Tuesday, September 30, 2008

121

Monday, September 29, 2008

दर्द स्क्रिप्ट


पी के टट्टू हो गया
लोकेशन-ढाबा
ड्रेस -पंजाबी कुर्ता , पगडी , छल्ला ,लाठी , दाढी मूंछ ,हुक्का , हारमोनियम
शायरी- हीरो शेर बोलता है, सामने लडकी
सामने से हीरों की एंट्री - गाना शुरू
कोरस
२० लड़के-लडकी

( हीरो का अलग से दूल्हे का क्लिप )

२ ,

ख़ाक में दिल के टुकड़े

लोकेशन , गाँव शादी का मंडप

द्रश्य -हीरो की एंट्री ,गाडी से उतरकर हाथ में बैग

शायरी-सूखे पेड़ के पास खड़े होकर शेर बोलना , गाना शुरू

२ - गार्डन में लड़का -लड़की का प्यार

अंतरा १- पेड़- पहाड़ (रात दिन तेरी )

शेर२-मंडप को देखकर हीरो की आंखों में आंसू

अंतरा २-जब तलक

द्रश्य-फ्लेश बैक , पुराणी याद

खबर क्या थी ... वापस में आता है

शेर ३- धूल में गिरकर , पत्थर पकड़ कर हीरो का शेर बोलना

अंतरा - एक तरफ़ ... पुराना लड़का-लड़की का हंसने वाला सीन

एक तरफ़ दुनिया ... सीन हीरो इन की डोली , वह हंस रही है ... घोडे का पैर फटा कुर्ता

३... दर्द देते हैं

लोकेशन -बंद कमरा , जाली वाला

ड्रेस -कुर्ता-पायजामा , पगडी, बिखरे बाल पागल जैसा

सीन- हीरी इन उसकी हालत पर हंस रही है, अपनी सहेलियों से उसका मजाक उड़ा रही है

शेर- हीरो जाली पर शेर बोलता है

सीन अंतरा-२-फ्लेश बैक हीरो-हीरो इन गार्डन में लडकी के हाथ में पेड़ की टहनी , हीरो को मुर्गा बनाती है , वह गिर जाता है॥ कोमेडी सीन , लड़की के इशारे पर बावडी में कूदने को तैयार, लड़की का पकड़ना

अगला सीन- लड़की का पिता लड़के को रुपये देता है, लड़का उन्हें फेंककर चला जाता है...

शेर -लड़की का पिता लड़की को हीरो के आपत्तिजनक फोटो दिखाकर भड़काता है

४... जबसे तुम्हें दिलबर ...

हीरो इन का क्रोमो

लोकेशन गार्डन, घर, किताबें , बंगलो , फूलों कें बीच में हीरो की एंट्री

गार्डन में गीत शुरू

५...दिल तोड़कर...

लोकेशन-स्टूडियो ही रही है । स्टेज शो

हीर इन अपने पति के साथ नाच रही है...

६.जब चाहा

लोकेशन -गार्डन , शेर-पर काटकर , स्टूडियो-जब चाहा दिल ... , पार्टी... पुराना ड्रेस चेंज है...

शेर- इस कदर हालत ...

अंतरा- १ जब तक न लगाया ...हीरो -हीरी इन क्रिकेट, फूटबाल खेल रहे हैं॥

दिन रात ... बेड सीन, हीरो- हीरो इन अलग-अलग करवटें

अंतरा-२, माँ बाप-... घर से गाडी से जा रहे हैं... माता-पिता खड़े हैं , हीरो उन्हें देखता है... हीरो इन अपनी तरफ़ कर लेती है... अगली लाइन में प्रेमिका अपने प्रेमी के साथ पार्टी सोंग करते हैं... नाच रहे हैं...

अंतरा-३- किचन का सीन ... हीरो इन आता छान रही है... पूरा आता बर्तन की बजाय नीचे गिर रहा है॥ मोहब्बत का जूनून,,, हीरो को वह खिड़की से निहार रही है...

७... कहदो ये आईने से

लोकेशन -पार्टी , ३ हीरो इन , १ हीरो

१-हीरो इन हीरों को शराब पिला रही है

२-रसियन डांसर

१-खिल जाए= फूल ४- ऐसी अदाएं-वेटर

१-होठों की ... मुख्या लीद २-वेटर सीन ३-रसियन डांसर , ४-मुख्य लीद ५- सब लोग

८-जा मेरी तरहा तू भी

स्टेज शो -स्टूडियो

मुखडा- पार्टी में , दर्शक

१- मालूम न था-हीरो गरीब, हीरो इन लालची , प्रेमी पैसे वाला

अंतरा-खुश हो ... शादी का सीन , माला डालते हुए

क्रॉस -हीरो के हाथ में फूल , उसे फेंक कर काँटा दिखाता है... दर्शक हीरो से ऑटो ग्राफ लेते हैं॥

शेर- स्टूडियो

३- माना की ... आग दिखानी है

४- जुहू चौपाटी ,प्यार , फ़िर स्टूडियो

९-पहली नज़र में ...

लोकेशन -गायक -स्टेज , ढोलकं, तबला, पेड़

झरना , नदी नाले



भाग-120

ऐड्स का डर उसके दिलो-दिमाग पर छाया हुआ था...लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी अगर उसे अनछुई लड़की नहीं मिल पाती है तो यह शेख के लिए बहुत दुःख की बात थी... जब वह काफी देर तक नहीं बोल पाया तो चंदा सजग हो गयी... हो से क्या-
- kya हुआ? आप तो ऐसे चुप हुए की कुछ बोल ही नहीं पा रहे हैं... मेरी जुबान से कोई ग़लत बात निकल गयी क्या ?उससे ही नाराज हो गए हों ?
-शेख तुमसे नाराज होने का मतलब है अपने आप से नाराज हो जाना ... मैंने तुमसे नाराज होने के बारे में अभी सोचा भी नहीं है... सोच भी नहीं सकता... तुम तो जान से भी प्यारी हो ... मैं न जाने किन ख्यालों में खो गया था... तुम कंडोम की जिद इस तरह कर रही थीं जैसे की कोई पेशेवर वैश्या कर रही हो ...
चंदा- किसी मन्दिर की देवी तो नहीं हूँ मैं... हूँ तो आखिरकार एक कोठे की बंधक ही... कोठे पर रह-रहकर कंडोम के बारे में ही जानकारी मिल पाएगी ... किसी भक्ति पद या संस्कृत के श्लोक के बारे में तो जानकारी तो मिलने से रही... मुझे सबसे पहले कंडोम के इस्तेमाल की नसीहत ही दी गयी थी... मुझे बताया गया की यह जानलेवा बीमारी है... एक बार जिसको लग गयी, समझो उसकी कहानी ख़त्म...
शेख -अगर ऐसी बात है तो फ़िर किसी को बच्चा होगा ही नहीं सब लोग हमेशा कंडोम का ही इस्तेमाल करेंगे...
चंदा- हम लोग तो अभी पति-पत्नी बने नहीं हैं , हमको अभी बच्चों की भी जरूरत नहीं है... इस लिहाज से तो हमको कंडोम लगा ही लेना चाहिए...
शेख- लेकिन तुम तो कह रही थीं की आज तक किसी गैर मर्द ने तुम्हारे कोरे बदन को किसीने छुआ तक नहीं है... तुम अभी तक अनछुईहो...
चंदा- भले ही मैं अनछुई हूँ, मुझे अभी तक किसी गैर मर्द ने नहीं छुआ है, मुझे ऐड्स भी नहीं है... मगर तू तो कुंवारे नहीं हो, तुमने तो अब तक न जाने कितनी कलियों को फूल बनाया है, तुम्हें भी तो ऐड्स हो सकता है...
शेख की आँखें आश्चर्य से फैलती चलीं गईं... वह जिस चंदा को गाँव की सीधी लड़की समझ रहा था, वह उसकी आशा से कई हजार गुना होशियार निकली थी... उसकी साफगोई शेख के सीने में शूल की तरह चुभ रही थी... अपनी झेंप मिटाने के लिए उसने कहा-
- मैं तो नियमित रूप से अपना इलाज कराता हूँ... ऐड्स की बात तो दूर मुझे तो सामान्य सा बुखार भी नहीं है...
चंदा- आपको कंडोम से क्या चिढ है ?
शेख- मज़ा नहीं आता... बस इतना सा सच है... आगे तुम्हारे इच्छा है... मैं जिस तरह से प्यार करता हूँ वह तो तुमने देख ही लियास है... इसी क्लारण मैं कह रहा था...
चंदा- मैं आपकी हर बात मानूंगी, बस इसके लिए मुझे माफ़ कर दीजिये...
काम शक्ति बढ़ाने वाली दवा का असर जबरदस्त हो रहा था... उसकी समझ में नहीं आ रहा था की वह क्या करे, आखिरकार उसने चन्दा की ही बात मान ली... उसने कंडोम इस्तेमाल किया... चंदा ने उस [पर फ़िर जो प्यार उंडेला उसी वह निहाल हो गया... उसको सच्ची और सम्पूर्ण संतुष्टि मिली थी...












Sunday, September 28, 2008

भाग-119

गाँव भले ही किसी देश का क्यों न हो, वहाँ के लोगों की मानसिकता यही होती है... वे लोग बात का बतंगड़ बना डालते हैं... इसलिए तुम यह बात मत बताना... वैसे भी तुम बता रही हो की जीवन भर तुम्हारे माता-पिता ने तकलीफें उठायी हैं, फ़िर क्यों उनको दुःख भरी बातें सुनाकर अब भी दुखी करना चाहती हो ..
चंदा- ठीक है... अब मैं उन्हें अपनी शादी की ख़बर सुनाकर खुश कर दूंगी ... जब लोगों को यह पता चलेगा की मुझसे विदेश का रईस शादी करने को राजी है तो सब लोगों की खुशियों का ठिकाना नहीं रहेगा...

सब लोगों का सपना होता है की वे अपनी बच्चियों की शादी बड़े घर में करें...

शेख- और अगर धर्म का मुद्दा उठा तो ? तुम दूसरे धर्म की हो और मैं अलग धर्म का ...

चंदा- तो क्या हुआ ? हो तो अच्छे इंसान... इससे क्या फर्क पड़ता है... आजकल सब लोग इस तथ्य को जान गए हैं की इंसानियत सबसे बड़ी होती है...

शेख- क्या ये बात सच है या फ़िर मेरा मन रखने के लिए ऐसा कह रही हो ?

चंदा-जो आप समझ रहे हैं, ऐसी बात नहीं है... अब घर-घर में जाग्रति आ चुकी है... टीवी ने सब कुछ बदल कर रख दिया है... सब जान गए हैं की धर्म का असली अर्थ लोगों में प्यार बाटना होता है, लड़ाई-झगडा करना नहीं...

शेख उसकी बात पर कम और उसकी मदमस्त जवानी पर ज्यादा ध्यान दे रहा था... चंदा के यौवन उभार बहुत गज़ब के थे... उन्हें देखते ही शेख के मुह में पानी आ रहा था... वह इतने जोर का दवाब डालता था की चंदा कराह उठती थी... उस आनंद मिश्रित दर्द की बात ही कुछ और थी...शेख ने जब से काम शक्ति बढ़ाने वाली दवा का सेवन किया था, तबसे वह बेहद खुश था... वह चंदा से कह रहा था-

- तुमसे मिलकर मेरा मन बच्चों जैसा हो गया है... कभी सोचता हूँ की ये करून , फ़िर अगले ही पल सोचता हूँ की ऐसा न करूँ...इसी उलझन में फंसा हुआ हूँ...

चंदा- प्यार करके तुमने मेरी टी जिन्दगी ही बदलकर रखदी, अब कहते हो की प्यार उल्झन है...

शेख- बात बनाना तो कोई तुमसे सीखे... तुम्हारा वास्तव में कोई जवाब नहीं है... इतनी मीठी -मीठी बातें करती हो की सीधी दिल में उतरती चली जाती हैं... आह... ज़रा आहिस्ता-आहिस्ता करो... तुम बहुत तेज दबाते हो...

शेख ने आक्रामक काम करना शुरू कर दिया... चन्दा भले ही कराह रही थी मगर फ़िर भी शेख को रोक नहीं रही थी... जब काफी देर तक वे दोनों प्रणय क्रीडा की मस्ती में डूबे रहे तो शेख ने पूछा-

- अगर चाहो तो मैं मंजिल पर पहुचने के लिए तैयार हूँ...

