Sunday, January 31, 2010

भाग-19

छमिया-इतनी लम्बी चौड़ी महाभारत का मतलब मैं समझ नहीं पा रही हूँ।
मुंशीजी- कहने का मतलब है कि सेक्स और सेक्सी शब्द बिलकुल कोमन हो गए हैं, बड़े शहरों में तो खुद लड़कियां पहल करके लड़कों से इस तरह कि डिमांड करती हैं, वे सोचती हैं कि कहीं फिर वह किसी और के चक्कर में न पद जाए, इसलिए अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए सेक्सी अदाओं का सहारा लेती हैं, सेक्सी बातों का सहारा लेती हैं, यहाँ तक कि उन्हें पटाकर ही दम लेती हैं, मैंने इस बात को बहुत अच्छी तरह से महसूस किया है, यहाँ तो भोगा भी है। एक दो तो रोजाना मेरी दूकान पर ऐसी आती हैं जो मुझे लुभाना चाहती हैं, सिर्फ उधार सामान लेने की खातिर वे कई तरह के ख़ास इशारे करती हैं, समर्पण का इशारा करती हैं, तो कुछ ऐसी हैं जो फ्री का माल लेने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं, उनके लिए सेक्स कोई मायने नहीं रखता, जिस्मानी समर्पण को वे ठीक ऐसा ही समझती हैं जैसे कि समौसा खा लिया या पानी पकुदे खाकर हाथ साफ़ कर लिए । इससे ज्यादा कुछ नहीं। उनका काम महत्वपूर्ण है, उनके लिए बाकी चीजें गौण हैं। पहले सेक्स शब्द को बड़ा अटपटा समझा जाता था लेकिन आज यह हमारी बोलचाल में भी समा गया है , और व्यवहार में भी।
छमिया- तो क्या इससे तकलीफ नहीं होती ? सेक्स अगर इतना ही सही होता तो समाज इसे गलत क्यों मानता ?
मुंशीजी- यही तो समझने -समझने का फर्क है, समाज इसे बुरा कहाँ मानता है ? अगर मानता तो बाकायदा शादी क्यों कराई जातीं।
छमिया- वही कह रही हूँ, शादी के अलावा तो इसे मानी नहीं किया जता।
मुंशीजी- लोगों न हर बात कि परिभाषा अपने तरीके गढ़ ली है। व्याख्या भी अपने फायदे के लिए अपने तरीके से करते हैं। जैसे कि जबलोग खुद सेक्स करना चाहते हैं तो इसे अच्छा बताते हैं और कोई दूसरा करे तो गलत। मैं तो इसे अनिवार्य मानता हूँ। प्रकृति कि डिमांड है। अगर इंसान है तो उसके मन में इस तरह कि फीलिंग होंगी ही क्योंकि ऐसी फीलिंग्स तो जानवरों के मन में भी होती हैं , वे भी सेक्स करते ही हैं, तमाम बाधाओं को पार करते हुए वे ऐसा करने की कोशिश करते हैं और आखिर में वे इसमें सफल भी होते हैं।
छमिया- लेकिन जानवर और इंसान में फर्क होता है।
मुंशीजी- बेशक होता है, तभी तो जानवर उतना आनंद नहीं ले पाते जितना कि हम लोग । हम लोग मोहब्बत के कई तरीके जानते हैं, समागम कि ख़ास स्टायल है अपने पास । हम लोग प्रेम की इस क्रीडा में इतने मगन हो जाते हैं कि अपने सभी दुखों से निजात पा लेते हैं। यह काम जानवर नहीं कर सकते, इसलिए हम अलग हैं।
छमिया- संत मुनि कम सेक्स करने पर जोर क्यों देते हैं
मुंशीजी- अपनी जगह वे भी ठीक कहते हैं, इस बात को तुम ऐसे सम्खो कि कोई अगर बन्दूक की गोलियां बेच रहा है तो तुम उसे गलत नहीं ठहरा सकती। क्योंकि यह उसका व्यवसाय है, भले ही गोलियों से नुक्सान होता है , फूल तो बरसते नहीं न। फिर भी वह अपनी जगह सही है, ऐसे ही तुम जहर बेचने वालों को गलत नहीं कह सकतीं, वह भी चूहा मारने या किसी और काम आता है। इसी प्रकार संत महात्मा भी अपनी जगह ठीक हैं, वे अध्यात्म को बढ़ावा देते हैं और तुम्हारे -मेरे जैसे लोग इस जीवन को पूरी तरह इंजॉय करने पर जोर देते हैं।

फिर भी मैं सुरक्षित सेक्स पर जोर दूंगा , जैसे कि मैंने अब तक किया है।

छमिया- तुमने बहुत सी महिलाओं के साथ सम्बन्ध बनाए हैं , क्या सबूत है कि अब तक तुम निरोगी हो ? हो सकता है कि तुम्हें भी एड्स न अपनी चपेट में ले लिया हो और तुम भी अब खतरनाक बन चुके हो ?

मुंशीजी- इसकी फ़िक्र मत करो इसका सबूत है मेरे पास , आओ तो सही, मेरी बांहों में समाओ तो सही।

Saturday, January 30, 2010

भाग-18

क्या एड्स के अलावा और भी कुछ अन्या गंभीर बीमारियाँ हैं जो हमारे जीवन को नरक बना सकती हैं ? या फिर ये सिर्फ डराने के वजह से फैलाई गयीए बातें हैं ? क्या हम बिना सेक्स पूरा जीवन बिता सकते हैं ? ये कुछ ऐसे सवाल हैं मुझे जिनके जवाब चाहिए ।
मुंशीजी- सवाल एक साथ किये गए हैं मगर इनका जवाब एक साथ संभव नहीं है। देने को तो दे दूं मगर तुम उस्ससे संतुष्ट नहीं हो सकतीं, और अगर ऐसा नहीं होगा तो फिर फायदा क्या ,जहां तक कंडोम कि बात है तो यह शारीरिक सम्बन्ध बनाने के लिए बहुत ठीक उपाय है, इससे गर्भ ठहरे कि संभावना बहुत कम हो जाती है, अगर वह लगाते समय फट जाता है या हम उसको ठीक तरह से नहीं लगाते तो यह दूसरा मामला है। अब यह कहना कि यह शत प्रतिशत कारगर उपाय है, ठीक नहीं है। कई बार ऐसा देखा गया है कि कंडोम लगाने के बाद भी सामने वाले को बीमारियाँ हूई हैं या सम्बंधित महिला गर्भवती हूई है। मैं यह बात पूर्व में घटी घटनाओं और समाचारों अथवा जन सूत्रों पर अआधारित बता रहा हूँ।
छमिया- और वो सवाल कि एड्स का हौव्वा कहीं कंडोम कंपनियों का खडा किया हुआ तो नहीं ताकि उनके प्रोडक्ट्स ज्यादा बिक सकें ।
मुंशीजी- यह शंका सच भी हो सकती है और गलत भी क्योंकि आज तक सरकार न कंडोम के लिए परमिट प्रणाली तो शुरू नहीं की, यानी कि किसी एक कंपनी का तो इस पर एकाधिकार है नहीं। बहुत सारी कम्पनियां कंडोम बेच रही हैं। लोग अवही खरीदते हैं जो उनकी कसौटी पर खरा उतरता है। यहाँ तक कि सरकार की तरफ से तो ये मुफ्त में दिए जाते हैं, फिर भी लोग गुणवत्ता के आधार पर बाहर का माल खरीदते ही हैं। अब तुम खुद सोचो कि सच्चाई क्या हो सकती है ?
छमिया- तो इसका इस्तेमाल ज्यादा क्यों नहीं करते लोग ?
मुंशीजी- जहां तक मेरी बात है, मुझे मजा नहीं आता, मैं ऐसे ही प्यार करने में खुश होता हूँ , कुछ मुझे झंझट लगता है। हाँ, अगर मैं किसी बाहरी महिला के साथ सम्बन्ध बनाता हूँ तो सुरक्षा का इंतजाम जरूर करता हूँ।
छमिया- तुम्हारी अपनी तो कोई है ही नहीं .
मुंशीजी - नई सदी की शुरुआत में सब कुछ बदल गया है। प्रेम की भाषा और परिभाषाएँ भी बदल गई हैं। शब्दों के रूप बदल गए हैं। इस बदलाव में भाषा को बेलगाम जबान मिली है। भाषा और जबान पर आ टिका है कामुकता का भाव जिसे अभिव्यक्त करता है एकमात्र 'सेक्सी' शब्द।आधुनिक भाषा शास्त्र में सेक्सी शब्द ऐसा रूप ले चुका है, जो किसी की तारीफ में भी यह कहा जा सकता हैं कि ''आप कितनी सेक्सी लग रही हैं''। सेक्सी शब्द आज के दौर की युवा पीढ़ी की शब्दावली का अभिन्न हिस्सा बन गया है, जो उनकी मनोभावनाओं को बेहद आसानी से व्यक्त करने में सहायक होता है। सेक्सी शब्द 'ढाई अक्षर प्रेम के' का नए ढाई अक्षरीय रूप में पुनर्जन्म है, जो हमेशा कामुकता की ओर इशारा नहीं करता बल्कि माहौल व उस में समाई चीजों को एक खास रूप से पेश करता है।आज पूरा का पूरा माहौल सेक्सी सुविधाओं व कृतियों से भरा हुआ है। कंप्यूटर सेक्सी है, टीवी पर न्यूजरीडर सेक्सी है, म्यूजिक सिस्टम सेक्सी है, बाथरूम सेक्सी है तो फ्रिज का लुक सेक्सी है। पोशाकें तो सेक्सी हैं ही। अब तो जूते, चप्पलें तक भी सेक्सी हो चले हैं।मुद्दे की बात यह है कि सेक्सी शब्द ऐसा साफसुथरा किंतु शरारतपूर्ण शब्द बन चुका है, जो मन के किसी कोने में पैदा हुई यौन इच्छा से जुड़ी गुदगुदी को जगा देता है। देखने में सुंदर, साफसुथरे ऑफिस को 'सेक्सी ऑफिस' कह दिया जाता है। मेज के कोने पर रखा नए मॉडल का आकर्षक कंप्यूटर या लैपटॉप, कुर्सियों की नरम गुदगुदा देने वाली गद्दियाँ आदि सब कुछ सेक्सी होने में शुमार हो जाते हैं।सड़कों पर मचती धूमकरीब 10-12 साल पहले देश की सड़कें सूनी नजर आती थीं। उन पर फिएट और एंबेसडर कारें और बहुत हुआ तो मारुति कारें दिखती थीं पर अब सड़कों पर 'सेक्सी कारों' की भरमार है। किसी का अगला हिस्सा सेक्सी है तो किसी का पिछला हिस्सा सेक्सी है। कामुकता पैसे की बैसाखियों पर सवार होकर ज्यादा इठलाती है। रईसों के लिए सफलता भी सेक्सी है और पैसा भी सेक्सी है। आज के परिवेश में पैसा और सफलता भी कामुकता पैदा करती है।हाऊ सेक्सी'प्यार' बाजार में मिलने लगा डब्बों में पैक हो कर रेडीमेड। प्रेम की भावना खुलेआम देशीविदेशी कार्ड कंपनियों द्वारा कभी कार्ड की शक्ल में, कभी गुब्बारों की शक्ल में। कभी छोटेबड़े टैडिबीयरों की शक्ल में दुकानें पर बिकने के लिए रखी जाने लगी है। मुँह से बोलने के लिए जबान ने सिर्फ एक ही शब्द चुना 'हाऊ सेक्सी'।सौंदर्य अब फड़कता, दमकता रोकड़ा बन गया है जिसे कैश कार्ड की तरह भुनाया जा सकता है। सौंदर्य प्रतियोगिता में अब लोग अपनी बेटियों की नुमाइश शौक से करते हैं क्योंकि अगर इस से नोट कमाए जा सकते हैं तो क्या बुराई है। सौंदर्य को ताकत समझा जाने लगा है। हर छोटाबड़ा शहर अपनेअपने तंबू तान कर अपनी-अपनी नजरें सिंकाई का सामान इकट्ठा करता है और कहा जाता है 'काफी सेक्सी शो था।'जिम्मेदार कौनपरफ्यूम की खुशबू में डूबा, महकता शरीर सेक्सी लगता है। आफ्टर शेव लोशन की महक पुरुष को ज्यादा सेक्सी बना देती है। विज्ञापन कंपनियां आलू के चिप्स से ले कर कमर के दर्द के मलहम तक सेक्सी अंदाज में पेश करने में पीछे नहीं रहती। सब कुछ घूमफिर कर सेक्सी अंदाजों में डूब कर दर्शकों व ग्राहकों को अपनी ओर खींचता है।माहौल पर हावीसेक्स माहौल पर इतना हावी कब और कैसे हो गया, पता ही नहीं चला।

