Thursday, July 31, 2008
भाग ६३
सुरभि-लेकिन , मैं तो पहले से ही किसी और की हो चुकी हूँ... आप को एक सलाह देती हूँ, ऐसा क्यों नहीं करते की किसी और खुबसूरत लड़की को ये ऑफर क्यों नहीं दे देते ... तुम शायद दया भाव दिखाकर मुझ जैसी मजबूर लड़की को मदद करना चाह रहे होंगे ... मगर अफ़सोस, यह चीज बिकाऊ नहीं है...
व्योम- झूठे आदर्श और खोखले सिद्धांत इंसान का पेट नहीं भर पाते... कुछ बातें ऐसी होती हैं जो सुनने में तो बड़ी सुंदर लहटी हैं मगर उन्हें जीवन में नहीं उतारा जा सकतामेरे एक dost
Tuesday, July 29, 2008
भाग ६२
सुरभि-जिस तरह हर पीली चीज सोना नहीं नहीं होती, वैसे ही हर चमकदार पत्थर भी हीरा नहीं होता...मैं ठहरी गाँव की कम पढ़ी- लिखी गंवार और तुम शहर के विद्वान ,रईस और भी न जाने क्या-क्या ?बड़ी हैरत की बात है की इतनी साधारण बातों को तुम नहीं जानते...
व्योम- तुम्हारा जादू मेरे सर पसर चढ़कर बोल रहा है... सारी होशियारी भूल चुका हूँ ... सिर्फ़ एक बार मुझे अपना तन सोंप दो... इसके बाद मैं कभी कुछ नहीं कहूँगा... तुम्हें प्राप्त किए बिना मैं अपने आपको अधूरा समझ रहा हूँ... इन शब्दों का प्रयोग मैं जानबूझकर नहीं कर रहा हूँ...ये सब कहने से पहले मैंने अपने आप से बड़ी जद्दोजहद की है... नादाँ दिल को बहुत समझाने की कोशिश की है... जब भी तुम्हें राजू के साथ देखता हूँ ,मुझे तुम दोनों के भाग्य से जलन होने लगती है... कहाँ मेरी, दौलत, मेरा रुतवा, समाज में मेरा मान सम्मान , और कहाँ एक अदना सा इंसान ? मैं तुम्हारे पति राजू की बात कर रहा हूँ...
सुरभि-आपको मेरे सामने मेरे पति के बारे में इस तरह की बातें नहीं करनी चाहिए...
व्योम-कैसा पति सुरभि? मुझे भी सच्चाई का ज्ञान हो चुका है... तुम दोनों भागकर यहाँ आए हो...जिस्म की भूख शांत करने के लिए तुमने यह रास्ता चुन लिया होगा... इसकी तुलना तुम शादी से कैसे कर सकती हो? राजू चालाक है... जब तक उसका जी चाहेगा, तब तक तुमसे मौज मस्ती कर लेगा और जब दिल भर जाएगा तो दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकालकर फेंक देगा... तुम उसका क्या बिगाड़ लोगी?ना तो तुम सामाजिक रूप से उसकी पत्नी हो और ना ही कानूनी रूप से ... धार्मिक तौर पर तो हरगिज नहीं ...
सुरभि-इसका मतलब आप अब तक भी पवित्र प्रेम के दायरे को समझ नहीं पाये हैं.... प्यार इन सब सीमाओं में नहीं समाता ...क़ानून के दांवपेंच, सामाजिक रीति-रिवाज़ और धार्मिक धकौसलों को चीरता हुआ प्रेम का प्रवाह सीधा आत्मा की गहराइयों में समा जाता है... प्यार में तुम्हारी तरह डर नहीं दिखाया जाता, लालच नहीं दिया जाता, बल्कि प्यार का बदला त्याग से दिया जाता है... तुम बड़े व्यापार हो, व्यापार करने में माहिर हो सकते हो, यह प्यार का रोग तुम्हारे वश का नहीं है... यहाँ सौदेबाजी नहीं समर्पण से कम चलता है...
व्योम- काश, यह प्रेम का पाठ तुम मुझे एकांत में पढा सकतीं...