चंदा- आपने कंडोम मंगवाए हैं की नहीं ?

शेख - उसकी क्या जरूरत है ?

चंदा- मैंने सुना है की इसके बिना ऐड्स हो जाता है...



Saturday, September 27, 2008

भाग-118

थोडी देर के बाद ही शेख के जिस्म में गज़ब की उत्तेजना आने लगी...उसकी रग-रग में मस्ती का तूफ़ान उठने लगा... अब चंदा को वह ऐसे घूर रहा था मानो उसको कच्चा चबा जायेगा... उसको एहसास हो रहा था की उसकी कामशक्ति बढ़ चुकी है... वह चंदा की आंखों में आँखें डालकर देखने लगा... चंदा मुस्कराके बोली-
- मेरे मन में अचानक ये क्या हो गया था ? इश्क का यह भूत बड़ी मुश्किल से उतर पाया है...
शेख- ओह, यह हमारे साथ क्या हो रहा है ? जब मेरी इच्छा होती है तो तुम इनकार करती हो और जब तुम्हारी इच्छा होती है तो मैं दजहीला हो जाता हूँ... हमारे प्यार को परवान चढ़ने से पहले ही किसी की नज़र तो नहीं लग गयी ? अब मैं किस मुह से कहूं की मैं तुम्हे संतुष्ट करने के लिए तैयार हूँ... बड़ी मुश्किल से मैंने अपने मन को मनाया है...डर इस बात का है की कहीं तुम्हें तैयार करने के चक्कर में मैं ख़ुद ही फेल न हो जाऊं...
चंदा- मैं आपकी बात ही मान लेती हूँ... अब जो होगा , वह कल देखा जायेगा...
शेख ने अपना सर पकड़ लिया ... उसको उदास देखकर चंदा ने उसके होठों से अपने होठ सता दिए... शेख के दिलो-दिमाग में एक बार फ़िर काम वासना का ज्वालामुखी भड़क उठा... वह चंदा की गोलाइयों को दबाने लगा... चंदा उसको मना करने के बजाय और उसे सहयोग कर रही थी... शेख पूछ बैठा-
- क्या तुम्हें मुझसे डर नहीं लगता?
चंदा- नहीं अब तो प्यार आता है... पहले की बात अलग थी... पहले तो दुनिया के हर शख्श से मेरी घिग्गी बंधती थी... मैं यही सोचती थी की दुनिया में सब लोग उसी तरह के होते हैं...
शेख- क्यों ? आख़िर सबसे ऐसी नाराजगी कैसी ? इसके पीछे कोई तो कारण होगा?
चंदा- मेरे माता-पिटा बहुत गरीब हैं ... जब मैं बड़ी हुई तो उनको मेरे विवाह की चिंता सताने लगी... एक दलाल उन दिनोंम हमारे गाँव आया हुआ था... वह कई लोगों की नौकरी लगा चुका था... उसने मेरे घरवालों पर भो डोरे द्दलने शुरू कर दिए... उसने मेरी माँ से कहा की वह मेरी अच्छी नौकरी लगवा देगा...उसने यह भी कहा की उसकी नज़र में अच्छे खानदान के कई लड़के हैं...वह कहीं न कहीं बिना दहेज़ के रिश्ते का जुगाड़ भी लगवा देगा... वैसे मेरे परिजन मुझे काम पर भेजना नहीं चाहते थे लेकिन दलाल की चिकनी चिप्दी बातों में आ गए... वह दलाल मुझे मीठी-मीठी बातों में बहलाकर कोठे पर ले आया... उसने मुझे बेच दिया...
शेख- दुनिया में ऐसे लोगों की कमी नहीं हैं जो मजबूरी का फायदा उठाने से भी नहीं चूकते...अब क्या करोगी?
चंदा- मेरे पास अपने गाँव का कोई फोननंबर नही हैं वरना मैं अपनी कुशलता और अपने साथ हुए हादसे की जानकारी घरवालों को देती...
शेख - ऐसा गज़ब न करना , जानती हो तुम्हारे घरवाले बुरी तरह से डर जायेंगे... इस बात की चर्चा पूरे गाँव में फ़ैल जायेगी ... बैठे-बिठाए बदनाम हो जाना चाहती हो ?

Friday, September 26, 2008

भाग-117

चंदा- बिल्कुल... इसमें क्या शक हो सकता है ? हर इंसान चाहता है की वह सदा सलामत रहे...
अरबी शेख- गुड... और ऐसा करने के लिए आपसी सहमती तथा भरोसे की आवश्यकता होती है... मैं कोशिश कर रहा हूँ की वही भरोसा सलामत रह सके...
चंदा- मेरा दिल बैठा जा रहा है... तुम जो कह रहे हो, मैं उसका अर्थ तो नहीं समझ पा रही, सिर्फ़ इतना जानती हूँ की तुमने अब प्यार में कुछ कम रूचि लेनी शुरू करदी है... मेरी हालत जानते हो ?
शेख-मुझसे बेहतर कौन जानता है ? मैं ख़ुद भी उसी माहोल से गुजर रहा हूँ...
चंदा- मैं बस ये कहना चाहती हूँ की यह प्रवचन का समय नहीं है... यह प्यार का वक़्त है... कुछ देर पहले तुमने मेरे जिस्म में जो तूफ़ान उठाया था, वह अब अपने पूरे शबाब पर है... मैंने तुम पर भरोसा किया है... मुझे पूरा विश्वाश है की तुम कभी कुछ ग़लत नहीं करोगे...मेरा मन जो मान रहा है, मैं वही कह रही हूँ... मैंने तो तुम्हारी बात मान ली ... अब तुम क्यों मुकर रहे हो...
शेख- समझने की कोशिश तो करो.... जब तुम्हें मुझ पर भरोसा है, तो ये क्यों नही मानती की अब भी जो कुछ मैं कह रहा हूँ उसे भी तो मानो...
शेख न जाने क्या-क्या दलीलें देता रहा मगर चंदा को संतुष्ट नही कर पाया... करता भी कैसे,जिस्म को शब्दों से संतुष्ट नहीं किया जा सकता...जब बिस्तर पर दो जवान जिस्म दहकते हैं तो उस अग्नि को शांत करने के लिए विशेष प्रयासों की जरूरत पड़ती है... उस स्थिति में अगर मर्द फेल हो जाए तो वह बेड पार्टनर का सबसे बड़ा शत्रु बन जाता है... वह मर्द भी इतनी हीन भावना का एहसास करता है की औरत से आँख मिलाने लायक नहीं रहता ...शेख की हालत भी कुछ ऐसी ही थी... वह बड़ा शर्मशार था... वह चन्दा को बड़े अरमान सजाकर यहाँ लाया था... यहाँ तक की उसने इसके लिए बड़ी कीमत भी चुकाई थी... उसने काम शक्ति भाधाने के लिए दवा भी खाई, मगर कुछ फायदा नहीं हुआ... ज्यादा शराब पीने के कारण वह समय से पूर्व ही फेल हो गया था... उसकी नाकामयाबी ने उसको चंदा की नज़र में बहुत बड़ा अपराधी बना दिया था... वह शराफत की आड़ में अपनी कमजोरी को क्व्हिपाना चाहता था... मगर सफल नहीं हुआ... उसने टीवी पर चल रही अश्लील फ़िल्म भी बंद करदी थी मगर उसका असर तो अभी तक बाकी था... शेख चाहता था की किसी तरह से चंदा के मन से कामुक भाव निकल जाएँ या फ़िर कम हो जाएँ... इसी कारण उसने टीवी पर समाच्जार चैनल चला दिया... शेख का यही वो निर्णय था, जिसने उसकी तकदीर बदलकर रखदी...वहाँ पर उसको अश्व्तुल- एक्स नामक भारतीय दवा का विज्ञापन दिखाई दिया ... शेख ने भी उसे आजमाने का मन बनाया... वह बाथरूम के बहाने गया और वेटर को किसी भी तरह से अश्व्तुल -एक्स लाने का आदेश दिया... यह दवा आते ही उसके अरमान फ़िर जवान होने लगे... उसने चंदा को पहले खाना खाने के लिए मना लिया... इस बीच वह अश्व्तुल- एक्स का सेवन कर चुका था... उसको यह भी भय था की काम शक्ति बढ़ाने वाली अमेरिकी दवा भी फेल हो गयी है तो भारतीय दवा का भी यही हश्र हो सकता है... दवा खाने के बाद उसने खाना खाया और फ़िर स्नान किया ... दो घंटे के बाद उसको अपने शरीर में जबरदस्त बदलाव नज़र आ रहे थे... उसकी काम शक्ति में गज़ब का इजाफा हो गया... अब वह चंदा को संतुष्ट करने के लिए तैयार था...

लोगों को बेहद पसंद आ रहे हैं दर्द के गीत , शूटिंग शुरू

फोटो- मुकेश मासूम, वीरेंद्र गुप्ता (डायरेक्टर ) और सीमा
मासूमफ़िल्म कंपनी की पेशकश दर्द के गीतों की चारों तरफ़ प्रशंशा हो रही है।सिर्फ़ एक महीने में ही म्यूजिक एल्बम दर्द की रिकॉर्ड बिक्री हुई है।- इसका ऑडियो रिलीज हो चुका है। यह लोगों को बेहद पसंद आ रहा है। इन गीतों को जो भी सुनता है, वही दीवाना हो जाता है । अब दर्द की शूटिंग भी शुरू कर दी गयी है। इसके डायरेक्टर वीरेंद्र गुप्ता हैं, जो इससे पहले दो दर्जन से ज्यादा एल्बम को निर्देशित कर चुके हैं। मीरा रोड के वी एस बच्चन स्टूडियो में दर्द की एक दिन की शूटिंग की गयी। मुकेश मासूम और सीमा पर द्रश्य फिल्माए गए। इसके कुछ गीतों पर सुप्रसिद्ध अभिनेत्री और डांसर सीरीन अभिनय करती नज़र आएँगी । सीरीन इससे पहले गीतकार अनवर जी के एल्बम तोहफा में अपनी अदाओं के ज़लवे बिखेर चुकी हैं। शेष कलाकारों का चयन जारी है। जल्दी ही इसकी शूटिंग मुंबई, पूना, खंडाला , जयपुर, उदयपुर आदि स्थानों पर की जायेगी। बहन जी दग्रेट सिस्टर , पंजाबी फ़िल्म - चक दे फट्टे , भोजपुरी फिल्मो- यूपी -बिहार,बम्बई एक्सप्रेस तथा गंगा तोहरे देश में सफल संगीत देने वाले अमन श्लोक इसके संगीतकार हैं। । इस एल्बम के निर्माता एवं गीतकार मुकेश कुमार मासूम हैं... कई सफल फिल्मों में अपने शब्दों का जादू बिखेर चुके मुकेश कुमार मासूम मुंबई संध्या दैनिक समाचार पात्र के कार्यकारी संपादक तथा राष्ट्रीय पत्रकार संघ- मुंबई के अध्यक्ष हैं । इससे पहले श्री मासूम ने उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष बहन कुमारी मायावती के जीवन पर बन रही फ़िल्म -बहनजी द ग्रेट सिस्टर में भी गीत लिख चुके हैं जो आजकल देश-विदेश में सराहे जा रहे हैं... दर्द में कुल आठ (८) गीत हैं...इन गीतों को एक बार जो भी सुनता है वह दीवाना होकर रह जाता है...इनका संगीत बेहद कर्णप्रिय है... एक- एक शब्द आपकी संवेदनाओं को झकझोर की क्षमता रखता है। इसके गीत अमन श्लोक, उदय नारायण और बिल्लू वारसी ने गाये हैं।मस्त-मस्त तेरे जोवन पर मेरा दिल भी लट्टू हो गया, मैं पिके टट्टू हो गया, गीत हर तरफ़ धमाल मचा रहा है। फिल्मी पंडतों का मानना है की यह एल्बम कामयाबी के सभी रिकॉर्ड तोड़ देगा।

