँ और कैसे ? इस मामले में किसी को भी राजदार बनाने का मतलब था अपने ही हाथों से अपनी कब्र खोदना... उसका दिन तो क्लीनिक के काम में ही बीत गया मगर रात कटनी भारी हो रही थी... शाम होते ही उसने जाम छलकाने शुरू कर दिए... जब नशा होने लगा तो तन की भूख सताने लगी... बदन में अकडन सी होने लगी... उसने एक जोरदार अंगडाई ली ...इसके बाद उसकी निगाह एक अंग्रेजी अखबार पढा... उसमें कुछ विज्ञापन उसको अच्छे लगे... एक विज्ञापन का मजमून इस प्रकार था-देशी-विदेशी पर्यटकों की मालिश करने के लिए मेल-फी मेल के आवश्यकता है... रोजाना १० से २० हजार कमाने का स्वर्ण अवसर... इस विज्ञापन को पढ़ते ही उसकी आंखों में चमक उभर आई... उसने सोचा ,क्यों न एक नया नंबर खरीदकर अखबारों में विज्ञापन दिया जाए की महिलाओं की मालिश करने वाले स्मार्ट , युवा लड़कों की आवश्यकता है... लेकिन फ़िर ख़याल आया की फ़ोन नंबर देने से तकलीफें भी हो सकती हैं... किसी का भी फोन कभी भी आ सकता है... न जाने कब किसका फोन आ जाए .... फ़िर उसको ई मेल का विचार आया... ई मेल पर वह बायोडाटा और फोटो भी मांगा सकती थी ... उससे यह आइडिया मिल सकता था की सामने वाला लड़का किस तरह का है... उसको ज्यादा लोगों में से किसी एक को चुनने का अवसर भी मिल सकता था...
Sunday, December 14, 2008
रंगीला रतन, भाग-48
- ये मेरे साथ क्या हो रहा है रंजना ? तुमने मेरे ऊपर ये क्या जादू कर दिया ? क्या तुम सचमुच जादूगरनी हो ?
Friday, December 12, 2008
रंगीला रतन भाग-४६
- आह... आनंद की कोई सीमा नहीं है... इतना सुख तो शायद स्वर्ग जाने वालों को भी नसीब नहीं होता होगा....
रंजना- ठीक कहते हो... आज तो कुछ ज्यादा ही मजा मिल रहा है...
रवि- ऐसे आलम में किसी बीते वक्त की बातें करना उचित होगा क्या ? अगर हाँ तो मुझे खुशी होगी...
रंजना- बहुत स्मार्ट हो गए हो रवि , काफी टोल-मोलकर बोलने लगे हो...
रवि- तुम्हारे साथ रहकर अगर इतना भी नहीं सीख पाया तो क्या फायदा होगा ? जब तुम दिल्ली छोड़कर चली जाओगी तो हरदम तुम्हारे बारे में ही सोचा करूँगा... साथियों को बताया करूँगा की किस तरह एक परी मेरे सपने में आई और फ़िर किस तरह वह मेरी दुनिया बदलकर चली गयी...एक दिन टीवी पर मैंने एक फ़िल्म देखि थी , उसमे हीरो एक डायलोग मारता है... हीरो इन से कहता है की "तुम बहुत अमीर हो मेमसाब, मुझ जैसे गरीब के साथ एकाध रात गुजारना भले ही तुम्हारे लिए तफरीह जैसी छोटी बात होगी मगर हमारे लिए तो यह हजार जिन्दगी जी लेने के समान है " ... मैं उस हीरो की तरह तो तुमसे नहीं कह सकता... क्योंकि फ़िल्म और हकीकत में बहुत अन्तर होता है... इसलिए उस फर्क को यहाँ पर महसूस भी तो होना चाहिए...
रंजना ने रची गालों को चूम लिया... वह उसको जितना गंवार समझ रही था, वास्तब में वह इतना था नहीं... वह जब धीरे-धीरे खुलने लगा तो रंजना को उस पर प्यार आ गया... वह उसके जिस्म से लिपट गयी और उसे वस्त्र की तरह धारण करने लगी... अब रंजना की समझ में आया की समझदारी सिर्फ़ ज्यादा पढ़ लिख लेने से ही नहीं आ जाती... उसके लिए प्राकृतिक देन और माहोल का भी बहुत बड़ा असर होता है... रवि पूरे जोश में था... उसको इस बात की भी खुशी थी की आहिस्ता-आअहिस्ता उसका जादू रंजना के सर चढ़कर बोलने लगा था... दिल्ली में उसका वास्ता सभी तरह के लोगों से पड़ता रहता था... इस कारण वह होशियार हो गया था... उसने अंग्रेजी भाषा के कुछ शब्दों को ऐसे याद कर लिया था और उन शब्दों को इस अंदाज में बोलता था मानो इस भाषा का बहुत बड़ा ज्ञाता हो... रंजना की तारीफ करती हुई बोली-
- इसका मतलब ये हुआ की अगर तुम मुंबई आ गए तो मराठी भाषा बहुत जल्दी सीख जाओगे... तुम्हारे अन्दर संभावनाए अंजर आ रही हैं... जिसके अन्दर सीखने की लगन होती है वह सब कुछ जान जाता है...
रवि- कुछ बातें तो मैं अब भी जानता हूँ... हमारे पड़ोस में एक सुनार की दूकान है... वह मूल रूप से महाराष्ट्र का ही रहने वाला है... वह बताता है की वहाँ पर प्याज को कांदा और बहन को ताई कहते हैं....
रवि की इस मासूम सी बात पर रंजना खूब खिलखिलाकर हंस पडी ... दोनों प्यार की ऐसी दुनिया में मगन थे जहाँ कोई दुःख का नाम भी नहीं होता है...
Tuesday, December 9, 2008
रंगीला रतन ,भाग-44
रवि- तुम्हारी बात का बुरा मानकर कहाँ जाऊँगा... अगर तुम ये कह रही हो तो सच ही होगा... मुझे तो तुम्हारी हर बात का भरोसा है... जो कहोगी, सोच विचारकर ही कहोगी... दरअसल मुझे तो मानव स्वभाव , मनोविज्ञान और इंसानी रिश्तों के बारे में कुछ जानकारी ही नहीं है... ज्यादा पढा-लिखा भी नहीं हूँ... अभी दुनियादारी देखि भी नहीं है... ले देकर जो सीख रहा हूँ, तुमसे ही सीख रहा हूँ...
रंजना- तुम इसलिए और भी प्यारे लगते हो... कोई बात काटते भी नहीं... अपना विचार भी नहीं रखते...
रवि- अब तुम्हारे साथ रह रह कर समझने लगूंगा...
रंजना- मैं रमेश की बेवफाई की दास्ताँ सुना रही थी... जब वह मेरे साथ बिस्तर पर होता तो खूब मीठी-मीठी बात करता था... मेरी हर बात मानता था... यहाँ तक की हमेशा मेरे ही तलवे चाटता रहता था... मुझसे दूर जाते ही वह रागिनी के पहलू में गम ग़लत करने लगता... उसके संसर्ग से रागिनी को एक बेटी भी पैदा हो गयी... एक दिन हवाई दुर्घटना में रागिनी के पति की मौत हो गयी...तबसे वह स्थाई रूप से रागिनी के पास ही रहने लगा... बिना शादी किए ही वे दोनों पति-पत्नी की तरह रहने लगे थे... धीरे-धीरे रागिनी भी रमेश की रंगीन मिजाजी को समझने लगी थी... जब उसने खर्चा देना कम किया तो रमेश जिगोलो बनकर अपना खर्च निकालने लगा था... इस दौरान उसने एक लड़की को धखा दे दिया... प्यार का नाटक करके वह उसके साथ अन्तरंग सम्बन्ध तो बना बैठा मगर जब वह कुँवारी ही माँ बन बैठी तो उसने गर्भपात कराने की सोची... उस लड़की को सातवा महीना लग चुका था... डॉक्टर कह चुके थे की ऐसे समय गर्भपात कराना खतरे से खाली नहीं होगा... वह लड़की एक लीडर की थी... रवि को जब लगा की जान फंसने वाली है तो उसने हर हालत में लड़की का गर्भपात कराने का निर्णय लिया... वह गर्भवती लड़की को लेकर मेरे पिता के क्लीनिक आया... वहाँ भी उसको निराशा हाथ लगी तो वह मेरे पिता के पैरों पर गिरकर गिदगिदाने लगा... वहाँ पर उसने ख़ुद को उस लड़की का पति बताया था... पारिवारिक कलह का वास्ता देकर वह मेरे पिता को कनवेंस करने में सफल हो गया... लड़की कम उम्र की थी... गर्भपात के दौरान उसकी मौत हो गयी... पुलिस केस बनते-बनते बच्चा... आखिरकार रागिनी ने अपने ऊंचे रसूख का फायदा उठाकर मामले को रफा-दफा कर दिया ... हांलाकि उसके कुकर्म की जानकारी मेरे पिता को भी लग गयी और रागिनी को भी... तबसे रागिनी उससे और भी ज्यादा चिढ गयी ... वह उस्ससे कटी-कटी रहने लगी थी... उसका व्यवसाय भी बड़ा था... वह उसमें उलझी रहती थी... उसी बीच रमेश ने मुझे भी अपने झूठे प्यार के जाल में फंसा लिया था... जब मेरे घरवालों को इसकी भनक लगी तो वे अवाक रह गए... वे लोग रमेश की हरकतों के बारे में जानते थे... इसीलिए उससे बेहद चिढ़ते थे... मैं उसके प्यार में दीवानी हो चकी थी... जिस पर प्यार का रंग एक बार चढ़ जाए फ़िर वह उतारे नहीं उतरता... मेरि९ उम्र भी कम थी और अनुभव भी... मेरे घरवाले रमेश से जितनी नफरत करते, मैं उससे कई गुनी मोहब्बत रमेश से करने लगती... उस वक्त मेरे दिलो दिमाग पर रमेश ही रमेश छाया था... रात को सोते समय हभी वही दिखाई देता और जागने पर भी... उसी प्यार की आग ने मेरा सब कुछ जलाकर भस्म कर दिया...