Friday, January 29, 2010

भाग -17

वो भी खुश और हम भी खुश, हम उनको उधार दे देते हैं, वक्त जरूरत उनको कुछ रुपये दे देते हैं और इसके बदले वे हमको अपना शरीर सौप देती हैं, यह सब गैर राजी नहीं होता, उनकी इच्छा से होता है, वे कहती हैं कि मेरे साथ उन्हें बहुत आनंद आता है, मेरे साथ शारीरिक सम्बन्ध रखने में कई महिलाओं को गर्व की अनुभूति होती है। ये मैं शेखी नहीं बघारता, चाहो तो किसी से भी पूछ सकती हो।
छमिया- आप क्यों झूठ बोलेंगे , मैं जानती हूँ, मुझे कुछ प्यार के टिप्स दो न ...
मुंशीजी- वैसे बात तो बिलकुल सही है कि प्यार का अफसाना निगाहें बयाँ करती हैं लेकिन यदि ये भाषा स्पष्ट न हो तो ....? अमूमन होता ये है कि कोई आपको बहुत-बहुत चाहता है और आप ही से इस बात को छुपाना भी चाहता है, फिर आप कैसे जानेंगे उसके मन की बात हम यहाँ आपके लिए कुछ टिप्स दे देते हैं, जो आपको ये जानने में मदद करेंगी कि आप जिन्हें चाहते हैं, वो आपके बारे में क्या सोचते हैं -हर व्यक्ति का अपना एक दायरा होता है, जिसमें वह किसी को आने नहीं देना चाहता लेकिन जब आप किसी की चाहत में डूबे हों तो इस तरह के दायरे अपने आप सिमटने लगते हैं। दिल चाहता है वो इस दायरे को तोड़कर आपके करीब, बिलकुल करीब आ जाएँ। और उनके मन की बात जानने के लिए आपको इसी दायरे का सहारा लेना है। उनके बिलकुल करीब जाकर उन्हें अनजाने में छूने की कोशिश कीजिए और उनकी प्रतिक्रिया पर गौर करें यदि वो आपको चाहते हैं तो उन्हें आपकी ये हरकत अच्छी लगेगी अन्यथा वे आपसे दूर होने की कोशिश करेंगे।उनके हावभाव, शारीरिक प्रतिक्रिया आदि पर ध्यान दें। यदि उनके मन में आपके लिए कुछ है तो वो आपको किसी न किसी बहाने छूने की कोशिश करेंगे, आपको देखते ही उनकी आँखों में चमक आ जाएगी, वो हमेशा आपका साथ पाने की कोशिश में लगे रहेंगे। ये ऐसी बातें हैं, जिन पर आप आसानी से उनके दिल की बात जान सकते हैं।उनकी चाहत के बारे में पता करने का एक और तरीका यह है कि आप किसी न किसी तरह से उनका हाथ अपने हाथों में लेने की कोशिश करें। जैसे यदि उन्हें आपसे कोई चीज चाहिए तो उसे इस तरह से पकड़ें कि वो आपका हाथ पकड़े बगैर उसे ले ही न पाएँ। उनकी प्रतिक्रिया पर गौर करें। यदि वो आपका हाथ पकड़ने से कतराते हैं तो फिर उन्हें पटाने की आपकी कोशिश बेकार है।किसी रैलिंग या टेबल या कहीं और अपना हाथ उनके हाथ के करीब रखें यदि वो आपको चाहते हैं तो जरूर आपका हाथ छूने की कोशिश करेंगे।उनके व्यवहार का अध्ययन करें। क्या आपके सामने आते ही उनके हाथ काँपने लगते हैं और उन्हें पसीना आने लगता है? क्या वो बात-बेबात आपकी तारीफों के पुल बाँधने लगते हैं? आपसे मिलने और बात करने के बहाने ढूँढते हैं? यदि हाँ तो ये बात सही है कि वो आपको चाहते हैं।ये कुछ ऐसी टिप्स हैं, जिनसे आप अंदाज लगा सकते हैं कि आपके दिल में जिसके प्रति प्यार उमड़ रहा है, वह आपको कितना चाहता है। अब देखो न मेरी आँखों में , कुछ तो अंदाजा लगेगा ही न।
छमिया- मुंशीजी , बड़े छलिया हो, रसिया के भी रसिया। हर बात को मोड़-तोड़कर यहीं पर ले आते हो। मैं सीखना चाहती हूँ, क्योंकि मेरे मन में बहुत से सवाल हैं।
मुंशीजी- कुछ ख़ास सवाल बताओ न।
छमिया- जैसे कि सेक्स करने से क्या नुक्सान और क्या फायदे हो सकते हैं ? सेक्स करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए , किस तरह के लोगों से सम्बन्ध बनाते समय ध्यान रखना चाहिए , कंडोम लगाना कितना जरूरी है और क्या यह सुरक्षा कवच साबित होता है या फिर कम्पनियां अपना प्रोडक्ट बेचने के लिए बीमारियों का हौव्वा खडा करती हैं ? क्या दवा लेने से भी गर्भ से बचा जा सकता है या फिर बचाव और फिर गर्भपात ही इसका अंतिम उपाय है ?