Wednesday, September 24, 2008

भाग-115

दोनों के मन में काम वासना का तूफ़ान उठ रहा था ... नशे की हालत में वह ग़लतकाम को भी अच्छा समझ रही थी... चंदा इतनी ज्यादा कामुक थी की ख़ुद ही अरबी शेख को आमंत्रित कर रही थी... जो चंदा अपनी आबरू बचाने के लिए सारी दुनिया से टकरा सकती थी और टकराई भी थी, उसी चंदा ने अरबी शेख के सामने ख़ुद ही समर्पण कर दिया था... इसी लिए तो शराब को बुद्धि विनाशक भी कहा जाता है...
जब दोनों नग्न अवस्था में प्रणय क्रीडा कर रहे थे तो शेख ने पुछा -
- क्या अब मेरे सिवाय निंदा रह पाओगी ?
चंदा- जीने की कल्पना करना भी बेकार है ... क्योंकि ऐसा सम्भव ही नहीं है... इससे पहले मैंने जितना भी समय बिताया, अब समझती हूँ की वह बेकार ही गया... अगर तुम मिल गए होते, तो मेरा वह निरर्थक जीवन भी सार्थक हो जाता ... सच कहूं तो जीवन का असली मकसद अब जाकर मेरी समझ में आया है... अब मैंने जाना है की जिस जीवन में रंगीनियाँ न हों, खुशियाँ न हों, वह जीवन मौत के समान है... तुमने कुछ ही घंटों में मेरे सोचने का, जीवन जीने का नजरिया बदल दिया है...
-तुमसे मिलकर मुझे जो असीम सुख मिला है, मैं उसका शब्दों में वर्णन नहीं कर सकता.... तुम्हारी तुम समझो, मैं तो अब अपने वताकं जाने लायक भी नहीं रहा हूँ... अगर जाऊँगा तो तुम्हें साथ लेकर जाऊँगा... वरना मैं भी यहीं बस जाऊँगा... यहाँ रहकर भी व्यापार किया जा सकता है...
चंदा- सच, ये तो मेरे लिए बहुत ख़ुशी की बात है... इसका मत्य्लब ये हुआ की अब हम दोनों ही एक दुसरे से मोहब्बत करने लगे हैं... पता नहीं मेरे अन्दर ऐसा क्या है की आप इतना रीझ रहे हैं, मैं तो खुद को कुछ नहीं समझती... वैसे भी आपके लिए मेरी क्या उपियोगिता हो सकती है ?
अरबी शेख- बात उपियोगिता की नहीं, दिल की है, प्यार की है... अब मैं यह बात किस्से पूछने जाऊं की तुम्हारीकिस अदा ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया है... बस मेरे लिए इतना ही काफी है की मुझे तुमसे प्यार है और तुम भी मुझ पर जान छिड़कती हो... मैं तो इसी ख़ुशी को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा...
चंदा- आह, क्या अब बातों से ही काम चलाते रहोगे या फिर कुछ करोगे भी ? देखो तो सही, मेरा गला सूख रहा है... दिल भी जोर-जोर से धड़क रहा है... मेरे मन ने न जाने कितनी तमन्नाएं पाल ली हैं... इन तमन्नाओं को तुम पूरा कर सकते हो...
शेख - तुम ठीक कहती हो... बेशक मैं ऐसा कर सकता हूँ और यहाँ तक की मैं तुमसे इसी तरह की अपेक्षाएं कर सकता हूँ...क्या तुम अपने फैसले खुद लेने की स्थिति में हो या फिर?
चंदा-ये क्या कहते हो, मैंने तो अपनी जिन्दगी तुम्हें सौंप दी है ... अब चाहे जो करो, मुझे कोई ऐतराज नहीं होगा... अगर अधिकार जताओगे तो ख़ुशी ही होगी...
शेख दिल से खुश हो गया वह जिस बात को जानना चाहता था, चंदा ने उसके सकारात्मक जवाब दिया था... शेख सक्रिय हो गया... वह चंदा के संगमरमर जैसे अनछुए बदन को चूमने लगा... उसका स्पर्श चंदा को बेहद ऊत्तेजित कर रहा था... जब शेख उसको सताने का प्रयास करने लगा तो चंदा ने उसके संवेदन शील अंग से छेड़छाड़ करनी शुरू करदी... उसने शेख की दुखती रग पर हाथ रख दिया था...

Tuesday, September 23, 2008

Sunday, September 21, 2008

भाग-112

चंदा पर इश्क का खुमार चढ़ने लगा था...वह नशे की तरंग में बहने लगी... अरबी शेख पक्का खिलाडी था... वह हर नाज़ुक वक़्त का फायदा उठाने से नहीं चूकता था... फ़िल्म के भड़काऊ द्रश्य देख-देखकर उसके जिस्म से अंगारे दहकने लगे थे... उसकी चाहत तो गज़ब की कुलांचें मारने लगी... वह उस शेख के विशेष अंग से ख़ुद ही प्रेम करने लगी... शराब पीने का यही तो नुक्सान होता है... इसको पीने के बाद अच्छा -खासा इंसान भी जानवर हो जाता है... पीने वाले का दिमाग पूरी तरह से भरष्ट हो जाता है... नैतिकता ख़त्म हो जाती है... ऐसा लगता है मानो दुनिया में सर्वश्रेष्ठ शक्तिमान वही है...जबकि ऐसा होता नहीं है... बिल्कुल उलटा ही होता है.... शराब का सेवन इंसान को हर तरह से कमजोर बना देता है... तन,मन,धन और विवेक का नाश हो जाता है... तभी तो धार्मिक शाश्त्रों में भी इसका सेवन नहीं करने की सलाह दी जाती है... चंदा ने अपनी इच्छा से भले ही शराब न पी हो मगर सच्चाई भी यह थी की उसके गले से शराब उतर चुकी थी... जब नशा और भी ज्यादा बढ़ने लगा तो वह और भी ज्यादा उत्तेजक हो गयी...अपनी गोलाइयों को वह ख़ुद ही दबाने लगी... शेख के होठों पर मुस्कान नाचने लगी... शरारत करने अंदाज़ में वह बोला-
-अब कहो, कैसा लग रहा है... क्या अब भी कोई दुःख तकलीफ है ?
चंदा- कैसी तकलीफ , कैसा दर्द ? अब तो आनंद ही आनंद है... न जाने तुमने कौन सी जादू की बूटी पिलाई की अब मेरी दुनिया ही बदल गयी है... बड़ा सुख मिल रहा है... अगर तुम्हारे हाथों का दवाब ज़रा भी कम हो जाए तो अच्छा नहीं लगता ... मज़ा सा बिगड़ जाता है...
शेख- तुम क्यों फ़िक्र करती हो? मैं तुमको यहाँ पर मज़े के लिए ही तो लाया हूँ... शर्मो हया में अपनी टाइम बरबाद मत करना... तुम्हें ज्जैसे भी अच्छा लगे वैसे ही करना...
चंदा- सच ? तब तो और भी आनंद आ जायेगा... इस फ़िल्म की हीरों जैसे सुख लूट रही है , क्या मैं भी वैसा ही सुख ले सकती हूँ क्या ?
इसका जवाब देने के बजाय शेख ने चंदा केसे समूचे जिस्म को चूमना शुरू कर दिया ... चंदा आह भरने लगी... शेख प्रेम क्रीडा करने का माहिर था... वह बिस्तर पर पार्टनर को खुश करने की हर कला में पारंगत था... थोडी देर के बाद वे दोनों नग्न अवस्था में आकर एक दूसरे में समाने का प्रयास करने लगे... चंदा पूछ रही थी-
- अब आगे की जिन्दगी कैसे काटेगी ?
शेख- मैं हूँ ना...उम्र भर इसी तरह मौज मस्ती करते रहेंगे... हांलाकि प्यार करने की एक ख़ास उम्र होती ...इस समय जो कर लोगी वह बाद में फ़िर कभी नहीं कर पाओगी...
चंदा- तो फ़िर ऐसे तदपा क्यों रहे हो ?
शेख - यही तो है सुख की चाबी ... अगर यह तड़प ही न हो तो सुख का पता कैसे चले ?

Saturday, September 20, 2008

भाग-111

चंदा के जिस्म में सनसनी फ़ैल गयी... उत्तेजना के कारण उसका बुरा हाल था... अरबी शेख के हाथ बड़े कलात्मक ढंग से हरकत कर रहे थे... अश्लील फ़िल्म बदस्तूर जारी थी... चंदा फुसफुसा रही थी-
-आह .... अब क्या होगा ? मैं तो न जाने किस उलझन में फंस गयी हूँ... न उगल सकती हूँ और न ही निगल सकती हूँ... मैं किस मुसीबत में पड़ गयी... मुझे इस परेशानी से निकाल दीजिये... मैं तो पहले ही ठीक थी... यह प्यार का रोग क्या लगा, मेरी जान ही आफत में आ गयी है... कभी इस तरह का हाल देखा नहीं , इसीलिए यह सब हो रहा है...मन उड़ सा रहा है... बेचैनी इतनी की ये बातें बताने में मेरी जुबान भी लरज रही है...
-हर काम की शुरुआत पहली बार तो करनी ही पड़ती है... आज तुम शुरू कर रही हो तो आगे कभी रिहर्सल की जरूरत नहीं पड़ेगी... अगर जीवन का असली सुख लूटना चाहती हो तो मामूली सा दर्द सहना भी सीखिए... छुई-मुई बन्ने से कोई काम नहीं चलेगा... थोडी सी सख्त बनिए...
-आह... मेरी जान लेने का इरादा है क्या? इतनी जोर से मत दबाओ .... कोई दुश्मनी है क्या ?
उसका जवाब देने के बजाय वह चुपचाप अपने काम में लगा रहा... वह चंदा के नाज़ुक बदन को अपने होठों से चूमता तो चंदा उच्चाल पड़ती थी... जब उसने चंदा को पूरी तरह से निर्वस्त्र कर दिया तो उसके उभारों ओ देखकर उसके मुह में पानी आ गया... वह गोलाइयों का बड़ा दीवाना था... कसे हुए यौवन उभारों को देखते ही उसके जिस्म में हरकत होने लगती थी... वह अपने आपको रोक नहीं पाटा था... उसने उभारों की चोटियों को चूमना शुरू कर दिया... इस क्रिया से चंदा क शरीर में बम से फटने लगे... वह कामोत्तेजना के शिखर पर पहुच गयी... उसने शेख के संवेदन शील अंग को को सहलाना शुरू कर दिया ... इसका जोरदार असर हुआ... अरबी शेख का ख़ास अंग अब सख्त होकर दहाडें मारने लगा था... उसके मन में तरह -तरह के भाव उमड़ रहे थे... वह चंदा के दिलो-दिमाग परछा जाना चाहता था... उसने पहली वाली अश्लील फ़िल्म निकाल कर चालू करदी... इस बीच शेख ने वेटर को शराब व् अन्य चीजों का आर्डर भी दे दिया था... आर्डर आते ही अरबी शेख ने दो पैग तैयार किए... एक पैग उसने चंदा को दे दिया तथा एक ख़ुद पीने लगा... चंदा ने बहुत इनकार किया ... बोली-
- मैंने आज तक इसको छुआ भी नहीं है और आप पीने की बात कर रहे है....
शेख- इसको पीते ही तुम्हारी दुनिया ही बदल जायेगी... अह शर्मो-हया हमारे प्यार में बाधक बनी हुई है... सारी झिझक रफू चक्कर हो जायेगी.... सब गम ख़त्म हो जायेंगे.... तुम्हारी हसरतें जाग उठेंगी...
-चंदा- ऐसे तो मैं बिगड़ जाउंगी... पहले शराब पिलाते हो बाद में सिगरेट पीने के लिए कहोगे....
-शेख- हाँ , वो तो है... मैं नहीं भी कहूँगा तो भी उम्हें सकी तलब महसूस होगी.... तुम्हारे जिस्म की भूख -प्यास भी जाग उठेगी...तुम्हारा नारीत्व साकार हो उठेगा ...मैं उस पल का इन्तजार कर रहा हूँ....
शेख बहुत उत्साह में था... उसने एक झटके में अपना पैग समाप्त कर दिया.... कुछ देर की जद्दो जहद के बाद चंदा ने भी शराब का पैग पीना शुरू कर दिया ... जब वह अपना हाथ पीछे हटाती तो शेख उसको नमकीन काजू खिला दिया करता था... चंदा को दूसरा पैग पीने में भी इसी तरह की तकलीफ हुई, फ़िर सब मामला पत्र्ती पर आ गया... स्व दोनों सिगरेट के धुए के छल्ले भी उडाने लगे...











