Sunday, May 31, 2009
तड़प, भाग-50
दीपू ने बिना मकसद भले ही यह सवाल उछाल दिया था लेकिन उसका दिमाग बड़ी तेजी से सक्रीय हो ने लगा... आंखों में हैरत के भाव गर्दिस करने लगे... फूल से भी नाजुक दिखने वाली शैली ऐसा कैसे कर सकती थी , यह रहस्य उसकी समझ से परे थी... उसका सिरबुरी तरह दुःख आहा था... कानों में बम से फ़ुट रहे थे... वह उदास हो गया और भगवान् से प्रार्थना करने लगा की अपने इस बार के मिशन में वह पास न होने पाये... इस बार वह अपनी ही असफलता की दुआ कर रहा था... मन ही मन वह ना जाने वह ना जाने क्या-क्या सोचने लगा... सोचते-सोचे उसको इस बात का भी पूरा ध्यान था की शैली को इसकी ज़रा भी भनक नहीं लगनी चाहिए... तभी तो उसने शैली की गोलाइयों पर दवाब बनाकर उसे अपनी बांहों में भर लिया... इस प्रयास में उसका चेहरा पीछे की तरफ़ हो गया था...वह शैली की नंगी पीठ पर हाथ फिराने लगा... बेहद चिकनी त्वचा थी शैली की... उसे सहलाते समय शैली गर्म होती चली जा रही थी... खामोशी तोड़ते हुए दीपू कहने लगा-
- एक कमजोर लड़की किसी ताकतवरमर्द को कैसे ठिकाने लगा सकती है, वो भी अकेली ?
शैली- जब जान पर बन आती है तो कोई भी इंसान अपनी जान बचाने के एवज में किसी दूसरे की जान बड़े आराम से ले सकता है... मेरे साथ भी यही हुआ.... जब मुझे लगा की वह मुझे मौत से भी बड़ी सजा दे चुका है और इससे भी संतुष्ट नहीं, मुझे इससे भी बड़ी सजा देने का प्रयास कर रहा है तो मैंने उसे फिनिस कर दिया... तुम मगर इतने हैरत में क्यों हो ?तुम्हारा कोई रिश्तेदार था क्या वो ?
दीपू- नहीं, सवाल ही नहीं उठता .... ऐसे गुनाहगारों और इंसानियत के दुश्मनों से मेरा दूर -दूर तक कोई रिश्ता नहीं हो सकता... हम समाज , धर्म और क़ानून को मान्न्ने वाले शांतिप्रिय नागरिक हैं... पूरे हिन्दुस्तान में आज तक हमारे पूरे खानदान के ख़िलाफ़ देश में कहीं भी कोई मामला दर्ज नहीं है...
शैली- हमारा भी रिकोर्ड पहले ऐसा ही था लेकिन अब इसका क्या करें ... अगर मैं तुम पर रिवाल्वर तान दूँ तो क्या करोगे तुम ? अपना बचाव भी नहीं करोगे ?
दीपू- जाहिर सी बात है करूंगा ही,, भले ही उसको चोट नहीं पहुचाऊं मगर रक्षा तो करनी ही होगी...
शैली- ये बात अब कह रहे हो, शांत वातावरण में ? मगर जब कोई पूरी ताकत से आप पर हमला करता है तो उसे पूरी शक्ति से ही झेला जा सकता है ... उसमे कोई दुर्घटना भी हो सकती है...
दीपू- हाँ, मगर मैं विस्तृत जानकारी चाहूँगा... कैसे हुआ ये सब ? इसकी नौबत कैसे आयी ?
शैली- मैं बता रही थी की राजेश , रवि और रोजा ने साजिस के तहत मुझे हवेली में बुलाया था... रात भर उन लोगों ने बारी -बारी से मेरे सहवास किया, नशे की हालत में मुझे कोई ध्यान ही नहीं था, मैं तो बस आनंद पाने के लालच में उनके आदेशों का पालन करती जा रही थी...
दीपू- ऐसे असामाजिक लोगों को फांसी का प्रावधन होना चाहिए , जो किसीके जज्बातों से खेलते हैं...
शैली- तुम्हें अपने पास पाकर आ ज मेरा मन बहुत हल्का हो गया है, अगर तुम्हारा प्यार मेरे साथ रहा तो इस बोझिल जिन्दगी को आराम से काटा जा सकता है, वरना..................
Saturday, May 30, 2009
तड़प, भाग-49
शैली- वाह, तुम्हारी बुलंद आवाज सच्चाई की प्रतीक है... मैं जानती हूँ तुम मुझे प्यार करने लगे हो, मैं भी चाहने लगी हूँ तुम्हें... लेकिन डर लगता है की कहीं कोई अनहोनी न हो जाए...मुझे बहुत ठोकरें मिली हैं दीपू, बड़ी मुश्किल से जिन्दगी में थोडा सा स्थायित्व आया है... अब मैं खुश हूँ , सुखी हूँ... मेरी दुनिया चाहे जैसी हो मगर मैं यहाँ संतुष्ट हूँ... इसे छोड़कर कहीं जाना नहीं चाहती... मेरी कोशिश ये है की किसी तरह से मेहनत मशक्कत करने के बाद इतने पैसे जमा करलूं की आराम से यह जीवन बसर हो जाए...
दीपू- इतना हल्का मन क्यों करती हो शैली... जरूरी नहीं की हर इंसान एक जैसा ही हो... यहाँ ग़लत और अच्छे हर तरह के लोग रहते हैं... मुझ पर भरोसा करके तपो देखो, अगर फ़िर तुम्हें लगता है की तुम्हारे साथ धोखा हो रहा है तो अपनी दुनिया में वापस लौट आना... कौन रोकेगा तुम्हें ? और कैसे रोक पायेगा ?
शैली- दिल टूट जाता है तो जीना मुश्किल हो जाता है यार... अगर फ़िर से धोखा हुआ तो जी नहीं पाउंगी... तुम नहीं समझते , नारी का ह्रदय कितना कोमल होता है... मैं बहुत भावुक हूँ .... मैं किसको को तकलीफ देना भी नहीं चाहती औए तकलीफ लेना भी नहीं पसंद... अगर कोई मुझे धोखा देता है तो मेरा खून खुल उठता है...
दीपू- हाँ, तकलीफ तो होती ही है, सबको होती है... मगर क्या किया जा सकता है... मरा भी तो नहीं जाता ...
शैली- मरने का सवाल कहाँ आता है.... ख़ुद ही तकलीफ उठाओ और ख़ुद ही मरो भी... यह कहाँ का न्याय है , कहाँ का क़ानून है , और अगर कहींका होगा भी तो ग़लत है ... इसे बदलना होगा....मुझे यह मंजूर नहीं...
दीपू- मगर किया भी क्या जा सकता है... मेरा मतलब है की अगर कोई मर्द तुम्हारी इज्जत के साथ खिलवाड़ करे तो ज्यादा से ज्यादा क्या कर सकती हो... पुलिस में रिपोर्ट करने जाओगी तो उसे खरीदना ज्या दा बड़ी बात नहीं है ... केस चला भी तो चलता ही रहता है ... ताकतवर इंसान का तुम जैसी नाजुक लड़की बिगाड़ भी क्या सकती है ?कहते हैं की धींगरा का रास्ता सिर पर होकर रहता है...
शैली- मैं ऐसा नहीं मानती... और भी कई रास्ते हैं... उस ताकतवर सितमगर को मारा भी तो जा सकता है ...
दीपू- मगर कैसे ? ह्त्या कैसे की जा सकती है ?
शैली- क्यों नहीं की जा सकती ? जब इंसान करने पर आए तो कुछ भी कर सकता है... मैं ख़ुद इस बात की गवाह हूँ... अपने इन्हीं हाथों से मैंने अपने प्रेमी राजेश को मौत के घाट उतारा था...
दीपू- ये क क क्या कह रही हो शैली ? ऐसा हो ही नहीं सकता ... शेखी बघारने के लिए तुम ऐसा कह रही हो...
शैली- यकीन नहीं आता न... मैंने यह राज आज तक किसीको नहीं बताया ... तुम्हें बताया भी तो तुम यकीन नहीं कर रहे हो...
दीपू- कैसे मानूंगा मैं ? मुझे इस बात का यकीन क्यों करना चाहिए ?
Friday, May 29, 2009
तड़प, भाग-48
शैली- ऐसा क्यों सोचते हो दीपू... तुम्हें मुझसे भी ज्यादा खूबसूरत लड़की मिल जायेगी, जो तुमसे खूब प्यार करेगी, तुम्हारा ध्यान रखेगी ... उसके आने से तुम्हारा समाज में मान -सम्मान बढेगा,... आदर भाव रहेगा... जबकि मुझे रिश्ता जोड़ने पर सिवाय बदनामियों के तुम्हें कुछ नहीं मिल पायेगा... हर इंसान मजाक उडाएगा, जिसके घर में खाने को अनाज नहीं होगा और जिसके ख़िलाफ़ मुक़दमे चल रहे होंगे ऐसे लोग भी तुम्हें सुनाकर चलेंगे... जब तुम्हारे बच्चे होंगे तो उन्हें भी वैश्या की संतान कहकर बुलाया जाएगा...
दीपू- बस शैली ... अपने मुंह से ऐसी जली कटी बातें मत कहो... मेरे दिल को ठेस पहुचती है...
शैली- बाद की बातें बाद में करेंगे, अभी तुम बहके हुए हो .... शराब ने तुम्हारा मूड ख़राब कर दिया है... तभी तुम्हारी जुबान बहकने लगी है और तुम एक काल गर्ल को शादी का प्रस्ताव दे रहे हो... जब तुम्हारा नशा उतरेगा तब जाकर जान पाओगे की पीनी के बाद तुम क्या- क्या अनहोनी बातें कह गए....
दीपू- मेरी जुबान पत्थर की लकीर की तरह है, जो कह दिया सो कह दिया...
शैली-० मैं बिखरने लगी हूँ दीपू, मुझे संतुष्ट करो.... मेरे जिस्म की ज्वाला भड़कने लगी है...
दीपू- मैं भी कम बेचैन नहीं हूँ.... मैं अपनी बेताबी कैसे कहूं... तुम ख़ुद ही समझ जाओ...
shaili - फ़िर समस्या क्या है , मैं जिंदा हूँ, तुम्हारा भी आदेश है फ़िर आक्रमण शुरू कर दिया जाए...