Thursday, January 28, 2010

भाग-16

छमिया - मैं भोजपुरी नहीं जानती, हिन्दी के शेर अच्छे लगते हैं।
मुंशीजी- यह हिन्दी ही तो थी, कुछ शब्द उर्दू , अरबी के थे। समझ में में तो आ गए न। जो बात हम आसानी से नहीं कह पाते , उनको शेर ओ शायरी के माध्यम से आसानी से कह जाते हैं।
छमिया- सच तो ये है की शेर मुझे बेहद पसंद हैं, समझो जान हैं मेरी। मैं हमेशा पढ़ती रहती हूँ। कुछ और कहो
मुंशीजी- वक़्त की मुठ्ठी मे कैद तकदीर ,देखकर हम तो हँस दिए हाथ की लकीर देखकर । वादा था कि बिछड़ के कभी भी ना रोयेंगे ,फिर क्यों रो दिया उसकी तस्वीर देखकर । वो ख्वाब जिनको कभी बचपने मे देखा , आँख भर आयी है उनकी ताबीर देखकर। मिलाया जिसने अक्सर दोस्ती का हाथ ,हैरान हूँ मै उन हाथो मे शमशीर देखकर । सफ़र जिन्दगी का क्या कभी रोक ,पावोगे ये सोचता रहा पांव मै पड़ी जंजीर देखकर ।
छमिया - वाह ... मजा आ गया, ऐसे शब्द दिल के अन्दर घर कर जाते हैं। लगता है जैसे लिखने वाले न मेरे ऊपर ही लिखा है। थोड़ा बहुत मैं भी लिखने की कोशिश करती हूँ, लेकिन जमता नहीं है। कैसे जमेगा ? मैं रदीफ़ काफिया , मक्ता थोड़े ही जानती हूँ।
मुंशीजी- ये सब चीज तो मैं भी नहीं जानता , अगर किसी शायर की कोई रचना अच्छी लगती है तो उसे लिख लेता हूँ, जिसे चिट्ठी वगैरहा में यूज कर लेता हूँ। आज तुम्हें सुना दिया। अब तो जान भी गया हूँ की तुम भी इसे पसंद करती हो।
छमिया -मैंने भी एक वेब साईट पर कुछ पंक्तियाँ पढी थीं, ध्यान दीजिये- सच्चे शब्दों में सच के अहसास लिखेंगे ..वक्त पढे जिसको कुछ इतना खास लिखेंगे ,गजल हम पर लिखेंगे लिखने वाले,हमने कलम उठाई तो इतिहास लिखेंगे।
मुंशीजी - वाह , वाह । कमाल करते हैं लिखने वाले भी। क्या खूब लिखा है, मजा आ गया ।dimaag फ्रेश हो गया। अब तो ऐसा दिल कर रहा है की तुम्हारे सारे वस्त्र एक तरफ उतार फेंकूं और तुम्हारे अनमोल खजाने की पूजा कर लूं, प्यार कर लूं इन उभारों से, इन गोलाइयों को दबाने , तुम्हारे होठों का अमृत रस पीने का दिल कर रहा है। प्यार के इस बहाव में बह जाने दो मुझे । इस वक्त तुम्हारे सामने बहुत बड़ा चांस है, इसे कैश करो। ऐश करो मेरी जान ऐश करो। अरे ये क्या ये तो छोटा -मोटा शेर ही बन बैठा।
छमिया चुप थी, उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था, खुद मुंशीजी भी सूखे पत्ते की तरह काँप रहे थे, यही फर्क होता है पत्नी और बाहरी लडकी के बीच। जब कोई अपनी पत्नी के साथ प्रेमालाप करता है तो उसे किसी तरह की चिंता नहीं होती, सामाजिक और मानसिक सुरक्षा के घेरे में रहकर वे दोनों जब एकाकार होते हैं तो बहुत इंजॉय करते हैं। लेकिन चोरी- चोरी किया जाने वाला प्रेमालाप कभी-कभी तो अपने अंजाम पर भी नहीं पहुच pata है। मुंशीजी न कुछ लाइनें सुनाकर छमिया को आकर्षित करने की कोशिश की-
-हमको भी समझ फूल या पत्थर नहीं आते,दुश्मन की तरह दोस्त अगर घर नहीं आते,नज़दीक बहुत गर रहे, बन जाओगे आदत,ये सोच के, मिलने तुझे अक्सर नहीं आते , जेस दिन से मैं ले आई हूँ बाज़ार से पिंजरा ,उस रोज से, छज्जे पे कबूतर नहीं आते , मिल जाए नया ज़ख़्म तो फिर कोई ग़ज़ल हो,अब ज़हन में अल्फ़ाज़ के पैकर नहीं आते । सच कहूं तो तुम्हारे हुस्न को देखकर हर शायर भी भी दीवाना हुए बिना नहीं रह सकता, जो भी ठीक से देखेगा वह शायरी भूलकर तुम्हारी इन झील सी आँखों में डूबना चाहेगा।
छमिया- मैं नहीं जानती थी की तुम पूरे रसिया हो, दिखने में तो सीधी सादे लगते हो मगर हो बड़े उस्ताद । मुझे पटाने से पहले और भी सैकड़ों पर डोरे दाल चुके हो , अब समझ में आया की कैसे आ जाती होंगी तुम्हारी बातों में ,
मुंशीजी- तुम सबसे अलग हो, अब तक तुम्हारे मोहल्ले की कोई और लड़की होती तो काम फिट हो जाता, वह कबकी अपने घर चली गयीए होती, मुझे भी खुश करके और खुद भी खुश होकर। कितना समय लगता है, पांच मिनिट में काम निबट जाता है।

Wednesday, January 27, 2010

भाग-15

छमिया- और अगर कल को तुम्हें मुझसे भी कोई सुन्दर मिल जाती है तो मेरी हसरत भी ख़त्म हो जायेगी ?

मुंशीजी- जी नहीं, दरअसल तुम मेरी पहली और आखिरी चाहत हो, मैं तुम जैसी पत्नी ही चाहता था लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं सका। मैं उस वक्त बहुत मायूस हुआ था , मेरे घरवाले गरीब थे इस कारन मुझे मन पसंद घरवाली नहीं मिल पायी, मेरी तो जैसे किस्मत ही फूट गयी थी, फूट-फूटकर बच्चों की तरह रोया था मैं। अपनी इच्छाओं का गला मैंने खुद ही घोंट डाला था। मैंने हमेशा तुम जैसी खूबसूरत लड़की को अपनी जीवन संगिनी बनाने के सपने देखे थे। मैंने पहले भी तुमको अपनी एक मित्र की बात बतायी थी, मगर उसके साथ सिर्फ मेरे शारीरिक सम्बन्ध थे, प्यार नहीं था। और लड़कों की तरह मैं भी सोचता था की कोई तुम्हारे जैसी हुस्न परी से मेरी भी दोस्ती हो जाए, मैं भी दिल खोलकर प्यार करुँ, मगर हाय री मजबूरी , यह किसीसे कुछ भी करा सकती है। आज मुझे कोई समस्या नहीं है, मैं अब अपने दिल की रानी को प्राप्त कर सकता हूँ। जो चाहूँ खरीद सकता हूँ। अब मैं मोहताज नहीं हूँ। और जिसे इतने सालों की तमन्ना के बाद पा रहा हूँ उसको भला कैसे भुला सकता हूँ, अब तो तुम मेरी मौत के बाद ही मुझसे जुदा हो पाओगी ।

छमिया- यही होता है मुंशीजी, जब हम पर कुछ पाने का जूनून होता है तो हम बिना कोई ध्यान दियी सारी ताकत लगा देते हैं, ऐसे में हमें यह ध्यान भी नहीं रहता की जिसे हम पाने जा रहे हैं , हो सकता है वह भी किसीको चाहता हो। हो सकता है उसकी अपनी भी कुछ हसरतें हों। जैसे की तुम जिसमें लड़की को पाना चाहते थे वो अभावों की वजह से नहीं नहीं पा सके और जिसे तुम पा रहे हो हो सकता है वह किसी और को पाने की चाहत रखती हो। यानी की हो सकता है मैंने भी किसी ख़ास राजकुमार के सपने देखे हों और आज मेरी गरीबी के चलते आप उन्हें कुचल रहे हों, हो सकता है न...