रंगीला रतन, भाग-43
-मैं तुम अविश्वाश नहीं कर रही बल्कि सलाह दे रही हूँ... कभी-कभी मार्गदर्शन भी बहुत काम आता है...
रवि- हाँ वो तो है... अभी तुम्हारी रमेश , प्रज्ञा और रागिनी वाली बात अधूरी है... उसको कब पूरा करोगी ?
रंजना- हाँ, मैं बता रही थी की रागिनी ने रमेश के यौवन को चूसना शुरू कर दिया था... प्रज्ञा मुफ्त में आनंद उठा रही थी... रागिनी की पहुच राजनीति में भी अच्छी थी... प्रज्ञा को खुश करके वह उससे अपने कामों को निकालती रहती थी... इस तरह वे दोनों ही अपनी -अपनी जगह पर खुश थीं... रमेश की पढाई का खर्च प्रज्ञा ही उठा रही थी...
रवि- यह बात रमेश से पता चलीं या किसी और से ?
रंजना- और कौन कहता... रमेश ने शराब पीकर मेरे सामने सारा सच उगल दिया था... हांलाकि वह अपने साथ-साथ पिला तो मुझे भी रहा था मगर मैं पीने का नाटक ज्यादा कर रही थी... रमेश और मैं ठीक इसी तरह से सो रहे थे जैसे अब तुम और हम सो रहे हैं ... उसने मेरी गोलाइयों को कैद कर रखा था... मेरी सख्त गोलाइयां उस समय बेहद आकर्षक हुया करती थीं... रमेश इन्हें देख्क्लर बाबला हो जाया करता था...
रवि- इनका तो अब भी जवाब नहीं हैं... इन्हें देखते ही मेरे रौंगटे खड़े हो जाते हैं... तुमने को कामुक फ़िल्म दिखाई थी, उस फ़िल्म की हीरो इन के उभार भी इतने सुंदर नही थे, इनकी बात ही कुछ अलग है...
इसके बाद रवि ने उसके उभारों से अपने होठ सता दिए... रवि का यह अंदाज रंजना को इतना भाया की वह उसके होठों से अपने होठ रगड़ने लगी, यहाँ तक की वह रवि के संवेदनशील अंग से भी खिलवाड़ करने लगी... अब तक रवि भी थोड़ा सा समझदार हो गया था... उसकी कामशक्ति और कामक्रीड़ा के तौर तरीकों में काफी वृद्धि हुई थी... रवि उसके पूरे जिस्म को सहला रहा था.... रंजना फ़िर कहने लगी-
- मैं तो रमेश से अंशा प्रेम करने लगी थी... उसकी हर बात को पत्थर की लकीर मान लिया था... जो वह कहता मेरे लिए हर शब्द सत्य और आखिरी हो जाता...
रवि- मैंने किताबों मेरा सुना था की प्यार मेरा इंसान कुछ भी कर सकता है... क्या ऐसा हकीकत में भी होता है ?
रंजना- हाँ, प्यार में कोई कुछ भी कर सकता है... अब मुझे ही देखो न, मैंने तुमको अपने साथ के काबिल समझा , क्या पूरी दिल्ली में तुम्हारे जैसा कोई दूसरा नहीं होगा ?
रवि- क्यों नहीं हैं, करोड़ों हैं... मेरे अलावा यहाँ का हर इंसान अच्छा है...
रंजना- बात ये नहीं है, दरअसल हर आदमी की पसंद अलग होती है... कोई किसी को श्रेष्ठ मानता है और कोई किसी को... मुझे तुम्हारी सादगी और ईमानदारी ने इतना प्रभावित किया की तुम्हारी ही होकर रह गयी... इसी तरह रमेश से भी मैं दिलोजान से मोहाब्बत करने लगी थी...
Monday, December 8, 2008
रंगीला रतन, भाग-42
-तुम अभी तक खड़े क्यों हो ?बैठो आराम से ... आज हम इसी कमरे में रहने वाले हैं... आज मैं बहुत खुश हूँ... केई सालों के बाद मुझे इतनी खुशी नसीब हुई है... आज इस खुशी को सेलिब्रेट करते हैं...
रवि ने थोडी सी शरारत से काम लिया ... वह बेड पर अकेला लेटने के बजाय रंजना को भी लेकर गिर पड़ा... अब वह रंजना के गालों को चूम रहा था... रंजना ने अपने दहकते हुए होठ रवि के होठों से सटा दिए... रवि के दिमाग में झन्नाटा छा गया... उसका संवेदनशील अंग जोर-जोर से दहाडें मार रहा था... रंजना उस अंग से विशेष प्यार करने लगी... उसको सहलाने से रंजना को सुखद अनुभूति का एहसास होता था... रंजना की इस हरकत से रवि के मन में काम वासना की आंधी चलने लगती थी... वह उग्र होकर रंजना के सीने पर दबाव बढ़ाने लगता था... रंजन इसके बाद जब गर्म आह भरने लगती तो वह और भी बेचैन हो जाता... रंजना का अंदाज वाकई बेहद कातिल था... उसका फिगर भी जबरदस्त था... वह सुबह-सुबह नियमित तौर पर सर करने जाती थी तथा व्यायाम करती थी... इसी कारण उसका बदन आकर्षक हो गया था... उसके पेट पर ज़रा भी अतिरिक्त चर्बी दिखाई नहीं देती थी... उसके चेहरे पर भी गज़ब की चमक थी... रही सही कसर उसके बेबाक अंदाज से पूरी हो जाया करती थी... जब रवि ने उसके कपडों को हटाना शुरू किया तो वह थोड़ा सा विरोध करने लगी मानो इशारा कर रही हो की अभी नहीं... मगर रवि पर तो जैसे दीवानगी का जूनून सवार था... वह अपनी धुन में मगन था, रंजना की गोलाइयों से प्यार कर रहा था, इस बीच जो भी रुकावटें आयीं , उसने सबको पार किया... हर रुकावट को काबू में करना उसको बखूबी आता था... रंजना हर पल कामुक होती जा रही थी... रवि ने पूछा-
-यह इनकार कैसा है ? दिल की धडकनों का हाल भी तो समझो... ये क्या कहती हैं ?
रंजना- हाँ, हाँ, सब समझती हूँ... मगर वक्त की नजाकत को भी समझो... यह समय प्यार करने का है... मगर तुम, तुम तो सीधे मंजिल की तरफ़ दौड़ने लगते हो...
रवि- सफर पर मेरी कोशिश यही रहती है की जितना जल्दी हो सके अपनी मंजिल पर पहुच जाना चाहिए , आख़िर मकसदभी तो वही होता है...
रंजना- लेकिन जो आनंद धीरे-धीरे चलने में है, वह सरपट दौड़ने में कहाँ ?
रवि- बेफिक्र रहो, मैं खूब संभल -संभलकर चलता हूँ, न तो ख़ुद गिरूंगा और न ही गिरने दूंगा...
Sunday, December 7, 2008
रंगीला रतन, भाग-41
Saturday, December 6, 2008
रंगीला रतन, भाग-40
- क्या हुआ रवि, सब कुछ ठीक तो है ? तुम्हारे चेहरे की हवाइयां क्यों उड़ रही है ?
रवि- ऑफ़, कुछ मत पूछो यार,मुझे न जाने क्या हो गया है ... तुमने शायद जादू कर दिया है... मैं ख़ुद नहीं समझ पा रहा हूँ की मैं क्या कर रहा हूँ... जैसे ही मेरी नींद खुली मैंने तुम्हें देखा, तुमको यहाँ न पाकर मेरी साँस ऊपर-नीचे चलनी लगी... मुझ पर पागलपन सवार हो गया... मुझे लगा जैसे की मैं सपना देख रहा था... कभी -कभी भांग के नशे में भी ऐसा महसूस होने लगता है... मैंने समझा की किसी तरह से कल भंगकी गोली तो नहीं खाली... अभी यह सब सोच ही रहा था की इतने में तुम आ गईं... अब मैं प्रसन्न हूँ...
रंजन- शुक्र है , मैं जल्दी आ गयी, वरना तुम पता नही क्या कर बैठते ...
रवि- कहाँ चली गईं थीं सुबह-सुबह ?
रंजना- मैं होटल बुक कराने गयी थी... बाहर देखा तो सब दुकानें बंद हैं... मैं सोच रही थी की अगर तुमने जल्दी दूकान नहीं खोली और यह बात तुम्हारे सेठ को पता चली तो वह नाराज हो जायेगा...