दीपू जोश में तो था ही , उसकी बात सुनकर वह और भी गर्म हो गया... शैली मद मस्त थी, जाम पर जाम छलकाए जा रही थी, दीपू ने उसके बदन से सारे वस्त्र उतार रखे थे , आखिरकार उसने शैली
ऐ यौवन द्वार पर दस्तक देनी शुरू करदी , थोडी देर तक सहलाने के बाद वह उस संवेदनशील स्थान को चूमने लगा, शैली के शरीर में हलचल मचने लगी... उसने अपनी बाँहें ऊपर उठादीन और जोरदार अंगडाई लेने लगी... यह आमंत्रण था... दीपू समझ गया और उसके रसीले होठों का रसपान करने लगा... वासना का तूफ़ान जोर-जोर से उमड़ने लगा... शैली अपने होठों को मुक्त करते हुए बोली-
- आह....... यह क्या कर रहे हो ... अगर यही हाल रहा तो मेरे प्राण निकल जायेंगे.......
Thursday, May 28, 2009
तड़प , भाग-47
शैली- प्यार जिन्दगी देता है, लेता नहीं है... प्यार जीने कि राह दिखाता है... इसलिए शुभ -शुभ बोलो...
दीपू- शुभ मुहूर्त में अशुभ बातें तो तुम कर रही हो... तुमने ही हमको पागल बनाया और अब तुम ही हो कि मजाक उदा रही हो मेरी दीवानगी का... जानती हो मैं तुम्हें क्यों चाहता हूँ ?
शैली- हाँ, जानती हूँ ... बहुत अच्छी तरह से जानती हूँ... आज से नहीं बहुत दिनों पहले से ही इस राज को जानती हूँ... यह सवाल भी पहली बार नहीं सुन रही हूँ ... फर्क ये है कि इस बार तुमने पहले ही सवाल कर दिया है...इससे पहले लोगों से मुझे सवाल करना पड़ता था... तब जो निचोड़ निकलकर सामने आता था वह चौकाने वाला होता था , लेकिन अब मैंने चौकना छोड़ दिया है, अब मुझे हंसी भी नहीं आती ... हर बात को सामान्य रूप में लेती हूँ...
दीपू- ठीक है , जब इतनी जानकारी दे ही दी है तो लगे हाथों बता ही दीजिये हम भी तो जाने कि हमारे विचार कितने मिलते हैं... और फ़िर थोड़े बहुत मिलते भी हैं या नहीं ?
शैली - सब लोग मुझसे प्यार जो करते हैं उसकी सिर्फ़ दो अहम् वजहें हैं - एक तो ये कि मैं गज़ब कि खूबसूरत हूँ और यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है... दूसरी अहम् वजह है मेरा करोरपति होना... अभी तक इससे तीसरी वजह कोई मेरे सामने नहीं आयी... अगर वो है तो कहो...
दीपू- वाह शैली , वाह... तुमने मुझे भी उसी तराजू में टोल दिया जिसमें सब एरों -गैरों ,नत्थू खैरों को तोलती हो... खैर, कोई नहीं... मेरा दिल तो इस बात से बहुत दुखा है मगर कोई बात नहीं ... तुम मेरी मोहब्बत हो और मैं तुम्हें सौ खून माफ़ करने तक का वादा दे चुका हूँ...
शैली- तुमने मेरी बात का बुरा मान लिया , अरे मजाक कर रही हूँ मैं... बोलो न तुम कुछ कह रहे थे...
दीपू- यही कि तुम्हारी सादगी और ईएमान्दारी के कारण मुझे तुम पर प्यार आया है... तुम्हारे पास बिल्कुल भी बनावट नहीं है... जो भी कहती हो सच कहती हो वरना कोई लड़की अपनी बीती हुयी जिन्दगी के नाजुक पलों का वर्णन नहीं करती... तुमने अपनी सच्ची बातें बताकर मेरा दिल मोह लिया है...
शैली- तुम सबसे हटकर हो दीपू... सबसे बेहतरीन हो... तुम्हारे विचार बहुत उत्तम हो... तुम दोस्ती करने लायक हो, भरोसा करने लायक हो और ऑफकोर्स , प्यार करने लायक हो...
दीपू- तो क्या मैं शादी करने लायक भी हूँ....?
शैली- अभी इतनी जल्दबाजी ठीक नहीं है... यह हमारी अभी पहली मुलाक़ात है... जब हम दोनों एक दूसरे को अच्छी तरह से जान जाएँ तब कोई फैसला लेंगे...
दीपू- मेरी तरफ़ से तो हाँ है, अब तुम करती रहना सोच विचार... शादी के बाद मैं तुम्हारे बंगले में नहीं अपने किराए के घर में रहूँगा... लेकिन दिन रात म्हणत करके जल्द ही तुम्हारे लिए प्यारा सा बँगला बनवा दूंगा... गाडी खरीद दूंगा और जीवन कि किसी भी सुख सुविधा का भाव नहीं रहने दूंगा...भले ही गरीब हूँ , मगर स्वाभिमानी भी हूँ...
Wednesday, May 27, 2009
तड़प, भाग-४६
शैली- ऐसा गज़ब ना करना , कभी किसी से प्यार ही ना करना... मैं हमेशा अपने लोगों को यही राय देती हूँ किकुछ भी करना यहाँ तक कि जरूरत पड़ने पर एक बार के लिए डकैती भी दाल लेना मगर प्यार का रोग ना पालना... यह रोग दीवाना बना देता है, कभी जीने नहीं देता....अरे मरने भी नहीं देता तो....तभी तो इसे कहते हैं -कमबख्त इश्क.............
दीपू- मैंने सुना है कि प्यार किया नहीं जाता, हो जाता है... मुझे भी यही महसूस हो रहा है... बिल्कुल यही...
शैली- तुम तो शायराना मिजाज के होने लगे मेरी जान... मैं जान ही कहा करुँगी...मुझे अच्छा लगता है....
दीपू - तुम्हें हर बात कि परमीशन है, जो चाहो कहो, जो चाहे करो... अगर मेरे सौ खून भी कर देती हो तो गम नहीं...रही बात शायराना मिजाज की तो मैं भी छोटा -मोटा शायर ही हूँ... बाथरूम सिंगर भी... कभी फुर्सत हो तो बताना ऊंची आवाज में सुनाऊंगा... जगह बड़ी होनी चाहिए...
शैली- अरे वाह , बहुत खूब... अगर ये बात है तो किसी दिन तुमको अपने बंगले पर बुलाऊंगी...
दीपू- तुम्हारे पास बँगला भी है ? वाह- वाह ... लगता है तुम दौलत वाली दोस्त हो....
शैली - नहीं यार... कुछ ख़ास दौलत वाली नहीं... आजकल लोन पर हर चीज मिल जाती है... अभी इसमे काम चल रहा है... पूजा वाले दिन बुलाऊंगी तुमको... कोई भजन याद करके आना... सुनाऊंगा... लोगों को अच्छा लगेगा...
शैली- लोगों को लगे या न लगे मैं जरूर प्यार से सुनूंगी... ध्यान से सुनूंगी....
दीपू- वैसे यह तुम्हारा पर्सनल मामला है , औए मुझे इसमे दखलंदाजी नहीं देनी चाहिए फ़िर भी दिल में यह सवाल उठाता है की आखिरकार तुमने अब तक शादी क्यों नहीं की... जबकि तुम्हारे पास तो सब सुविधाएं मौजूद हैं...
शैली- शादी... हां -हां हां............कौन करेगा हमसे शादी? वैश्या से कोई शादी नहीं करना चाहता दीपू....लोग एक बार के लिए लंगडी-लूली ,कानी भिंडी को पसंद कर लेते हैं , शादी कर लेते हैं मगर जान्बूझते हुए हम जैसी काल गर्ल से कोई नहीं... हांलाकि जब शरीफ लोगों को हम जैसों की जरूरत पड़ती है तो हमारे तलवे चाटते हैं... प्यार का नाटक करते हैं, कसमे वादे करते हैं...हाँ कुछ लोग जो दिलचस्पी लेते भी हैं तो वे मेरी ही दलाली करके खाना चाहते हैं... वे जानते हैं की मेरे पास घर है, गाडी है , बेंक बैलेंस है , सभी सुविधाएं हैं... वे इस सबका फायदा उठाना चाहते हैं... मैं ऐसे लड़के से शादी करुँगी जो सिर्फ़ मुझसे प्यार करता हो , मेरे व्यक्तिगत विचारों से सहमत हो जिसे मेरी दौलत की नहीं मेरी तलब हो...जो मुझसे सच्चा प्यार करे... जिसकी ऐसी भावना हो की की कमाकर मुझे खिलायेगा, मैं जैसी भी हूँ वह मुझे इसी रूप में स्वीकार करे.... किसी शर्त के साथ नही ... कोई ये ना कहे की शादी के बाद तुम्हें यह काम छोड़ना पडेगा... मैं चाहूँ तो इस काम को करती रहूँ और चाहूँ तो छोड़ दूँ...
दीपू- तुमने कहीं तलाश किया क्या ऐसा लड़का ?
शैली - तो तुम करदो... तुम हो ना मेरे दोस्त ... अब तक मेरा अपना कोई ना था , सब लोग पराये थे... अब जबकि तुम अपने बन चुके हो क्या मैं अब भी ख़ुद ही ये काम करुँगी ?
दीपू- बगल में छोरा और गाँव में ढिंढोरा ? तुम्हारी आंखों के सामने लड़का है और तुम ना जाने कहाँ ढूंढ रही हो...
शैली- दीपू.... मेरे अच्छे दोस्त.... रहने दो इतने जज्बाती मत बनो... तुम अच्छे लड़के हो अपना जीवन बरबाद मत करो , यह जीवन भर का सौदा होता है... साल दो साल कटाने की बात नहीं है... मेरे दोस्त बनकर रहो , मुझे इसीमे बहुत खुशी है...
दीपू- पहले तो मुझे दीवाना बना दिया और अब दीवानगी ना करने की सलाह देती हो...
शैली- ये तुम्हारे क्षणिक जज्बात हैं, जब जोश ख़त्म होगा तो नशा उतर जाएगा... यथार्थ के धरातल पर जाकर गिरोगे तो सब इश्क भूल जाओगे....
दीपू- जब ओखली में सर दाल ही दिया तो मूसल से कैसे डरना ? अब जो चाहे हो... मैं तुमसे शादी करने के लिए तैयार हूँ... मैं तुम्हारी हर शर्त मानने के लिए तैयार हूँ....
Tuesday, May 26, 2009
तड़प, भाग-45
शैली- मसाज करना भी जानते हो क्या ?
दीपू- समझिये उस्ताद हूँ, मैंने विधिवत प्रशिक्षण भी लिया है , जैसी मसाज मैं कर दूंगा दूसरा कोई नहीं कर सकता... इसके लिए मुझे एक हर्बल तेल की जरूरत पड़ेगी मगर फ्रेश हो जाओगी... कमरे में चलते हैं, वेटर से तेल मंगवा लिया जाएगा... उसके बाद आनंद लेते हैं... ना तो आपको कोई जल्दी है और ना ही मुझे कुछ ख़ासजल्दी है...