मुंशीजी- हाँ , संभव है। यहाँ कुछ भी हो सकता है लेकिन मैं इस त्याग के बदले तुम्हारा और तुम्हारे परिवार का जीवन उज्जवल बना रहा हूँ। मेरे साथ ऐसे हालात नहीं थे। मुझे बदले में कुछ नहीं मिला था। मेरा दिल तोड़ना था, लोगों न तोड़ दिया। मेरे जज्बातों को कुचलते हुए सफलता की सीढिया तय करनी थीं , सो लोगों न ऐसा किया । मुझसे बदले में यह नहीं कहा गया की मुझे कोई आर्थिक सहायता देगा, या कोई मेरे अरमानों की ज़रा भी कद्र करेगा। इसलिए अपने हालात की बराबरी मेरे हालातों से न करो। तुम जानती हो की यहाँ पर ऐसे लोग मौजूद हैं जो तुम्हारी जवानी के रस को चूसना तो चाहते हैं लेकिन किसी भी हालत में तुम्हारे दशा सुधारना नहीं चाहते, वे तुम्हें प्यार का झूठा झांसा दे सकते हैं, तुम्हें बहका सकते हैं मगर सच्चा साथ नहीं दे सकते ।मैंने एक ग़ज़ल पढी थी , सुनाता हूँ, अर्थ अपने आप जान जाओगी -पूछ लो तुम भी इस ज़माने से,प्यार छुपता नहीं छुपाने से !पास आते हो छुते हो, बात करते हो,कभी मतलब से कभी बहाने से !!प्यार दिल में है तो लाओ ज़ुबाँ पे,आग भड़कती है इस कदर बुझाने से !तुम्हें न पाना शायद बेहतर है,पा के फिर से तुम्हें गंवाने से !!क्या सुनायें किसी को राज़-ए-दिल,दर्द सिर्फ़ बढ़ता ही है सुनाने से !
छमिया- मैं दर्द बढाने नहीं प्यार के पींग बढाने आयी हूँ, चाहती हूँ की आप कोई प्यार का टिप्स सुनाएँ , आपबीती कहानी भी चलेगी और जगबीती भी। मैं जब तक अपने दिल को सेक्स के लिए तैयार नहीं कर लेती तब तक तुम्हारी हसरतों को लगाम लगानी ही होगी।
मुंशीजी- मैं तो हर तरह से हर वक्त तैयार हूँ, तुमने इस दहकती हूई जवानी पर मेरा नाम लिखकर इसे मेरे लिए आरक्षित कर दिया है इससे बढ़कर खुशी मेरे लिए भला क्या हो सकती है ? मेरा नसीब अच्छा है।
छमिया- इसमें कोई दो राय नहीं, वरना हर किसी को मन माफिक चीज नहीं मिल पाती ।
अपने दिल का हाल पंक्तियों में व्यक्त करता हूँ- तुझे ख़बर है तुझे सोचने की खातिर,बहुत से काम मुक़दर पे टाळ रखते हें !कोई भी फ़ैसला हम सोच कर नहीं करते,तुम्हारे नाम का सिक्का उछाल रखते हैं !!तुम्हारे बाद ये आदत सी हो गई अपनी,बिखरते सूखते पत्ता संभाल रखते हैं !खुशी सी मिलती है ख़ुद को अजायते देकर,सो जनबुझ कर ख़ुद को निढाल रखते हैं !!तुम्हारे हिज्र में ये हाल हो गया अपना,किसी का ख़त हो, उससे भी संभल रखते हैं !खुशी मिले तो तेरे बाद खुश नही होते,हम अपनी आँख में हर दम मलाळ रखते हैं !!कुछ इसलिए भी तो बे-हाल हो गए हम,तुम्हारी याद का बेहद ख्याल रखते हैं।

Monday, January 25, 2010

भाग-१४
जब हमारे होठों से होठ मिलेंगे , सीना से सीना मिलेगा और हम दोनों एक दुसरे में समा जायेंगे तब पता चलेगा कि असली सुख क्या होता है, तब जानोगी कि स्वर्ग किसको कहते हैं ?तुम्हारे मन के तार झन्ना जायेंगे , दिल बाग-बाग हो जाएगा . जिस तरह वीणा के तार झंकृत होने से मन प्रफुल्लित हो जाता है, उसी तरह की अनुभूति होगी .
छमिया- वाह, जब पहले ही इतना सुखद अनुभव हो रहा है तो आगे क्या होगा , मैं कल्पना कर सकती हूँ लेकिन अपने आपको समर्पित कब करूंगी मैं तुम्हें बता ही चुकी हूँ.
मुंशीजी- मुझे भी कहाँ इनकार है ? मैं तैयार हूँ और उसी दिशा में काम कर रहा हूँ. मगर तुम तो जैसे पत्थर की बनी हुई हो, टस से मस होने का नाम ही नहीं ले रही हो. फिर भी मेरी कोशिशे जारी हैं, और कोशिश हमेशा कामयाब होती है, बस मलाल इस बात का है कि मैं जो मेहनत कर रहा हूँ इससे आनंद तो हम दोनों उठाएंगे मगर परेशान मैं अकेला हो रहा हूँ.
छमिया- अकेले कैसे कह सकते हो, मैं भी यहाँ पर तुम्हारे साथ हूँ, और अब तो तुमने मुझे अपनी बांहों में भी कैद कर लिया है. पहले कहते थे कि दूर से ही बात करेंगे .
मुंशीजी ने छमिया के गदराए हुए बदन को आहिस्ता-आहिस्ता दबाना शुरू कर दिया, उनका हाथ छमिया की उन्नत गोलाइयों तक पहुच गया था, कई बार छमिया ने उनका हाथ वहाँ से हटाने की कोशिश भी की मगर सफलता नहीं मिल पायी. मुंशीजी खेले खाए फ़कीर थे , ना जाने कितनी लड़कियों के साथ गुलछर्रे उड़ा चुके थे , इसलिए ऐसी तरकीब भिडाई कि वह नाराज भी नहीं हुई और वे अपने काम में लगे रहे . छमिया का बदन थर –थर कांपने लगा, जिस्म के रौंगटे खड़े हो गए, वह अपने आपको आसमान में उड़ता महसूस कर रही थी, उसका विरोध काफी कमजोर पड़ चूका था. सारा जोश ना जाने क्यों नशे में बदलता जा रहा था. उसको मुंशीजी कि आवाज सुनाई दी-
-जी करता है कि तुम इसी तरह हमेशा मेरे साथ रहो और मैं तुम्हें अपनी आगोश में भींच लूं, मेरा दिल इस वक्त मेरे कब्जे में नहीं है, मगर तुम फ़िक्र मत करना, मैं अपना वादा नहीं तोडूंगा. वही करूँगा जो तुमसे कह चुका हूँ, वचन की मर्यादा समझता हूँ, हांलाकि यह मेरा प्यार है , इसमें कहीं कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन फिर भी अब मैं यहाँ से आगे बढ़ने से डरता हूँ.
छमिया- झूठे कहीं के , सब कुछ करते हो और मुकर भी जाते हो, वो भी तुरंत. पहले कहा था कि हाथ नहीं लगाएंगे , और अब छोड़ने का नाम भी नहीं ले रहे हैं.
मुंशीजी- क्या तुम्हें अच्छा नहीं लग रहा, सच –सच बताओ क्या तुम्हारी इच्छा नहीं हो रही ?
छमिया- कैसी इच्छा ?साफ़-साग कहो मैं कुछ समझ नहीं पा रही हूँ.
मुंशीजी- अच्छा जी... मुझे नहीं लगता तुम इतनी नादाँ हो, अपने दिल में झांककर देखो. जवाब मिल जाएगा, तुम्हारी आँखों से भी प्यास साफ़-साफ़ झलकने लगी है.
छमिया- बिलकुल नहीं, यह डर और घबराहट कि वजह से ऐसा हो रहा है।
मुंशीजी ने मौका देखकर चौका मारना उचित समझा , जब जान लिया कि छमिया बातों में उलझ गयी है तो अपना हाथ उसके यौवन द्वार कि तरफ बढ़ाना शुरू कर दिया.


मुंशीजी- झूठ, सफ़ेद झूठ. मैं नहीं मानता. डर नाम की अगर कोई चीज होती तो तुम अब तक कई बार टोक चुकी होती, तुम जानती हो कि यहाँ पर कोई नहीं आएगा. यह भी सच है कि जब तुम्हारी और मेरी मर्जी है तो कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता.अगर तुमने मेरा साथ देने का वादा किया तो मैं सबसे लड़ सकता हूँ, तोड़े में ही इतना जानलो कि तूम्हें पाने के लिए मैं कुछ भी खो सकता हूँ.
छमिया- झूठ, फिर झूठ. जब सबको पता चलेगा कि मुंशीजी ने छमिया को अपनी रखैल बना लिया है तो तुम्हारे भाई की पत्नी ही तुमको बराबर कर देगी, फिर उसके साथ मौज कर पाओगे ?
मुंशीजी- जब तुम मिल गयीं तो सारी दुनिया मिल गयी मुझे फिर कोई हसरत नहीं रह जायेगी