सुरभि- आपकी यह ख्वाहिश कभी पूरी नहीं हो सकती... जिनके मन में मेल होता है , वे इस पवित्र गंगा को कभी प्राप्त नहीं कर पाते...
व्योम- मैंने जिसको चाहा है, उसे हासिल करके ही दम लिया है...चाहे बदले में कुछ भी क्यों ना देना पडा हो... इसका कारण ये है की थोडी बहुत दुनिआदारी मैं भी समझता हूँ... मैं इस नतीजे पर पंहुचा हूँ की इस दुनिया में कुछ भी सम्भव है, यहाँ पर हर चीज बिकाऊ है, बशर्ते की हम उसके सही दाम लगा पायें .... हो सकता है की अभी मैं तुम्हारी सही कीमत ना लगा पाया होऊं ...
भाग 61
फ
वही पिता तुल्य व्योम जिस्म का सौदा कर रहा था... व्योम का कहना था--तुम बहुत सुंदर हो...स्वर्ग से उतरी हुई अप्सरा नज़र आती हो... तुम अगर जीवन भर कमाती रहो, तो भी इतना जमा नहीं कर पाओगी, उतनी रकम मैं तुम पर एक पल में न्यौछावर कर दूंगा... सिर्फ़ एक बार , इधर देखो, मैं सिर्फ़ एक बार की बात कर रहा हूँ, बस एक बार अपना यह सोने सा तन मेरे हवाले करदो... मैं तुम्हें दौलत से मालामाल कर दूंगा... फ़िर तुमको कभी भी नौकरानी का काम करने की जरुरत नहीं पड़ेगी...सुरभि-यह आप क्या कह रहे हैं ?मैं आपका बहुत सम्मान करती हूँ... आपकी पत्नी है, बच्चे हैं... आपको ऐसी बातें शोभा नहीं देती...-तुम फ़िक्र मत करो, मैं इस राज को हमेशा राज रखूँगा ... पत्नी की बात छोडो , पत्नी तो अब ढीली हो चुकी है... तुम्हारी बात और है... तुम्हारी अभी खेलने - खाने की उम्र है... बच्चे पैदा कर कर के वह तो एकदम बेकार हो गयी है... अब वह मज़ा नहीं दे पाती...तुम्हारा पति दिन रात गाडियां धोता रहता है, तुम भी लगी रहती हो, ऐसा कब तक चलेगा?क्यों इस जीवन और जवानी का क्यों नाश कर रही हो ?सुरभि-अपनी- अपनी पसंद होती है व्योम साहेब , कोई अपनी दौलत की दुनिया की दुनिया में मगन है तो कोई इज्जत की दुनिया में ... हम गरीब है, कमजोर हैं, लेकिन इज्जतदार हैं... मैं अपने राजू के साथ गद्दारी नहीं कर सकती... मैंने जीवन bhar usiki बने रहने का व्रत लिया है....व्योम-तुम क्या हमेशा उसके पीछे -पीछे पड़ी रहती हो ? वह क्या सिर्फ़ तुम्हें ही पसंद करता है... वह भी तो अपनी पसंद की किसी अन्य लड़की से प्यार -मोहब्बत करता ही होगा...
सुरभि- वह ऐसा नहीं है ... वह मेरे सिवाय किसी दूसरी लड़की की तरफ़ आँख उठाकर भी नहीं देख सकता... हम दोनों एक दूसरे पर इतना भरोसा करते हैं की उतना कोई किसी पर भी नहीं कर सकता... मेरे ख़याल से आप जैसे लोग तो उस बारे में सोच भी नहीं सकते, विश्वाश तो तब करेंगे... प्यार में एक दूसरे पर भरोसा करना पड़ता है...
व्योम- अगर में यह सिद्ध करदूं की वह तुम्हारे अलावा दूसरी अन्य महिला के सैट भी शारीरक सम्बन्ध बनाता है तब तो तुम मान जोगी?
सुरभि- अव्वल तो कभी ऐसा होगा नहीं, और अगर कभी ऐसा हुआ भी तो मुझे इसकी ज़रा भी परवाह नहीं है...प्यार का दूसरा नाम त्याग भी तो होता है... अगर राजू कभी अपनी खुशी के लिए किसी के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाता भी है तो बनाए , मुझे कोई आपत्ति नहीं...