शैली- मेरे ग्राहक पागल हो जायेंगे, कुछ लोग तो ऐसे हैं की दो दिन मुझसे दूर हुए तो परेशान हो जाते हैं,
दीपू- कोई बात नहीं है... उन्हें भी थोड़ा सा तरसने दीजिये, अगर वे तरसेंगे नहीं तो जुदाई के महत्त्व को नहीं समझ पायेंगे... सच तो ये भी है कि ये सब स्थितियां पैदा की जाती हैं...
शैली- तुम होशियार हो, हर बात मालूम है... लगता है पहुचे हुए फ़कीर हो , मेरे सामने ही बाल ब्रहमचारी बन्ने कि कोशिश कर रहे हो... मगर ये मत भूलना मैंने भी तुम जैसे कई लड़कों से सारे राज उगाल्वाये हैं...
दीपू- अगर कोई राज होता तो उसे तुम्हें सुनाकर गर्व कि अनुभूति करता ...मुझे तुम्हारा चैलेन्ज भी स्वीकार है , मगर मुझसे कुछ झूठ मत उगलवाना ... ऐसा न हो कि डर के मारे उन गुनाहों को भी कबूल कर बैठूं जो कि मैंने कभी किए ही नहीं... पुलिस स्टेशन में क्या होता है , यही ना... दहशत के मारे लोग उन आरोपों को भी कबूल कर लेते हैं जो उन्होंने किए ही नहीं.... जब पुलिस का आन मिलो सजना बदन पर पड़ता है तो फ़िर सब बातों के लिए हाँ होने लगती है... मैंने ख़ुद देखा है ऐसा होते हुए... पुलिस खुश... अपनी पीठ थपथपाती है कि उसने इतने केस हल कर लिए... मैं सच कह रहा हूँ ना...?
शैली- झूठ का सवाल ही कहाँ आता है , जब तुम कहोगे तो सच ही कहोगे... अब चलो कमरे में ही चलते हैं....
शैली का जिस्म गर्म हो रहा था , उसको संतुष्टि कि सख्त जरूरत महसूस हो रही थी लेकिन उसने आखिरकार दीपू कि बात मानली और होटल के कमरे में आ गयी... वेटर से कहकर हर्बल तेल भी मांगा लिया गया... दीपू ने शैली को जमीन पर नीचे लिटा लिया और उसके सारे कपड़े उतारकर उसकी मालिस करने लगा...शैली ने महसूस किया की उसके स्पर्श में गज़ब का आकर्षण था... वह आह भरके कहने लगी-
- तुम तो छलिया हो, धीरे -धीरे खुल रहे हो... मैं सब जानती हूँ... जादू है तुम्हारे हाथों में ,,, तुम्हारा हाथ लगते ही नीद जैसी आने लगी है... देखो न शरीर के साथ-साथ आत्मा को भी सुख मिल रहा है... यह सुखद एहसास ही प्यार है दीपू... मुझे प्यार हो गया है तुमसे...
दीपू- हाँ सच कहती हो , मैं भी यही महसूस करने लगा हूँ... तुम्हें हर वक्त खुश देखना चाहता हूँ... तुम्हें अपने करीब पाना चाहता हूँ... जब तुम किसी ग्राहक की बात करती हो तो मुझे ना जाने क्यों तुमसे जलन होने लगती है... ऐसा क्यों हो रहा है... ? यह प्यार नही तो और क्या है ?
संजय निरूपम को बधाई
Monday, May 25, 2009
तड़प, भाग-44
शैली- मेरी जान ये क्या कह रहे हो , मेरी गलती इतनी सी है कि मैं जो भी कहती हूँ सच कहती हूँ, दिल से कहती हूँ... उसमें कुछ घटाया या बढाया नहीं जाता, इसी कारण लोग मेरे बारे में कुछ से कुछ राय बना लेते हैं... अगर मेरी जगह पर दूसरी कोई लड़की होती तो कहती कि उसे राजेश ने जबरन अपनी हवस का शिकार बनाया था, मैं ऐसी हूँ कि हर बात सच ही बाताउंगी,अगर मेरी गलती हुई तो उसे भी बयान करुँगी...
दीपू- ठीक है, अब आगे कहो .... इसके अलावा उअर क्या -क्या सोच रही थीं तुम?
शैली यही कि राजेश के तीन भी और हैं,, वे मानने वाले तो हैं नहीं ... अगर मैं राजेश कि दुल्हन बन्ने में कामयाब हो गयी तो अन्य तीन भी मेरे साथ सहवास किया करेंगे... मैं उन क्षणों कि कल्पना करके ही आनंद के सागर में गोते लगाने लगती थी जब बारी -बारी से राजेश और उनके तीनों भाई मेरे साथ सम्बन्ध बनाते ...
दीपू- तो क्या राजेश भी अपनी भाभी के साथ में सम्बन्ध बनाया करता था ?
शैली- मैंने भी पूछा था उससे... राजेश ने मुझे बताया था कि उसकी भाभी तो चाहती है, भाइयों को भी ऐतराज नहीं था मगर शर्म की वजह से उसने एक बार भी सम्बन्ध नहीं बनाया था... दो बड़ी भाभी तो उससे काफी बड़ी थीं इस कारण भी वह नहीं कर पाया... हाँ, उससे बड़े वाले की शादी होने वाली थी इसके लिए उसने पहले से ही योजना बना राखी थी की मौका मिला तो भाई से पहले वो ही सुहागरात मनायेगा... इससे किसी को भी आपत्ति नहीं थी...
दीपू- मैं पहली बार इस तरह की बात सुन रहा हूँ... मुझे यह बात बेहद अटपटी लग रही है... ऊंची दूकान और फीके पकवान वाली बात हुई ये तो ... कहाँ तुम बता रही हो की वह राजाशाही खानदान है.... और उनके बारे में ये सब कह रही हो... किस तरह लोग इस तरह की संस्कृति को अपना लेते हैं... इनसे अच्छी तो वो वेश्याएं भी हैं जो सरे आम अपना जिस्म बेचकर अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह तो करती हैं... वे किसी ढोंग को तो नहीं अपनातीं...
शैली- इतना भावुक होने की जरूरत नहीं है मेरी जान ... मौज लो मौज दो... क्या रखा है इन बातों में ?
दीपू- हाँ तुम ठीक कहती हो, इस तरह की बातें सुन सुनकर मूड ख़राब करना ठीक नहीं है.... अब मैं बेताबी की हद तक पहुच चुका हूँ, हमें छोटा सा ब्रेक लेना होगा... थोड़े से ब्रेक में ही सुख भोगना है, इसके बाद कुछ खाना है और फ़िर आराम करना है... सोने के बाद फ़िर प्रणय क्रीडा का आनंद भोगेंगे...
शैली- मेरा भी कुछ इसी तरह का ख़याल है... मैं भी यही चाहती हूँ.... शायद तुम थक गए होंगे.... मैं भी शराब के सहारे चल रही हूँ वरना थकान तो बहुत है...
Sunday, May 24, 2009
तड़प, भाग-43
दीपू- और तुम ? तुमने क्या सोचा था ?
शैली- मेरी सोच भी अन्य लोगों से अलग नहीं थी... मैं भी चाहती थी की राजेश मुझसे प्यार करे , मेरे साथ सम्बन्ध बनाए , मगर ये सम्बन्ध स्थायी होने चाहिए...सिर्फ़ एक रात भर के लिए मैं दुल्हन बन्ने के पक्ष में नहीं थी... लेकिन बचपन में मेरे साथ जो हादसा हुआ उससे मैं मर्दों से नफरत करने लगी थी... राजेश ने मेरी इस विचारधारा को बडी मुश्किल से चेंज किया था... यही कारण था की रवि ने जब राजेश की बुराई की तो मुझे बहुत बुरा लगा... मेरे लिए राजेश सब कुछ था... वह जितना ताकतवर था मेरे लिए वह कम नहीं था... मैं चाहता भी यही था की किसी तरह से वह मेरा दोस्त बना रहे और फ़िर किसी दिन हम दोनों हमेशा हमेशा के लिए विवाह के बंधन में बाँध जाएँ.... मेरा तो बस यही सपना था....
दीपू- लेकिन उसके विशेष एंड का छोटा होना या उसकी पावर कम होना तुम्हारे लिए कोई मायने नहीं रखता था ?
शैली- बिल्कुल नहीं... यह सामान्य बात थी, मेरे लिए इसका ज़रा भी महत्व नहीं था...
दीपू- मैंने तो सुना है की तुम लोगों को एक बार खाना नहीं मिले तो चल जाता है मगर मर्द मजबूत होना ही चाहिए... इस कहावत में कितना दम है ?
शैली- बात ये भी सच्ची है .... ऐसा ही सोचती हैं, ज्यादातर लड़कियां.... यहाँ तक की मैं भी... मगर राजेश के मामले में बात दूसरी थी... एक तो वह ज्यादा कमजोर नहीं था... हाँ उसके मुकाबले उसका दोस्त रवि बहुत मजबूत था... उसका ख़ास अंग भी दमदार था... इतना दमदार की उसने एक रात में ही मुझे एक साल का सुख दे दिया था... मगर राजेश के बारे में एक अन्य सच्चाई मैं जानती थी... राजेश के तीन भाई थे , वे तीनों ही मिलजुलकर एक दूसरे की पत्नी के साथ रात बिताया करते थे... उनका मानना था की घर का माल घर में ही रहना चाहिए... एक लड़की ने मुझे उसके भाई के विशेष अंग के बारे में बताया था... वह बहुत बड़ा रसिया था... किसी भी लड़की को छोड़ता नही था, उसके चंगुल में आने के बाद निकलना बेहद मुश्किल हो जाया करता था.... वह मेरी एक सहेली को नियमित बुलाया करता था , मैं समझ गयी की राजेश से शादी होने के बाद मुझे उसका स्वाद भी चखने को मिलता... इसीलिए मुझे राजेश से कोई ऐतराज नहीं था...
Saturday, May 23, 2009
तड़प, भाग-42
दीपू- नहीं , बिल्कुल नहीं... अभी मुझे इसकी जरूरत नहीं ,,, वैसे मैं कई लोगों को इसकी सलाह दे चुका हूँ... जिसने सेवन किया वह सुखी हो गया... वे लोग अब अपने अनुभव मेरे साथ बाँटते हैं ,, अच्छा लगता है... इसी कारण तुम्हें बता दिया... मैं कोई हकीन वैध तो हूँ नहीं, जो करीबी लोगों से सुना है बता दिया...
शैली- मुझे तुम्हारी बात अच्छी लगी... अगर ऐसी बात है तो मैं अपने कुछ ग्राहकों को इसे खाने की सलाह दे सकती हूँ, अच्छा ही है अगर हमारी वजह से किसीका भला हो जाए तो... मैं ऐसा इसलिए भी कर रही हूँ क्योंकि इस तरह की दवाओं का कुप्रभाव सीधे किडनियों पर पड़ता है , इसी कारण सेक्स पावर बढ़ाने वाली दवाओं को चुनने में थोडी सावधानी बरतनी चाहिए...