Saturday, January 23, 2010

भाग-13

लेकिन उसके बारे में बताने से पहले मैं तुम्हें कुछ और बताता हूँ , कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें प्यार नहीं मिला तो टेंशन और मिल गया तो भी टेंशन। एक मित्र हैं मैंने उनसे कहा तुम्हें किस बात की चिंता है। कहने लगे क्या करें यार जीवन खाली-खाली लगता है, कोई जिंदगी में होना चाहिए। दूसरे मित्र ने तपाक से जवादिया, अच्छा है जो अकेले हो वर्ना समझ में आ जाती कि जिंदगी में तूफान भी होते हैं।पता नहीं यह किसने कहा था कि प्‍यार टेंशन पैदा करता है और सेक्‍स उसे दूर करता है। और यह भी कि शादी विवेक पर मूर्खता की विजय है। एक चुटकुला भी है कि घड़ी और शादी में समानता यह की दोनों में ही बारह बजते हैं। धत्त तेरे की...कंडोम बनाने वाली प्रमुख कंपनी कामसूत्र ने भारत में एक सर्वेक्षण कराया था जिसमें लग बड़े शहरों में रहने वाले हजारों लोगों ने भाग लिया। सर्वेक्षण से आश्चर्यजनक तथ्य उभर कर आया कि 40 प्रतिशत लोगों ने स्वीकार किया है कि उन्होंने विवाह से पहले शारीरिक संबंध कायम किया था।सोचें 40 प्रतिशत लोग! क्या यह अच्छी बात है? भारत गाँवों में बसता है बाबूजी और गाँवों के लोग आज भी सच्चे और अच्छे हैं।.यह धारणा भी कितनी गलत है कि जोड़े स्वर्ग में तय होते हैं। 'रहस्य' और 'मनोविज्ञान' को जो जानते हैं वे तो शायद ऐसा नहीं कहेंगे। शादी के बारे में आमतौर पर कहा जाता हो कि यह एक ऐसा लड्डू है जिसे खाने वाला भी पछताता है और न खाने वाला भी। समझदार व्यक्ति ऐसी बेवकूफी भरी कहावत पर शायद ही विश्वास करें।रॉबर्ट एप्सटेन ने कहा था कि किसी भी व्यक्ति में किसी भी व्यक्ति के प्रति छह माह में प्यार जगाया जा सकता है। इसका यह मतलब हुआ कि प्यार होता नहीं किया जाता है।कुछ डॉ. अपने शोध के आधार पर कहते हैं कि प्यार एक बीमारी है और इस बीमारी का इलाज है सिर्फ सेक्स। यदि प्रेम के इजहार का मौका नहीं मिलता तो बीमारी और बढ़ जाती है, हो सकता है कि वे गुस्सा, अवसाद या किसी अन्य मानसिक रोग से ग्रस्त हो जाएँ। इसे 'लव सिकनेस' कहते
खैर यह तो बात प्यार के इजहार से जुड़ी है लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि इजहार कर ही दिया तो फिर नया खेल शुरू होता है जो कुछ दिन तक तो अच्छे अहसास के साथ चलता है, लेकिन फिर धीरे-धीरे उसमें टेंशन पैदा होने लगता है।बेवफाई का डर ‍भीतर ही भीतर सालता रहता है। यदि प्यार में बेवफाई का सामना करना पड़े तो फिर दिल के दौरे की संभावना बढ़ सकती है बशर्ते कि आप अपने प्रेमी या प्रेमिका से कितने जुड़े हैं यह इस पर तय होता है।तमाम शोध और तमाम बेवकूफी भरे वाक्य प्यार की ताकत को झुठला नहीं सकते और ना ही उसे सेक्स से जोड़ सकते हैं। सेक्स आपके जीवन का अहम हिस्सा हो सकता है, लेकिन प्यार का स्थान उससे कहीं ऊँचा है। मीरा ने कृष्ण से प्रेम किया था किसी गलत वजह से नहीं। पवित्र प्रेम के बारे में सोचने वाले सही हैं। प्यार और विश्वास किसी भी दंपति के जीवन का आधार है। दांपत्य जीवन में प्यार का मतलब सिर्फ सेक्स से नहीं॥
छमिया- ये सब सुनकर बड़ा मजा आ रहा है ॥
मुंशीजी-असली मजा तो अभी दूर है
भाग-१२
छमिया- मुझे कुछ प्रेम के टिप्स चाहिए, आप तो खेले खाए खिलाड़ी हो, बहुत दुनिया देखी है. मैं सब कुछ जांउगी, उसके बाद तुम्हें इस अमृत रस का स्वाद चखने को मिलेगा.
मुंशीजी-इतना तडपना भी ठीक नहीं है, क्यों मुझे परेशान कर रही हो, मैं तरस रहा हूँ तुम्हारे यौवन का मजा लेने के लिए. साथ में तुम्हें भी इतनी खुशी दूंगा कि फूली नहीं समाओगी.
छमिया- मेरे लिए तो अभी जिंदगी पडी है , मुंशीजी. तुम अपनी बात कहो. तुम्हारी जीभ ही लार दाल रही है तो पहले मुझे उन रास्तों से वाकिफ कराओ जिन पर चलकर मुझे मंजिल तक पहुचना है.
मुंशीजी- जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा, मैं जो कहता हूँ वही करता हूँ या यूं समझिए कि बस उतना ही कहता हूँ जितना कि मैं कर सकता हूँ. मैं तुम्हें प्यार करने के तरीके जरूर सिखाऊँगा , कुछ प्रेम कहानियाँ भी सुनाउंगा और अपने नौभावों से भी अवगत कराऊंगा . ठीक है ? बोलो सबसे पहले क्या जानना चाहोगी ?
छमिया- तुम्हारा सबसे पहला प्रेम कौन था ? क्या वह अब भी मुलाक़ात करती है , क्या तुमने उसके साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाये थे ?
मुंशीजी- उससे प्यार था या नहीं लेकिन इतना बताता हूँ कि मैंने एक अधेड औरत के साथ जिस्मानी ताल्लुकात बनाये थे, या ये समझो कि उसने मुझे इसके लिए तैयार कर लिए था. मैं तो कुछ भी जानता ही नहीं था, इस सबसे अनजान था , लेकिन उसने मेरी जिस्मानी भूख को बढाने और फिर उसे शांत करने का काम किया. उसके बड़े- बड़े तीन बच्चे थे, वह ओर रंग कि खूबसूरत और थोड़ी सी मोटी महिला थी, जब वह हँसती तो उसके गालों में गड्ढे पड़ जाया करते थे, जिसने भी उसको हँसते हुए देख लिया वह उसका दीवाना हुए बिना नहीं रहता था, मुझे लगता है कि ज्यादातर कम उम्र की लड़कियों के साथ उम्रदराज पुरुष पहले जिस्मानी सम्बन्ध बना डालते हैं और कम उम्र की हसीं लडकियां हम जैसों के चक्कर में आ जाती हैं और अपना कुंवारापन समर्पित कर देटी हैं, यह इस तरह का चक्रव्यूह है .
छमिया- तो उस महिला के साथ तुमने शारीरिक सम्बन्ध कब बनाए ?
मुंशीजी- यह बहुत जल्दी हो गया था, वह महिला अचानक मुझे जजूस की दूकान पर मिल गयी, हलकी सी जान पहचान हुयी और जैसा कि मैंने बताया उसकी मनमोहक मुस्कान मेरा दिल ले गयी, बातों ही बातों में उसने मुझे घर चलने का ऑफर दे दिया. वे दो थीं, मैंने भी हाँ कहदी. गर्मियों का समय था , वह मुझे अपने किराए के छोटे से घर में ले गयी. वहाँ पर कोई भी मौजूद नहीं था, उसने मुझे बताया कि उसके बच्चे छुट्टियों में कहीं बाहर गए हुए हैं, उसका पति भी कहीं बाहर गया था,उन्होंने अपना खुद का घर बनाने के लिए एक प्लाट खरीदी थी, वह उसी के सिलसिले में बेचनी वाले से मिलने गया था. उस महिला ने मुझे ठंडा शरबत पिलाया और झुककर जब गिलास उठाने लगी तो उसका पल्लू सरक गया. मुझे उसके यौवन के उभार नजर आने लगे थे, मेरा दिल डोलने लगा , मैंने उसकी ख़ूबसूरती की तारीफ़ की तो वह मेरे पास बैठ गयी और उसने अपने खुले बालों को जब एक झटका दिया तो वे काली नागिन कि तरह बल खाने लगे. उसकी आँखें कंजी थीं, बिलकुल बिल्ली की तरह . जब उसने मुझे सर से पाँव तक घूरकर देखा तो मैं सहम गया. मैंने घर जाने की इजाजत माँगी तो उसने आराम करने का सुझाव दिया,जिसे मैंने सहर्ष स्वीकार भी कर लिया. आखिरकार मैं लेट गया तो वह मेरे सर में तेल डालकर मालिस करने लगी , कुछ ही देर में मेरी सोने की इच्छा जागृत होने लगी लेकिन मैं आखी ऐसा कैसे कर सकता था. मैंने कांपते हाथों से उसके यौवन कि गोलाइयों को दबाना शुरू कर दिया.