व्योम- हो सकता है की तुम्हारे-मेरे सम्बन्ध पर राजू को भी हो कोई एतराज़ ना हो?
सुरभि- होने को तो कुछ भी हो सकता हे ... शायद यह भी की मैं अभी और इसी वक़्त पुलिस ठाणे जाकर तुम्हारी शिकायत करदूं... शायद तुम्हें कुछ साल की जेल भी हो जाए...
व्योम- इस दुनिया में सोने चांदी की नदियाँ बहती हैं जो समझदार होते हैं, वे सोना चांदी लूट लेते हैं और जो मूर्ख होते ही, उनके हाथ पत्थरों के सिवाय कुछ नहीं मिलता...
सुरभि- कुछ लोग ऐसे नादाँ भी होते हैं जो चमकीले टुकडों को ही हीरे मोटी मान लेते हैं... जो होशियार होते हैं , वो अपने मान -सम्मान और आबरू को ही सच्चा हीरा मानते हैं...
Monday, July 28, 2008
भाग -६०
राजू-अच्छा , ठीक है... अगर तुम इसी जिद पर अडीहो तो मैं अभी और इसी वक़्त तुम्हें अपने साथ ले जाने के लिए तैयार हूँ... इससे पहले मेरी कुछ बात सुन सकती हो ?
सुरभि- यह छोड़कर कुछ भी कहो , मुझे मंज़ूर है... सिर्फ़ यही नहीं मानूंगी...
राजू- जब यह ख़बर उडेगी की तुम मेरे साथ भाग गयी हो तो तुम्हें जन्म देने वाले माँ -बाप पर क्या गुजरेगी? वे बेचारे तो जी ते जी मर जायेंगे... समाज उन्हें चैन से रहने देगा क्या ?जो समाज के ठेकेदार हमारे मिलने पर भी इतनी हाय तौबा मची जा रही है तो भाग जाने पर क्या होगा ?भागना समाधान नहीं है... हमको इन सभी परिस्थितियों का डटकर मुकाबला करना चाहिए ... यदि हमारा प्यार सच्चा है तो जीत भी हामीको मिलेगी... सिर्फ़ थोड़े से सब्र की जरुरत है... मुझे बहाने बनाने की कोई जरुरत नहीं है... अगर मेरे मन में पाप होता तो हम इतनी दूर तक साथ-साथ नहीं चलते...
सुरभि- तुम बात को समझने की कोशिश नहीं कर रहे... अब पानी सर से ऊपर तक जा चुका है... मैं कुछ अलग ही फील कर रही हूँ... मुझे उल्टियाँ आ रहीं हैं... शायद मैं ... शायद ... कुछ गड़बड़ हो चुकी है...
राजू- ये क्या कह रही हो ?
सुरभि- शायद ... मैं माँ बनने वाली हूँ ... यह भेद बहुत जल्दी खुल जाएगा... सब कुछ तबाह हो जाएगा...
राजू- मैं कुछ पैसों का इंतजाम करलूं ,फ़िर कहीं चल देते हैं... जैसे इश्वर रखेगा, वैसे रहेंगे॥
सुरभि-मेरे पास सब इंतजाम है... मैं घर को अलविदा कहकर आ चुकी हूँ...
मालती-कमाल है ... इतनी जिद्दी थी सुरभि ?राजू ने उसकी बात मान ली थी क्या ?
आशा- मुझे उसने जो बताया , मैं तुमको वही बता रही हूँ... उसने कहा की सुरभि की बात मानकर राजू उसे लेकर गों से भाग गया... गों के लोगों को भनक लगती, उससे पहले ही वे दोनों कोल्कता पहुच चुके थे... वहां पर राजू ने एक गैरेज में गाड़ी धोने का कम कर लिया और सुरभि एक सेठ के यहाँ झाडू -पोंछा करने लगी...उन दोनों की प्रेम कहानी जैसे-तैसे आगे बढ़ ही रही थी की उन पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा...
मालती- दुःख भरा मोड़?
आशा- हाँ यार, तुम सिगरेट सुलगाओ ... सुरभि का संदेह सही निकला था... वह सचमुच गर्भवती थी...
मालती- किसी और से या ?