Friday, September 19, 2008

भाग-110

अरबी- प्यार में शर्त नहीं होती , मगर मैं इसके लिए भी तैयार हूँ... मैं तो किसी भी हद तक जा सकता हूँ...
चंदा- मैं आपको किसी धर्म संकट में नहीं डालना चाहती... एक बार हम दोनों निकाह कर लेंगे और बाद में विवाह कर लेंगे ... मुझे आपसे मतलब है... सिर्फ़ आपसे...
अरबी- क्या यह सब करना अभी और इसी वक़्त जरूरी है क्या ?
चंदा-आपको क्या लगता है ? यह बड़ा शुभ काम होता है ... जब हम एक नई जिन्दगी की शुरुआत करने ही जा रहे हैं तो क्यों न यह पहले ही कर डालें ... भले ही इसमें तुम्हारे रिश्तेदार शामिल नहीं हो पायेंगे, मगर मेरे परिजनों को इससे जो सम्मान मिलेगा, आप उसकी कल्पना भी नहीं कर पायेंगे ... एक गरीब पिता की सबसे बड़ी हसरत यही होती है की उसकी बेटी के हाथ पीली हो जाएँ... जब उनको यह पता चलेगा की मेरी शादी एक अमीर विदेशी के साथ होने वाली है तो वे फूले नहीं समायेंगे... फ़िर भले ही हम यहाँ आ जायेंगे... यहाँ की छोडो, अगर तुम जहन्नम मेंभी लेकर जाओगे तो मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी...
अरबी- इस काम में समय बहुत लगेगा... फ़िर भी ऐसा करके मुझे खुशी ही होगी... बस एक बार जी भरके प्यार करने दो... बहुत कुछ इंतजाम भी करना होगा... मैं सब कर लूँगा... मुझे थोड़ा सा समय तो चाहिए ही...
अरबी शेख की दलील पर चंदा चुप हो गयी... वह इतना तो जान ही गया था की चंदा को उसकी नीयत पर शक जरूर है... कोठे पर उसे कुछ वेश्याओं ने जो बातें बताईं थीं वे उसके दिलो दिमाग में बस गयी थीं... चंदा शेख की बातों से संतुष्ट हो गयी... ज्यादा जिद करने की कोई वजह भी नहीं थी... वह नहीं चाहती थी की शेख उससे नाराज़ हो या फ़िर वह उसको जिद्दी समझे... वह एक आदर्श नारी की भूमिका निभाना चाहती थी... एक ऐसी प्रेमिका बन्ना चाहती थी ,जिससे प्रेमी को कोई शिकायत नहीं होती... इसीलिए वह चुप हो गयी... शेख ने इस अवसर का फायदा उठाना बेहतर समझा ... उसने एक अश्लील फ़िल्म लगादी ... यह बहुत भयानक फ़िल्म थी... उसकी भाषा हिन्दी थी... उसमे एक ऐसे महिला की कहानी दिखाई गयी थी , जिसका विवाह सात दिनों पहले ही संपन्न हुआ था... उसका पति सीधा-सादा था... दो दिनों तक तो सब कुछ ठीक-ठाक रहा , बाद में वह नव विवाहिता उससे मुख मैथुन और स्तनपान की मांग करने लगी... जब शर्मीले युवक ने इससे इनकार किया तो वह तलाक की धमकी देने लगी... बेचारा युवक इतना परेशान हुआ की घर छोड़कर दूसरे शहर भाग गया ... युवती ने अपने पड़ोसी से सम्बन्ध बना लिए... जो सुख उसको अपने पति से नहीं मिल पाया था, अब वह पड़ोसी से लूट रही थी... उसका पड़ोसी कुवारा था... वह शराब पीने और अश्लील फ़िल्म देखने का शौकीन था... उन दोनों की जोड़ी जबरदस्त जम गयी... चंदा उस फिल को साँस थाम कर देख रही थी... अरबी शेख का ध्यान तो फ़िल्म की तरफ़ था, लेकिन वह चंदा के नाजुक अंगों पर हाथ फिरा रहा था... चंदा के रौंगटे खड़े हो गए... वह कामोत्तेजना की आग में झुलसता जा रहा था... चंदा की हालत भी बद से बदतर होती जा रही थी... शेख उसके यौवन द्वार को अपनी उँगलियों से सहला रहा था....

Thursday, September 18, 2008

भाग-109a

चंदा-हाँ , बात बिल्कुल सही है... ऐसा है की तन-मन और आत्मा के साथ-साथ सामाजिक मान मर्यादा भी बहुत जरूरी होती है... हमारे पूर्वजों ने अगर कुछ नियम क़ानून बनाए हैं तो इसका कुछ तो महत्व होगा... मैं ये चाहती हूँ की हमसे समाज भी नाराज़ न हो...
-अरबी- हाँ -हाँ क्यों नहीं ? तुम जैसे कहो , मुझे कोई ऐतराज नहीं... मैं तो पहले ही वायदा कर चुका हूँ की तुम्हारी हर बात मानूंगा... मैं तुम पर अंधा विश्वाश करने लगा हूँ... तुम्हारी तुम जानो ,मैं अपने दिल की बात कह रह हूँ... मैं तुम्हारे लिए जाती- धर्म भाषा और वतन की दीवार भी गिराने के लिए तैयार हूँ...
चंदा- मुझे ग़लत मत समझो... मैं भी प्यार की हर कीमत चुकाने के लिए तैयार हूँ...

भाग -109

चंदा को बहुत आनंद आ रहा था... वह अपने शरीर को आंदोलित महसूस कर रही थी... अरबी का स्पर्श उसको कामोत्तेजित कर रहा था... चंदा ने कहना शुरू किया-
-मेरा बदन जल रहा है... अंग-अंग में आग सी लगी है... इस तरह की बेचैनी मैं पहली बार महसूस कर रही हूँ...
अरबी- इश्क में यही तो असली सुख होता है... जब तक इस रस का स्वाद नहीं लिया जाता तब तक जीवन का कोई अर्थ नहीं होता... मैं तुमको हर सुख देना चाहता हूँ... इसके लिए थोड़ा सा दर्द सहना पड़ेगा... क्या तुम इसके लिए तैयार हो ? मेरी यही कोशिश होगी की आपको बेंतिहान सुख मिले... मेरे बाद भी तुम मेरी चर्चा करो...
चंदा- तुम्हारा नाम मेरे सीने पर लिख चुका है... अब ये मुमकिन नहीं की तुम्हें भुलाया जा सके... अब तो हर जगह तुम ही तुम नज़र आते हो... इतना सुख पाकर तो मुझे अब किसी भी चीज की कमी महसूस नहीं होती... यहाँ तक की अब अगर आप बेवफा भी निकले तो मुझे गम नहीं होगा... मैं हर हाल में तुम्हारी बनकर रहूंगी... इतने कम समय में तुमने मुझे इतनी ज्यादा खुशियाँ बख्शी हैं की इन यादों के सहारे ही जिन्दगी गुजर सकती है... मैं तो हर हालत में गुजार सकती हूँ... सबको एक न एक दिन मरना ही पड़ता है... अमर तो मुझे भी नहीं रहना है... फर्क इतना है की कोई कुछ बरस पहले मर जाता है तो कोई कुछ बरस के बाद ... रो-रो के १०० साल तक मरने से १०० पल तक सुख से जीना बेहतर है...
अरबी- तुम जितनी खूबसूरत हो उससे भी ज्यादा समझदार हो... मैं तुम्हें पाकर खुश हूँ... जितना प्यार तुम मुझसे करने लगी हो, मैं भी तुमसे उतना ही प्रेम करने लगा हूँ... यकीन मानो, मैं तुम्हें कभी दगा नहीं दूंगा... यह सब मेरी फितरत में नहीं है...
चंदा- ये सब कहने की बातें नहीं हैं... मैं जान रही हूँ ... मेरा दिल जान रहा है... मुझसे शादी करना चाहते हो न तुम ?
अचानक इस वाक्य ने अरबी शेख को चौंका दिया... सवाल करने के बाद वह थोडी देर तक उसके चेहरे को घूर रही थी... शायद वह उसके चेहरे के भावों को पढ़ना चाहती थी... शेख थोड़ा सा शोख हो गया ... उसको गुदगुदी करते हुए बोला-
- तुम मजाक बहुत अच्छा कर लेती हो... हम सुहागरात मनाने की तैयारी कर रहे हैं और तुम शादी की बात कर रही हो... मन से मन और तन से तन का मिलन ही शादी कहलाता है...

Wednesday, September 17, 2008

भाग-108

चंदा-एक लड़की तो यह भी कह रही थी की हो सकता है मुझे भी एक साजिश के चलते कोठे से बाहर ले जाया जा रहा हो... वह बता रही थी की मेरा इस्तेमाल करने के बाद मुझे फ़िर से कोठे पर वापस भेजा जा सकता है...
अरबी- और ,तुम्हें क्या लगता है ?क्या ऐसा हो सकता है ? क्या मैं तुम्हें धोखा दे सकता हूँ ...?
चंदा -होने को तो कुछ भी हो सकता है, लेकिन मैं आप पर अंधा विश्वाश करती हूँ... आप जो चाहें करें...
अन्दर तक दहल गया शेख ... चंदा ने सच्ची बात कहदी थी... कुछ पलों तक तो वह अवाक रह गया... सच्चाई सामने आने पर वह बुरी तरह घबरा गया... साथ ही चंदा के विश्वाश से उसको सहारा भी मिला था... यह ऐसा समय था जहाँ बोलने की गुंजाइश बहुत कम थी...वैसे अरबी शेख बहूत घाघ था... ऐसे अवसरों पर बात को संभालना वह बखूबी जानता था... उसने चंदा की आंखों में आँखें डालकर देखा, अपनी बांहों में कैद करके वह उसके गालों को चूमने लगा ... उसकी आत्मीयता देखकर चंदा भी भावनाओं में बहने लगी... अरबी शेख उसके सभी नाज़ुक अंगों को छेड़ रहा था... जब उसको लगा की चंदा उससे प्रभावित हो गई है तो उसने कहा-
- प्यार कोई करने की चीज नहीं है ... यह दिल के अन्दर का एहसास होता है... जिससे हो गया, समझो हो गया... यह बेचने या खरीदने की चीज भी नहीं होती... जो लोग ऐसा करते हैं , या प्यार की आड़ में d

Tuesday, September 16, 2008

भाग-107

चंदा के लिए यह नया माहौल था... उसने यह सब कहाँ देखा था... वह तो बेचारी गर्दिश की मारी थी... कई दिनों से बंधक की जिन्दगी बिता रही थी... जब बकरे को कसाई के घर बाँध दिया जाता है तो सोच-सोचकर ही उसकी हालत मौत से बद्तर हो जाती है... चंदा का भी तो यही हाल था... वह जबसे कोठे पर आई थी, तभी से उसे न खाना अच्छा लग रहा था और न ही पीना अच्छा लग रहा था... वह सूखती चली जा रही थी... अब अरबी शेख उसको शानदार होटल में लेकर आया था... यहाँ आते ही उसकी तबियत खुश हो गई... उस शेख पर उसको खूब भरोसा हो गया था...चंदा सोच रही थी की अगर शेख ग़लत इंसान होता तो अब तक उसका शरीर हासिल कर चुका होता... उसको पूरा चांस मिला था... मगर उसने ऐसा करने से साफ़ इनकार कर दिया था... चंदा के सोचने का द्रष्टिकोण यह था और शेख के सोचने का तरीका बिल्कुल अलग था... वह हमेशा अपना आगे का फायदा सोचता था... उसका ख़याल था की वह चंदा का विश्वाश जीतने के बाद ही उसके साथ सम्बन्ध बनाएगा... इस प्रयास में उसको काफी हद तक सफलता भी मिली थी... मन ही मन चंदा उस पर फ़िदा हो गई ... इतनी फ़िदा की अपनी खुशी से उसके साथ होटल में चली आई... वहां की चमक-दमक देखकर उसकी आँखें फटी की फटी रह गई...वहाँ पर एक इशारे पर हाजिर रहने वाले सेवक थे ... महकता हुआ माहोल था और गहरा सुकून...वह बेहद खुश थी... अरबी शेख उसको अपनी बांहों में लेकर चूम रहा था... चंदा उसका आभार व्यक्त करते हुए बोली-
-इतने सुख भरे पल आपकी वजह से ही मिल पाए है... जागती आंखों का सपना जैसा लग रहा है... कैसे उतारूंगी यह उपकार... आपको मेरी जिन्दगी में बहुत पहले ही आ जाना चाहिए था...
अरबी- जो होना होता है, वही होता है... मालिक की मर्ज़ी के बोना कभी कुछ नहीं होता... यह मेरा निजी अनुभव है... न जाने कितने सालों से मैं तुम जैसी खूबसूरत लड़की को तलाश कर रहा था... कितने साल बीत गए और अब जाकर मेरी तलाश पूरी हो पाई है...
- आप इस दिल की हर धड़कन में बस गए हैं... अगर मेरा सीना चीरकर देखोगे तो इसमें आप ही आप नज़र आएँगी... पहले कभी भी मुझे इस तरह का एहसास नहीं हुआ ... मैंने अपने दिल में कभी इस तरह की हलचल महसूस नहीं की... यह एकदम अलग सा है...
-मोहब्बत का संगीत सबसे सुरीला होता है... इतना की वह जिस्म की रग-रग से सुनाई देता है...
चंदा-मुझे अपने नसीब पर ज़रा भी भरोसा नहीं है... डरती हूँ की कहीं किसी की बुरी नज़र हमारे प्यार पर न लग जाए... कभी-कभी दिल में यह शंका पैदा होती है की कोठे की मालकिन ने मुझे इतनी जल्दी आजाद कर दिया है, तो जरूर इसके पीछे कोई राज होगा ... ऐसा भी हो सकता है की अपने गुंडे भेजकर वे हमें फ़िर उठ्वालें ...
अरबी- ऐसा क्यों सोच रही हो तुम ?
चंदा- वहाँ की लडकियां की बता रही थीं...
अरबी- और क्या कह रही थीं वे?