Thursday, January 21, 2010

भाग-11

मैंने उससे विस्तार से कहा- कई बार हमें लगता है जीवन में हर चीज सही जगह ठिकाने पर है। हमारे रिश्ते, हमारा काम, सभी कुछ वैसा ही चल रहा है, जैसा हमने सोचा है। हमें महसूस होता है कि जीवन के हर पहलू को हम अपनी मर्जी से स्वरूप दे रहे हैं। इन सारे अहसासात के साथ हम तब तक बेहद सुकून से जीते रहते हैं जब तक कोई अप्रत्याशित घटना हमें आकर झकझोर न दे। उस समय हमें समझ में आता है कि हमारी पकड़ तलवार पर इसलिए मजबूत थी क्योंकि पानी का रुख भी उधर का ही था। अब जब बहाव अलग दिशा में है तो हमारी नैया डगमगाने लगी है। जिस सोच को हम जितना व्यवस्थित और सुनियोजित मानकर चल रहे थे, दरअसल, उसकी सारी बुनियाद ही गलत नजर आने लगती है। फिर बार-बार यही अफसोस और पछतावा होता है काश यह बात हमें बहुत पहले समझ में आ जाती। उनकी मुश्किल यह है कि वह अपनी यह मनोदशा अपनी दोस्त के सामने बयान नहीं कर सकते क्योंकि उन्हें लगता है यदि दोस्त ने नाराज होकर दोस्ती तोड़ ली तो वह और भी मानसिक उलझन में पड़ जायेंगे इतने वर्षों तक जब वह केवल आपकी दोस्त थी और आपके मन में कभी प्रेम प्रस्ताव की भावना नहीं आई तो अब क्यों आप इतने विचलित हो रहे हैं। आपने शायद इसीलिए ऐसा किया होगा कि आप उन्हें मात्र मित्र के रूप में ही देखते होंगे। जब किसी अन्य व्यक्ति ने उसके सामने प्रेम का प्रस्ताव रखा तो उसे ठीक लगने पर उसने स्वीकार कर लिया। एक बात बताएँ कोई लड़की जिसे आप पसंद करते और वह आपके सामने प्रेम प्रस्ताव रखती तो आप क्या करते? क्या आप यह सोचते हैं कि जीवन भर आप वो दोस्त बने रहते और आप लोगों के जीवन में किसी को भी नहीं आना चाहिए। पूरी जिंदगी मित्रता के नाम। ऐसा भी संभव है, पर ऐसा कोई समझौता भी नहीं था आपके बीच। फिर यह हाय तौबा क्यों?दरअसल, हर क्षेत्र में हम एकाधिकार रखने के लिए तड़पते रहते हैं। संयोगवश जब तक कोई उसमें घुसपैठ नहीं करता है, वह हमारी आदत बन जाती है और किसी भी आदत को छोड़ना कभी भी आसान नहीं होता। सारे तर्क धरे रह जाते हैं। दोस्ती से बहुत ज्यादा निजीपन और नजदीकी लिए होता है प्रेम का रिश्ता। उन दोनों के एक हो जाने से हम खौफजदा हो गए हैं।हमको लगता है आप दोयम स्थान पर खड़े हैं। आप पछताते रहते हैं कि आपने पहले अपनी भावना को क्यों नहीं समझा। आपको अफसोस हो रहा है कि आज जो प्रेम आप अपनी दोस्त के लिए महसूस कर रहे हैं, क्यों नहीं इसका इजहार आपने पहले किया। कई बार ऐसा होता है कि हम बाजार से बहुत ही खूबसूरत रंग का एक लिबास खरीद कर लाते हैं। उसे बार-बार देखते हैं और अपनी पसंद पर फख्र करते हैं। यदि किसी ने उसकी तारीफ कर दी तो हम बड़ी शान से बोलते हैं कि बहुत सारे रंगों के बीच से चुना है हमने यह रंग। देखो हमारी पसंद लाजवाब है पर फिर एक दिन हम उसी रंग से मिलता-जुलता एक शेड देखते हैं और वह हमें इतना ज्यादा अच्छा लगता है कि हमारा चुना हुआ रंग बेहद भद्दा लगने लगता है। अफसोस होता है क्यों जल्दबाजी की, थोड़ा और समय लगा लेते तो क्या बिगड़ जाता। ऐसी बातें आए दिन होती रहती हैं और हम भूल जाते हैं क्योंकि इसमें थोड़ा पैसा और समय लगा होता है पर रिश्तों में हमारी ढेर सारी भावनाएँ लगी होती हैं और जब वहाँ विकल्प के कारण कोई हाथ से जा रहा होता है तो हम कराह उठते हैं कि काश वह विकल्प हम ही होते। रिश्ते में यदि दिमाग साफ रखा जाए तो तकलीफ कम होती है और व्यवहार करना आसान हो जाता है। नए रिश्ते से आहत व विचलित होने के बजाय आप तीनों अच्छे दोस्त बन जाएँ और अपने लिए एक साथी की तलाश करें।सामजिक रीति रिवाज से आपकी शादी हो चुकी है, अब उसे ही अपनाएं.
छमिया- मुझे सीधे तरीके से समझाओ , इस तरह के उदाहरण थोड़ी देर से मेरी समझ में आते हैं.
मुंशीजी- मेरे कहने का अर्थ ये है कि अगर तुम मुझे दिल से स्वीकार करोगी तो मेरे साथ एक ही बिस्तर पर सोने में तुम्हें कोई तकलीफ नहीं आएगी. तुम बड़ी आसानी से प्रणय क्रीडा कर सकोगी , यहाँ तक कि उसमे खूब आनंद भी उठा सकोगी

Wednesday, January 20, 2010

भाग -10

भाग-१०
उसकी बातों से मुंशीजी को बड़ी तसल्ली हुई थी, दिल में आशाओं के फूल खिलने लगे, दरअसल छमिया ने अपनी बात इस अंदाज में कही थी कि उसको न मानने का सवाल ही नहीं उठता था. जब किसीको भरोसा हो जाता है तो फिर मन में शान्ति हो जाती है. ५० साल के ऊपर के मुंशीजी के जीवन में अब कुछ खास अभिलाषा नहीं थी, सिवाय इसके कि वे अब अपना आगे का समय चैन –सुकून के साथ गुजारें , और उन्होने जो दौलत कमाई थी उसमे से आधी तो अपने भाई को दे दें और आधी छमिया को. और वैसे भी उन्होंने अपने नाम तो बहुत कुछ जमा कर रखा था. उन्हें याद आने लगे वे दिन जब गाँव वालों को लूट –लूटकर धन संग्रह किया करते थे, उन्हें याद आने लगे वे क्षण जब उन्होंने लोगों के खेत , घर और प्लाट को बहुत कम रुपये में गिरवी रख लिया था. इस तरह लोगों का धन लूट-लूटकर उन्होंने करोड़ों की संपत्ति बना ली थी, उन्होंने छमिया से कहा-
-तुम्हारी बातों से मन खुश हो गया है, मैं अपनी खुशी का बखान नहीं कर सकता. मुझे तुम्हारी बातों पर यकीन है, तुम कोई भी सवाल करो , मैं तुम्हारे हर सवाल का जवाब दूंगा. मैन तुम्हारी बिना मर्जी के तुमसे कभी प्रेम नहीं करूँगा. एक बार मुझसे एक लड़के ने पूछा था-

लग गई है , जिसके कारण मेरा स्टडी में मन नहीं लगता है। पिछले कुछ दिनों से मुझे ब्लू फिल्म देखने की आदत सी लग गई है। जब तक दिन में एक या दो ब्लू फिल्म मैं देख न लूं , तब तक मुझे चैन नहीं आता है। मैं रोज़ इंटरनेट के जरिए एक या दो ब्लू फिल्म देखता हूं।

जब मैं स्टडी करने बैठता हूं , तो इस कारण मेरा मन उसमें बिल्कुल नहीं लगता है और मुझे नींद आने लगती है। मन आलस से भर जाता है और ब्लू फिल्म के दृश्य जहन में दौड़ने लगते हैं। इसके चलते मैं आजकल बहुत परेशान रहने लगा हूं। इस बुरी लत के कारण मेरा जीवन बर्बाद हो रहा है। मैं क्या करूं मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। इस बुरी लत से कैसे पीछा छुटेगा और फिर मेरा मन पढ़ाई में लगने लगेगा ? मैं इस पर सुझाव चाहता हूं।
छमिया- फिर क्या कहा तुमने ? क्या तुम भी उसके समर्थन में थे ?
मुंशीजी- मैंने उसे बहुत समझाया , मगर माने तब न . आखिरकार कुछ दिनों बाद वह खुद ही सब कुछ समझ गया, आखिर जब जीवन बर्बाद होने लगा तो खुद ही अक्ल आ गयी.एक बार मैंने एक और युवक कि समस्या हल कर दी थी, उसने बताया था कि -

मेरी शादी दो साल पहले हुई थी। हम एक - दूसरे से बहुत प्यार करते थे। शुरू में हमारा वक्त बहुत अच्छा बीता। लेकिन बाद में कुछ लोगों ने मेरी बीवी को भड़का दिया। फिर हम दोनों में लड़ाई होने लगी।

किसी तरह मैंने उसे समझाया। हमारे बीच सुलह हो गई। उसके बाद मैं कुवैत आ गया। लेकिन मेरे आने के बाद उसका रवैया फिर बदल गया। बात - बात पर शिकायत। मैं उसे समझाता था , पर वह कुछ सुनने को तैयार नहीं होती थी। वह मुझसे तलाक चाहती थी। मेरे मना करने पर वह मुझे धमकी देने लगी।

दबाव में आकर मैंने फोन पर एक बार वह शब्द बोल दिया और वह मुझसे अलग हो गई। उसके बाद मैं बहुत परेशान रहने लगा। मेरी परेशानी को देखते हुए मेरे घर वालों ने मेरी दूसरी शादी करवा दी। लेकिन , मैं उसको नहीं भूल पाया। आज भी मैं उसको चाहता हूं। मैं उसे दोबारा लाना चहाता हूं। उसके बिना मैं मर जाऊंगा। क्या करूं , कुछ समझ में नहीं आ रहा।जानती हो मैंने उसे क्या बताया ?