आशा-किसी और से क्यों होती? उसके पेट में राजू का गर्भ ही पल रहा था... उन दोनों के बीच शारीरिक सम्बन्ध बन चुके थे... सुरभि बेहद सुंदर थी... कहा जाता है की गरीब की पत्नी को सब भाभी कहना चाहते हैं... सुरभि के यौवन पर भी कई लोगों की कुद्रष्टि लगी हुई थी... उन सबमें सुरभि के यौवन रस को लूटने की जो सबसे ज्यादा इच्छा रखता था, वह था सुरभि का सेठ... जहाँ पर वह बतौर नौकरानी काम करती थी... व्योम दा नामक अधेड़ सेठ सुरभि की अदाओं का जबरदस्त दीवाना था... जब सुरभि झाडू लगाती तो वह उसके शरीर को छिप-छिपकर देखता रहता था... जब वह नीचे झुकती तो उसकी गोलियां सीने से मुक्त होने का प्रयास करती प्रतीत होती थीं... व्योम ने एक दिन अकेले में सुरभि का जिस्म हासिल करने की अपनी आरजू प्रकट की... भोली सुरभि को यह सुनकर बड़ी हैरानी हुई... जिस को वह अपने पिता जैसा samajhtee थी
Sunday, July 27, 2008
भाग-59
- आह... मुझे इतना आनंद नहीं चाहिए...धीरे -धीरे करो,
राजू- तुम भी आहिस्ता-आहिस्ता बोलो, अगर किसी ने सुन लिया तो लेने के देने पड़ जायेंगे... तुम्हें तो कोई कुछ नहीं कहेगा , मेरी जान जरुर आफत में आ जायेगी... हांलाकि, इसकी चार दिवारी तो बहुत ऊंची -ऊंची हैं ,फ़िर भी
क्या भरोसा, कोई तक -झाँक कर सकता है... वैसे भी इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते...
- प्यार का दावा भी करते हो और भेद खुलने के नाम से भी डरते हो... यह कैसा प्यार है...
राजू- बहुत bholi हो तुम... प्यार और में अन्तर होता है... बिना कारण मुश्किल में फंसने का कोई अर्थ नहीं होता...छलनी में धार कधे, कर्म को सँवारे...
- तुम तो मुहावरे भी खूब जानते हो... सुरभि की दास्ताँ पूरी नहीं सुनाओगे?
राजू-क्यों नहीं? तुम्हारे कहने पर तो मैं जान भी दे सकता हूँ...सुरभि से जब मेरी मोहब्बत परवान चढी तो हम दोनों नियमित रूप से मिलने लगे... यह मिलन समाज के ठेकेदारों को इतना नागवार गुजरा की हमारे मिलने-जुलने पर पाबंदियां लगादी ... सुरभि तो बिल्कुल टूट चुकी थी... मैंने उसको समझाया -बुझाया ... उसकी हिम्मत बधाई...मैं भी नहीं चाहता था की मेरी जान से प्यारी सुरभि परेशान हो , इसलिए मैंने एक दिन उसे अकेले में बुलाया...वह बहुत नर्वस थी,रह-रहकर रो रही थी... कहने लगी--
-अब मैं तुम्हारे बिना एक पल भी नहीं जी सकती... मुझे मरना मंज़ूर है, लेकिन यूँ घुट-घुटकर नहीं जी सकती...
राजू- तुम धीरज रखो, सब ठीक हो जाएगा...
सुरभि- ठीक तो हो जाएगा, मगर कब ?जब मैं इस जहाँ में नहीं रहूंगी तब क्या ?अब मुझसे धैर्य की अपेक्षा मत करो... अगर कल तक इंतजाम नहीं किया तो मेरी मरी का मुह देखोगे...
राजू- लेकिन मैं क्या कर सकता हूँ?
सुरभि-मुझे लेकर कहीं भाग चलो... हम दोनों भूखे रहकर जीने के लिए तैयार हैं... साथ-साथ मरना भी मंज़ूर है, मगर एक दूसरे से जुदा होकर रहना हरगिज़ नहीं...
राजू- मुझे थोड़ा सा वक़्त चाहिए...