Saturday, September 13, 2008

भाग-104

चंदा- ओह यह तुमने क्या कह दिया, क्या कर दिया ? आह...
अरबी- ऐसा क्यों कहती हो, मैंने तो अभी कुछ भी नहीं कहा ... एक बार स्पर्श ही तो किया है... अगर तुम इजाज़त दो तो तुम्हारे मन के तारों को वीणा की मधुर वाणी की तरअह झंकृत कर दूंगा...तुम्हारी यह सुंदर काया हर किसी को नसीब नहीं होती... जब मालिक ने तुम्हें इतना सुंदर हुस्न बख्शा है तो इसका सदुपयोग करो....
चंदा- तुम जादूगर तो नहीं हो? मीठी-मीठी बातें करके तुमने मेरा तन -मन मोह लिया है... अब मैं तुम्हारे सिवाय और किसीके बारे में नहीं सोच सकती... यहाँ जो भी आया वह मेरे जिस्म का सौदा करने ही आया ... तुम ऐसे अकेले हो जिसने आकर मेरी भावनाओं को समझने की कोशिश की...
अरबी- ये तो कुछ भी नही, मैं तुम पर अपनी सारी दौलत .सारा प्यार लुटाना चाहता हूँ...इस कोठे की मालकिन मेरी बहुत इज्ज़त करती है... उससे पूछकर मैं तुमको अपने साथ ले जा सकता हूँ... हम लोग कोई अच्छा सा होटल देखकर एक कमरा बुक करा लेंगे, उसमें खूब आनंद उठाएंगे... जब तक हम एक दूसरे को अच्छी तरह से पहचान भी लेंगे... उस वक़्त यदि तुम्हारी इच्छा हुई तो मैं तुम्हें अपने साथ वतन ले चलूँगा... हमारे पास वहां इतनी संपत्ति है की सात जन्मों तक भी हम बैठकर शहन्शाहाओं की तरह खा सकते हैं... मेरे जीवन तुम जैसी एक हसीना की ही कमी थी, वह तुम्हारे आने से पूरी हो जायेगी... फ़िर मुझे कुछ नहीं चाहिए... मेरा जीवन सफल हो जायेगा, धन्य हो जायेगा... मैं तुम्हें इतना प्यार दूंगा की ज़माना हमारी वफाओं की क़समें खाया करेगा...
चंदा- मैं भी अपनी जान लुटा दूंगी, जहाँ तुम्हारा पसीना गिरेगा , वहां मैं खुश होकर अपना लहू बहा दूंगी...
चंदा पर इश्क का भूत सवार होता जा रहा था... वह अरबी शेख की बातों में आकर पिघलती जा रही थी... अरबी ने चंदा के यौवन की गोलाइयों तक अपनी पहुच बना ली थी... वह चंदा के होठों का रस तो पहले ही चख चुका था... अब वह उसकी क्वारी और मदमस्त ज़वानी का आनंद लूटने को बेताब था... चन्दा की तबियत भी मचलने लगी थी... अरबी ने उसके अंग-अंग में कामोत्तेजना का तूफ़ान भर दिया था...अरबी शब्दों का खिलाड़ी था... वह पूछ रहा था-
-तुम्हारे चेहरे पर खुशियों की जगह पर ये दर्द की लकीरें क्यों दिख रही हैं?
चंदा-क्योंकि मुझे अपना मुकद्दर पर भरोसा नहीं है... मेरे दामन में आने से पहले की सुख रूठ जाता है... डरती हूँ की फ़िर कोई ऐसा ही हादसा हमारे साथ न हो जाए...तुम क्या जानो, बड़ी बदनसीब हूँ मैं...
अरबी- जब तक मैं तुम्हारे साथ हूँ, तब तक तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है... मैं हर आंधी-तूफ़ान का रुख मोड़ सकता हूँ... तुम्हारे तरफ़ आने वाली हर बला को मैं अपने ऊपर ले लूँगा...
चंदा- ज्यादा वाडे न करो, सुना है की वायदे अक्सर टूट जाते हैं...
अरबी- तुम शंका मत करो... नेगेटिव विचारों से इंसान की शक्ति कमजोर हो जाती है...
चंदा- तुम शायद ठीक कहते हो ... मैंने भी ऐसे ही महसूस किया है... अब मैं वही करुँगी, जो तुम कहोगे...
चंदा ने जब अपने हाथों को ऊपर उठाकर अंगडाई ली तो अरबी शेख का मन विचलित हो गया... वह







Friday, September 12, 2008

भाग-103

चंदा-सब झगडा तो इसी शरीर का है... सभी इसको पाने के लिए बेचैन हैं... तुम ही मेरी मदद कर सकते हो... मैंने अभी तक किसी को यह जिस्म नहीं सौपा है... मैं समझ नहीं पा रही हूँ की इस जाल से कैसे निकला जाए... तुम्हारे शब्दों से मेरा हौसला बढ़ा है... पता नहीं यह खुशी कितनी देर तक टिक पाती है?

अरबी- यह क्या कह दिया चंदा , तुम अगर कहो तो तमाम उम्र तुम्हें इसी तरह की खुशियाँ मिल सकती हैं... मैं तो पहली नज़र में तुम्हारा दीवाना हो गया था... तुम मेरे साथ मेरे वतन चलो, तुम्हें अपनी रानी बनाकर रखूँगा... वहां पर हमारा बहुत बड़ा कारोबार है... वैसे तो कोई कमी नहीं है, लेकिन खूबसूरत औरतें मेरी सबसे बड़ी मजबूरी हैं ... मैं बहुत कामुक हूँ ... मुझे प्रणय क्रीडा करने में बहुत आनंद मिलता है... मेरा निकाह हो चुका है लेकिन मेरी बीबी मुझे वो सुख नहीं दे पाती, जिसकी मुझे जरूरत है...तुम्हें देखा तो ऐसा लगा जैसे की मेरी तलाश पूरी हो चुकी है... अब मैं बड़े आराम से जिन्दगी गुजार सकता हूँ... मैं तुम्हें अपनी बनाने को तैयार हूँ... यहाँ पर रोजाना तरह-तरह के लोग तुम्हारे जिस्म से खिलवाड़ करने के लिए आयेंगे... अगर तुम राजी से नहीं मानी तो ये लोग जबरन तुम्हारी आबरू लूट लेंगे... अगर तुम सोचती हो की पुलिस तुम्हारी मदद करेगी, तो यह तुम्हारी बहुत बड़ी भूल है... ऐसा हो ही नहीं सकता... पुलिस के भष्ट अफसर इन कोठे वालों से मिले हुए होते हैं, वे हमेशा उनकी ही तरफदारी करते हैं... इसलिए यह उम्मीद करता हूँ की आपको वहां से कोई मदद नहीं मिलेगी ... मेरी बात अलग है... मैं तो प्रेमी हूँ आपका ... मैं जो भी करूँगा, आपके हित में करूँगा... कहोगी तो रानी बनाकर रखूँगा...

चंदा-ये क्या कह रहे हैं आप ?मैं कहाँ ,मुसीबत की मारी हुई एक बदनसीब लड़की ... और आप कहाँ , आप ठहरे करोडो पति ... बस आप मुझे यहाँ से निकलवा दीजिये...

अरबी - तुम डरना मत... डरने से किसी को कुछ नहीं मिलता... आओ, मेरी बांहों में आकर समा जाओ... मुझे तुम्हारी चिंता हो रही है... इस वक़्त तुम ठीक तरह से अच्छी बातें सोचने की स्थिति में नहीं हो...

चंदा चुप हो गयी... उसने महसूस किया की अरबी की बात में वाकई ताकत है... अरबी शेख उसके और भी करीब आकर बैठ गया ... अब वह उसके गोरे-गोरे गालों पर हाथ फिराने लगा... चंदा खामोश रही ... उसको अरबी की उपस्थिति बहुत अच्छी लग रही थी... उसका मन खुश था... अरबी ने उसके गाल का चुम्बन लेते हुए कहा-

- दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की हो तुम... आह, अगर मैं इस बार भारत नहीं आता तो बहुत बड़े सुख से हाथ धो बैठता ... मैं तुमको हमेशा खुश रखूँगा...

Thursday, September 11, 2008

भाग-१०२ अ

और इनका तो कहना ही क्या है ... कितनी मोटी-मोटी आँखें हैं , सुर्ख लाल गाल और उससे भी अच्छे होठ... आह, इतनी खूबसूरत लड़की मैंने अपने जीवन में पहले कभी नहीं देखी... क्या नाम है इनका?
उस अरबी शेख ने इतनी मीठी जुबां में बातें कीं की चंदा का दिल पिघल गया... उसने बड़े अदब से उसको अपना नाम बताया और यहाँ तक की अपनी सब परेशानियां भी गिनाईं...वह बोली-
- यहाँ के लोग हमारे साथ में जानवरों जैसा व्यवहार करते हैं ... बीमार हो जाए तो दवा का नाम तो लेते नहीं उल्टे काम करने को कहते हैं... मेरी तो हालत ख़राब हो हो गयी है... आप देखिये मुझे बुखार है की नहीं ?
अरबी- तुम फ़िक्र मत करो, दो मिनिट में ये बुखार रफूचक्कर हो जायेगा, मैं यह दवा देता हूँ, लो इसको खालो, अब अगर तुम्हारी इजाज़त हो तो मैं तुम्हारे पास बैठकर थोडी देर तक दुःख -सुख की बात करूँ, हम लोग अपना वतन छोड़कर यहाँ इसलिए आते हैं ताकि थोड़ा सा सुकून हासिल कर सकें... रोजाना की भाग दौड़ और आपा धापी की जिन्दगी से ऊब हो चुकी है... धन-दौलत या शौरत ही सब कुछ नहीं होते... मुझे देखो, मेरे पास सब कुछ है लेकिन मानसिक शान्ति नहीं है... यहाँ पर तुम्हें देखा तो न जाने क्यों ऐसा लगा की तुम्हारी आंखों मेंजो चमक है,उससे मेरी बीमारी का इलाज़ हो सकता है... मेरे दिल की इस बीमारी को अब तुम ही ठीक कर सकती हो... क्या तुम ऐसा करोगी ? देखो, इंकार न करना ... मैं जीवन में इतना प्रभावित पहले कभी किसी से नहीं हुआ ....
चंदा- मैं भला इसमें क्या कर सकती हूँ ?डॉक्टर तो ख़ुद आप हैं...आपकी एक गोली से ही मैं बिल्कुल ठीक हो गयी...
अरबी- क्यों नहीं कर सकती? तुम बहुत कुछ कर सकती हो... जैसे की थोडासा मुस्करा सकती हो... इससे मेरे दिल को बड़ा अच्छा लगेगा...करो न ऐसे...
चंदा सचमुच मुस्कराने लगी थी ... अरबी खुश हो गया... वह चंदा को अपनी बातों में उलझाने में कामयाब हो गया था... चंदा को उसकी बातों में मज़ा आने लगा था... वह पलंग पर उसके करीब आकर बैठ गया... चंदा के बालों में अपनी उँगलियों से कंघी करते हुए वह पूछने लगा-
- इससे पहले कहाँ थी आप? इस कोठे पर तो पहली बार ही देख रहा हूँ ...
चंदा- हाँ, अब तक मुझे कई जगहों पर बेचा जा चुका है... हर जगह मुझे मारा-पीटा जाता है, यातनाएं दी जाती हैं,धमकियाँ दी जाती है, तब भी मैं उनकी बात नहीं मानती तो ऊंचे दाम लेकर वे लोग मुझे दूसरी जगह पर बेच देते हैं... दो दिन से यहाँ पर भी मुझे इसी तरह की तकलीफें दी जा रहीं हैं... मेरी सुनने वाला कोई नहीं है... क्या आप मुझे यहाँ से निकाल सकते हैं ? मैं जीवन भर आपकी गुलामी करने को तैयार हूँ...
अरबी- अरे ये क्या कहती हो? दोस्ती में ये सब बातें नहीं कही जातीं... मैं तुमकोअपने दिल के करीब पाटा हूँ... तुम्हें दोस्त मान चुका हूँ... तुम अगर मेरी बात मानोगी तो मैं भी तुम्हारे लिए कुछ भी कर सकता हूँ... लो ,फिलहाल ये सोने की चैन अपने गले में दाल लो, तुम्हारे गोरे बदन को खूब अच्छी लगेगी...
चंदा- इस वक़्त मुझे सोने चांदी की नहीं बल्कि एक सच्चे साथी और सहयोगी की जरूरत है, जो मुझे इस नर्क से निकाल सके ... क्या तुम सचमुच मेरी मदद करने के बारे में सोच रहे हो ?
अरबी- तुम्हारे लिए तो जितना किया जाए कम है... ये बताओ, इससे पहले कितने मर्द तुम्हारे जिस्म को स्पर्श कर यौवन का आनंद लूट चुके हैं ?



