रवि- हाँ, यह बात तो है... मैं ख़ुद भी इसी बात को लेकर परेशान हूँ... मगर ये बंद कैसे ? कोई नेता- वेता मर गया होगा ? यहाँ तो आए दिन यही होता रहता है... अगर किसीने मुह खोला तो गया काम से... नेता लोग भी कमाल करने लगे हैं... ये खुशी में भी पैसे लेकर जाते हैं औए गम में भी ... इनका कोई दीं ईमान नहीं होता ... जो भी ड्रामा करते हैं,दौलत के लिए करते हैं...
रंजना- एक बोर्ड पर लिखा था की किसी नेता को गिरफ्तार कर लिया है , उसीके विरोध में दुकानें बंद की गयी हैं...
रवि- अच्छा, ध्यान आया... विधूडी को पकडा गया होगा... कई दिनों से ऐसी चर्चा चल रही थीं... भ्रष्टाचार का एक माला चल रहा था शायाद उसी में गिरफ्तारी हुई होगी....
रंजना- छोडो भी, क्या रखा है इन बातों में अब काम की बातें करते हैं... मैं होटल गयी थी... अपने लिए कमरा बुक करा आयी हूँ... मेरे खयाल से यह जगह हम दोनों को मोहब्बत के लिहाज से सुरक्षित नहीं थी... यहाँ कोई भी और कभी आ - जा सकता है... कोई हमको यहाँ पर इस हालत में देख लेता तो तुम्हारी बदनामी हो जाती... इसी कारण मैंने पर्सनल कमरा बुक करा लिया है... अब आराम से दोनों प्यार का आनंद उठाएंगे...
Friday, December 5, 2008
राज्य शासन के प्रवक्ता के अनुसार 16 वर्ष पूर्व छह दिसम्बर को अयोध्या में विवादित धार्मिक ढांचे को ढहाये जाने की घटना को लेकर सरकार बेहद संवेदनशील है। जिसके चलते हर जिले के पुलिस कप्तान से कहा गया है कि वह अपने जिले में 6 दिसम्बर की घटना को लेकर साम्प्रदायिक सौहार्द बनाये रखने के लिए शान्ति कमेटी के लोगों के साथ बैठक करें और जिले के हर मोहल्ले एवं महत्वपूर्ण स्थल के समीप तथा जिले के बस व रेलवे स्टेशन, भीड़ भरे बाजार, मॉल एवं सिनेमाघर तथा होटल आदि के आसपास पुलिस पिकेट एवं सिपाही तैनात करें। जिलें में संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त पाये जाने वाले लोगों पर नजर रखी जाये तथा खुफिया के लोगों के साथ मिलकर जिले की सुरक्षा व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त बनाये रखा जाये।
नेपाल सीमा से सटे जिलों में चौकसी बढ़ाये जाने के निर्देश भी डीजीपी ने इस क्रम में दिये हैं। जिसमें उन्होंने कहा है कि नेपाल से जिले में आये हर व्यक्ति का पूरा ब्यौरा रखा जाये और सीमावर्ती सभी जिलों मे होटल आदि में कौन रुका है? इसकी भी जानकारी की जाये। 6 दिसम्बर के दिन और इसके पूर्व राज्य में कोई अप्रिय घटना न होने पाये इसके लिए डीजीपी ने सभी जिलों में पुलिस सतर्कता बढ़ाने और गश्त एवं चेकिंग पर जोर देने की सलाह जिलों के पुलिस अफसरों को दी है।
दलितों के मसीहा ,महामानव डॉक्टर भीमराव आंबेडकर को शत-शत नमन
कई सामाजिक और वित्तीय बाधाएं पार कर, अम्बेडकर उन कुछ पहले अछूतों मे से एक बन गये जिन्होने भारत में कॉलेज की शिक्षा प्राप्त की। अम्बेडकर ने कानून की उपाधि प्राप्त करने के साथ ही विधि, अर्थशास्त्र व राजनीति विज्ञान मे अपने अध्ययन और अनुसंधान के कारण कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स से कई डॉक्टरेट डिग्रियां भी अर्जित कीं। अम्बेडकर वापस अपने देश एक प्रसिद्ध विद्वान के रूप मे लौट आए और इसके बाद कुछ साल तक उन्होने वकालत का अभ्यास किया। इसके बाद उन्होने कुछ पत्रिकाओं का प्रकाशन किया जिनके द्वारा उन्होने भारतीय अस्पृश्यो के राजनैतिक अधिकारों और सामाजिक स्वतंत्रता की वकालत की।
शिक्षागायकवाड शासक ने संयुक्त राज्य अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय मे जाकर अध्ययन के लिये अम्बेडकर का चयन किया गया साथ ही इसके लिये एक 11.5 डॉलर प्रति माह की छात्रवृत्ति भी प्रदान की। न्यूयॉर्क शहर में आने के बाद, अम्बेडकर को राजनीति विज्ञान विभाग के स्नातक अध्ययन कार्यक्रम में प्रवेश दे दिया गया। शयनशाला मे कुछ दिन रहने के बाद, वे भारतीय छात्रों द्वारा चलाये जा रहे एक आवास क्लब मे रहने चले गए और उन्होने अपने एक पारसी मित्र नवल भातेना के साथ एक कमरा ले लिया। 1916 में, उन्हे उनके एक शोध के लिए पी. एच.डी. से सम्मानित किया गया। इस शोध को अंततः उन्होंने पुस्तक "इवोल्युशन ओफ प्रोविन्शिअल फिनान्स इन ब्रिटिश इंडिया" के रूप में प्रकाशित किया। हालाँकि उनकी पहला प्रकाशित काम, एक लेख जिसका शीर्षक, भारत में जाति : उनकी प्रणाली , उतपत्ति और विकास है। अपनी डाक्टरेट की डिग्री लेकर अम्बेडकर लंदन चले गये जहाँ उन्होने ग्रे'स इन और लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स में कानून का अध्ययन और अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट शोध की तैयारी के लिये अपना नाम लिखवा लिया। अगले वर्ष छात्रवृत्ति की समाप्ति के चलते मजबूरन उन्हें अपना अध्ययन अस्थायी तौर बीच मे ही छोड़ कर भारत वापस लौटना पडा़ ये विश्व युद्ध प्रथम का काल था।
बड़ौदा राज्य के सेना सचिव के रूप में काम करते हुये अपने जीवन मे अचानक फिर से आये भेदभाव से अम्बेडकर उदास हो गये, और अपनी नौकरी छोड़ एक निजी ट्यूटर और लेखाकार के रूप में काम करने लगे। यहाँ तक कि अपनी परामर्श व्यवसाय भी शुरू किया जो उनकी सामाजिक स्थिति के कारण विफल रहा। अपने एक अंग्रेज जानकार बंबई के पूर्व राज्यपाल लॉर्ड सिडनेम, के कारण उन्हें बंबई के सिडनेम कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनोमिक्स मे राजनीतिक अर्थव्यवस्था के प्रोफेसर के रूप में नौकरी मिल गयी। 1920 में कोल्हापुर के महाराजा अपने पारसी मित्र के सहयोग और अपनी बचत के कारण वो एक बार फिर से इंग्लैंड वापस जाने में सक्षम हो गये। 1923 में उन्होंने अपना शोध प्रोब्लेम्स ऑफ द रुपी (रुपये की समस्यायें) पूरा कर लिया। उन्हें लंदन विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टर ऑफ साईंस की उपाधि प्रदान की गयी। और उनकी कानून का अध्ययन पूरा होने के, साथ ही साथ उन्हें ब्रिटिश बार मे बैरिस्टर के रूप में प्रवेश मिल गया। भारत वापस लौटते हुये अम्बेडकर तीन महीने जर्मनी में रुके, जहाँ उन्होने अपना अर्थशास्त्र का अध्ययन, बॉन विश्वविद्यालय में जारी रखा। उन्हे औपचारिक रूप से 8 जून 1927 को कोलंबिया विश्वविद्यालय द्वारा पी एच.डी.प्रदान की गयी।
प्रारंभिक जीवनभीमराव रामजी आंबेडकर का जन्म ब्रिटिशों द्वारा केन्द्रीय प्रांत ( अब मध्य प्रदेश में ) मे स्थापित नगर व सैन्य छावनी महू में हुआ था। वे रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई मुरबाद्कर के 14 वें व अंतिम बच्चे थे। उनका परिवार मराठी था और वो अंबावडे नगर जो आधुनिक महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले मे है से संबंधित था। वे हिंदू महार जाति से संबंध रखते थे, जो अछूत कहे जाते थे और उनके साथ सामाजिक और आर्थिक रूप से गहरा भेदभाव किया जाता था। अम्बेडकर के पूर्वज लंबे समय तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में कार्यरत थे, और उनके पिता,भारतीय सेना की महू छावनी में सेवा में थे और यहां काम करते हुये वो सूबेदार के पद तक पहुँचे थे। उन्होंने मराठी और अंग्रेजी में औपचारिक शिक्षा की डिग्री प्राप्त की थी। उन्होने अपने बच्चों को स्कूल में पढने और कड़ी मेहनत करने के लिये हमेशा प्रोत्साहित किया।
