कुंवारी सुहागिन- २3
ूजन- तो क्या बात है,. कुछ भी होने दो, मैं बैठा हूँ न. मौज मस्ती के लिए ही ज़िंदा हूँ. शायद जीवन के इस मोड पर तुमसे मुलाक़ात होना ही लिखा था इसी कारण तुम और हम मिले ह.
अमृता- क्या एक दिन में ही जान ले लोगे ? ज़िंदा घर पहुँचने दो , बाद में जों हो सो कर लेना.
पूजन- तुम ऊपरी दिल से कह रही हो, भाभी वाली बात भी मुझे आजमाने के लिए कहती हो.
अमृता- अगर तुममे हम दोनों को संतुष्ट करने का की ताकत है तो करो, कल उनेहं भी यहाँ पर ले आउंगी . बोलो मंजूर है ?
पूजन- अपने दिल की बात टटोलो, मैं तो तुम ननद भाभी को ऐश करा दूंगा मगर देखना की बाद में ऐतराज मत उठाना . कभी पछताना पड़ जाए .
पूजन ने अपने शब्द खत्म ही किये थे की उसे जोर-जोर से दरवाजा खटखटाने की आवाज सुनाई दी. बड़ी-बड़ी बातें करने वाले पूजन की बोलती बंद हो गयी . अमृता तो कपडे पहने हुए थी, उसने
भी जल्दी -जल्दी कपडे पहने और अमृता को टेरेस पर चले जाने का हुक्म सुना दिया. हक्की-बक्की अमृता ने फ़ौरन सीढी तय करना शुरू कर दिया. सब कुछ हडबडाहट में हो रहा था. उन दोनों के
ऐश करने के सबूत वहीं पर बिखरे पड़े थे. लेकिन उन दोनों ने उसका भी कोई खास ध्यान नहीं दिया. ऐसे अवसरों पर ध्यान भी कहाँ रहता है ? सब कुछ गडबड हो जाता है. अमृता का दिल जोर -जोर
से धड़क रहा था, किसी अनहोनी की आशंका से उसकी साँसें तेजी के साथ चलने लगीं. वह सिर्फ चलती चली जा रही थी. पूजन ने उन सीढ़ियों का दरवाजा बंद करके उस पर ताला जड़ दिया और अपने
पलंग को ठीक -ठाक करने की कोशिश करने लगा . दरवाजा अभी तक बज रहा था. ऐसा लगता था जैसे कोई बेल बजा बजाकर थक गया हो और जवाब न मिलने पर कोई दरवाजे को ठोक रहा हो.
कुछ देर के बाद पूजन नीचे आया. तेजी के साथ दरवाजा खोला तो उस पार एक पुलिस अधिकारी को खड़े पाया. दो हवलदार आस-पास टहल रहे थे. वह एरिया का इन्स्पेक्टर था. उसकी नेम प्लेट पर
उसका पद और नाम लिखा था. वह सीनियर इस्स्पेक्टर विजय था. पूजन ने सशंकित भाव से उन्हें अंदर आने को कहा . विजय कह रहा था-
-हम लोग एक घंटे से परेशान हैं. आपका फोन भी नहीं लग रहा. मोबाइल स्विच ओफ है, पड़ोसी दुकानदार ने बताया की ऊपर वाले कमरे में होंगे इसलिए दरवाजा बजा रहा था.
पूजन- जी, दरअसल एक कवी सम्मलेन से आया तो रात भर का जागा और रास्ते भर का थका हुआ था. फोन बंद करके सो गया, कहिये मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ ?
विजय- ओह, माफी चाहता हूँ आपको तकलीफ हुई . हम लोग स्टाफ की तरफ से एक कवी सम्मलेन करना चाहते हैं. आपको तो पता ही होगा की थाने में एक विशाल मंदिर बनाया गया है, उसकी का उदघाटन
करने गृह मंत्री आने वाले हैं. सब लोगों की राय है की अगर आप उस रोज अपने अन्य कवियों के साथ पधारें , दो घंटे का एक छोटा सा कवी सम्मलेन करलें तो अच्छा हो जाएगा .
पूजन- मुझे वहाँ आकर खुशी होगी मगर डेट बता दीजिए. यदि पहले से तारीख बुक होगी तो तकलीफ होगी.
विजय- कैसे भी करके एडजस्ट करिये, कप्तान साब भी आपकी कविताओं के दीवाने हैं. बजट ज्यादा नहीं है मगर आपस में समझ लेंगे . आप निराश मत कीजियेगा.
पूजन- बजट की कोई खास बात नहीं है., जब हम लोग दूसरे शहरों में भी सेवायें देते हैं तो ये तो अपने घर की बात है. आप कुछ चाय -नाश्ता लेंगे ?
विजय- किसी दिन थाने आइये, तब चाय -पानी करते हैं. ठीक है ?
पूजन- चलिए आपकी बात मान लेते हैं .
पुलिस अधिकारी चला गया अब जाकर पूजन ने राहत की सांस ली, वह दौडता हुआ छत पर गया. जल्दी से ताला खोलना चाहा मगर गलती से चाबी दूसरी ले आया था. वहाँ की चाबी न जाने कहाँ
रख छोड़ी थी, आखिरकार परेशान होकर ताले पर एक बड़ा पत्थर दे मारा. ताला खुल गया. दौडकर टेरेस पर आया तो दांग रह गया. वहाँ पर तो कोई नहीं था. अमृता न न अमृता की परछाई. चारों तरफ
देखा तो कोई नहीं था. पूजन को सर्दी में भी पसीना आ गया. उसकी सोच सन्न हो गयी. वह तेजी से सोचने लगा. फिर उसको एक टंकी दिखाई दी. उस पर रस्सी बंधी थी जों नीचे की तरफ गयी
हुई थी. विजय की समजह में सारा माजरा आ गया. इसका मतलब अमृता रस्सी के सहारे निकल गयी थी. इतना बड़ा रिस्क लेकर अमृता कहाँ गयी होगी ? उसको चोट तो नहीं आयी होगी . वह उस पल
को कोसने लगा जब उसने अमृता के साथ जिस्मानी सम्बन्ध बनाने की बात सोची थी. काश वह उसके साथ ऐसी बात नहीं सोचता तो आज इस मुसीबत में नहीं फंसता . अगर उतरते समय उसे कुछ
हुआ होगा या उसे किसीने देख लिया होगा तब क्या होगा . वह इन्हीं विचारों में मगन था की उसे फिर से दरवाजा खटखटाने की आवाज सुनाई दी. शुरुआत में तो उसे भ्रम सा लगा मगर चिर -परिचित
आवाज को सुनकर वह चौंक पड़ा . उसने समूची ताकत से आवाज दी-
- कौन ?
Friday, March 25, 2011
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