मुंशीजी- कहने का मतलब है कि सेक्स और सेक्सी शब्द बिलकुल कोमन हो गए हैं, बड़े शहरों में तो खुद लड़कियां पहल करके लड़कों से इस तरह कि डिमांड करती हैं, वे सोचती हैं कि कहीं फिर वह किसी और के चक्कर में न पद जाए, इसलिए अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए सेक्सी अदाओं का सहारा लेती हैं, सेक्सी बातों का सहारा लेती हैं, यहाँ तक कि उन्हें पटाकर ही दम लेती हैं, मैंने इस बात को बहुत अच्छी तरह से महसूस किया है, यहाँ तो भोगा भी है। एक दो तो रोजाना मेरी दूकान पर ऐसी आती हैं जो मुझे लुभाना चाहती हैं, सिर्फ उधार सामान लेने की खातिर वे कई तरह के ख़ास इशारे करती हैं, समर्पण का इशारा करती हैं, तो कुछ ऐसी हैं जो फ्री का माल लेने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं, उनके लिए सेक्स कोई मायने नहीं रखता, जिस्मानी समर्पण को वे ठीक ऐसा ही समझती हैं जैसे कि समौसा खा लिया या पानी पकुदे खाकर हाथ साफ़ कर लिए । इससे ज्यादा कुछ नहीं। उनका काम महत्वपूर्ण है, उनके लिए बाकी चीजें गौण हैं। पहले सेक्स शब्द को बड़ा अटपटा समझा जाता था लेकिन आज यह हमारी बोलचाल में भी समा गया है , और व्यवहार में भी।
छमिया- तो क्या इससे तकलीफ नहीं होती ? सेक्स अगर इतना ही सही होता तो समाज इसे गलत क्यों मानता ?
मुंशीजी- यही तो समझने -समझने का फर्क है, समाज इसे बुरा कहाँ मानता है ? अगर मानता तो बाकायदा शादी क्यों कराई जातीं।
छमिया- वही कह रही हूँ, शादी के अलावा तो इसे मानी नहीं किया जता।
मुंशीजी- लोगों न हर बात कि परिभाषा अपने तरीके गढ़ ली है। व्याख्या भी अपने फायदे के लिए अपने तरीके से करते हैं। जैसे कि जबलोग खुद सेक्स करना चाहते हैं तो इसे अच्छा बताते हैं और कोई दूसरा करे तो गलत। मैं तो इसे अनिवार्य मानता हूँ। प्रकृति कि डिमांड है। अगर इंसान है तो उसके मन में इस तरह कि फीलिंग होंगी ही क्योंकि ऐसी फीलिंग्स तो जानवरों के मन में भी होती हैं , वे भी सेक्स करते ही हैं, तमाम बाधाओं को पार करते हुए वे ऐसा करने की कोशिश करते हैं और आखिर में वे इसमें सफल भी होते हैं।
छमिया- लेकिन जानवर और इंसान में फर्क होता है।
मुंशीजी- बेशक होता है, तभी तो जानवर उतना आनंद नहीं ले पाते जितना कि हम लोग । हम लोग मोहब्बत के कई तरीके जानते हैं, समागम कि ख़ास स्टायल है अपने पास । हम लोग प्रेम की इस क्रीडा में इतने मगन हो जाते हैं कि अपने सभी दुखों से निजात पा लेते हैं। यह काम जानवर नहीं कर सकते, इसलिए हम अलग हैं।
छमिया- संत मुनि कम सेक्स करने पर जोर क्यों देते हैं
मुंशीजी- अपनी जगह वे भी ठीक कहते हैं, इस बात को तुम ऐसे सम्खो कि कोई अगर बन्दूक की गोलियां बेच रहा है तो तुम उसे गलत नहीं ठहरा सकती। क्योंकि यह उसका व्यवसाय है, भले ही गोलियों से नुक्सान होता है , फूल तो बरसते नहीं न। फिर भी वह अपनी जगह सही है, ऐसे ही तुम जहर बेचने वालों को गलत नहीं कह सकतीं, वह भी चूहा मारने या किसी और काम आता है। इसी प्रकार संत महात्मा भी अपनी जगह ठीक हैं, वे अध्यात्म को बढ़ावा देते हैं और तुम्हारे -मेरे जैसे लोग इस जीवन को पूरी तरह इंजॉय करने पर जोर देते हैं।
फिर भी मैं सुरक्षित सेक्स पर जोर दूंगा , जैसे कि मैंने अब तक किया है।
छमिया- तुमने बहुत सी महिलाओं के साथ सम्बन्ध बनाए हैं , क्या सबूत है कि अब तक तुम निरोगी हो ? हो सकता है कि तुम्हें भी एड्स न अपनी चपेट में ले लिया हो और तुम भी अब खतरनाक बन चुके हो ?
मुंशीजी- इसकी फ़िक्र मत करो इसका सबूत है मेरे पास , आओ तो सही, मेरी बांहों में समाओ तो सही।