कबीर पंथ से संबंधित इस परिवार मे, रामजी सकपाल, अपने बच्चों को हिंदू ग्रंथों को पढ़ने के लिए, विशेष रूप से महाभारत और रामायण प्रोत्साहित किया करते थे। उन्होने सेना मे अपनी हैसियत का उपयोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूल से शिक्षा दिलाने मे किया, क्योंकि अपनी जाति के कारण उन्हें इसके लिये सामाजिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा था। स्कूली पढा़ई में सक्षम होने के बावजूद अम्बेडकर और अन्य अस्पृश्य बच्चों को विद्यालय मे अलग बिठाया जाता था और अध्यापकों द्वारा ना तो ध्यान ही दिया जाता था ना ही कोई सहायता दी जाती थी। उनको कक्षा के अन्दर बैठने की अनुमति नहीं थी साथ ही प्यास लगने पर कोई उँची जाति का व्यक्ति उँचाई से पानी उनके हाथों पर पानी डालता था क्योकि उनको ना तो पानी ना ही पानी का पात्र को स्पर्श करने की अनुमति थी क्योकि लोगों के मुताबिक ऐसा करने से पात्र और पानी दोनो अपवित्र हो जाते थे। आमतौर पर यह काम स्कूल के चपरासी द्वारा किया जाता था जिसकी अनुपस्थिति मे बालक अम्बेडकर को बिना पानी के ही रहना पड़ता था। 1894 मे रामजी सकपाल सेवानिवृत्त हो जाने के बाद सपरिवार सतारा चले गए और इसके दो साल बाद, अम्बेडकर की मां की मृत्यु हो गई। बच्चों की देखभाल उनकी चाची ने कठिन परिस्थितियों में रहते हुये की। रामजी सकपाल के केवल तीन बेटे, बलराम, आनंदराव और भीमराव और दो बेटियाँ मंजुला और तुलासा ही इन कठिन हालातों मे जीवित बच पाये। अपने भाइयों और बहनों मे केवल अम्बेडकर ही स्कूल की परीक्षा में सफल हुए और इसके बाद बडे़ स्कूल मे जाने में सफल हुये। अपने एक देशस्त ब्राह्मण शिक्षक महादेव अम्बेडकर जो उनसे विशेष स्नेह रखते थे के कहने पर अम्बेडकर ने अपने नाम से सकपाल हटाकर अम्बेडकर जोड़ लिया जो उनके गांव के नाम "अंबावडे" पर आधारित था।
रामजी सकपाल ने 1898 मे पुनर्विवाह कर लिया और परिवार के साथ मुंबई (तब बंबई )चले आये। यहाँ अम्बेडकर एल्फिंस्टोन रोड पर स्थित गवर्न्मेंट हाई स्कूल के पहले अछूत छात्र बने। पढा़ई में अपने उत्कृष्ट प्रदर्शन के बावजूद, अम्बेडकर लगातार अपने विरुद्ध हो रहे इस अलगाव और, भेदभाव से व्यथित रहे। 1907 में मैट्रिक परीक्षा पास करने के बाद अम्बेडकर ने बंबई विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और इस तरह वो भारत में कॉलेज में प्रवेश लेने वाले पहले अस्पृश्य बन गये। उनकी इस सफलता से उनके पूरे समाज मे एक खुशी की लहर दौड़ गयी , और बाद में एक सार्वजनिक समारोह उनका सम्मान किया गया इसी समारोह में उनके एक शिक्षक कृषणजी अर्जुन केलूसकर ने उन्हें महात्मा बुद्ध की जीवनी भेंट की, श्री केलूसकर, एक मराठा जाति के विद्वान थे। अम्बेडकर की सगाई एक साल पहले हिंदू रीति के अनुसार दापोली की, एक नौ वर्षीय लड़की, रमाबाई से तय की गयी थी। 1908 में, उन्होंने एलिफिंस्टोन कॉलेज में प्रवेश लिया और बड़ौदा के गायकवाड शासक सहयाजी राव तृतीय से संयुक्त राज्य अमेरिका मे उच्च अध्धयन के लिये एक पच्चीस रुपये प्रति माह का वजीफा़ प्राप्त किया। 1912 में उन्होंने राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र में अपनी डिग्री प्राप्त की, और बड़ौदा राज्य सरकार की नौकरी को तैयार हो गये। उनकी पत्नी ने अपने पहले बेटे यशवंत को इसी वर्ष जन्म दिया। अम्बेडकर अपने परिवार के साथ बडौ़दा चले आये पर जल्द ही उन्हें अपने पिता की बीमारी के चलते बंबई वापस लौटना पडा़, जिनकी मृत्यु 2 फरवरी 1913 को हो गयी। छुआछूत के खिलाफ संघर्षभारत सरकार अधिनियम 1919, तैयार कर रही साउथबोरोह समिति के समक्ष, भारत के एक प्रमुख विद्वान के तौर पर अम्बेडकर को गवाही देने के लिये आमंत्रित किया गया। इस सुनवाई के दौरान, अम्बेडकर ने दलितों और अन्य धार्मिक समुदायों के लिये पृथक निर्वाचिका(separate electorates) और आरक्षण देने की वकालत की। 1920 में, बंबई में, उन्होंने साप्ताहिक मूकनायक के प्रकाशन की शुरूआत की। यह प्रकाशन जल्द ही पाठकों मे लोकप्रिय हो गया, तब्, अम्बेडकर ने इसका इस्तेमाल रूढ़िवादी हिंदू राजनेताओं व जातीय भेदभाव से लड़ने के प्रति भारतीय राजनैतिक समुदाय की अनिच्छा की आलोचना करने के लिये किया। उनके दलित वर्ग के एक सम्मेलन के दौरान दिये गये भाषण ने कोल्हापुर राज्य के स्थानीय शासक शाहू चतुर्थ को बहुत प्रभावित किया, जिनका अम्बेडकर के साथ भोजन करना रूढ़िवादी समाज मे हलचल मचा गया। अम्बेडकर ने अपनी वकालत अच्छी तरह जमा ली, और बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना भी की जिसका उद्देश्य दलित वर्गों में शिक्षा का प्रसार और उनके सामाजिक आर्थिक उत्थान के लिये काम करना था। सन् 1926 में, वो बंबई विधान परिषद के एक मनोनीत सदस्य बन गये। सन 1927 में डॉ. अम्बेडकर ने छुआछूत के खिलाफ एक व्यापक आंदोलन शुरू करने का फैसला किया। उन्होंने सार्वजनिक आंदोलनों और जुलूसों के द्वारा, पेयजल के सार्वजनिक संसाधन समाज के सभी लोगों के लिये खुलवाने के साथ ही उन्होनें अछूतों को भी हिंदू मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार दिलाने के लिये भी संघर्ष किया। उन्होंने महड में अस्पृश्य समुदाय को भी शहर की पानी की मुख्य टंकी से पानी लेने का अधिकार दिलाने कि लिये सत्याग्रह चलाया।
1 जनवरी 1927 को डॉ अम्बेडकर ने द्वितीय आंग्ल - मराठा युद्ध, की कोरेगाँव की लडा़ई के दौरान मारे गये भारतीय सैनिकों के सम्मान में कोरेगाँव विजय स्मारक मे एक समारोह आयोजित किया। यहाँ महार समुदाय से संबंधित सैनिकों के नाम संगमरमर के एक शिलालेख पर खुदवाये। 1927 में, उन्होंने अपना दूसरी पत्रिका बहिष्कृत भारत शुरू की, और उसके बाद रीक्रिश्टेन्ड जनता की। उन्हें बाँबे प्रेसीडेंसी समिति मे सभी यूरोपीय सदस्यों वाले साइमन आयोग 1928 में काम करने के लिए नियुक्त किया गया। इस आयोग के विरोध मे भारत भर में विरोध प्रदर्शन हुये, और जबकि इसकी रिपोर्ट को ज्यादातर भारतीयों द्वारा नजरअंदाज कर दिया गया, डॉ अम्बेडकर ने अलग से भविष्य के संवैधानिक सुधारों के लिये सिफारिशों लिखीं।
पूना संधिअब तक डॉ अम्बेडकर आज तक की सबसे बडी़ अछूत राजनीतिक हस्ती बन चुके थे। उन्होंने मुख्यधारा के महत्वपूर्ण राजनीतिक दलों की जाति व्यवस्था के उन्मूलन के प्रति उनकी कथित उदासीनता की कटु आलोचना की। अम्बेडकर ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और उसके नेता मोहनदास (महात्मा) गांधी की आलोचना की, उन्होने उन पर अस्पृश्य समुदाय को एक करुणा की वस्तु के रूप मे प्रस्तुत करने का आरोप लगाया। अम्बेडकर ब्रिटिश शासन की विफलताओं से भी असंतुष्ट थे, उन्होने अस्पृश्य समुदाय के लिये एक ऐसी अलग राजनैतिक पहचान की वकालत की जिसमे कांग्रेस और ब्रिटिश दोनों का ही कोई दखल ना हो। 8 अगस्त 1930, को एक शोषित वर्ग के सम्मेलन के दौरान अम्बेडकर ने अपनी राजनीतिक दृष्टि को दुनिया के सामने रखा, जिसके अनुसार शोषित वर्ग की सुरक्षा उसके सरकार और कांग्रेस दोनों से स्वतंत्र होने मे है।