सुरभि-पहले ही बहुत देर हो चुकी है, अब अगर एक पल की भी देरी की गयी तो हम दोनों को जीवन
Saturday, July 26, 2008
भाग - ५८ , उसने ज़ज्बात का कत्ल कर दिया
- मैं तुमसे हर बात सच कह रहा हूँ आशा ... कभी तुम्हें यह ना लगे की मैंने तुमसे कुछ छिपा लिया... मैं सुरभि के आकर्षण में ऐसे बंध गया थकी मुझे अपनी भी सुध-बुध नहीं रही... तब मैंने जाना की प्यार कोई किसी से करने की चीज नहीं है... यह तो हमारी अंतरात्मा में बसा हुआ होता है... सच्चा प्रेम हमेशा हमको अच्छी राह दिखाता है...अगर हम चाहें की किसी से मोहबात करलें तो ऐसा क्षणिक ही हो सकता है... जन्म जन्मान्तर का प्यार तो हमारे रग -रग में समाया हुआ होता है... अगर दिल से नफरत निकाल दी जाए तो फ़िर प्यार ही शेष रह जायेगा ... जब नफरत के लिए जगह ही नहीं बचेगी तो वह नफरत परोसेगा कैसे... यही प्यार का सार है... इसलिए कोशिश होनी चाहिए की दिलो-दिमाग में कहीं नफरत बचे ही नहीं...
मालती- वाह, वाह ... ऐसा कहा उसने...वाकई यह तो कमाल हो गया... शब्दों का भी जादूगर था वह...
-हाँ, वह था ... सब कुछ था राजू... मैं यंत्रवत उसकी बातें सुनती जा रही थी... उससे प्रभावित न होने का सवाल ही नहीं उठता था...उसकी जुबां से शहद टपक रहा था... मुझे अचानक ये एहसास हुआ की मैं राजू की गुलाम बनती जा रही थी... उसने mujh पर जबरदस्त प्रभाव छोड़ा था... जैसे कोई संत बोलता रहता है और भक्त सुनते रहते हैं... थोडी देर पहले जो राज काम वासना में जकडा हुआ था वह अब सुरभि की बात कहते-कहते बिल्कुल आध्यात्मिक हो चुका था...
मालती- तुमने इतना बर्दास्त कैसे कर लिया... गर्म कर देती...
- हारकर यही करना पडा...मैंने राजू के ऐसे अंगों को सहलाना शुरू कर दिया, जिनसे वह उत्तेजक हो सकता था... इसका तत्काल असर भी हुआ ... वह थोड़ा सा विचलित होने लगा... मुझे मज़ा आया ... मने आगे कहा-
- तुमने सुरभि के साथ असली सुख नहीं उठाया....
राजू- तुम किस सुख की बात कर रही हो ?
- उसी सुख की जो तुम मुझसे वसूल करना चाह रहे हो ...
राजू- यह देह सुख असली सुख नहीं है... सच्चा सुख तो यहाँ , देखो यहाँ सीने में बसा होता है...
-मेरा शरीर अकड़ रहा है... मुझे तुमने प्रेम रोग लगा दिया है... अब क्या करूँ,
मालती- तुम्हारी हालत पर राजू को तरस नहीं आया? हाँ आया ...उसने मेरे उभारों को जोर-जोर से सहलाना शुरू कर दिया...वह काफी देर तक उनका मर्दन करता रहा... मैं सुख में सराबोर होती रही... मेरी खुशी की कोई सीमा नहीं थी... जीवन में इतना आनंद कभी नहीं मिला था... उस दिन मुझे पता चला की दुनिया में कितने रंग बिखरे हुए है... सारा जहाँ रंगीन नज़र आ रहा था... मैं उसके होठो से अपने नर्म -नाज़ुक होठों को रगड़ने लगी.... इस घर्षण से मेरे बदन में ज्वाला सी दाहक उठी... मन में फुल्झादियाँ सी छूटने लगीं...राजू भी कामोत्तेजित हो चुका था ... उसकी गर्म साँसें मुझे और भी ज्यादा उत्तेजित कर रही थीं...सीने के बाद उसने मेरी जाँघों को निशाना बनाना शुरू कर दिया... मेरी चिकनी जांघें जब दर्द से दुखने लगीं तो मैंने शिकायती लहजे में कहा-
-इन पर ज्यादा जोर न डालो...इस तरह तो मेरा चलना -फिरना भी दूभर हो जाएगा...