Wednesday, September 10, 2008

भाग-102

वहां पर उपस्थित सभी लोग तालियाँ बजा रहे थे... आशा की आंखों में गज़ब की चमक थी... उसको आज महसूस हुआ की अब तक बदले की आग में जलकर उसने कितना बड़ा गुनाह किया था... विनीत अपनी खुशी जब्त नहीं कर पा रहा था... चंदा इसको हसीं ख्वाब की तरह देख रही ... उसको आशा से ऐसी आशा नहीं थी... उसे बस इतनी उम्मीद तो थी की एक न एक दिन आशा को उस पर तरस आ जायेगा,कभी न कभी वह उसकी बात मान ही जायेगी... मगर ये बात उसने सपने में भी नहीं सोची थी की आशा एकदम बदल जायेगी... वैश्यावृत्ति छोड़कर अपनी सारी संपत्ति को परोपकार के कामों में दान दे देगी... मजबूर लड़कियों को खरीदकर उनसे जबरन जिस्म फरोशी कराने वाली आशा बिल्कुल बदल गयी थी.... चंदा को अपने वे पुराने दिन याद आने लगे जब वह इस दल-दल में फंसी हुई थी... यह उस समय की बात है , जब वह दूसरे कोठे पर थी... वहाँ उसे कई जगह से खरीदते-बेचते हुए लाया गया था... एक दिन की बात है, जब वह बुखार में बुरी तरह से तड़प रही थी तभी कोठे का दलाल उसके पास आया... बोला-
- एक बहुत अच्छा ग्राहक आया है... सबसे ज्यादा टिप देता है... इस बार वह तुम्हें पसंद कर चुका है... अगर तुमने उसको खुश कर दिया तो मज़ा आ जायेगा... वह अरब का शेख है, जिस पर उसका दिल आ गया समझो उसका बडा पारहो गया... बड़ा रंगीला इंसान है, वह ख़ुद भी जमकर आनंद लेता है और तुमको भी देगा...
चंदा- देखते नहीं हो, मैं बुखार में कितनी जल रही हूँ...
दलाल- उससे क्या फर्क पड़ता है ? वह डबल इंजेक्शन लगाता है... मस्त कर डालेगा...
चंदा- मुझे दवा की जरूरत है...
दलाल- अगर यूँ ही नफरत करती रही तो जैसे दवा के लिए तरस रही है, एक दिन जिन्दगी के लिए तद्पेगी...
चंदा- ऐसे जीवन से तो अगर मर ही जाऊं, तो ही बेहतर है... मुझे जहर ही लाकर दे दो , तुम सबको तब तो तसल्ली मिल जायेगी... ये लो मैं तुम्हें इतनी तकलीफ भी नहीं दूंगी... लो, मर जाती हूँ ...
चंदा ने अपना सर दीवार में दे मारा... ठीक तभी उस कमरे में एक अधेड़ व्यक्ति ने प्रवेश किया... वह अमीर अरब शेख था... उसने चंदा को संभाल लिया... मीठी भाषा में वह बोला-
-ये क्या गज़ब कर रही हैं आप ? इतनी खूबसूरत होकर भी ऐसी कायराना हरकत कर रही है?
-चंदा- कौन हो तुम ? ये सब कहने के लिए तुम्हें यहाँ भेजा किसने है?
दलाल- यही तो है तुम्हारा आज रात का साजन ... इसीने तुम्हें आज पसंद किया है...
-तो इनको कहीं और लेकर जाओ न, मैं अकेली ही इस कोठे पर रहती हूँ क्या ?भाग जाओ वरना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा ... तुम सब के सब जल्लाद हो...मेरी बात कोई नहीं सुन रहा है ,सब अपनी-अपनी मस्ती में हैं ...
अरबी - अरे, भाई इनको परेशानी क्या है ? पहले इनकी तकलीफ दूर करो , उसके बाद में हम इनसे बात करेंगे... मुझे लगता है आप लोग इतनी हसीं लड़की का सम्मान करना भी नहीं जानते... अरे भाई, लड़की बड़ी खूबसूरत होती हैं...
















Tuesday, September 9, 2008

भाग-101

सब लोग बेहद खुश थे... यूँ तो उस कोठे पर रोजाना ही शराब और शबाब की महफिलें सजा करती थीं... खुशियों के कहकहे गूंजा करते थे... लेकिन वह हंसी खोखली हुआ करती थी... आज सबके चेहरे सच्ची खुशी से दमक रहे थे....

मालती ने कहा भी-

-आज कितना पवित्र दिन है... हर तरफ़ रौनक ही रौनक है... काश, इतना मुबारक दिन पहले ही आ गया होता... मगर कहते हैं न की जब कुदरत का इशारा होता होता है , तभी सब कुछ होता है... वैसे भी समय से पहले और भाग्य से अधिक किसी को कुछ नहीं मिलता...

आशा- जब जागो तभी सवेरा होता है... आज से तुम बागडोर संभाल लो...

मालती- मैं भी आप सब लोगो के सामने यह घोषणा करती हूँ की अब कभी भी किसी लड़की से वैश्यावृत्ति नहीं कराऊंगी ... मैं आज और अभी से सबको मुक्त करती हूँ...जोलड़कियां मेहनत करके कमाना चाहती हैं उन सबका स्वागत है... मैं ऐसी लड़कियों को पूरी सुख सुविधाएं दूंगी... तुम सबके आश्रितों को रहने की सुविधा दी जायेंगी... तुम्हारे बच्चों को पढने की सहूलियत दी जायेंगी... बोलो मंज़ूर है ?

सब लड़कियों ने एक स्वर में सहमती जताई... एक ने पूछा-

- वो सब तो ठीक है लेकिन हमको काम क्या करना पड़ेगा ?

मालती- फिलहाल इस बारे में कुछ सोचा नहीं गया है... मगर इतना याद रखो, जो कुछ भी काम हम सब करेंगे वह ईमानदारी वाला होगा और अच्छा ही होगा ... हम ख़ास लोगों से पूछताछ करके कोई व्यवसाय शुरू करेंगे... इतना यकीन करें की हम हर हालत में कामयाब होंगे... अगर तुम लोगों ने दिल से साथ दिया तो हम सारी दुनियाको यह दिखा देंगे की वैश्याये भी मुख्य धारा में शामिल हो सकती हैं...

लगभग ९० वेश्याओं और स्टाफ के ३५ लोगों ने मालती की बात का तालियों की गडगडाहट के साथ स्वागत किया... आशा का उत्साह और भी ज्यादा बढ़ गया... वह फूली नहीं समा रही थी... उसने जोश में कहा-

- आज तक लोग हमारा शोषण करते रहे, हमारे जिस्म की बदौलत अपना व्यवसाय चमकाते रहे, अब हमारी है... अब हम व्यवसाय करेंगे और जहाँ-जहाँ लड़कियों को जबरन जिस्म फरोशी के धंधे में धकेला जायेगा , वहाँ -वहाँ हम विरोध करने पहुंचेंगे...कानूनी और सामाजिक दवाब डालकर हम उस अबला की मदद करेंगे... इसके लिए हम एक सामाजिक संगठन का गठन करेंगे...

मालती- हाँ और अगर जरूरत पडी तो हम आन्दोलन करेंगे... हम एक ऐसा आश्रम बनायेंगे जहाँ पर ऐसी मुसीबत की मारी हुई लड़कियां को शरण मिल सके ... हम वहाँ पर कई काम सिखाने की व्यवस्था करेंगे ताकि वह काम सीखकर हमारी कम्पनियों या फ़िर कहीं दूसरी जगह पर भी नौकरी कर सके...

आशा- मालती की बात स्वागत योग्य है... मेरे पास इतनी संपत्ति मौजूद है, जिससे आप लोगों का यह सपना पूरा हो सकता है... मैं आप सबको आत्मनिर्भर बनते हुए देखना चाहती हूँ...

Sunday, September 7, 2008

भाग-१००

उनको यह भरोसा होने लगा था की अब वे भी अपने प्रेम की मंजिल तक पहुँचने में कामयाब हो सकती हैं... बस एक बार रास्ता बनाने में ही तःलीफ होती है... बाद में तो सब कुछ लीक पर ही चलकर ठीक-ठाक हो जाता है...इसी उम्मीद पर ये सारी दुनिया कायम है...आशा के आंसू vऐसे तोसब कुछ बयान कर रहे थे, लेकिन चंदा के मन के किसी कोने में यह डर भी बसा हुआ था की कहीं आशा के आंसू घडियाली तो नहीं... मालती बहुत पशोपेश में थी.... विनीत पास में खड़ा होकर यह सब नज़ारा देख रहा था... सहसा आशा के मुख से शब्द निकले-
-तू उधर खड़ा हुआ क्या देख रहा है? क्या तू अपनी माँ से आशीर्वाद नहीं लेगा ?
विनीत को अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ ... वह जो सुन रहा था, उस पर सहज भरोसा करना कठिन था...वह तुंरत उसके क़दमों में झुक गया... आशा ने उसको भी अपने गले से लगा किया .... अब वह आशा और विनीत से ऐसे प्यार कर रही थी, मानो वे उसकी अपनीं संतान हो....आशा बोली-
- जाओ, तुम दोनों आजाद हो... सिर्फ़ तुम ही नहीं, मेरे कोठे का कोई भी कर्मचारी आज से स्वतंत्र है... वह अपनी मर्जी से कहीं भी आ-जा सकता है... अब मेरा किसी पर कोई क़र्ज़ नहीं है... कोई जोर नहीं है... अब तक मैंने तुम लोगों के साथ बहुत ज़ुल्म किए, अब मेरी आँखें खुल चुकी हैं ... इन प्यार के परिंदों ने मेरे दिल से नफरत की ज्वाला को पूरी तरह से शांत कर दिया है... मैं अपने अहम् को संतुष्ट करने के लिए नजाने कितने पाप करती रही... अब मैं इन पापों का प्रायश्चित करनाचाहती हूँ...आज मैं अपनी सारी चल -अचल संपत्ति अपनी ख़ास सहयोगी मालती को सौपती हूँ... तुम लोग यहाँ पर जितने भी कर्मचारी हो, उन सबको मैं आश्वस्त करना चाहती हूँ की किसी को भी निराश होने की जरूरत नहीं है... मैं मालती से कहूँगी की कोठे को तो तत्काल बंद कर दे लेकिन साथ ही लोगों के लिए भी कोई व्यवस्था कर दी जाए , ताकि ये लोग बेरोजगार न हो सकें... तुम लोगों को दुखी देखना मेरा मकसद नहीं है...
आशा ने ये बातें बेहद संजीदगी से कही थीं, इसके बावजूद ऐसा लगता था मानो किसी भी समय वह ये एलान न कर दे की वह तो महज़ मजाक कर रही है... तमाम वेश्याएं आँखें फाड़-फाड़ कर देख रहीं थीं... उसने पुछा-
-मैं आप लोगों से ये जानना चाहती हूँ की किसी को इस सम्बन्ध में कुछ कहना तो नहीं है ?
एक दलाल- अगर धंधा बंद कर दिया तो हम लोग खाएँगे क्या ? हमारे बच्चे भूखे मर जायेंगे... हमने दूसरे कोठे के लोगों से तुम्हारी खातिर बहुत पंगा लिया है, अब उन लोगों का नजरिया हमारे प्रति बहुत क्रूर हो जायेगा.... इस तरह हम जियेंगे कैसे ?
मालती- फ़िक्र मत करो, वो सब हमारी जिम्मेदारी होगी... अब तुम्हें पहले से ज्यादा पगार भी मिलेगा और कोई गलत् काम भी नहीं करना पड़ेगा...
आशा- सूना तुम लोगों ने ... तुम सब लोगों को नौकरी भी मिलेगी और बुरा काम भी नहीं करना होगा...
आशा की बातें सुनकर वहाबं पर उपस्थित सभी लोगो के चेहरे पर मुस्कान नाचने लगी ... सब लोग महसूस कर रहे थे ,जैसे की उनको खुली आंखों से सपना दिखाया जा रहा हो....विनीत कहने लगा-
-मुझे माफ़ कर दीजिये... आप तो सचमुच देवी हैं... जीती-जाग्तियो देवी....