हमें अपना रास्ता स्वयँ बनाना होगा और स्वयँ ... राजनीतिक शक्ति शोषितो की समस्याओं का निवारण नहीं हो सकती, उनका उद्धार समाज मे उनका उचित स्थान पाने मे निहित है। उनको अपना रहने का बुरा तरीका बदलना होगा.... उनको शिक्षित होना चाहिए .... एक बड़ी आवश्यकता उनकी हीनता की भावना को झकझोरने, और उनके अंदर उस दैवीय असंतोष की स्थापना करने की है जो सभी उँचाइयों का स्रोत है।
इस भाषण में अम्बेडकर ने कांग्रेस और गांधी द्वारा चलाये गये नमक सत्याग्रह की शुरूआत की आलोचना की। अम्बेडकर की आलोचनाओं और उनके राजनीतिक काम ने उसको रूढ़िवादी हिंदुओं के साथ ही कांग्रेस के कई नेताओं मे भी बहुत अलोकप्रिय बना दिया, यह वही नेता थे जो पहले छुआछूत की निंदा करते थे और इसके उन्मूलन के लिये जिन्होने देश भर में काम किया था। इसका मुख्य कारण था कि ये "उदार" राजनेता आमतौर पर अछूतों को पूर्ण समानता देने का मुद्दा पूरी तरह नहीं उठाते थे। अम्बेडकर की अस्पृश्य समुदाय मे बढ़ती लोकप्रियता और जन समर्थन के चलते उनको 1931 मे लंदन में दूसरे गोलमेज सम्मेलन में, भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया। यहाँ उनकी अछूतों को पृथक निर्वाचिका देने के मुद्दे पर तीखी बहस हुई। धर्म और जाति के आधार पर पृथक निर्वाचिका देने के प्रबल विरोधी गांधी ने आशंका जताई, कि अछूतों को दी गयी पृथक निर्वाचिका, हिंदू समाज की भावी पीढी़ को हमेशा के लिये विभाजित कर देगी।
1932 मे जब ब्रिटिशों ने अम्बेडकर के साथ सहमति व्यक्त करते हुये अछूतों को पृथक निर्वाचिका देने की घोषणा की, तब गांधी ने इसके विरोध मे पुणे की यरवदा सेंट्रल जेल में आमरण अनशन शुरु कर दिया। गाँधी ने रूढ़िवादी हिंदू समाज से सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता को खत्म करने तथा, हिंदुओं की राजनीतिक और सामाजिक एकता की बात की। गांधी के अनशन को देश भर की जनता से घोर समर्थन मिला और रूढ़िवादी हिंदू नेताओं, कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं जैसे पवलंकर बालू और मदन मोहन मालवीय ने अम्बेडकर और उनके समर्थकों के साथ यरवदा मे संयुक्त बैठकें कीं। अनशन के कारण गांधी की मृत्यु होने की स्थिति मे, होने वाले सामाजिक प्रतिशोध के कारण होने वाली अछूतों की हत्याओं के डर से और गाँधी जी के समर्थकों के भारी दवाब के चलते अंबेडकर ने अपनी पृथक निर्वाचिका की माँग वापस ले ली। इसके एवज मे अछूतों को सीटों के आरक्षण की बात स्वीकार कर ली जो अंततः अछूतों के अधिक प्रतिनिधित्व मे परिलक्षित हुई। गाँधी ने इस पर अपना अनशन समाप्त कर दिया। बाद मे अम्बेडकर ने गाँधी जी की आलोचना करते हुये उनके इस अनशन को अछूतों को उनके राजनीतिक अधिकारों से वंचित करने और उन्हें उनकी माँग से पीछे हटने के लिये दवाब डालने के लिये गांधी का खेला एक नाटक करार दिया।
राजनीतिक जीवन 13 अक्टूबर 1935, को येओला नासिक मे अम्बेडकर एक रैली को संबोधित करते हुए.13 अक्टूबर 1935 को,अम्बेडकर को सरकारी लॉ कॉलेज का प्रधानचार्य नियुक्त किया गया और इस पद पर उन्होने दो वर्ष तक कार्य किया। इसके चलते अंबेडकर बंबई में बस गये, उन्होने यहाँ एक बडे़ घर का निर्माण कराया, जिसमे उनके निजी पुस्तकालय मे 50000 से अधिक पुस्तकें थीं। इसी वर्ष उनकी पत्नी रमाबाई की एक लंबी बीमारी के बाद मृत्यु हो गई। रमाबाई अपनी मृत्यु से पहले तीर्थयात्रा के लिये पंढरपुर जाना चाहती थीं पर अंबेडकर ने उन्हे इसकी इजाज़त नहीं दी। अम्बेडकर ने कहा की उस हिन्दु तीर्थ मे जहाँ उनको अछूत माना जाता है, जाने का कोई औचित्य नहीं है इसके बजाय उन्होने उनके लिये एक नया पंढरपुर बनाने की बात कही। भले ही अस्पृश्यता के खिलाफ उनकी लडा़ई को भारत भर से समर्थन हासिल हो रहा था पर उन्होने अपना रवैया और अपने विचारों को रूढ़िवादी हिंदुओं के प्रति और कठोर कर लिया। उनकी रूढ़िवादी हिंदुओं की आलोचना का उत्तर बडी़ संख्या मे हिंदू कार्यकर्ताओं द्वारा की गयी उनकी आलोचना से मिला। 13 अक्टूबर को नासिक के निकट येओला मे एक सम्मेलन में बोलते हुए अम्बेडकर ने धर्म परिवर्तन करने की अपनी इच्छा प्रकट की। उन्होने अपने अनुयायियों से भी हिंदू धर्म छोड़ कोई और धर्म अपनाने का आह्वान किया। उन्होने अपनी इस बात को भारत भर मे कई सार्वजनिक सभाओं मे दोहराया भी।
1936 में, अम्बेडकर ने स्वतंत्र लेबर पार्टी की स्थापना की, जो 1937 में केन्द्रीय विधान सभा चुनावों मे 15 सीटें जीती। उन्होंने अपनी पुस्तक जाति के विनाश भी इसी वर्ष प्रकाशित की जो उनके न्यूयॉर्क मे लिखे एक शोधपत्र पर आधारित थी। इस सफल और लोकप्रिय पुस्तक मे अम्बेडकर ने हिंदू धार्मिक नेताओं और जाति व्यवस्था की जोरदार आलोचना की। उन्होंने अस्पृश्य समुदाय के लोगों को गाँधी द्वारा रचित शब्द हरिजन पुकारने के कांग्रेस के फैसले की कडी़ निंदा की। अम्बेडकर ने रक्षा सलाहकार समिति और वाइसराय की कार्यकारी परिषद के लिए श्रम मंत्री के रूप में सेवारत रहे।
1941 और 1945 के बीच में उन्होंने बड़ी संख्या में अत्यधिक विवादास्पद पुस्तकें और पर्चे प्रकाशित किये जिनमे ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ भी शामिल है, जिसमें उन्होने मुस्लिम लीग की मुसलमानों के लिए एक अलग देश पाकिस्तान की मांग की आलोचना की। वॉट कॉंग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स (काँग्रेस और गान्धी ने अछूतों के लिये क्या किया) के साथ, अम्बेडकर ने गांधी और कांग्रेस दोनो पर अपने हमलों को तीखा कर दिया उन्होने उन पर ढोंग करने का आरोप लगाया। उन्होने अपनी पुस्तक ‘हू वर द शुद्राज़?’( शुद्र कौन थे?) के द्वारा हिंदू जाति व्यवस्था के पदानुक्रम में सबसे नीची जाति यानी शुद्रों के अस्तित्व मे आने की व्याख्या की. उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि किस तरह से अछूत, शुद्रों से अलग हैं। अम्बेडकर ने अपनी राजनीतिक पार्टी को अखिल भारतीय अनुसूचित जाति फेडरेशन मे बदलते देखा, हालांकि 1946 में आयोजित भारत के संविधान सभा के लिए हुये चुनाव में इसने खराब प्रदर्शन किया। 1948 में हू वर द शुद्राज़? की उत्तरकथा द अनटचेबलस: ए थीसिस ऑन द ओरिजन ऑफ अनटचेबिलिटी (अस्पृश्य: अस्पृश्यता के मूल पर एक शोध) मे अम्बेडकर ने हिंदू धर्म को लताड़ा।
हिंदू सभ्यता .... जो मानवता को दास बनाने और उसका दमन करने की एक क्रूर युक्ति है और इसका उचित नाम बदनामी होगा। एक सभ्यता के बारे मे और क्या कहा जा सकता है जिसने लोगों के एक बहुत बड़े वर्ग को विकसित किया जिसे... एक मानव से हीन समझा गया और जिसका स्पर्श मात्र प्रदूषण फैलाने का पर्याप्त कारण है?