दीपू - तुमने भी यह बताकर अच्छा किया वरना मैं बेवजह परेशान हो सकता था...खैर, तुम राजेश और रवि के बारे में बता रही थीं...मैं उसी कथा को सुनना चाहता हूँ...
शैली- उस रात मेरे दोस्त राजेश ने रवि की प्रेमिका रोजी के साथ सम्बन्ध बनाये, रवि मेरे बदन से खिलवाड़ करता रहा... रोजी खुश तो थी मगर संतुष्ट नहीं... एक बार सम्बन्ध बनाने के बाद वह सिगरेट पीने हमारे पास आयी थी, उसने मुझसे कहा था-
-तुम कैसे झेलती हो ये सब? पकाऊ आदमी है ... भले ही रवि का दोस्त है मगर वो मर्दानगी नहीं जो हम जैसों की उभरती जवावी को दबा सके... ऐसे लोगों को प्रणय क्रीडा का खेल खेलने का धिकार नहीं है... सचमुच अब तो रवि ही मेरी प्यास बुझा पायेगा...
रवि- लेकिन अभी तो मैं शैली को भी संतुष्ट नहीं कर पाया... इसके बाद ही तुम्हारा नंबर आएगा...
रोजी- इतनी देर से क्या कर रहे थे तुम लोग ? कमाल है अभी तक ऐसे के ऐसे ही हो.... मैं कुछ हेल्प करुँ ?
शैली-० नहीं, शुक्रिया... मुझे अच्छा नहीं लगता ...शर्म आती है, जब तक यहाँ पर तुम रहोगी हमें ऐसे ही झिझक रहेगी...
रवि- हां , हमको थोड़ा समय और दो... या फ़िर तुम्हारा कल का नंबर लगा देते हैं... आज का पूरा वक्त मैं अपनी इस नयी दोस्त के नाम करना चाहता हूँ.... तुम राजेश के पास जाओ... वह नर्वस हो गया होगा, सीधा है बेचारा... इसीलिए तुम्हें मन माफिक संतुष्ट नहीं कर पाया... हांलाकि वह भी अच्छा खासा तंदुरुस्त है... बिस्तर के इस खेल में अच्छे अच्छे फेल हो जाते हैं मेरी जान... उसने ज्यादा पी राखी है... सब्र से काम लो सब ठीक हो जाएगा...
रोजी- मुझे तुमने अपनी ऐसी आदत लगादी है कीकोई नजर में जमता ही नहीं है, सब छोटे ही लगते है...
रवि - ठीक है... मगर यह भी तो जानलो की राजेश मेरा दोस्त है... उसे संभालना तुम्हारा काम है.... भले ही वह तुम्हारे एक्जाम में फेल हो गया हो लेकिन वह भी मर्द है मेरी जान ... जब बिल्कुल निराश हो जाओ तो यहीं आ जाना मैं तुम दोनों को भरपूर सुख संतुष्टि देने की कोशिश करूँगा... ठीक है....
Friday, May 22, 2009
तड़प , भाग-४१
शैली- हाँ, इसमें कोई दो राय नहीं, वह गज़ब का खिलाड़ी था... तुम भी उससे किसी मामले में कम नहीं हो, उसका स्टेमिना कम था तुम्हारा बहुत ज्यादा है... वह इस खेल के मैदान में ज्यादा देर तक नहीं ठहर सकता था... थोडी सी देर में ही हांफने लगता था , तुम्हारी बात अलग है... तुम जब तक मैदान में डटे रहते हो तब तक की मैं ख़ुद भी संतुष्ट नहीं हो जाती... मेरी समझ में नहीं आता की तुम इतनी ताकत कहाँ से एकत्रित कर पाते हो...
दीपू- तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे की मैं इस दुनिया से कोई अलग काम कर रहा हूँ, ?
शैली- अलग तो है ही... तुम सच्चे मर्द हो ... मेरे पास जो ग्राहक आते हैं , उनमे ज्यादातर लोग आधे मर्द ही निकलते हैं... जब मैं गर्म होकर तैयार होती हूँ तो वे फेल हो जाते हैं, भले ही मैं काल गर्ल हूँ और उन्हें सुख देने की मुझे भरपूर कीमत भी मिलती है मगर इसका मतलब यह नहीं की हमारा जिस्म पत्थर का है, हमारी भ सम्वेद्नायीं होती हैं, कुछ इच्छाएं होती हैं... हमारे सीने में भी एक दिल धड़कता है... हमें भी ग्राहकों से कुछ अपेक्षाएं होती हैं.... हम उम्मीद करते हैं की हमको भी बीच मंझधार में तड़पता हुआ नहीं छोड़ा जाए, लेकिन जब उम्मीदें पूरी नहीं होती तो बहुत तकलीफ होती है...
दीपू- लेकिन तुम तो कहती हो की तुम्हें सिर्फ़ पैसे से मतलब होता है किसी और चीज से नहीं ?
शैली- इसके सिवाय और कह भी क्या सकते हैं.... ग्राहक से लड़ तो नहीं सकते... हमें सिर्फ़ उसको ही खुश करना होता है... ये तो मैं तुम्हें अपने दिल की आवाज सुना रही हूँ...
दीपू- अपने ग्राहकों को अगर ज्यादा संतुष्ट करना है तो तुम्हें मर्दानगी का एक राज बताता हूँ,
शैली- इसका भी कोई राज होता है, वाह ... फ़िर तो मैं जरूर जानना चाहूंगी....
दीपू- जो लोग तनाव में होते हैं, किसी कारणवश शराब या अन्य नशे की गिरफ्त में आ जाते हैं उन लोगों की शारीरिक शक्ति कमजोर होने लगती है.... ऐसे लोग अपने बेद पार्टनर को सुख नहीं दे पाते, ख़ुद भी दुखी रहते हैं और अपने साथी की जिन्दगी में भी जहर घोल देते हैं....
शैली- अरे यार दीपू, होशियार हो तुम तो सब कुछ जानते हो मेरे यार... और बताओ तुम्हें इस बारे में क्या जानकारी है ? मैं सुनना चाहती हूँ...
दीपू- नहीं पहले तुम अपनी कहानी कहो, तुम कुछ कह रही थीं....
शैली- पहले तुम .... समझे....
दीपू- ठीक है... मैं हर उस आदमी को तंदरुस्त बनाने का राज जानता हूँ जो नामार्दांगी का जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं... अगर वे लोग विगोरा हाई पावर नामक दवा का एक कोर्स पूरा करें तो उनका जीवन खुश हाल बन सकता है... यह होम्योपैथिक भारतीय दवा है... जो लोग इसका सेवन करते हैं... वे कभी भी सर झुकाकर नहीं चल सकते... खुशियाँ उनके कदम चूमती हैं....
Wednesday, May 20, 2009
तड़प , भाग-39
रवि- नहीं यार...तुम तो बच्चों की तरह डर रही हो... एक बार मेरे साथ प्रणय क्रीडा के समुन्दर में गोते लगाकर तो देखो, मुझे भूल नहीं पाओगी, जब मैं शहर चाला जाऊँगा तब भी मुझे याद किया करोगी... राजेश से कहा करोगी की एक बार और मिल्वादों... ये मेरा दावा है....तुम प्रधान को जानती हो ?
शैली- हाँ , अच्छी तरह से... अपने गाँव के प्रधान को क्यों नहीं जाउंगी....
रवि- उसकी तीसरे नंबर की लड़की को देखा है ? वह गोरी , पतली -पतली...
शैली- हाँ, जानती हूँ ...
रवि- उसने दो महीने पहले मेरे साथ एक बार सुख उठाया था तब से लेकर अब तक मुझे सौ से ऊपर पत्र लिखकर बुला चुकी है... कहती है मुझे बस तुम चाहिए...
शैली- मैं नहीं मानती... वह तो अभी बहुत छोटी है... उसके तो सीने पर अभी ठीक से गेंद भी नहीं हैं... वह तुम्हें कैसे झेल सकती है ? मुझे यकीन नही आ रहा?
रवि- ठीक है, फ़िर कल आना , वह भी रात भर यहीं रहेगी,... पिछली बार वह रात भर मेरे बिस्तर पर ही थी... एक बार तो खूब घबराई थी, उसको कली से मैंने ही फूल बनाया था... उसका पहला-पहला अवसर था इसलिए घबरा रही थी... डर रही थी... जब उसने शराब के दो पैग पिए तब जाकर उसने अपने जिस्म को स्पर्श करने दिया... तुमने सही कहा, उसकी गोलाइयां बिल्कुल छोटी -छोटी थीं... मैंने धीरे -धीरी उसे सुख देना शुरू किया... अगली बार क्या हुआ जानती हो ?
शैली- भाग गयी होगी बेचारी ? और क्या ?
रवि - नहीं यार... अगली बार तो वह ख़ुद से हर वो काम करने लगी जो मुझे करना चाहिए था...
शैली- तुम इस गाँव में जब भी आते हो तो मौज मस्ती अकरने ही आते हो क्या ?
रवि- जी नहीं, मैं अकेला मौज मस्ती नही करता, तुम्हारे गाँव की लड़कियों को भी सुख देता हूँ... जो मेरी उम्र की है और सुंदर है , उसमें से बहुत कम लड़कियां ही बची हैं वरना सब यहाँ एक रात की दुल्हन बन चुकी हैं... एक बस तुम बची थीं , आज की रात तुम्हें भी दुल्हन बना दिया जाएगा...
शैली- क्या तुम एक बार के लिए ही सम्बन्ध रखते हो, उसके बाद भूल जाते हो ?
रवि - ऐसी बात नहीं है, दरअसल फुर्सत ही नहीं मिलती... किस किसको देखें हम पर तो हर लड़की मरती है... वैसे भी मैं किसीको घाटे में नहीं रहने देता , जिस के साथ भी रात बितात हूँ उसे दस हजार नकद देता हूँ ताकि उन पैसों से वह कोई काम कर सके... कितनी ही गरीब लड़कियों ने तो उन्हीं पैसों से अंपनी शादी कर ली हैं...
शैली- यह अच्छी बात है, मस्ती भी और पैसे भी ... मगर मैं सिर्फ़ दस हजार में मानने वाली नहीं हूँ...
रवि- मुझे खुश करदो... जो कहूं करो... मन मांगे दाम दूंगा...
शैली- जो कहोगे करुँगी... जो भी कहोगे...
रवि- मुझे जीभ का स्पर्श बहुत अच्छा लगता है...
शैली- मैं समझ गयी, कोई दिक्कत नहीं है, जानती हूँ तुम दोस्त किसके हो, शौक भी एक जैसे ही हैं...