Saturday, September 6, 2008

भाग-99

यहाँ तक की भूखा मरना भी मंज़ूर है, लेकिन चंदा को इस नर्क में एक दिन भी नहीं रहने दूंगा...
आशा- यह तुम्हारा जोश है,भावुकता है .... जब ये सपने सचाई के धरातल से टकरायेंगे तो क्या होगा ? सब कुछ ख़त्म हो जायेगा... सारे ख्वाब और ख़याल बिखरकर मिटटी में मिल जायेंगे ....
विनीत-आप यकीन मानिए,ऐसा कुछ नहीं होगा... वो लोग दूसरे होते हैं जो वादेसे मुकर जाते हैं या फ़िर अपना स्वार्थ साधने के लिए प्यार का ढोंग रचते हैं...
चंदा- मैं भी विनीत की बातों से सहमत हूँ, आपने मुझे बेटी की तरह पाला, सहारा दिया, स्नेह दिया ... मैं उसके लिए आपको जीवन भर याद रखूंगी... आपको याद करती रहूंगी, आपका सम्मान करती रहूंगी ... लेकिन सम्मान का अर्थ यह भी ही नहीं की मैं आपकी बात मानकर अपने प्यार का गला घोंट देते हैं...दगा नहींहो सकती...
चंदा ने अपने दोनों हाथ जोड़कर यह बात इतने मार्मिक ढंग से कही की मालती और आशा के दिलों पर असर कर गयी ... उसके शब्दों में द्रढ़ता थी... लहजे में इज्जत और आंखों में सच्चाई ... मालती बोलने से हिचकिचा रही थी... बहुत ज्यादा जरूरत हुई तो थोड़ा बहुत बोल दिया करती थी... उसके दिलो-दिमाग में बहुत बड़ा तूफ़ान उठा हुआ था... वह हमेशा आशा के बारे में चिंतित रहती थी... आशा द्वारा कोठा छोड़ने की मंशा ने मालती को अन्दर ही अन्दर परेशान कर दिया था... काफी देर तक सब लोग चुप रहे... आखिरकार चंदा के सब्र का बाँध टूट गया... उसकी आंखों से गंगा -जमुना की धारा बहने लगी... वह पास में खड़ी आशा के गले से लिपट कर फ़ुट-फ़ुट कर रोने लगी... यह ऐसा द्रश्य था, जब कोई दुल्हन अपना पीहर छोड़कर सौराल के लिए विदा होती हैउर पास में खड़ी माँ या पिता से लिपटकर फ़ुट-फ़ुट कर रोने लगती है ... सब हैरान थे... इस द्रश्य को जो भी देखता वही हैरान हो जाता ... आशा नें चंदा को अपनी बांहों में ऐसे जकड लिया था, मानो उसको ज़रा भी ढीला छोड़ा तो वह उससे हमेशा के लिए जुदा हो जायेगी... इससे भी ज्यादा आशचर्य की बाटी तो ये थी की आशा की आंखों से भी आँसू निकल रहे थे... यानी की जिस आशा ने उम्र भर लोगों को खून के आँसू रुलाये थे , वही अब ख़ुद रो रही थी... उसके मन का सारा मेल धुल रहा था... कई बरसों से रूह में जो जहर इकट्ठा हो रहा था, वह अब धीरे-धीरे बह रहा था... आंसुओं की शक्ल में अब बुराइयां बह रही थीं... आशा का ह्रदय परिवर्तन हो चुका था... विनीत भी खुश होकर रोने लगा... उसकी समझ में नहीं आ रहा था की वह अपनी खुशी का इज़हार कैसे करे ... कुछ आशंकाएं जरूर थीं मगर साफ़ तौर पर इतना तो स्पष्ट हो ही गया था की आशा को उनके रिश्ते पर कोई एतराज नहीं है...यह ख़बर कोठे पर मौजूद सभी लोगों तक पहुच चुकी थी... सभी के दिलों में बजाब की हलचल थी... तरह-तरह की चर्चाएँ चल रहीं थीं... दलालों के मन में थोड़ा सा रोष जरूर था... यह कुछ दलालों को अपना अस्तित्व धोखे में नज़र आने लगा था... वे वेश्याएं बेहद खुश थीं जिनके मन में प्यार तो पल रहा था लेकिन डर के मारे वे ये बात किसी को बताती नहीं थीं... अब उन्हें उम्मीद की किरण नज़र आने लगी थी...

भाग -८१


भाग -८१
लेकिन यह बात मैं तुमसे कह नहीं पाया था... मुझे इस बात का डर था की मेरी बात सुनकर तुम नाराज़ न हो जाओ ... अगर कोई और माहौल होता तो मैं इस तरह डर-डर के प्रस्ताब रखने के बजाय मैं बड़े रोमांटिक अंदाज़ में ये बात कहता ... मुझे बुरा मत समझना ... मन से लाचार हूँ...उसकी बातें सुनकर अलसाई हुई आशा के कान खड़े हो गए... उसे अचानक इस तरह के प्रस्ताब की आशा नहीं थी... उसकी आंखों से नींद गायब हो गयी... उस वक़्त वह बस इतना ही कह पायी थी-- ये आप क्या कह रहे हैं?मैं ..............?
सलीम -क्यों ?तुम क्यों नहीं? क्या परेशानी है ? अगर तुम अपने गर्भ में पल रहे शिशु के बारे में सोचती हो तो ये अच्छी बात है... मैं तुम्हारे हर निर्णय का स्वागत करूँगा...
आशा- मैं किसी से प्यार करती हूँ सलीम... उसको छोड़कर मैं किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में सपनों में भी नहीं सोच सकती... जब तक मैं जिउंगी , राजू की ही बनकर रहूंगी...
सलीम-ठीक है... मैं कहाँ इंकार करताहूं, मैं भी चाहता हूँ की आप अपने राजू से मोहब्बत करें... लेकिन sath ही यह भी मान लें की अब राजू इस दुनिया में नहीं हैं... अब सिर्फ़ राजू की यादों से ही प्यार किया जा सकता है... उनकी आत्मा का साथ ही प्राप्त किया जा सकता है... यह जीवन पहाड़ जैसा होता है... अकेले यह जिंदगी की गाड़ी की नहीं चलाई जा सकती... सफर बहुत काँटों भरा होता है... तनहाई का दर्द मुझसे बेहतर कौन जान पायेगा...यह ज़माना इतना सीधा नहीं है, जितना की आमतौर पर दिखाई देता है...
आशा- आप हैं ना... आप दुनिया जैसे नहीं हैं ना... जब आपने उन मवालियों को धमकाया था, मैं तभी जान गयी थी की आप सबसे अलग हैं... मगर.....
सलीम- मगर क्या आशा ?
आशा- अब तो तुम्हारे साथ जाने में भी हिचक सी हो रही है...
सलीम- मेरे साथ जाने में तकलीफ कैसी ? मैं तुम्हें कोई परेशानी नहीं होने दूंगा... जब भी तुम्हारे मन में मेरे प्रति प्यार का भाव उमड़ आए, तब मेरी बांहों में चली आना...

Friday, September 5, 2008

भाग -98

आशा- यकीन कैसे करूँ तुम पर ?
विनीत-मैं हर तरह से हाज़िर हूँ... मेरी जान हाज़िर है... मेरा सर कलम कर दीजिये , तब तो भरोसा हो जायेगा... मैं चंदा के सुंदर शरीर का ही कायल नहीं हूँ... मैं इसको मुख्यधारा में लाना चाहता हूँ.... मैं एक हमेशा के लिए बंद राह को खोलना चाहता हूँ... मेरी ख्वाहिश है की मेरे बाद वे लडकियां भी खुली हवा में साँस लेने का प्रयास करें,जिनको जबरन वैश्यावृत्ति के दल-दल में फंसाया गया है...
आशा- ओह, तो क्रान्ति करना चाहते हो ...
विनीत- जी नहीं... मैं तो बस प्यार करना चाहता हूँ... दुनिया को प्यार का संदेश देना चाहता हूँ... यह दिखा देना चाहता हूँ की प्यार का मतलब सिर्फ़ सेक्स करना या बच्चे पैदा करना ही नहीं... प्यार का अर्थ सिर्फ़ अपने लिए जीना भी नहीं है... दूसरों की स्वतंत्रता को खतरे में डालकर अपना उल्लू सीधा करना कभी प्यार नहीं हो सकता... यहाँ हम अपने सुख के लिए तो तमाम साधन जमा कर लेते है लेकिन दूसरों का बिल्कुल ख़याल नहीं रखते... यहाँ दौलत के बल पर गरीबों की इज्जत बेचीं-ख़रीदी जाती है... मात्र कुछ रुपयों की चमक दिखाकर गरीब घर की लड़कियों को दलाल खरीद कर ले जाते हैं... फ़िर उन्हें जीवन भर नर्क की यातना भुगतनी पड़ती हैं... अगर कोई लड़की वैश्यावृत्ति से छुटकारा पाना चाहे तो उसको मार दिया जाता है... उसको साजिश के तहत किसी बीमारी का शिकार करवा दिया जाता है... तो , ये है तुम्हारी घिनोनी दुनिया... चंदा और मैंने इसके ख़िलाफ़ लड़ने का फैसला किया है... आप जो चाहें करें, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता , क्योंकि हम लोग मानसिक रूप से ख़ुद को तैयार कर चुके हैं... अगर हम दो मरेंगे , कम से कम एक को तो मारेंगे...
आशा- अगर तुम्हें मारकर रेलवे लाइन पर फिकवा दया जाए और इसको दुर्घटना बता दिया जाए तो यह कहानी यहीं ख़त्म नहीं हो जायेगी...
विनीत- ये आपकी भूल है... इस तरह मेरी आवाज़ और भी बुलंद हो ... सत्य को थोडी देर के लिए छिपाया तो जा सकता है, लेकिन उसे हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता... जब यह ख़बर उजागर होगी की एक वैश्या और उसके प्रेमी को प्यार की सज़ा मौत दी गयी है तो जानते हो क्या होगा ? जिन वेश्याओं के दिल में किसी के लिया चाहत की भावना है वह अपने प्रेमी के साथ मिलकर बगाबत कर सकती है... मेरे जैसे युवक भी अपनी चहेती वेश्याओं को अपनाने के लिए आगे आ सकते हैं... अपने लोगों की यादों पर भी पहरा बिठा दिया है... फ़िर लोग आराम से सपने देख सकेंगे... अगर उनमें से कुछ लोग भी अपने मकसद में कामयाब हुए तो हमारा त्याग सफल हो सकता है... वैसे भी कभी किसी की मेहनत बेकार नहीं जाती... मेहनत का फल तो मिलता ही है...
आशा- अगर तुम लोगों को आजाद कर दिया जाए तो क्या करोगे ?
चंदा- आपका एहसान मानेंगे और इस शहर को छोड़कर हमेशा के लिए चले जायेंगे...
विनीत - हम मेहनत मजदूरी करके पेट भर लेंगे... कुछ बेचकर गुजारा कर लेंगे...