अम्बेडकर इस्लाम और दक्षिण एशिया में उसकी रीतियों के भी आलोचक थे। उन्होने भारत विभाजन का तो पक्ष लिया पर मुस्लिम समाज मे व्याप्त बाल विवाह की प्रथा और महिलाओं के साथ होने वाले दुर्व्यवहार की घोर निंदा की। उन्होंने कहा, बहुविवाह और रखैल रखने के दुष्परिणाम शब्दों में व्यक्त नहीं किये जा सकते जो विशेष रूप से एक मुस्लिम महिला के दुःख के स्रोत हैं। जाति व्यवस्था को ही लें, हर कोई कहता है कि इस्लाम गुलामी और जाति से मुक्त होना चाहिए, जबकि गुलामी अस्तित्व में है और इसे इस्लाम और इस्लामी देशों से समर्थन मिला है। हालाँकि कुरान में वर्णित ग़ुलामों के साथ उचित और मानवीय व्यवहार के बारे में पैगंबर के विचार प्रशंसायोग्य हैं लेकिन, इस्लाम में ऐसा कुछ नहीं है जो इस अभिशाप के उन्मूलन का समर्थन करता हो। अगर गुलामी खत्म भी हो जाये पर फिर भी मुसलमानों के बीच जाति व्यवस्था रह जायेगी।
उन्होंने लिखा कि मुस्लिम समाज मे तो हिंदू समाज से भी अधिक सामाजिक बुराइयाँ हैं और मुसलमान उन्हें " भाईचारे " जैसे नरम शब्दों के प्रयोग से छुपाते हैं। उन्होंने मुसलमानो द्वारा अर्ज़ल वर्गों के खिलाफ भेदभाव जिन्हें " निचले दर्जे का " माना जाता था के साथ ही मुस्लिम समाज में महिलाओं के उत्पीड़न की दमनकारी पर्दा प्रथा की भी आलोचना की। उन्होंने कहा हालाँकि पर्दा हिंदुओं मे भी होता है पर उसे धर्मिक मान्यता केवल मुसलमानों ने दी है। उन्होंने इस्लाम मे कट्टरता की आलोचना की जिसके कारण इस्लाम की नातियों का अक्षरक्ष अनुपालन की बद्धता के कारण समाज बहुत कट्टर हो गया है और उसे को बदलना बहुत मुश्किल हो गया है। उन्होंने आगे लिखा कि भारतीय मुसलमान अपने समाज का सुधार करने में विफल रहे हैं जबकि इसके विपरीत तुर्की जैसे देशों ने अपने आपको बहुत बदल लिया है।
"सांप्रदायिकता" से पीड़ित हिंदुओं और मुसलमानों दोनों समूहों ने सामाजिक न्याय की माँग की उपेक्षा की है।
हालांकि वे मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग की विभाजनकारी सांप्रदायिक रणनीति के घोर आलोचक थे पर उन्होने तर्क दिया कि हिंदुओं और मुसलमानों को पृथक कर देना चाहिए और पाकिस्तान का गठन हो जाना चाहिये क्योकि एक ही देश का नेतृत्व करने के लिए, जातीय राष्ट्रवाद के चलते देश के भीतर और अधिक हिंसा पनपेगी। उन्होंने हिंदू और मुसलमानों के सांप्रदायिक विभाजन के बारे में अपने विचार के पक्ष मे ऑटोमोन साम्राज्य और चेकोस्लोवाकिया के विघटन जैसी ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख किया।
उन्होंने पूछा कि क्या पाकिस्तान की स्थापना के लिये पर्याप्त कारण मौजूद थे? और सुझाव दिया कि हिंदू और मुसलमानों के बीच के मतभेद एक कम कठोर कदम से भी मिटाना संभव हो सकता था। उन्होंने लिखा है कि पाकिस्तान को अपने अस्तित्व का औचित्य सिद्ध करना चाहिये। कनाडा जैसे देशों मे भी सांप्रदायिक मुद्दे हमेशा से रहे हैं पर आज भी अंग्रेज और फ्रांसीसी एक साथ रहते हैं, तो क्या हिंदु और मुसलमान भी साथ नहीं रह सकते। उन्होंने चेताया कि दो देश बनाने के समाधान का वास्तविक क्रियान्वयन अत्यंत कठिनाई भरा होगा। विशाल जनसंख्या के स्थानान्तरण के साथ सीमा विवाद की समस्या भी रहेगी। भारत की स्वतंत्रता के बाद होने वाली हिंसा को ध्यान मे रख कर यह भविष्यवाणी कितनी सही थी।
संविधान निर्माणअपने विवादास्पद विचारों, और गांधी और कांग्रेस की कटु आलोचना के बावजूद अम्बेडकर की प्रतिष्ठा एक अद्वितीय विद्वान और विधिवेत्ता की थी जिसके कारण जब, 15 अगस्त, 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद, कांग्रेस के नेतृत्व वाली नई सरकार अस्तित्व मे आई तो उसने अम्बेडकर को देश का पहले कानून मंत्री के रूप में सेवा करने के लिए आमंत्रित किया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। 29 अगस्त 1947 को, अम्बेडकर को स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना कि लिए बनी के संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया। अम्बेडकर ने मसौदा तैयार करने के इस काम मे अपने सहयोगियों और समकालीन प्रेक्षकों की प्रशंसा अर्जित की। इस कार्य में अम्बेडकर का शुरुआती बौद्ध संघ रीतियों और अन्य बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन बहुत काम आया।
संघ रीति मे मतपत्र द्वारा मतदान, बहस के नियम, पूर्ववर्तिता और कार्यसूची के प्रयोग, समितियाँ और काम करने के लिए प्रस्ताव लाना शामिल है। संघ रीतियाँ स्वयं प्राचीन आदिवासी गणराज्यों जैसे शाक्य और लिच्चवि की शासन प्रणाली के निदर्श (मॉडल) पर आधारित थीं। अम्बेडकर ने हालांकि उनके संविधान को आकार देने के लिए पश्चिमी मॉडल इस्तेमाल किया है पर उसकी भावना भारतीय है या कहें आदिवासी है।
अम्बेडकर द्वारा तैयार किया गया संविधान पाठ मे संवैधानिक गारंटी के साथ व्यक्तिगत नागरिकों को एक व्यापक श्रेणी की नागरिक स्वतंत्रताओं की सुरक्षा प्रदान की जिनमें, धार्मिक स्वतंत्रता, अस्पृश्यता का अंत और सभी प्रकार के भेदभावों को गैर कानूनी करार दिया गया। अम्बेडकर ने महिलाओं के लिए व्यापक आर्थिक और सामाजिक अधिकारों की वकालत की, और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए सिविल सेवाओं, स्कूलों और कॉलेजों की नौकरियों मे आरक्षण प्रणाली शुरू के लिए सभा का समर्थन भी हासिल किया, भारत के विधि निर्माताओं ने इस सकारात्मक कार्यवाही के द्वारा दलित वर्गों के लिए सामाजिक और आर्थिक असमानताओं के उन्मूलन और उन्हे हर क्षेत्र मे अवसर प्रदान कराने की चेष्टा की जबकि मूल कल्पना मे पहले इस कदम को अस्थायी रूप से और आवश्यकता के आधार पर शामिल करने की बात कही गयी थी. 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा ने संविधान को अपना लिया। अपने काम को पूरा करने के बाद, बोलते हुए, अम्बेडकर ने कहा :
मैं महसूस करता हूं कि संविधान, साध्य (काम करने लायक) है, यह लचीला है पर साथ ही यह इतना मज़बूत भी है कि देश को शांति और युद्ध दोनों के समय जोड़ कर रख सके। वास्तव में, मैं कह सकता हूँ कि अगर कभी कुछ गलत हुआ तो इसका कारण यह नही होगा कि हमारा संविधान खराब था बल्कि इसका उपयोग करने वाला मनुष्य अधम था।
1951 मे संसद में अपने हिन्दू कोड बिल के मसौदे को रोके जाने के बाद अम्बेडकर ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया इस मसौदे मे उत्तराधिकार, विवाह और अर्थव्यवस्था के कानूनों में लैंगिक समानता की मांग की गयी थी। हालांकि प्रधानमंत्री नेहरू, कैबिनेट और कई अन्य कांग्रेसी नेताओं ने इसका समर्थन किया पर संसद सदस्यों की एक बड़ी संख्या इसके खिलाफ़ थी। अम्बेडकर ने 1952 में लोक सभा का चुनाव एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप मे लड़ा पर हार गये। मार्च 1952 मे उन्हें संसद के ऊपरी सदन यानि राज्य सभा के लिए नियुक्त किया गया और इसके बाद उनकी मृत्यु तक वो इस सदन के सदस्य रहे।
बौद्ध धर्म मे परिवर्तनसन् 1950 के दशक में अम्बेडकर बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षित हुए और बौद्ध भिक्षुओं व विद्वानों के एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए श्रीलंका(तब सीलोन) गये। पुणे के पास एक नया बौद्ध विहार को समर्पित करते हुए, अम्बेडकर ने घोषणा की कि वे बौद्ध धर्म पर एक पुस्तक लिख रहे हैं, और जैसे ही यह समाप्त होगी वो औपचारिक रूप से बौद्ध धर्म अपना लेंगे। 1954 में अम्बेडकर ने बर्मा का दो बार दौरा किया; दूसरी बार वो रंगून मे तीसरे विश्व बौद्ध फैलोशिप के सम्मेलन में भाग लेने के लिए गये। 1955 में उन्होने भारतीय बुद्ध महासभा या बौद्ध सोसाइटी ऑफ इंडिया की स्थापना की। उन्होंने अपने अंतिम लेख , द बुद्ध एंड हिज़ धम्म को 1956 में पूरा किया। यह उनकी मृत्यु के पश्चात प्रकाशित हुआ।