Tuesday, January 19, 2010

गुरूवार अंक में प्रकाशित होने के लिए एडवांस , भाग-9

भाग- ९
छमिया- तो फिर पहले एक लाख रुपये मेरे एकाउंट में जमा करा सकते हो ? आज की तारीख में ?
मुंशीजी- इसका मतलब तुम मान गयी. आज मैं बहुत खुश हूँ. मेरे कदम जमीन पर नहीं पड़ रहे हैं. मैं तो पहले ही समझ गया था कि तुम्हारा और मेरा किसी पुराने जन्म का मेल है, बिछुड गए होंगे इसलिए इस जन्म में मिल रहे हैं. मैं अभी एक लाख रुपये तुम्हारे एकाउंट में जमा करने कि व्यवस्था करता हूँ, लेकिन फिर आज की रात सुहागरात होगी
छमिया- अगर तुम अपने वादे पर खरे उतारते हो तो मेरी तरफ से तुम्हें निराशा हाथ नहीं लगेगी. तुम्हें मालूम ही है, मैं भले ही मुंह से भौंकती रहती हूँ लेकिन हूँ तो दिल की साफ़. जो डील करूंगी सच्ची करूंगी, और हाँ,तुम भी अपने वादे से मत मुकरना , मेरे भाई –बहनों का भविष्य तुम्हारे हाथ है, उन्हें किसी अच्छे स्कूल में पढाने कि जिम्मेदारी तुम्हारी है.
मुंशीजी- ठीक है, इसकी व्यवस्था भी कल कर दी जायेगी.बढ़िया बोर्डिंग स्कूल में उनका दाखिला करा देता हूँ, उसने खर्चे और फीस आदि का इंतजाम भी करवा देता हूँ, लेकिन मुझे सिर्फ तुम्हारा तन ही नहीं मन भी चाहिए. सिर्फ मांस के लोथड़े के साथ खिलवाड करना मुझे पसंद नहीं, मेरी इच्छा है कि तुम मेरी दुल्हन की तरह रहो. मैं तुम्हारा ख़याल रखूँ और तुम मेरा ख़याल रखो.
छमिया-क्या तुम्हें लगता है कि यह सब इतना आसान है ? कोई किसीको बदन तो सौंप सकता है मगर मन और आत्मा के समर्पण के लिए तो कुछ समय चाहिए, बिना वक्त दिए यह संभव नहीं, अगर कोई दावा करे तो झूठा होगा. पहले मुझे समझाइये कि सेक्स क्या है ? प्यार क्या है ? इसे कैसे किया जाता है ? कैसे असुरक्षित सेक्स से तकलीफें होती हैं , कैसे नहीं होतीं ? जब तक मुझे विस्तार से नहीं बताओगे तब तक किसी दिल लेने कि बात वृथा है .
मुंशीजी समझ गए कि पहले उसको समझाना होगा, उसके मन में सेक्स को लेकर जो डर और भ्रान्तियां हैं उनको निकालना होगा , वरना वह तो यही समझेगी कि चुम्बन लेने से गर्भवती हो जाते हैं, जैसा कि वह इससे पहले सोच रहीए थी. उसने छमिया के सुर्ख लाल गालों पर एक चुम्बन जड़ते हुए मीठे शब्दों में कहा-
-तुम्हें डरने या घबराने कि कोई जरूरत नहीं है, मैं तुम्हारा प्यार चाहता हूँ, मैं मोहब्बत करने में विश्वाश रखता हूँ, बलात्कार करने में नहीं, जब तुम्हें ऐसा लगने लगे कि मैं तुम्हें चाहता हूँ और तुम्हारे तन –मन पर मेरा हक है, तभी तुम जिस्म समर्पित करना, उसी पहले नहीं, मैं तुम्हें यकीन दिलाता हूँ कि कभी तुम्हारे साथ जोर जबर्दस्तई नहीं के जायेगी, मैं तुम्हें इसके बारे में विस्तार से समझाउंगा, लेकिन हर रात तुम्हें मेरे साथ बितानी होगी. मैं इतना ही कह सकता हूँ कि जब तुम कहोगी तभी तुम्हारे साथ प्रणय क्रीडा करूँगा, बोलो मंजूर है ?
छमिया- ठीक है, मुझे मंजूर है , मगर हर रात तुम मेरे एक सवाल का जवाब दोगे ?
मुंशीजी- ठीक है, जितना मैंने सीखा है, और जितनी मेरी क्षमता है, मैं जरूर उतना बताने कि कोशिश करूँगा , म्साथ ही यह भी ध्यान रहे कि मेरे साथ धोखा बाजी नहीं चलेगी, जब मैं लाखों रुपये किसी कि जिंदगी बनाने में खर्च कर सकता हूँ तो उसे बर्बाद करने के लिए किसी भी हद से गुजर सकता हूँ.
छमिया- आज कह दिया सो कह दिया, आइन्दा मत कहना, मैं ऐ जो भी कह दिया सो कह दिया. छमिया अपनी जुबान कटवा सकती है लेकिन जुबान गिरा नहीं सकती, मैं अपना कुंवारा जिस्म अगर इस दुनिया में क्सीको समर्पित करुँगी तो वो तुम हो, तुम्हारे अलावा मेरे इस बदन से कोई स्पर्श बी ही नहीं कर सकता, चाहे मेरी जान ही क्यों ना चली जाए.
.
भाग-८मैं अकेला ही तो यह सुख नहीं लूटूँगा तुम भी बराबर कि साझीदार रहोगी, तुम्हें भी उतना ही आनंद आएगा जितना कि मुझे , हो सकता है कि थोडा सा कम आएगा मगर आएगा जरूर. जब मैं तुम्हारे होठों का रसपान करूँगा तो क्या अकेले मुझे ही मजा आएगा ? जब मैं तुम्हारे इन यौवन उभारों को दबाउंगा तो क्या मैं अकेला ही रोमांचित होउंगा , क्या तुम्हें वह सुख नहीं मिलेगा ? जब मेरा और तुम्हारा जिस्म एकाकार होगा तो उस चरम सुख का लाभ क्या तुम नहीं उठाओगी ? फ्री इतना बबाल क्यों उठा रही हो. सर पर आसमान क्यों उठा रही हो. आखिओर मैं कुछ खास तो नहीं चाहता सिवाय इसके कि तुम्हारे बदन से लिपटकर कुछ पल बिताऊँ.
इस बार मुंशीजी ने मानो अचूक ब्रह्मास्त्र से वार किया था. छमिया खामोश होकर उसकी बातों को सुन रही थी. उसको लगा जैसे कि उसके भाइयों और बहनों का भाविष्य सुरक्षित होने जा रहा है.उसे ख्यालों में लगने लगा कि उसका भाई शहर में पढकर बड़ा हो रहा है, बड़ा होकर वह अफसर बन जाता है और सबके सामने उसकी तारीफ़ करता है, उसकी मेहनत के गुण गाता है, उसकी बहन बड़ी कलाकार बन गयी है है, और जब उसको पुरस्कार मिलता है तो वह उसका नाम पुकारती है, कार्यक्रम के जज उसको ट्राफी प्रदान करते हैं. उसको त्याग करने का ख़याल आता है. फिर अगले ही पल उसे महसूस होता है जैसे कि मुंशीजी उसके कोरे बदन पर कीड़े कि तरह रेंग रहे हैं. लगता है जैसे कि उसकी इज्जत नीलाम हो गयी है और वह मंदी की सब्जी कि तरह बिक गयी है , उसे बेचने वाला कोई और नहीं बलिक वह खुद है. सौदागर उसका मांस नोंच रहे हैं. उसका दिल भर आया. दिल का दर्द आँखों से बहने लगा. आंसूं टप-टप बहने लगे. आँखों से जन सावन बरसने लगा तो मुंशीजी धीरे –धीरे उसके पास आये , अपने हाथों से उसके आंसू पौंछे और फिर उसको सीने से लगा लिया. छमिया का दिल चाहा कि खूब जोर-जोर से रोये मगर ऐसा भी नहीं कर सकी. आंसूं भी रूंठ गए, हालात की तरह वे भी बेवफा हो चुके थे . मुंशीजी कह रहे थे-
-जो तुम्हारी किस्मत में नहीं लिखा उसे बेवजह आमंत्रण दे रही हो. इन आंसुओं को मंजिल की सीढियां बनाओ , कमजोरी नहीं. तुम कोई भी चीज फ्री में हासिल नहीं कर रही हो. बल्कि उसके बदले कुछ देने भी जा रही , अपना समर्पण, अपना विश्वाश ... तो तुम्हें ज़रा भी हीन भावना का शिकार नहीं होना चाहिए, इसके अलावा तुम्हें तो खुशी होनी चाहिये कि तुम अपने दम पर अपने परिवार को सदा –सदा के लिए मुफ्लिसी के भंवर से निकाल सकती हो. ऐसी कुव्वत भी हर किसी में नहीं होती. जहां तक बाजार की बात है तो वहाँ पर जिस्म का भाव इतना भी नहीं है कि तकदीर संवारी जा सके, जिस्म के बाजार में पचास –सौ रुपये में रोजाना शरीर बिकते हैं. और एक बार जो इस उलझन में फंसी फिर वह हमेशा के लिए उसमे फंस जाती है, दलाल उसे फिर कभी दल –दल से निकलने ही नहीं देते. मगर मैं तुमको संरक्षण प्रदान कर रहा हूँ, जब लोग जान जायेंगे कि तुम मुझसे जुडी हुई हो तो कोई भी तुम पर नजर नहीं गदायेगा, जब तक तुम फ्री दिखाई दोगी तभी ताल सब लार तप्कायेंगे इसके बाद सब किनारा कर लेंगे , हमारे बीच एक ईमानदार समझौता रहेगा, हजब तक तुम मुझे सुख दोगी तब तक मैं तुम्हारे परिवार को आर्थिक सहायता दूंगा, जो भी खर्च होगा वो सब वाहन करूँगा, इस बीच तुम्हें मेरी पत्नी की तरह रहना होगा , ये अलग बात है कि इस बात को अगर तुम छिपाकर भी रखना चाहो तो मुझे कोई एतराज नहीं, उलटा हम दोनों के लिए ही यह उचित रहेगा.
छमिया- इस बात की क्या गारंटी है कि मुझे पाने के बाद तुम अपना वादा पूरा करोगे ?
मुंशीजी- मैं तुम्हें हर तरह संतुष्ट करने के लिए तैयार हूँ., जैसे कहो मैं मानूंगा. तुम जिस तरह की गारंटी चाहो मैं देने के लिए तैयार हूँ. मैं ये कर सकता हूँ क्योंकि मैंने उतना ही वादा किया है. जो लोग सूरज, चाँद सितारे तोड़कर लाने की बात करते हैं, वे भावुकता में वादे तो कर देते हैं लेकिन उसे कभी पूरा नहीं पाते , क्योंकि वे सिर्फ करने के लिए वादे करते हैं और मैं निभाने के लिए . समझी.?