Thursday, September 4, 2008

भाग-97

लेकिन मालती उनमें से नहीं थी... तभी तो आशा ने उस पर इतना बड़ा भरोसा किया था... वह आशा के साथ शुरू से ही थी... उसकी हर सफलता या असफलता की गवाह थी... उसकी ईमानदारी ने ही आशा
को अपना करीबी और अब उत्तराधिकारी बनाने के लिए विवश किया था...

उस रात वे दोनों वहीं पर सो गयी... उनमें से किसी ने कुछ नहीं कहा... नीद ने उन दोनों को अपनी आगोश में जकड लिया था... जब दिन काफी चढ़ आया तब जाकर उनकी नीद टूटी... एक जम्हाई लेकर आशा बोली-

-आज बहुत दिनों के बाद इतनी चैन की नीद आई है... अब जाकर पता चला की संतुष्टि भी कोई चीज होती है... मेरे चेहरे पर देखो, आज कितना सुकून नज़र आ रहा है...

मालती सचमुच उसके चेहरे की तरफ़ देखने लगी... अब सुकून कोई प्रदर्शन की चीज थोड़े ही होती है... उसको तो सिर्फ़ दिल से महसूस किया जा सकता है... इसके बाद उन दोनों के बीच कोई संवाद नहीं हुआ ... मालती नीबू -नमक डालकर डालकर दो गिलास पानी ले आई... एक गिलास उसने आशा को दे दिया और एक ख़ुद उसने पी लिया... मालती बेजुबान बनकर रह गयी थी... रात को शा ने उससे जो शब्द कहे थे,वे उसको अविश्वश्नीय लग रहे थे मगर कुछ कहने की हिम्मत नहीं हो रही थी... आशा ने नाश्ते के आदेश के साथ-साथ चंदा और उसके आशिक विनीत को भी अपने पास लाने का आदेश दिया... चंदा डर रही थी... उसके डर का कारण आशा का क्रोध था... उसके गुस्से से वह अच्छी तरह से वाकिफ थी... आशा का जो काम दुश्मनी से नशीं होता था, उसे वह प्यार्र से कर लिया करती थी... धोखा देने को वह बुराई नहीं बल्कि एक बेहतरीन अदा समझती थी ... विनीत ने मजबूती के साथ उसका हाथ थाम रखा था... आशा ने पूछा-

-मैं चाहती हूँ की आप दोनों मेरे साथ नाश्ता करें ... आप लोगों को कोई आपत्ति तो नहीं ?

चंदा- हमारी भूख-प्यास मर चुकी हैअब कुछ भी इच्छा नहीं है... इतनी मेहरबानी कर दीजिये, हमको यहाँ से जाने दीजिये... या फ़िर हम दोनों की जान ले लीजिये...

उसकी ऊंची आवाज़ सुनकर मालती बीच में ही बोल पड़ी-

- आवाज़ थोडी कम कम रखो, क्या यहाँ का शिष्टाचार भी भूल गयी चंदा... अंजाम का डर नहीं है तुम्हें ?

आशा- बोलने दो इसको... कहो चंदा, जो कहना चाहती हो, खुलकर कहो...

विनीत- ये क्या कहेगी, मैं कहता हूँ... आप लोग हमको आजाद कर दीजिये वरना हम क़ानून का सहारा लेंगे...

आशा- उसकी जरुरत ही नही पड़ेगी ... मैं तुमको छोड़ने के लिए तैयार हूँ... लेकिन ये तो बताओ की इसका क्या करोगे तुम ? यह मेरे कोठे पर कई सालों से वैश्यावृत्ति कर रही है... दर्जनों बार यह गर्भपात करा चुकी है... पता नहीं यह कभी माँ बन भी पाएगी की नहीं ... इसके साथ कब तक रह सकते हो तुम ?

विनीत- मैं चंदा से मोहब्बत करता हूँ , इसके अलावा मुझे और कुछ नहीं चाहिए ... मैं अपनी आखिरी साँस तक चंदा के साथ रहना चाहता हूँ, इसके लिए चाहे मुझे कुछ भी कुर्बानी क्यों न देनी पड़े... किसी भी हालत में क्यों न रहना पड़े...

आशा- इसके रूप के दीवाने हो तुम ... जब दिल भर जायेगा तो ठोकर मारकर चले जाओगे...

विनीत- मैं अपनी जान दे सकता हूँ, मगर कभी धोखा नहीं दूंगा...


Tuesday, September 2, 2008

भाग-96

किसीने आपके कान तो नहीं भर दिए ?













आशा- ऐसी कोई बात नहीं है... दरअसल मैं आज मजाक के मूड में नहीं हूँ... यहाँ तक की मैं व्यंग्य भी नहीं कर रही... आज मैं इंतकाम के मूड में भी नहीं हूँ ... मेरा यकीन मानो...
मालती- तो फ़िर ? तबियत ठीक नहीं है ? मैं तो पहले ही डॉक्टर बुलाने के लिए कह रही थी...
आशा- मुझे इलाज की जरुरत तो है, लेकिन इस काम को डॉक्टर नहीं कर सकता...
मालती-आज इन पहेलियों को बुझाने का सबब जान सकती हूँ...
आशा- जो भी मैं कहती हूँ, उसे ध्यान से सुनती जाओ, साथ ही उस पर अमल भी करती जाओ ... मैं बिल्कुल फिट हूँ... अपने होशो-हवाश में यह कह रही हूँ की मैं इस कोठे की बागडोर अब तुम्हारे हाथों में सौपना चाहती हूँ... अपनी सारी दौलत तुम्हारे नाम करना चाहती हूँ... इस दुनिया से अब मेरा मोहभंग हो गया है...
मालती- अगर यह बात सच भी है तो इसके लिए आपने मेरा नाम ही क्यों चुना है ?
आशा- क्योंकि इस साम्राज्य को खड़ा करने में मुझे आपका बहुत बड़ा योगदान मिला... मैं अकेली इतना सब नहीं कर पाती ... मैं समझतीं हूँ की तुम मेरी सबसे करीबी और वफादार हो...
मालती- चलिए, ये तो हुआ वारिस बनाने का कारण ... अब लगे हाथों इस वैराग्य का कारण भी बता दीजिये...
आशा- बस, अब और नहीं... इस कारवाँ को अब मैं आगे नहीं बढाना चाहती... इससे कभी किसी का भला नहीं हुआ... इस काम से सिवाय नुक्सान के किसी का फायदा नहीं... हमने इस वैश्यावृत्ति से पीढियां की पीढियां बरबाद कर डाली... कितने लोगों के घर उजडे, कितनों को बीमारियाँ लग गयी और कितने लोग ऊपर चले गए... खुशियों और संतुष्टि के आवरण में लपेटकर हमने न जाने कितने ही परिवारों को हमेशा-हमेशा के लिए गम भेंट कर डाले... अब इस सिलसिले को रोकना होगा...विध्वंस बहुत हो गया , अब कुछ नव निर्माण की बात करनी होगी...
मालती उसकी बातों को ऐसे सुन रही थी जैसे दुनिया के सबसे बड़े अजूबे को देख रही हो... हैरत के मारे उसके नेत्र फटे जा रहे थे... एक टॉप की वैश्या के मुख से साधुओं जैसे पवित्र शब्द निकल रहे थे... मालती कभी सोच भी नहीं सकती थी की किसी का ह्रदय परिवर्तन इस तरह भी हो सकता है ... उसने अंगुलिमाल डाकू की कहानी सुन राखी थी... जिस तरह उसका ह्रदय परिवर्तन हुआ था, वैसे ही आशा का हो रहा था... मालती बहुत पहले से यह सपना देखा करती थी की वह भी आशा की तरह एक दिन कोठे की मालकिन बने ... उसके कोठे की पूरे हिन्दुस्तान में धूम मचे... उसकी रोजाना हजारों, ल्लाखों में कमाई हो... अपने इस ख्वाब को पूरा करने के लिए उसने बेईमानी का रास्ता कभी नहीं चुना था... वह आशा की हमेशा वफादार बनी रही... आशा ख़ुद ही अपनी करोरों की संपत्ति उसे सौपना चाहती थी... इतनी आनंद दायक बात ने भी ना जाने क्यों उसको ज्यादा सुख नहीं दिया... उसके स्थान पर अगर कोई और होती तो फूली नहीं समाती..

Monday, September 1, 2008

भाग-95

तुम अब कह रहे हो, मैं तो पहले ही कह रही थी... मैंने बस एक बार ही मज़ा लिया है, वह भी कंडोम के साथ ...

सलीम- फ़िर कोई टेंसन नहीं है... अब मैं निश्चिंत हूँ...
सलीम और बिजली एक दूसरे में समाने का प्रयत्न करने लगे... जब दो जिस्म आपस में टकराते हैं तो एक अजीब माहोल तैयार हो जाता है... बिजली को आनंद आ रहा था... सलीम की उम्र वैसे तो ढलने वाली थी, लेकिन वह इस खेल का पक्का खिलाड़ी था... वह अपने अनुभव के आधार पर बिजली को हर सम्भव सुख देने का प्रयास कर रहा था...जब वे दोनों एक दूसरे में पूरी तरह समाहित हो गए तो उन्हें असीम सुख मिला... सलीम फूला नहीं समा रहा था... वह एक कमसिन लड़की के साथ सम्बन्ध बनाने को गर्व की बात समझ रहा था... उसको क्या पता था की जिस खूबसूरत लड़की से उसने आनंद लिया था,वह उसके काल का सबब बन चुकी थी... बिजली उसको ऐड्स की सौगात सौंप चुकी थी... यह था आशा का इंतकाम... इतने पर भी वह चुप नहीं बैठी थी... उसने बिजली से पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करवा दी... पुलिस वाले उसको जानते थे... बिजली के साथ बलात्कार की पुष्टि हो गयी ... सलीम अपना इलाज भी नहीं करवा पाया था... जेल में ही उसकी दर्दनाक मौत हो गयी... जिस सलीम ने उसको वैश्यावृत्ति के दल-दल में धकेला था, उस सलीम का उसने इस तरह दर्दनाक अंत कर दिया था... आज उसे सारी बातें रह-रह कर याद आ रही थीं... मालती उसको यूँ देख रही थी, जैसे किसी रहस्मयी औरत को देख रही हो... वह उसके कन्धों को झकझोर कर बोली-
-कहाँ खो गई हैं आप? मैं बार-बार पीने के लिए मना कर रही थी ... मुझे पता था की आज कुछ अनहोनी होने वाली है... ऑफ़ , लगता है डॉक्टर बुलाना पड़ेगा...
आशा- परेशान मत हो मालती... मुझे कुछ नहीं हुआ है... ये ठीक है की मैंने आज बहुत शराब पी ली है, लेकिन तुम तो जानती हो की दुनिया की किसी भी शराब में इतना असर नहीं की मुझे बहका सके...
मालती- अरे वाह... आप तो पूरी तरह से ठीक हैं...
आशा- हाँ मालती ... मैं बिल्कुल ठीक हूँ... अत्तीत में चली गयी थी...
मालती- अच्छा... अब मेरे लिए क्या आदेश है ?
आशा- तुम बार -बार अफ़सोस ज़ाहिर करती थी ना , की तुम भी मेरी तरह कोठा मालकिन नहीं बन पाई...
सलीम- हाँ , तो ? अब उसको दोहराने का क्या मतलब है ?
आशा- मैं चाहती हूँ की तुम अपना वो सपना पूरा करो...
मालती- सपना पूरा, मगर कैसे ? यह कैसे सम्भव है ?
आशा- दुनिया में क्या नहीं हो सकता... हर सपना पूरा होने के लिए ही होता है...
मालती- मैं कुछ समझ नहीं पा रही हूँ...
आशा- मैं चाहती हूँ की मेरी जगह अब तुम इस कोठे की मालकिन बन जाओ...
मालती- ये क्या गज़ब कर रही हैं आप ? क्या आपको मेरी निष्ठां पर कोई संदेह है ?