14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में अम्बेडकर ने खुद और उनके समर्थकों के लिए एक औपचारिक सार्वजनिक समारोह का आयोजन किया. अम्बेडकर ने एक बौद्ध भिक्षु से पारंपरिक तरीके से तीन रत्न ग्रहण और पंचशील को अपनाते हुये बौद्ध धर्म ग्रहण किया। इसके बाद उन्होने एक अनुमान के अनुसार लगभग 500000 समर्थको को बौद्ध धर्म मे परिवर्तित किया। नवयान लेकर अम्बेडकर और उनके समर्थकों ने हिंदू धर्म और हिंदू दर्शन की स्पष्ट निंदा की और उसे त्याग दिया। इसके बाद वे नेपाल में चौथे विश्व बौद्ध सम्मेलन मे भाग लेने के लिए काठमांडू गये. उन्होंने अपने अंतिम पांडुलिपि बुद्ध या कार्ल मार्क्स को 2 दिसंबर 1956 को पूरा किया।
मृत्यु1948 से, अम्बेडकर मधुमेह से पीड़ित थे। जून से अक्टूबर 1954 तक वो बहुत बीमार रहे इस दौरान वो नैदानिक अवसाद और कमजोर होती दृष्टि से ग्रस्त थे। राजनीतिक मुद्दों से परेशान अम्बेडकर का स्वास्थ्य बद से बदतर होता चला गया और 1955 के दौरान किये गये लगातार काम ने उन्हें तोड़ कर रख दिया। अपनी अंतिम पांडुलिपि बुद्ध और उनके धम्म को पूरा करने के तीन दिन के बाद 6 दिसंबर 1956 को अम्बेडकर की मृत्यु नींद में दिल्ली में उनके घर मे हो गई।
7 दिसंबर को चौपाटी समुद्र तट पर बौद्ध शैली मे अंतिम संस्कार किया गया जिसमें सैकड़ों हजारों समर्थकों, कार्यकर्ताओं और प्रशंसकों भाग लिया।
मृत्युपरांत अम्बेडकर के परिवार मे उनकी दूसरी पत्नी सविता अम्बेडकर रह गयी थीं जो, जन्म से ब्राह्मण थीं पर उनके साथ ही वो भी धर्म परिवर्तित कर बौद्ध बन गयी थीं। विवाह से पहले उनकी पत्नी का नाम शारदा कबीर था। सविता अम्बेडकर की एक बौद्ध के रूप में सन 2002 में मृत्यु हो गई, अम्बेडकर के पौत्र, प्रकाश यश्वंत अम्बेडकर भारिपा बहुजन महासंघ का नेतृत्व करते है और भारतीय संसद के दोनों सदनों मे के सदस्य रह चुके है।
कई अधूरे टंकलिपित और हस्तलिखित मसौदे अम्बेडकर के नोट और पत्रों में पाए गए हैं। इनमें वैटिंग फ़ोर ए वीसा जो संभवतः 1935-36 के बीच का आत्मकथानात्मक काम है, और अनटचेबल, ऑर द चिल्ड्रन ऑफ इंडियाज़ घेट्टो जो 1951 की जनगणना से संबंधित है।
एक स्मारक अम्बेडकर के दिल्ली स्थित उनके घर 26 अलीपुर रोड में स्थापित किया गया है। अम्बेडकर जयंती पर सार्वजनिक अवकाश रखा जाता है। 1990 में उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया है। कई सार्वजनिक संस्थान का नाम उनके सम्मान में उनके नाम पर रखा गया है जैसे हैदराबाद, आंध्र प्रदेश का डॉ. अम्बेडकर मुक्त विश्वविद्यालय, बी आर अम्बेडकर बिहार विश्वविद्यालय- मुजफ्फरपुर , डॉ. बाबासाहेब् अम्बेडकर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा नागपुर में है, जो सोनेगांव हवाई अड्डे के नाम से जाना जाता था. अम्बेडकर का एक बड़ा आधिकारिक चित्र भारतीय संसद भवन में प्रदर्शित किया गया है।
मुंबई मे उनके स्मारक हर साल लगभग पाँच लाख लोग उनकी वर्षगांठ (14 अप्रैल) पुण्यतिथि (6 दिसम्बर) और धम्म चक्र परिवर्तन् दिन 14 अक्टूबर नागपुर में, उन्हे अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए इकट्ठे होते हैं। सैकड़ों पुस्तकालय स्थापित हो गये हैं, और लाखों रुपए की पुस्तकें बेची जाती हैं। अपने अनुयायियों को उनका संदेश था " शिक्षित बनो !!!, संगठित रहो!!!, आंदोलन करो !!!".ग्रामीण जीवन पर अम्बेडकर बनाम गांधीअम्बेडकर, महात्मा गांधी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उग्र आलोचक थे. उनके समकालीनों और आधुनिक विद्वानों ने उनके महात्मा गांधी (जो कि पहले भारतीय नेता थे जिन्होने अस्पृश्यता और भेदभाव करने का मुद्दा सबसे पहले उठाया था) के विरोध की आलोचना है।
गांधी का दर्शन भारत के पारंपरिक ग्रामीण जीवन के प्रति अधिक सकारात्मक, लेकिन रूमानी था, और उनका दृष्टिकोण अस्पृश्यों के प्रति भावनात्मक था उन्होने उन्हें हरिजन कह कर पुकारा। अम्बेडकर ने इस विशेषण को सिरे से अस्वीकार कर दिया। उन्होंने अपने अनुयायियों को गांव छोड़ कर शहर जाकर बसने और शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया।
आलोचना और विरासतअम्बेडकर की सामाजिक और राजनैतिक सुधारक की विरासत का आधुनिक भारत पर गहरा प्रभाव पड़ा है। स्वतंत्रता के बाद के भारत मे उनकी सामाजिक और राजनीतिक सोच को सारे राजनीतिक हलके का सम्मान हासिल हुआ। उनकी इस पहल ने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों मे आज के भारत की सोच को प्रभावित किया। उनकी यह् सोच आज की सामाजिक, आर्थिक नीतियों, शिक्षा, कानून और सकारात्मक कार्रवाई के माध्यम से प्रदर्शित होती है। एक विद्वान के रूप में उनकी ख्याति उनकी नियुक्ति स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री और संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष के रूप में कराने मे सहायक सिद्ध हुयी। उन्हें व्यक्ति की स्वतंत्रता में अटूट विश्वास था और उन्होने समान रूप से रूढ़िवादी और जातिवादी हिंदू समाज और इस्लाम की संकीर्ण और कट्टर नीतियों की आलोचना की है। उसकी हिंदू और इस्लाम की निंदा ने उसको विवादास्पद और अलोकप्रिय बनाया है, हालांकि उनके बौद्ध धर्म मे परिवर्तित होने के बाद भारत में बौद्ध दर्शन में लोगों की रुचि बढ़ी है।
अम्बेडकर के राजनीतिक दर्शन के कारण बड़ी संख्या में दलित राजनीतिक दल, प्रकाशन और कार्यकर्ता संघ अस्तित्व मे आये है जो पूरे भारत में सक्रिय रहते हैं, विशेष रूप से महाराष्ट्र में। उनके दलित बौद्ध आंदोलन को बढ़ावा देने से बौद्ध दर्शन भारत के कई भागों में पुनर्जागरित हुआ है। दलित कार्यकर्ता समय समय पर सामूहिक धर्म परिवर्तन के समारोह आयोजित उसी तरह करते रहते हैं जिस तरह अम्बेडकर ने 1956 मे नागपुर मे आयोजित किया था।
कुछ विद्वानों, जिनमें से कुछ प्रभावित जातियों से है का विचार है कि अंग्रेज अधिकतर जातियों को एक नज़र से देखते थे और अगर उनका राज जारी रहता तो समाज से काफी बुराईयों को समाप्त किया जा सकता था। यह राय ज्योतिबा फुले समेत कई थी सामाजिक कार्यकर्ताओं ने रखी है।
नारायण राव काजरोलकर ने अम्बेडकर की आलोचना की है क्योंकि उन्हें विश्वास था कि वे खर्च बजाय सब लोगों के बीच, सिर्फ अपनी ही जाति यानि महार पर खर्च करने मे करते थे। सीताराम नारायण शिवतारकर भी इससे सहमत है।
आधुनिक भारत में कुछ लोग, अम्बेडकर के द्वारा शुरू किए गए आरक्षण को अप्रासांगिक और प्रतिभा विरोधी मानते हैं।
अम्बेडकर के बादपिछले वर्षों में लगातार बौद्ध समूहों और रूढ़िवादी हिंदुओं के बीच हिंसक संघर्ष हुये है. 1994 में मुंबई में जब किसी ने अम्बेडकर की प्रतिमा के गले में जूते की माला से लटका कर उनका अपमान किया था तो चारों ओर एक सांप्रदायिक हिंसा फैल गयी थी, और हड़ताल के कारण शहर एक सप्ताह से अधिक तक बुरी तरह प्रभावित हुआ था। जब अगले वर्ष इसी तरह की गड़बड़ी हुई तो एक अम्बेडकर प्रतिमा को तोड़ा गया। तमिलनाडु में ऊंची जाति के समूह भी बौद्धों के खिलाफ हिंसा में लगे हुए हैं। इसके अलावा, कुछ परिवर्तित बौद्धों ने हिंदुओं के खिलाफ मोर्चा खोल दिया (2006, महाराष्ट्र में दलितों द्वारा विरोध) और हिंदू मंदिरों मे गन्दगी फैला दी, और देवताओं के स्थान पर अम्बेडकर के चित्र लगा दिये। एक कट्टरपंथी अम्बेडकरवादी संस्था बौद्ध पैंथर्स मूवमेंट ने तो अम्बेडकर के बौद्ध धर्म के आलोचकों की हत्या तक करने का प्रयास किया है।
फिल्मजब्बार पटेल ने सन 2000 मे डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर नामक हिन्दी फिल्म बनाई थी। इसमे अम्बेडकर की भूमिका माम्मूटी मे निभाई थी. भारत के राष्ट्रीय फ़िल्म विकास निगम और सामाजिक न्याय मंत्रालय के द्वारा प्रायोजित, यह फिल्म प्रदर्शन से पहले एक लंबी अवधि तक विवादो मे फँसी रही।
यू. सी. एल. ए. मे मानव शास्त्र के प्रोफेसर और ऐतिहासिक नृवंश विवरणकार, डॉ. डेविड ब्लुंडेल फिल्मों की एक श्रृंखला बनाने की दीर्घकालिक परियोजना बनाई है जो उन घटनाओं पर आधारित है जो भारत में समाज कल्याण की स्थिति के बारे में ज्ञान और इच्छा को प्रभावित करती है। ए राएज़िग लाइट डॉ. बी आर अम्बेडकर के जीवन और भारत में सामाजिक कल्याण की स्थिति पर आधारित है।
Thursday, December 4, 2008
रंगीला रतन , भाग-३८
- कैसा लग रहा है रवि ? ऐसी फ़िल्म इससे पहले कभी देखि की नहीं ?