Tuesday, May 19, 2009
तड़प, भाग-38
- ये तुम क्या कर रहे हो, मुझे भी बेशर्म बना डालोगे क्या ? तुम्हारे शहर में ये सब चलता होगा , यहाँ गाँव में नहीं॥
रोजी- क्यों यहाँ क्या परेशानी है... यहाँ के इंसान मौज मस्ती पसंद नहीं करते ? इनको जीवन का असली आनंद लेने का हक़ नहीं है क्या ?
शैली- हक़ तो है , मगर यहाँ चलन नहीं है... यहाँ पर ये सब परदे की चीजें हैं... खुलापन नहीं है...
रोजी- हर काम की शुरुआत करनी पड़ती है, जैसे अब हमने की है... अन्य लोग इसका अनुसरण करेंगे और आनंद लेंगे... कोई तकलीफ तो महसूस नहीं हो रही ?
शैली- तुम्हारे रहते कोई तकलीफ नहीं हो सकती, लेकिन राजेश को तुम्हारी बांहों में देखकर अजीब सी फीलिंग हो रही है... जो अब तक सिर्फ़ मेरा बेड पार्टनर रहा हो उसे तुम्हारे साथ नग्न अवस्था में देखकर कुछ तो हो रहा है...
राजेश- तुम इन बातों को छोड़ दो और जवानी का आनंद उठाओ... जब तक जवानी है तभी तक दुनिया पूछती है उसके बाद कोई किसी को घास तक नहीं डालता... तुमने सुना ही होगा- चढ़ते सूरज को लोग जल देंगे, और जब ढल जाएगा तो चल देंगे... यही हाल जवानी का है... जवानी का सूरज ढलते ही एक एक करके सब साथ छोड़ना शुरू कर देते है, अपना साया भी साथ नहीं देते...
शैली- इस तरह आनंद लेने के बाद जवानी का सूरज नहीं ढलेगा क्या ? हमेशा सलामत रहेगा ?
रोजी- सही समय पर तुमने चौका मारा है, सूरज को तो dhalnaa ही है , ढलेगा ही लेकिन तुम्हें इस बात का मलाल तो नहीं रहेगा की जिन्दगी में कुछ नहीं कर पाई, जो मजा बाद में लेना था वह पहले ही ले लिया... इसमे किसी की ना भी नहीं है, सभी लोग हंसी खुशी आनंद ले रहे हैं...
इस तरह की और भी कई बातें हुईं और आखिरकार शैली दिल से हर वो काम करने लगी जो की रोजी, रवि और राजेश चाहते थे... जब उसने रवि के कपडे हटाये तो उसका ख़ास अंग देखकर चकित रह गयी... यह बेहद खतरनाक था... इतना ज्यादा खतरनाक की शैली का बदन काँपने लगा... रवि ने चुप रहने का कारण पुछा तो वह बोली-
-आः, इतना डेंजर मैं बर्दाश्त नहीं कर सकती... मर जाउंगी मैं तो...
रवि- तुम क्यों परेशान होती हो मेरी जान ... ऐसा कुछ नहीं होगा... अब आराम से यहाँ पर लेट जाओ प्यार करो और प्यार लो, मैं तुम्हारे एडजस्ट कर लूँगा... पहले सब लड़कियां ऐसे ही डरती हैं मगर जब आनंद आता है तो यह भी उनके लिए छोटा पड़ने लगता है, हम जानते हैं....
Monday, May 18, 2009
शैली- मन तो मेरा भी मचल रहा है, लेकिन मैं कुछ संकोच कर रही हूँ...
राजेश- गोली मारो इस संकोच को... आ जाओ इस रवि की बांहों में , इसकी तमन्ना भी पूरी करदो और अपने मन की कशिश भी पूरी करदो... ऐश लो , ऐश दो...
रवि ने देर करना उचित नहीं समझा... दौड़कर शैली के पास आया और उसको अपनी बांहों में भर लिया, शैली शराब के नशे में चूर थी... उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था की उसके साथ ऐसा इत्तेफाक भी हो सकता है... नशे की तुनक में वह इतनी ज्यादा आगे बढ़ गयी की उसे नीति -आनीति का कोई ज्ञान नहीं रहा...रोजी को भी जबरदस्त अवसर मिल गया... वह राजेश जैसे मर्द के साथ प्यार का सुख उठाना चाहती थी... राजेश ने उसको चूमना शुरू कर दिया.... वह उसके होठों का चुम्बन ऐसे ले रहा था जैसे कोई भंवरा किसी कली को चूस रहा हो... उस कमरे में वासना का तूफ़ान उठने लगा था, रवि, शैली, राजेश और रोजी की भावनाएं भड़की हुई थीं... सब जोश उफान पर था... चारों जवान थे, चारों के मन में शारीरिक संबंधों को लेकर उत्सुकता थी... वे अपने मन औए तन की प्यास को बुझाने का प्रयत्न करने लगे...राजेश और रोजी ने रवि की खूब तारीफ की थी, तभी तो वह अपने आपको शक्तिमान दिखाने की कोशिश करने लगा... जब उसने अपने वस्त्र उतारकर एक तरफ़ रखे तो शैली के जिस्म में झुरझुरी सी दौड़ने लगी... रवि का ख़ास अंग वास्तव में बेहद खतरनाक था... शैली ने ललचाते हुए कहा-
-क्या मैं इसे पुचकार सकती हूँ, बहुत सुंदर है, मगर उतना ही खतरनाक भी , यह गाडी आहिस्ता-आहिस्ता चलानी होगी, वरना एक्सीडेंट हो जाएगा...
रवि - तुम्हें डराने के लिए नहीं बल्कि खुश करने के लिए ,संतुष्ट करने के लिए मैंने इस हथियार को सजाकर रखा है... इससे प्यार करो , डरने का सवाल ही नहीं है...
शैली- हाँ, ज़रा देखूं तो सही, चाहे जो हो आज मैं इस खूबसूरत खिलौने से खेलकर रहूंगी... मैं अपने राजेश पर बहुत भरोसा करती हूँ, अगर ये कहते हैं की तुम गज़ब के मर्द हो तो बिल्कुल हैं,, अब तो मैंने भी महसूस कर लिया है...
रवि- मैं भी रोजी से बहुत प्यार करता हूँ, वह चाहती थी की एक बार राजेश से सम्बन्ध बनाकर टेस्ट बदले , तो मने भी हाँ करदी... रोजाना एक ही सब्जी खा खाकर सचमुच स्वाद बिगाड़ने लगता है...
समझो इसी स्वाद को बदलने की जरूरत थी... अब वह पहला ज़माना तो नही रहा, जहाँ महिलायें जीवन भर एक ही मर्द की अर्धांगिनी बनाकर रह लिया करती थीं... जबकि मर्द एक साथ सैकडों और यहाँ तक की हजारों रानियाँ -पट रानियाँ रखा करते थे....
Sunday, May 17, 2009
तड़प, भाग-36
शैली-- अच्छा , क्या ये जवानी का नशा है, मगर पहले कभी तो यह नहीं चढ़ा ? आज इसे क्या हो गया ?
राजेश- होगा क्या यार , आज पर निकल आए हैं, जब तक सोने को किसी पारखी के पास न ले जाया जाए , तब तक उसे प्रमाणित नहीं किया जा सकता... पता ही नहीं चलता की वह सोना है या पीतल ... इसी तरह से अगर जवानी के सही कद्रदान ना हों तब तक भी यह ज्ञान नहीं होता की जवानी की कीमत क्या है ?
रवि- ये त्तुमने सही बात कहदी... बिल्कुल सत्य बात... अब देखो न , अगर हम लोग शैली को नहीं मिलते तो ये कैसे जानतीं की ये हैं क्या ?
शैली- मुझे मजाक का विषय तो नहीं बना रहे हो ? आः, मेरे सर में चक्कर आ रहे हैं...
राजेश- ये लो... पकडो जाम , टकराओ और उड़ा जाओ... अभी ठीक से तुम्हारा गला तर नहीं हुआ है इसी कारण ये तकलीफें पेश आ रही हैं, इसके साथ अगर सिगरेट का काश लगाओगी तो आनंद बढ़ जाएगा...
शैली- मुझे तो इसके धुँए से ही अजीब सी परेशानी महसूस होती है, इसे कैसे पी सकती हूँ...
रवि- दूर से चीजें दूसरी तरह की लगती हैं, जब नजदीक आते हैं तब पता चलता है की वास्तब में वह है क्या ?
राजेश- हाँ, जैसे मेरे इस दोस्त को ही देखलो , एक बार अगर बिस्तर पर इसके साथ मजा लिया तो सब कुछ भूल जाओगी, यहाँ तक की मुझे भी... यह बिस्तर का बहुत बड़ा खिलाड़ी है... मुझे तो रोजी ने ये सब बताया है...
रोजी- हाँ, ये सच कह रहे हैं...इनकी बात में कोई बनावट नहीं है... मैं तो हफ्ते में एक बार जरूर रवि के साथ मस्ती करती हूँ, मगर महीने भर का मजा यह एक रात में ही दे देता है... एकदम जादूगर है ये...
शैली- हफ्ते में मजा क्यों लेती हो फ़िर, रोजाना क्यों नहीं ?
रोजी- क्योंकि मैं पढ़ती हूँ, वह भी पूना में और रवि रहता है मुंबई में , तो फ़िर रोजाना तो आ नहीं सकती...मेरी राय है की आज की रात कुछ समय के लिए तुम भी रवि के साथ सुख भोगकर देखो, तबियत खुश हो जायेगी तुम्हारी...
राजेश- मुझे तो कोई आपत्ति नहीं , मैं तो इसको खुश देखकर ही खुश हो लेता हूँ...
रवि-तुम तो राजी हो मगर शैली भी तो खुश होनी चाहिए...
रोजी- यह तो शैली के लिए गौरव की बात है जो इसका प्रेमी ही इसका इतना ध्यान रख रहा है ...इस बहाने मुझे भी आज की रात राजेश से प्यार करने का मौका मिल जाएगा...
रवि- बड़े शौक से... मुझे खुशी होगी, बल्कि मैं तो कहता हूँ की यहीं पर हम चारों मस्ती के समुन्दर में गोते लगायेंगे... जी भरके मजे लेंगे और फ़िर खूब आनंद एक दूसरे को देंगे...
शैली- ओह, तुम लोग ऐसी बात कैसे सोच सकते हो ? आज ना सही जीवन में फ़िर कभी राजेश मुझे इस बात का ताना जरूर देंगे...
Saturday, May 16, 2009
तड़प, भाग-35
दीपू- तुमने गिलास हाथ में क्यों पकडा ? इनकार करना चाहिए था तुम्हें ?
शैली- हाँ, वाही तो नहीं कर पाई मैं , उसीका खामियाजा तो मैं अब तक भुगत रही हूँ... उन लोगों ने ऐ मुझे पीने की ऐसी लत डाली की अभी तक भुला नहीं पाई हूँ... अब यह शराब मेरे जीवन के लिए उतनी ही जरूरी बन चुकी है जितने की तुम...