राजू- प्यार की यह सुखद अनुभूति तुम्हें बहुत याद आएगी आशा... मुझे अब ना रोको....
Friday, July 25, 2008
भाग 57
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Thursday, July 24, 2008
चनेवाली चाची - भाग-५६
मालती- आह , ये जितने अच्छे शब्द है, इन्हें बोलने वाला भी उतना ही अच्छा होगा...
- हाँ, कानों में शहद सा घुल जाता है... सुनने वाला मंत्र-मुग्ध हो जाता है... मेरा भी यही हाल हुआ था... राजू ने मेरे शरीर से सारे वस्त्र उतार दिए थे... वह आलती-पालती मारकर बैठा था... मैं उसकी जाँघों पर लेती हुई थी...
मालती- तुम्हें बीच में ही टोककर एक बात कहना चाहती हूँ... हम दोनों काफी देर से पी रही हैं... मेरे ख़याल से इतना पीना ठीक नहीं होता... अब हमें इसे बंद कर देना चाहिए ...
- ओह, तुम भी कमाल की बात करती हो... ऐसा भला होता है क्या?अच्छा ये बताओ , दारू पीना किसके ख्याल से उचित होता है ? ये नुक्सान तो करती ही है... मगर क्या करें , इस कमबख्त के बिना काम भी तो नहीं चलता... पीने से इनकार करोगी तो कच्ची साकी कहलाओगी, ऐसा गज़ब न करना... पैग तैयार कर लीजिये ... ख़ुद भी पीओ और हमें भी पिलाओ...ख़ुद भी जियो और हमें भी जीने दो...
मालती- ठीक है तुम अपनी कथा जारी रखो, मैं दौरे जाम तैयार रखती हूँ...
-राजू थोड़ा सा दहशत में था, मैंने उसको समझाया... थोडी देर के बाद वह जब नोर्मल हुआ तो पूरे मूड में था... उसने मेरे ख़ास अंग से छेड़छाड़ करते हुए कहा-
-जब से तुम मिली हो, तभी से मैं जादुई सुख का एहसास कर रहा हूँ...
- मेरे दिल का हाल सुनोगे तो पता चलेगा... तुमने मेरी जिंदगी में उथल-पुथल मचा दी है... मैं अब पहले जैसी आशा नहीं रह गयी हूँ ...
राजू- पहले कैसी थीं तुम ?
-ओह , मत पूछो ... बिल्कुल छुई-मुई जैसी ... कोई मेरी तरफ़ नज़र भरके देख भी नहीं सकता था ...
राजू- तुम इतनी हसीं ही की तुम्हें देखे बिना कोई रह ही नहीं सकता... ये अलग बात है की वह तुम्हें इसकी ख़बर भी ना होने दे... सचमुच तुम हुस्न्परी हो...
- इतनी तारीफ कैसे कर लेते हो तुम ?ऐसे -ऐसे शब्द ढूंढकर न जाने कहाँ से लाते हो ?
राजू- अगर मैं शायर होता तो तुम्हारी खूबसूरती पर अब तक न जाने शेर लिख दिया होता... एक बार ट्रक के पीछे एक शेर लिखा हुआ देखा था-
-चंदा चकोर चांदनी ,बदल में लच्छे-लच्छे ,गोरी तेरे हुस्न पर मरते हैं अच्छे-अच्छेपसंद आया...
- बहुत बढ़िया है... और भला क्या चाहिए ?तुम सबसे अलग हो... एक बात का जवाब दोगे?
राजू - बिल्कुल... हर बात का सच्चाई के साथ जवाब दूंगा...
- जो बातें तुम मुझसे कह रहे हो, क्या इससे पहले किसी और लड़की से भी कही थीं?
राजू- अच्छा, ये बात है... मैं तुम्हारे सवाल का आशय समझ गया हूँ ... तुम मेरी गर्ल फ्रेंड के बारे में जानना चाहती हो... मैं सच बोलने का वादा किया है... तुम्हें हर बात का ज़वाब मिलेगा... मेरी एक मित्र है... उससे सिर्फ़ एक बार मिला... पहली मुलाक़ात में ही हम दोनों एक दूसरे के आकर्षण में बाँध गए...