रवि- बिल्कुल नहीं... कहाँ से देखता ? कभी फुर्सत ही नहीं मिलती... यहाँ तक की सादा फ़िल्म देखने का मौका भी कम ही मिलता है... अब इसे देख रहा हूँ तो अच्छा लग रहा है... जाते-जाते कुछ फिल्में छोड़ती जाना ....
रंजना- छोड़ तो खैर जाउंगी मगर इसे देखकर जब तुम्हारी काम वासना जाग्रत हो उठेगी तो क्या करोगे ?
रवि - अपने आपको संभालने की क्षमता मेरे पास है... मैं तुम्हारे सिवाय किसी और लड़की के बारे में सोच भी नहीं सकता... मैं इन्तजार करूँगा... जब तुम आओगी, तभी प्यार की बातें होंगी...
टीवी स्क्रीन पर अब जो सीन उभर रहे थे, वे पहले से ज्यादा कामुक थे... रवि ने देखा की फ़िल्म के पात्र रति क्रीडा में लीन थे... रवि ने उत्सुकता से पूछा -
-इस फ़िल्म के कलाकार सचमुच ऐसा कर रहे हैं या फ़िर ये महज़ कैमरा की कारस्तानी है ?
रंजना- कैमरा इतना सब नहीं कर सकता ... जो ये हो रहा है, वाकई करना पड़ा होगा... बिना किए फ़िल्म सम्भव नहीं ... फर्क अगर कैमरे से ही हो जाए तो फ़िर हीरो-हीरो इन की जरूरत ही क्या पड़े ?
रवि अब आपे से बाहर होने लगा... वह बेकाबू होने लगा था... उसकी आंखों की पुतलियाँ सुर्ख लाल हो चुकी थीं... रंजना का बदन भी तपने लगा... जब उसने कातिल अंगडाई ली तो रवि ने उसकी चिकनी जाँघों पर हाथ फिराना शुरू कर दिया ... दोनों ही क्लाइमेक्स की तरफ़ बढ़ने के लिए बेताब थे... रंजना ने जोश में भरकर उसको अपनी तरफ़ खींच लिया... रवि और उसके होठ आपस में मिल गए... दोनों तरफ़ से रस्साकसी तेज होने लगी... रवि ने कहा-
- ऐसा लगता है जैसे मेरा बदन फट जायेगा... बड़ी बैचैनी महसूस हो रही है... आह, मेरी जान बचालो...
रंजना-- इस आग में तुमने मुझे भी झुलसा दिया है, मेरी नस-नस में अग्नि प्रवाहित हो चुकी है... अब तो इस आग को जली ही रहने दो... ताकि इसका एहसास हमेशा -हमेशा के लिए बना रहे...
रवि- ऐसा न हो की इश्क की इस आग में हमारा वजूद ही भस्म हो जाए...
र रात एक और आतंकी ईमेल भेजा। संगठन ने इस बार देश के एयरपोर्ट्स को निशाना बनाने की बात कही है। इस आतंकी ईमेल में 3 से 7 दिसंबर के बीच नई दिल्ली, चेन्नै और बेंगलुरु एयरपोर्ट्स पर आतंकी हमला करने की धमकी दी गई है। यह ईमेल नई दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनैशनल एयरपोर्ट को भेजा गया। इस ईमेल के मद्देनज़र इन सभी एयरपोर्ट्स पर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है। खुफिया सूत्रों के मुताबिक डेकन मुजाहिदीन की ओर से पहले आए ईमेल की तरह यह ईमेल भी रूस के रिले सर्वर्स से भेजा गया है और इसे सऊदी अरब में ट्रेस किया गया। इससे पहले डेकन मुजाहिदीन द्वारा भेजे गए आतंकी ईमेल को इंटरपोल ने ट्रैक किया था जिसे लाहौर में ट्रेस किया गया था। खुफिया एजंसियों का मानना है कि डेकन मुजाहिदीन लश्कर का ही संगठन है और इसे खासतौर पर मुंबई में हमले करने के लिए तैयार किया गया।
Wednesday, December 3, 2008
रंगीला रतन-भाग-37
रवि- हर इंसान एक जैसा नहीं होता... तुम्हें अपने मन में बसी दहशत को हर हाल में निकालना ही होगा... वरना जीवन भर फ़िर किसी पर भरोसा नहीं कर पाओगी... रमेश ने तुम्हारे साथ जो जुल्म किया है , भगवान् उसको कभी माफ़ नहीं कर सकता ... कहावत है की विष दे दो, मगर किसी को विश्वाश नहीं देना चाहिए.... उसके बारे में कुछ और बताओ न... उसने रागिनी और प्रज्ञा के बारे में और क्या कहा ?
रंजना- उसने प्यार में आकर मुझे उन दोनों के बारे में सब कुछ बता दिया था... उसने कहा की प्रज्ञा और रागिनीउससे खूब आनंद उठा रही थीं... वे उसको कुछ रुपये देकर अपनी जिस्मानी प्यास को शांत कर लिया करती थी... यहाँ तक की मेडिकल में उसका एडमिशन भी प्रज्ञा ने ही कराया था...
रवि- अच्छा, तुम्हारी मुलाक़ात वहीं पर रमेश से हुई थी ?
रंजना- हाँ, हम साथ-साथ पढ़ते थे... मैंने देखा था की ज्यादातर डॉक्टर्स की पत्नियाँ भी डाक्टर्स ही होती हैं... इसी कारण मैंने भी यह तय किया की रमेश को अपना जीवन साथी बनाकर आराम से जिन्दगी गुजारुंगी... भविष्य में मेरी ख़ुद का अस्पताल खोलने की योजना थी... सोचा की दोनों मिलकर यह सब बखूबी कर लेंगे ... मगर वह तो बहुत बड़ा छलिया निकला ... उसकी नीयत मेरे पिता की दौलत पर थी... वह मेरा सहारा लेकर तुंरत करोड़ पति बनना चाहता था... वह एक नंबर का झूठा और ड्रामेबाज था... उसको समझने में मुझे बहुत वक्त लगा... मुझे उसीने बताया की एक बार शारीरिक सम्बन्ध बनाने के बाद प्रज्ञा उस पर जी जान से फ़िदा हो गयी थी... एक दिन वह रमेश से बोली-
- ओह, रमेश, तुम तो मेरे दिल पर छा गए हो यार ... मन से हटते ही नहीं... सच कहूं तो आजतक मुझे कभी भी इतना आनंद नहीं मिला ,जितना की तुमने दिया है.... तुम सच्चे मर्द हो... ऐसा जांबाज मर्द जो औरत को सम्पूर्ण सुख-संतुष्टि दे सकता है... ऐसा कूव्वत मेरे ख़याल से किसी और मर्द में नहीं है...
रमेश- ये आप कैसे कह सकती हैं ?
प्रज्ञा- क्योंकि तुम वो अकेले नहीं हो जिसके साथ मेरे शारीरिक सम्बन्ध हैं... अब तक मैं एक से बढ़कर एक लड़कों के साथ मजे लूट चुकी हूँ ... तुम उन सबसे अलग हो यार... तुम्हारी बात सबसे जुदा है... ऐसा पावर कहाँ से लाते हो ? कहीं सांड हा तेल तो इस्तेमाल नहीं करते ?
रमेश - क्या कहती हो? क्या इस तरह के किसी तेल से जिस्म के अन्दर जोश और मर्दानगी आ सकती है ?
प्रज्ञा - अगर तुम्हारा जैसा मर्द उसको इस्तेमाल करले तो क़यामत आ जायेगी... जब अभी तुम्हारा यह हाल है तो आगे क्या होगा ?
रमेश- अब पूरा वक्त तारीफ़ में ही गुजारने का इरादा है क्या ?