दीपू- शुक्रिया शैली... इतना प्यार देने के लिए मैं अआभारी हूँ...
शैली - फोर्मेलिती मत करो दीपू... मैं कहाँ कर रही हूँ... तुम्हारे मुह पर तारीफ़ करने कामतलब यह नहीं होता की मैं चापलूसी कर रही हूँ... मुझे तो आदत है सच कहने की...
दीपू- ठीक है, मैं आगे की बातें सुनना चाहता हूँ,। अपनी शैली में ही बताइये...
शैली-बस मैंने शराब पीनी शुरू की और रवि ने मेरे हुस्न की तारीफ़ करते हुए कहा-
- तुम बेहद सुंदर हो, मैं चाहता हूँ की तुम मेरे साथ मुंबई चलो, मैं अपने मामा से कहकर तुम्हें एक्ट्रेस बनने की कोशिश करूँगा, हंगामा हो जाएगा... अच्छी- अच्छी एक्ट्रेस की छुट्टी कर डौगी तुम... तुम्हारी यह जवानी इतनी कातिल है की देखते ही दीवाना हो गया हूँ...ये तो शुक्र है की तुम अपनी ही दोस्त निकलीं वरना गज़ब हो जाता... जब तुम राजेश की मित्र हो तो मेरी भी मित्र हो...
राजेश- बिल्कुल सही है यार , तुम्हारा उअर क्या बँटा है... शैली को अपनी ही समझो...
शैली- मैं तो राजेश की गुलाम हूँ, राजेश अगर जान भी देने को कहे तो दे दूंगी... ज़रा भी टाइम ख़राब नहीं करुँगी...
रवि- अगर राजेश तुमसे मेरे साथ सोने को कहे तो इनकार तो नहीं करोगी ?
शैली- बिल्कुल नहीं करुँगी... ओह,, यह मुझे क्या हो रहा है ? क्या सवाल पूछ रहे हो तुम ? और मैं भी ये क्या जवाब दी जा रही हूँ , लगता है मुझे बहुत चढ़ गयी है....
Friday, May 15, 2009
तड़प, भाग-34
शैली- बहुत मुश्किल होता है घर से बाहर रात गुजारना... मुझे लगता है मम्मी -पापा को सब भनक लग चुकी है, इसी कारण मैं उनके सामने झिझकती रहती हूँ, मन में ग्लानी सी रहती है...
राजेश- ये सब तुम्हारा वहम है, ऐसा कुछ नहीं होता... दोस्ती और मोहब्बत की बात वो भी समझते हैं... वो भी जानते हैं की इश्क क्या होता है, अगर ऐसे ही छिछोरेपन की बात होती तो वे तुम्हें जरूर टोकते...
शैली- माँ वृद्ध होने को आयीं, बीमारी ने समय से पहले ही उन्हें बुढापे की तरफ़ धकेल दिया है... अब तो काम भी नही होता... मैं उनका हाथ नहीं बँटा सकती, इसका मलाल होता है...
राजेश- तुम्हें फ़िक्र करने की जरूरत नहीं है... हमारी हजारों एकड़ खेती किस दिन काम आएगी, तुम अपने पिताजी से कहना की की हमारी नहर के किनारे वाली १० बीघा भूमि को जोतने लगें, अच्छी फसल देती है, उसीसे तुम्हारे घर के सारे खर्चे निकलते रहेंगे...
शैली- इस बारे में उनसे क्या कहूँगी ? कोई भी इतनी जमीन ऐसे ही कैसे देने को राजी हो जाएगा ? यहाँ तक की लेने वाला भी हजार बार सोचेगा ... उनके मन में ग़लत ख़याल आ सकते हैं...
राजेश- ऐसी बात नहीं है, हमारे खानदान के बारे में हर कोई जानता है... सबको मालूम है की हम अपने शुभचिंतकों में ऐसे जमीन बाँटते रहते हैं...
शैली- तुम कह भी दो तो क्या होता है , जमीन तो तुम्हारे पिताजी के नाम होगी?
राजेश- नहीं, सारी जमीन अलग-अलग लोगों के नाम है, मेरी बात कोई नहीं गिराएगा, जो भी कह दिया वह पत्थर की लकीरहै...कोई उसे काटने वाला नहीं है...
शैली- ठीक है तो किसी दिन अच्छा सा मुहूर्त देखकर उसे पहले पिताजी के नाम लिखवा दीजिये वरना तुम्हारे खानदान के लोग बाद में झगडा करेंगे ...
राजेश- नहीं ऐसा कोई नहीं कर सकता , फ़िर भी अगर तुम्हारे मन में कोई संशय है तो कोई दिक्कत नहीं, सोमवार को तुम मेरे साथ चलना , तुम्हारे ही नाम लिखवा दूंगा... फ़िर तुम्हारा ये रोजाना का खर्चों का झंझट मिट जाएगा...
शैली- ठीक है, मैं पिताजी को समझा बुझाकर आती हूँ... लेकिन यह बात लीक नहीं होनी चाहिए...
राजेश- पागल हुई हो क्या ? इस तरह की बातें लीक करने के लिए होती हैं क्या ?
इसके बाद जब राजेश अपने शहरी दोस्त रवि को लेकर उसके घर से निकला तो शैली को कुछ खटका सा लगा... उसको रवि की नीयत कुछ अच्छी नहीं लग रही थी..., रवि का ध्यान शैली के उफनते हुए यौवन पर टिका हुआ था... जब वह साँस लेती तो उसके सीने के वक्ष ऊपर नीचे होने लगते थे और रवि की दिलचस्पी उसी में ज्यादा थी...
Thursday, May 14, 2009
तड़प,भाग-33
शैली- हाँ यार, मैं तो सन्न रह गयी थी... मैं समझ नहीं पाई की इस बात का मतलब क्या है , दरअसल मैं ठहरी गाँव की सीधी सादी लड़की ... मुझे दुनिया के दांव पेच का ज्ञान नहीं था ... मैं मोहब्बत पर कुर्बान होने वाली दीवानी थी... जब किचन में थी तभी राजेश का शहरी दोस्त रवि वहां आ धमका ... उसने पीछे से मुझे अपनी बांहों में कसकर कैद कर लिया और मेरे hoth को choom लिया ... कुछ kshan के लिए तो मैं सोच भी नहीं पाई की मुझे क्या करना chaahiye , मैं अभी विचार कर ही रही थी की तभी राजेश वहाँ आ धमका .... वह मुस्कराते हुए बोला-
-आखिरकार रवि को अपना हक़ छीनकर ही लेना पडा न... अगर तुम राजी से इससे प्यार कर लेतीं तो क्या बिगड़ जाता ।, मेरे ख़याल से तुम्हें शर्म या झिझक हो रही होगी... शहरों में यह सब सामान्य बात है... वहाँ तो एक दूसरे की प्रेमिकाओं को भी बदल लिया जाता है, सेक्स करने के बाद फ़िर सब सामान्य हो जाता है... जब तक जवानी है तब तक इसका रस लेना चाहिए, बुढापे में कोई किसी को नहीं पूछता ... तुम और हम चाहकर भी कोई मजा ने अहं ले पायेंगे, अरे शरीर के अंग भी काम करना छोड़ देते हैं... इसलिए मौज मस्ती जहाँ मिले , वहाँ प्यार से स्वीकार करो, खूब आनंद लो...
शैली- मैं आपकी प्रेमिका हूँ , किसी दूसरे को छूना भी मेरे लिए पाप है...
राजेश- बात बिल्कुल सही है, मैं मानता हूँ... स्वीकार है मुझे लेकिन दूसरे के साथ, और यह रवि कोई दूसरा नहीं है , हमारा अपना है... मेरे जिगर का टुकडा है ये... जो मेरा है वो तुम्हारा भी तो हुआ न , यह क्यों नहीं समझतीं....
शैली- ठीक है, मैं तो मूर्ख हूँ,, कुछ नहीं जानती... तुम खुश रहो ... मैं भी खुश हो ही जाउंगी... अब तो किस ले लिय्या अब तो यहाँ से हटो... मैं नाश्ता कैसे तैयार karungi ?
राजेश- ठीक है , जल्दी से नाश्ता तैयार karlo , फ़िर तो हवेली में आ जाना , वहाँ रंगमहल में हम तुम्हारा इन्तजार करेंगे...तुम्हारे समान में आज हमने स्पेसल बकरा बनवाया है , वहां पर रवि मिलेगा , रवि की प्रेमिका मिलेगी और मैं -तुम रहेंगे... हो सके तो आज किसी काम का बहान करदो, आज की रात हम साथ गुजारना चाहते हैं... समझ गयी न मेरी जान ...
शैली- ये क्या कह रहे हो , तुम्हें ज़रा भी शर्म नहीं आती, अपने दोस्त के सामने ऐसी गन्दी बात करते हो...
राजेश- ये तो कुछ भी नहीं है , ये मेरा दोस्त तो मेरी आंखों के सामने अपनी प्रेमिका के साथ प्रणय क्रीडा भी करता है, वो भी खूब मजे ले लेकर साथ देती है ...
शैली- अच्छा, ये सिर्फ़ सामने ही करते हैं, तुम्हें आमंत्रित नहीं करते ?
राजेश- कह चुके हैं कई बार ... इनको कोई आपत्ति नहीं है... इसकी प्रेमका तो मुझे अपने ऊपर खीचकर कहती है कई तुम दोनों एक साथ मेरे न्बदन की अगन बुझाओ , लेकिन तुम्हारा टेस्ट मुझे कैसे मिलेगा ... तुमने बिस्तर पर मुझे जो आनंद दिया है मेरे लिए वाही काफी है, मैं किसी दूसरी लड़की में ज़रा भी दिलचस्पी नहीं रखता ... हाँ अगर तुम्हारी इच्छा हो तो मैं इनकार भी नहीं करूँगा...
शैली- नई नई लड़कियां तुम्हें ही आकर्षक लगती हैं मगर मुझे नए लड़कों का कोई शौक नहीं है... मैं तो तुहें ही बर्दाश्त नहीं कर पाती... तुम्हीं इतना सुख देते हो जितना की किसी शादीशुदा को भी नहीं मिलता होगा... जब मैं तुम्हें ही पूरी तरह से संतुष्ट नहीं कर पाती तो मेरी इच्छा कैसे होगी ...
राजेश- अभी तो तुम्हें कुछ सुख नहीं मिला , आगे देखो होता है क्या ?
Wednesday, May 13, 2009
तड़प, भाग-32
- यार राजेश तुमने प्रेमिका तो गज़ब की पाई है, अगर इसको शहर में लाया गया तो क़यामत हो जायेगी, इसको फ़िल्म स्टार बन्ने से कोई नहीं रोक सकता... यह तो धमाका है यार ... हमारी दोस्ती नहीं करवाएगा?