Wednesday, July 23, 2008
चनेवाली चाची . भाग-55
मालती-काश, उस समय पर मैं भी वहीं पर मौजूद रहती... तब तो हम दोनों मस्ती के समुन्दर में डूब गए होते...
- हाँ, काश ऐसा हो सकता...
मालती-क्या उस दिन तुमने राजू के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाए , की नहीं ?
-आह, मत पूछो ... वे ऐसे क्षण थे जब मैं सारी दुनिया से बेखबर होकर राजू के आगोश में समाई हुई थी... मुझे लगा, वह भी कामवासना की नदी में डूब चुका था... जब वह मेरे होठों पर अपनी जीभ फिराता तो मेरा जिस्म हवाओं में उड़ने लगा था... मैं उसके सीने से प्यार करने लगी... उसका बदन इतना मोटा नहीं था, लेकिन सीना जवान मर्दों की तरह ही चौडा था... अब मेरे मन में इस तरह के भाव थे की वह पहले की तरह ही हरकत करे तो आनंद आएगा... मगर शायद वह बुरी तरह से डर गया था... मैंने उसका डर निकलने की गरज से कहा-
-अदा क्या बात है, तुम तो अचानक ठंडे पड़ गए... कुछ देर पहले तो बड़ा जोश दिखा रहे थे।?
राजू- ओह, तुम्हारी बातों का भी ज़वाब नहीं है... पहले इतनी नाराज़ हो गयी थीं की अभी तक उसको पचा नहीं पाया हूँ... देखो ना, मेरे हाथ भी काँप रहे हैं...
- वो तो मैं अच्छी तरह से देख ही रही हूँ...सिर्फ़ हाथ ही नहीं , और भी कुछ काँप रहा है...
राजू- बहुत शरारत करते हो तुम ?
- सीखा किस्से है ? गुरु भी तो आख़िर तुम ही हो ... तुमसे सीखी हुई विद्द्या तुम्हीं पर इस्तेमाल करुँगी...
राजू- स्वागत है... तुम्हारी हौसला अफजाई से अब मेरा कांपना भी ख़त्म हो गया है...
राजू अब बेखौफ हो चुका था... उसने मेरे सभी ऊपरी वस्त्रों को उतर फेंका था... मेरे उभारों की तारीफ में उसने ज़मीन- आसमान एक कर दिए... वह बच्चे की तरह उन पर हाथ फिराकर देखता तो कभी उन्हें चूमने लगता था... शुरुआत में तो मुझे थोड़ा सा गुदगुदी जैसा एहसास हुआ लेकिन बाद में वासना का जो तूफ़ान उठा,म उसने मुझे विचलित कर दिया... मेरा तन-मन बेकाबू होने लगा... मेरी गर्म सांसों ने राजू को भी बेचैन कर दिया... वह मेरी जाँघों को सहला रहा था... मैंने तुंरत उसे सहयोग करना शुरू कर कुछ देर के बाद ही मेरे मन से डर नाम की चिडिया फुर्र हो चुकी थी ... जब मैं गर्म हो गी तो मने पूछा-
-जो हम ये करने जा रहे हैं यह ग़लत तो नहीं है... ?
राजू- प्यार करना अगर ग़लत होता, तो बड़े-बड़े- साधू-संत , रजा-महाराजा और यहाँ तक की देवतागण मोहबत क्यों करते ... तम्हें पता भगवान् श्री कृष्ण की पत्नी का नाम क्या था ?
-सबको पता है, राधा...
राजू- यही तो ग़लत है... राधा तो उनकी प्रेमिका थी, पत्नी का नाम रुकमनी है... जबकि हर जगह पहले राधा का नाम आता है... प्यार में यही तो ताकत होती है...
- क्या हमारा प्यार भी उतना ही पवित्र है ?क्या मेरा नाम भी राधा की तरह अमर हो जाएगा ?
राजू- हाँ-हाँ , क्यों नहीं ... हम भी तो एक दूसरे से सच्चा प्रेम करते हैं ...