राजेश- ताना क्यों देता है, इसीलिए तो तुझे यहाँ लेकर आया हूँ, शैली , यह मेरा ख़ास दोस्त है... मैं और ये दोनों एक जिस्म दो जान हैं, हम एल दूसरे को अपनी सब बातें बताते हैं, मैंने तुम्हारे बारे में भी इसको सब कुछ बता दिया है... यह कहता है की तुम फ़िल्म स्टार बनने लायक हो, इसके साथ एक बार शहर चली जाओ, हो सकता है तुम्हारी किस्मत ही खुल जाए...
शैली- मेरी किस्मत तो आप हैं, और मुझे कुछ नहीं चाहिए ...
राजेश- ठीक है , ठीक है ,,,मगर कम से कम तुम मेरे दोस्त से हाथ तो मिला सकती हो....
शैली- मैं मिला चुकी हूँ... आपका ध्यान उस समय मेरी तरफ़ नहीं था...
रवि- तुम से अपना ध्यान कौन हटा सकता है, पटाखा हो तुम तो... हम इतनी दूर से तुम्हें देखने आए हैं, तुमसे मिलने आए हैं और तुम नखरे दिखा रही हो... मैंने सोचा था की तुम मोहब्बत से पेश आओगी मगर....?
राजेश- तू भी कमाल का इंसान है यार, अभी वक्त ही कितना हुआ है तुझे आए हुए , अभी ठीक से पहचान हुई है , साथ में उठेंगे बैठेंगे , दुःख सुख की बात करेंगे खाएँगे पियेंगे ऐश करेंगे ... सब ठीक हो जाएगा धीरे- धीरे... क्यों टेंशन लेते हो... अरे प्यार से बात करो , गिले शिकवे मत करो...
शैली- मैं आप लोगों के लिए नाश्ते का इंतजाम करती हूँ... अआप आराम से बैठिये,...
राजेश - मेरे यार रवि की बातों का बुरा मत माना ,, मेरे से छोटा है... इस लिहाज से तुमसे मजाक करने का इसका हक़ बनता है... इ९से इस हक़ से वंचित मत करो... मुह से बक-बक करता है लेकिन दिल का बड़ा साफ़ आदमी है... दोस्ती के लायक है ये... इससे दोस्ती करके कई लडकियां अपनी जिन्दगी बना चुकी हैं... इसका सगा मामा बहुत बड़ा फ़िल्म डायरेक्टर है , मुंबई में रहता है... यह कई लड़कियों की सिफारिश करके उनकी जिन्दगी खुश हाल बना चुका है, बहुत काम का आदमी है... जितना जमीन का ऊपर है उससे कई गुना जमीन के नीचे भी है...
रवि- चल छोड़ यार अगर ये हमसे दोस्ती नहीं करना चाहतीं तो जबरदस्ती करनी बेकार है...
राजेश-त०ऊ दिल छोटा कर रहा है क्या, मैं अभी शैली से कहता हूँ वह तुम्हें किस देकर अभी खुश कर देगी...
Tuesday, May 12, 2009
तड़प, भाग-31
- आह, यह क्या ? मैं कितनी महत् कर रहा हूँ और आप हैं की ना जाने किस दुनिया में खोई हुई हैं ?
शैली- मन ही मन तारीफ़ कर रही थीतुम्हारी, जब सामने पर करती हूँ तो बच्चों की तरह शर्माने लगती , इसलिए...समझे ? तुमने क्या समझा , बुराई कर रही हूँ ?
दीपू- मैं भी तो जानूं की मेरे बारे में तुम्हारा मन क्या कहता है?
शैली- मेरा मन कहता है कीतुम इसके राजकुमार बन चुके हो, तुम सबसे अलग हो और अच्छे हो....
दीपू- अभी तुमने मेरे बारे में ऐसी राय क्यो बनाली ? पहले देखो, बरतो, समझो फ़िर कुछ कहना...
शैली- जितना देख समझ चुकी हूँ उतना ही काफी है, जीवन के पल मुट्ठी में रेत की अरह निकले जा आहे हैं, मैं हर पल को तुम्हारी नाम कर देना चाहती हूँ.....
दीपू- मैं भी अपनी जान से बढ़कर चाहने लगा हूँ ,
Sunday, May 10, 2009
तड़प, भाग-30
शैली- और अब ? कैसा लगा अपनी मोहब्बत से मिलकर ? अब कोई तस्बीर बनी की नहीं ?
दीपू- अब तो सीधे दिल पर छाप चुकी हो, मुझे नहीं लगता की कभी यह सूरत मेरे मन से निकल पायेगी... शायद मरने के बाद भी कोई इसे नहीं हटा सकता...
शैली- इतने भावुक मत बनो दीपू, वरना फ़िर पछताना पड़ सकता है... जिन हसीं पलों से हम गुजर रहे हैं ये बेहद नाजुक होते हैं, इन अंतरण क्षणों में मर्द लोग कोई भी वादा कर डालते हैं, कोई भी कसम खा लेते हैं लेकिन जब उन वादों , इरादों को निभाने का समय आता है तो नानी याद आ जाती है, फ़िर उन्हें अपनी गलती का एहसास होता है... फ़िर पश्चाताप करते फिरते हैं , महबूब को बेवफा कहने लगते हैं ...
दीपू- इस मामले में तो तुम मेरे विचारों से पहले से ही परिचित हो, तुम्हें पता है, मैं दोस्ती में त्याग की बात करता हूँ, गिला शिकवे मुझे पसंद नहीं ... मैं कभी अपने किए वादों को शर्मिंदा नहीं होने दूंगा...मुझे जितना लगाव अपने व्यक्तित्व से है उतना ही अपने वादों से भी है...
शैली- मुझे तुम जैसे लोग बहुत पसंद हैं लेकिन ऐसे मिलते कहाँ हैं ? आजकल तो सब व्यापार देखते हैं...
दीपू- सच कहती हो , यी बात तो है... व्यवहार पर बाजार इस कदर हावियो हो गया है की अब हर दूकानदार अपनी ग्राहकी बढ़ाने के लिए काउन्टर पर एक सुंदर लड़की जरूर बिठाता है...
शैली- मैंने भी इस बात को बड़ी शिद्दत से महसूस किया है , कुछ लोग तो अपनी महिला सेक्रेटरी इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए रखते हैं... और तो और बड़े -बड़े नामचीन लोग अपने खर्चे से हमको अपने व्यापारिक फायदे के लिए दूसरे लोगों का बिस्तर गर्म करने के लिए भेजते हैं... ऐसा करके वे अपने अपने काम निकाल लेते हैं... अब उनमे और दलालों में क्या फर्क रह जाता है ? वे बड़े दलाल हैं इसलिए कोई उनसे कोई सवाल नहीं कर सकता ... उनके पास दौलत है इसलिए सबका मुह बंद रहता है...
दीपू- इससे आची तो तुम हो, कुछ छिपा तो नहीं रहीं , जो भी कर रही हो डंके की चोट पर ईमानदारी के साथ कर रही हो... मुझे ऐसे लोग अच्छे नहीं लगते जो अपने मुख पर कई मुखौटे चढाये रहते हैं...
तुमने यह गीत सुना ही होगा- क्या मिलिए ऐसे लोगों से जिनकी सूरत छिपी रहे, असली चेहरा सामने आए नकली सूरत छिपी रहे... यह गीत आजकल के माहोल पर बिल्कुल फिट बैठता है...
शैली- आज क्या सिर्फ़ बातों -बातों में ही वक्त बिताने का इरादा है ?
दीपू- ऐसी बात नहीं है, तुमसे ज्यादा तुम्हारी बातों में मजा आता है, तुम इतनी कामुक बात करती हो की मेरी नस-नस मदमस्त हो जाती है। भावनाएं भड़क उठती हैं और जी चाहता है, जी चाहता है की....
शैली- क्यों रुक क्यों गए ? बोलो न....
दीपू- रहने दो... फ़िर कभी kahunga... अब jubaan से नहीं , कुछ करना होगा...
इसके बाद दीपू ने शैली के yauvan द्वार पर हरकत karni शुरू kardee...
तड़प, भाग-29
मुरीद बनकर रह गया था... दीपू को लगने लगा था की अब वह जिन्दा नहीं रह पायेगी, बिना शैली के अब उसको अपना जीवन निरर्थक लगने लगा था... यह कैसा परिवर्तन था , यह कौन सी शक्ति थी जो उसे उससे ही अलग करने पर तुली थी... वह शैली के बदन पर हाथ फिर रहा था, शैली आहें भर रही थी, काम वासना बढ़ाने वाले प्रसंग सुना रही थी, वह उसको ऐसे ऐसे संस्मरण सुनाती की दीपू का उत्साह कई गुना बढ़ जाया करता था , वह उस पर आक्रमण करने लगता , प्रहार और भी तेज करने लगता, शैली अपने पास कंडोम रखा करती थी और एक बार भी उसने सुरक्षा के सम्बन्ध नहीं बनाए थे... जब दीपू ज्यादा जोश में होता तो होश खोने जैसी बात करने लगता था ... कहने लगता-
-हटाओ इसे , इससे मजा नहीं आता... मैं बिना इसके ही ज्यादा आनंद का अनुभव करता हूँ...
शैली- अच्छा, भूल गए ऐड्स को, सारी शेखी राखी रह जायेगी... सारा आनंद ख़ाक में मिल जाएगा... इसका दुनिया में कहीं भी इलाज नहीं है, जानते हो इससे अच्छी तो मौत होती है... अगर किसीको यह बीमारी लग गयी तो पूरे वंश का नाश कर डालती है... इसलिए कभी भी असुरक्षित यौन सम्बन्ध नहीं बनाने चाहिए... क्या तुम्हें मालूम है की यह लाइलाज बीमारी है ?
दीपू- हाँ , पढा तो बहुत है , मगर साथ में यह भी पढा है की कंडोम बेचने वाली कम्पनियां बेवजह टूल पहुचाकर अपना प्रोडक्ट बेचना चाहती हैं,
शैली- एक बार को अगर इसे सच भी मान लिया जाए तो हर्ज भी क्या है , कौन सा लाख रुपये का खर्च आता है ? कहीं कहीं तो यह मुफ्त में भी मिल जाता है ?अगर जान है तो जहाँ है... लोग सोचते हैं की बुरी चीजें हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती, लेकिन यह विचार ग़लत है... हमको सावधान रहना चाहिए...एक पल का मजा मौत में बदल सकता है...
दीपू- तुमने तो मुझे भयभीत ही कर दिया , मेरा सारा नशा हिरन हो गया है...
शैली- मेरा , मकसद तुम्हें सचेत करना है, तुम मेरे सबसे प्यारे दोस्त है , अब तुम जहाँ भी रहोगे मैं तुम्हारी चिंता करती रहूंगी.... शायद प्यार इसीको कहते हैं...
दीपू- अब से मैं गर्व से कह सकता हूँ की इस शहर में मेरा अपना भी कोई है जो मेरी इतनी फ़िक्र करता है...मुझे चाहता है...
Saturday, May 9, 2009
तड़प, भाग-28
शैली- बिना विवाह किए ऐसे सम्बन्ध ग़लत कहलाते हैं, पहले मांग भरो फ़िर कुछ करने दूंगी...
राजेश-हम जब मांग भरते हैं तो सिन्दूर का सहारा नहीं लेते बल्कि खून से मांग सजाते हैं... पढाई पूरी करने के बाद मैं तुमसे धूमधाम से शादी कर लूँगा... एक बहुत बड़े समारोह में ये सब होगा... अगर तुम जिद करती रहीं तो यह काम मैं अकेले में भी कर सकता हूँ लेकिन मेरी नजर में यह अशुभ होगा ... मैं दिल से प्यार करता हूँ और शादी भी करूँगा तो इसी तरह शान से करूँगा...
शैली- तुम्हारी नजर में मेरी खुशी का कोई मतलब नहीं है ? अगर मैं कुछ कह रही हूँ तो उसका कोई महत्व नहीं ? क्या मोहब्बत और भावनाओं का कोई अर्थ नहीं , जिस्म ही सब कुछ होता है क्या ?
राजेश- मैंने ऐसा कब कहा , भूल गईं क्या ? मैं तो इस जिस्म को पहले ही मिटटी का बता चुका हूँ फ़िर इसको तुमसे तुमसे कम या ज्यादा समझने का मतलब ही कहाँ पैदा होता है ?
दीपू- इसका मतलब बहस करने में राजेश भी अव्वल था ?
Wednesday, May 6, 2009
तड़प, भाग-25
राजेश- तुम तो ऐसी बात कर रही हो जैसे की मैंने तुम्हें बांधकर रखा है, अगर तुम सचमुच जाना चाहती हो तो जा सकती हो, मैं रोकने वाला कौन होता हूँ....लेकिन एक बात का ध्यान रखना, तुम मेरा दिल दुखाकर जा रही हो, मेरे अरमान जलाकर जा रही हो, अब मैं रात भर सो नहीं जाऊँगा... पेट भरके खा नहीं पाऊंगा, चैन से जी नहीं पाऊंगा...
शैली- इतने भावुक और कमजोर मत बनो... दिल को मजबूत बनाओ ...
राजेश- गला काटकर फ़िर मरहम लगाने की बात करती हो, तुम हसीनों की इस आदत से मैं अच्छी तरह वाकिफ हूँ...मैं तो तुमसे सच्चा प्यार करता हूँ...अगर कोई शक है तो मेरी परिक्षा ले सकती हो...
शैली- मैं अगर तुम पर संदेह करती तो यूँ दिल न्यौछावर नहीं करती... ऐसे अकेले में तुम्हारे साथ नहीं आती... जब भरोसा होता है तभी कोई इतना रिस्क लेता है...
राजेश- अब मैं इससे ज्यादा कोई सफाई नहीं दे सकता , इतना ही कहता हूँ की ऐसे
शैली- तुम्हें ऐसा क्यों लगता है की मैं जानबूझकर यहाँ से जाना चाहती हूँ, तुम जैसे खूबसूरत और जवान मर्द
हर किसीको नहीं मिलते... तुम बेहद सुंदर और सुलझे हुए हो, मैं तुमसे बार- बार और हर बार मिलना चाहूंगी...
राजेश- अच्छा ठीक है , भरोसा है मुझे तुम पर... अब तुम जा सकती हो...
दीपू और शैली गार्डन के छिपे हुए कोने में बैठकर यह चर्चा कर रहे थे... शैली अपने जीवन की बीती हुई कहानी उसे बाता रही थी... दीपू ध्यानपूर्वक सुन रहा था...वह पूछने लगा-
- अच्छा ये तो कहो की उस समय तुम इतनी होशियार कैसे थीं ? मुझे लगता है की तुमने राजेश से झूठ बोलकर उससे आसानी से पीछा छुडा लिया वरना मेरे ख़याल से वह उस दिन तुम्हें छोड़ने वाला नहीं था...जब तुम कह रही हो की वह इतना बड़ा दबंग था तो उसका जलवा होगा गाँव में , कोई उसका क्या कर लेता ? ऐसे लोग सनकी भी होते हैं, अगर उनकी नहीं मानो तो अपराध करने पर भी उतर आते हैं...
शैली- हाँ, सही पहचाना, उस दिन मैंने झूठी क़समें खाईं और क्झूथ के सहारे बचकर चली आयी... मैंने ये सारी कहानी अपनी एक खास सहेली को बतायी तो वह मुझे समझाने लगी...
दीपू- क्या कहा उसने ? क्या वह राजेश से दोस्ती करने के पक्ष में थी ? याफिर वह मना कर रही थी ?
शैली- दरअसल वह थाकुन के जुल्मों को अच्छी तरह से जानती थी , उसकी राय थी की मैं यह बात किसीसे न कहूं और चुपचाप गाँव छोड़कर किसी रिश्तेदारी में दूर चली जाऊं, क्योंकि अगर राजेश कुछ चाह लेता है तो ख़ुद उसके घरवाले भी उसकी इच्छा पूरी करने में जुट जाते हैं , चाहे उन्हें जोर जबरदस्ती ही क्यों न करनी पड़े ?
दीपू- हैरत होती है ऐसी बातें सुनकर , क्या अब भी ऐसी यातना देने वाले लोग यहाँ जिन्दा हैं?
Tuesday, May 5, 2009
tadap, bhag-24
Monday, May 4, 2009
तड़प, भाग-23
- तुम मेरे लिए बनी हो शैली... इस मद मस्त जवानी को मेरे नाम करदो, फ़िर देखो जन्नत के सुख कैसे मिलते हैं...
शैली- और किसीके नाम करनी होती तो इस तरह तुम्हारे पहलू में क्यों आती ? अब तो तुम्हारी हो ही गयी...
राजेश- देखो, ऐसा ना हो की बाद में बात बदल जाओ... दिल मुझे दिया है तो हमेशा प्यार भी मुझसे ही करना पड़ेगा... मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो अपनी हवस मिटाने के बाद पहचानने से भी इनकार कर देते हैं...मैं ठहरा प्यार का पुजारी... सिर्फ़ प्रेम करना जानता हूँ...
शैली- तुमने स्कूल में देखा होगा , मैं किसी से बात भी करती हूँ क्या ? किसीकी तरफ़ देखती बही नहीं हूँ... एक तुम ही हो जिसके लिए मैं यहाँ तक आ गयी... तुम्हारी हवेली में तो कितनी ही लड़कियां आती हैं, तुम्हें मौज मस्ती की क्या कमी होगी ? मुझे सब मालूम है...
राजेश- अच्छा, ऐसी बात है... तुम्ही बताओ मेरा नाम कभी लफडे में सुना है... भले ही हमारी हवेली में कितनी ही लड़कियां आती हैं, एक से बढ़कर एक औरतें हमारे यहाँ काम करती हैं मगर मुझे तुम्हारे जैसी कोई नहीं लगती...
शैली-तुम्हारे बड़े भाए तो खूब रंगीले हैं, उनके पूरे गाँव में चर्चे हैं... कोई ऐसी औरत नहीं होगी जोतुम्हारी हवेली में आती हो और फ़िर सूखी लौट जाती हो... यहाँ आने वाली ऐसी किसी लड़की नाम बताओ जिसकी इज्जत महफूज हो... बता सकते हो कोई नाम ?
राजेश- तुम मेरे बड़े भाई की बात कर रही हो, उसकी तुल्लना मुझसे नहीं की जा सकती... वह तो रसिया है , रंगीला रतन है... गुलछर्रे उडाना उसका शौक है, मगर तुम मेरे बारे में कोई भी एक ऐसी बात बतादो... भले ही हमारे पास दौलत है, सैकडों बीघा खेत है मगर मैं उसका घमंड नहीं करता...
शैली- तुम्हारे पुरखे राजा महाराजा थे, उनका ही खून तुम्हारी रगों में भी दौड़ रहा है... मुझे नहीं लगता तुम भी उनसे कुछ अलग होंगे...
राजेश - मुझ पर भरोसा करने का कारण बी ही तो नहीं है तुम्हारे पास... कोई एक शिकायत तो कहो...
शैली- दूसरे किसी का क्या कहना ... मैं ख़ुद भुक्तभोगी हूँ... छोड़ने का बोलती हूँ तो और भी जकड लेते हो...मुझे छोडो तो जानूं... मैं इस वक्त अपने घर जाना चाहती हूँ...
राजेश- मजाक कर रही हो, ऐसे हसीं पलों को तुम कैसे छोड़ना चाहोगी ? जरूर तुम झूठ बोल रही हो...
शैली- नहीं , बिल्कुल नहीं.... मैं सच कह रही हूँ, मेरा दम घुट रहा है... अभी- अभी मुझे महिना आ गया है... अब मैं तुम्हारे किसी काम की नही रही.... समझे बुद्धू.... अब कम से कम चार दिन इन्तजार करो...
राजेश - मेरे ऊपर इतना जुल्म मत करो.... अरे मर जाऊँगा मैं... मुझे तुम्हारी इस समय सख्त जरूरत है....
राजेश के शब्दों में याचना थी... उसने महसूस किया की राजेश उत्तेजना के चरम पर पहुच गया था....
Saturday, May 2, 2009
तड़प- भाग-22
- कहाँ हो ? मैं तुम्हारे पहलू में हूँ और तुम्हारा कहीं अता -पता ही नहीं है... क्या बात है मेरी जान ?
शैली- कुछ पुरानी बातें याद आ गईं, मन बहक गया , जख्म थोड़े से हरे हो गए... इसीलिए तो मैं चुप रहती हूँ...
दीपू-इस चुप्पी को तोड़ डालो , दिल में जो दर्द है उसे बाहर निकालो वरना ये naasoor बन जाएगा,,,
शैली- मैं जब छोटी थी तो मेरे साथ बलात्कार किया गया... जब उसकी शिकायत पुलिस से करनी चाही तो उलटी तोहमतें सहनी पड़ीं, धमकियाँ मिलीं... घरवाले डर गए, गाँव के दबंग लोगों ने उन्हें खूब डांटा -डपटा... आखिरकार चुप ही रहना पड़ा... मैं पढने जाती तो सहपाठी छेड़ते थे, ताने देते थे... जब बड़ी हुई तो राजेश नाम के एक लड़के ने मुझसे प्यार का इजहार किया... पहले-पहले तो मैं नजरअंदाज करती गयी मगर फ़िर जल्द ही मैंने महसूस किया की राजेश मुझे दीवानों की तरह चाहने लगा था, वह मेरा खूब आदर भी करता था... मैं उससे मिलने लगी... यह मुलाक़ात बहुत कम समय के लिए होती थी... कभी गली के किसी नुक्कड़ पर हम एक दूसरे से राजी खुशी पूछ लिया करते थे...