Sunday, January 17, 2010

भाग- ७
मुंशीजी अपनी ही शाली में कहते चले जा रहे थे, उन्हें यह भी भी ध्यान नहीं था कि इसी छमिया उर्फ छबीली के मन पर क्या बीत रही है , हांलाकि चेहरे पर मन के भाव साफ़ नजर आते हैं मगर उनको कोई देखने और समझने वाला भी तो चाहिए. छामिया ने उससे कहां-
-मुझे एक कहावत याद आ रही है – “कुत्ते की पूंछ को अगर १२ साल भी सीधी करने के लिए रखा जाए तो भी वह टेढी की टेढी ही रहटी है , तुम्हारा भी वही हाल है, कभी सुधर ही महिम सकते. चाहे मैं कुछ भी कह लूं, कुछ भी सुन लूं,. मुझे लगता है शायद तुम्हारा नाश्ता भी मेरी जली कटी सुनने के बाद ही होता होगा, इससे पहले तुम्हारा पेट ही नहीं भरता. मेरे ख़याल से तुम पच्चड़ हो चुके हैं, ऐसे लोगों को पच्चड़ ही कहा जाता है.
मुंशीजी- मैंने पहले ही कहा कि मुझको कोई फर्क नहीं पड़ता, मैं इस बात के लिए मन में कोई फर्क नहीं रखता, तुम भले ही मुझे पसंद नहीं करतीं लेकिन मैं तुम्हें चाहता हूँ.
छमिया- अच्छा जी, क्या इसीको चाहत कहते हैं ? क्या यही प्यार है ? मुझे रखैल बनाने का प्रस्ताव रखते हो और कहते हो कि मोहब्बत है, यह सौदेबाजी है मुंशीजी, तुम ठहरे दुकानदार . हर जगह पर नफ़ा नुक्सान ही देखते हो, तुम्हें प्यार में व्यापार नजर आता है.और इतना तो अब मैं भी समझ गयी हूँ कि सौदागरी करने वाला कभी प्यार नहीं कर सकता.
मुंशीजी- जिन बातों पर तुन जोए दे रही हो ये गलत नहीं हैं, अच्छी हैं, सच्ची भी , लेकिन यह भी जानलो कि किताबों और किस्से कहानियों में ही ये सब भला लगता है, सच्चाई से इसका दूर-दूर तक भी कोई लेना-देना नहीं होता. जब इस तरह के भाव हकीकत के धरातल से टकराते हैं तो टूटकर चूर-चूर हो जाते हैं, ये जमाना गिव एंड टेक का है. यानी कि कुछ देना तो उसके बदले कुछ लेना. जब आप दूकान पर जाते हैं तो पहले कुछ देने का ऑफर देते हैं फिर दुकानदार सामान देता है.
छमिया- मैं भी वही कह रही हूँ, तुम जैसा सौदागर कभी भी प्यार को नहीं समझ सकता, यह फकीरों का काम है, दीवानो का काम है, और तुम जैसे लोग सिर्फ जिस्म से मतलब लगते हैं, जिस्म का सौदा आप जैसे महानुभाव करते हैं.
मुंशीजी- तो फिर क्या करून, तुम्हें पाने के लिए बाबा जी बन जाऊं, सड़क पर आ जाऊं, दर –दर की ठोकरें खाता फिरूं, क्या यही प्यार है ? क्या इसी तरह तुम मानोगी मेरे प्यार को. तुम तो उस वाला हिसाब कर रही हो-‘रांड के पाँव सुहागन लागी, हो जा बहना मुझ जैसी. यानी कि जब एक सुहागिन ने विधवा के पाँव छुए तो उसने अपने जैसी होने का आशीर्वाद दिया. वही आशीर्वाद तुम मुझे दे रही हो , तुम जिस तरह परेशान हो, जैसे तुम्हारा परिवार एक-एक रुपये के लिए मोहताज है, तुम चाहती हो कि मैं भी प्यार के चक्कर में वैसा ही हो जाऊं, जबकि मैं इसके ठीक उलटा सोचता हूँ, मैं चाहता हूँ कि तुम्हारा पिता भी मेरी ही तरह कोई कारोबार करे, हर शुरुआत छोटी ही होती है जो बढते-बढते बड़ी हो जाती है, मेरी इच्छा है कि तुम अच्छे –मंहगे कपडे पहनो, गहने पहनो. मेरी इच्छा है कि तुम अपने भाइयों और बहनों को अच्छे स्कूल में पढाओ , उन्हें काबिल बनाओ, वे मजदूरी के भंवर से निकल जाएँ , बड़े अफसर बनें, खूब नाम और दाम कमाएँ. और यह सब संभव है , तुम्हें क्या करना है, कुछ नहीं . बस सुख लेना है, मैं तुम्हें आनंद ही एंड देना चाहता हूँ, मुझे तुमसे लगाव है तो तुम्हारी सारी जरूरतों को पूरा करने कि जिम्मेदारी भी मेरी है, मैं ये अच्छी तरह से समझता हूँ, बस अपने इन होठों का रस चखने दो, अपनी जवानी के सागर में गोते लगाने दो. क्या बिगड जाएगा तुम्हारा ?

Saturday, January 16, 2010

भाग -६
मुंशीजी उसे समझाते –समझाते थक गए मगर वह अपना शरीर सौपने के लिए राजी नहीं हुयी तो उन्हें याद आने लगे वे शब्द जो उन्होंने एक पत्रिका में पढ़े थे. शेखी बघारने के लिए उन्होंने खा दिया था कि वे काम शास्त्र के ज्ञाता हैं, असल में वे फुटपाथ पर बिकने वाली पत्रिकाएं छिप-छिपकर पढ़ा करते थे , एक बार उन्होंने पढ़ा था कि
जब “वह” सेक्स से दूर भागने लगती है तो समझो कि इसकी वजह लड़ाई, प्यार का न मिलना, अकेलापन वगैरह हो सकती हैं.
उससे प्यार जताएं, लेकिन जबर्दस्ती न करें.उससे बातें करें और अपने साथ सहज होने का मौका दें
महिला चाहे गृहिणी हो या प्रफेशनल, तमाम परेशानियां उनके लिए एंजॉय करने का स्कोप कम ही छोड़ती हैं. फिर रिसर्च से भी यह बात साबित हो चुकी है कि तनाव में रहने वाली महिलाओं को सेक्स में ज्यादा दिलचस्पी नहीं होती.इसके अलावा, सेक्स को लेकर नर्वस होना, प्रेग्नेंसी का डर, दर्द वगैरह की वजह से भी वे सेक्स से दूर रहती हैं.
उनके साथ प्यार से पेश आएं और उनके लिए कुछ स्पेशल करें। फोर प्ले पर ध्यान दें. सेंसुअल मसाज या हॉट वॉटर बाथ जादू की तरह काम करेंगे.
उन्होंने छमिया को अपने पास बुलाते हुए कहा-
-मेरे पास तो बैठो ,पहले ही अच्छा था कम से कम मेरे करीब तो थीं. दरअसल प्रेम के खेल को तुम कुछ अलग ही समझ रही हो, ये बिलकुल आसान काम है , डरने जैसी कोई बात ही नहीं है.फिर उसे पत्रिका में लिखी बात याद आ गयी -

उसे लाइट में कपड़े उतारने में दिक्कत होती है और सेक्स के तुरंत बाद कपड़े पहनने की जल्दी. ऐसा तभी हो सकता है, जब वह अपनी बॉडी को लेकर सहज न हों. अचानक वजन का बढ़ना, स्ट्रेच मार्क्स, दाग या पार्टनर के कॉमेंट्स उनमें हीन भावना जगा सकते हैं.
उन्हें किसी हीरोइन या मॉडल की तरह बनने को न कहें. उन्हें बताएं कि साइज जीरो न होने के बावजूद वह आपको खूबसूरत लगती हैं.
सेक्स ड्राइव बढ़ाने में खाने का भी अहम रोल है. 25 साल की एक लड़की ने शादी से पहले वजन घटाने के लिए खूब डाइटिंग की. शादी तक वह स्लिम तो हो गई, लेकिन शादी के बाद सेक्स में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं थी.कुछ फूड आइटम्स स्टैमिना बढ़ाकर, बॉडी टोन करके और त्वचा को ग्लो देकर सेक्स ड्राइव बढ़ाते हैं.
ध्यान रखें कि आपकी पार्टनर चॉकलेट, ओटमील, वॉलनट जैसी चीजें खूब खाएं. दरअसल, ये मूड लिफ्टर्स होती हैं साथ ही, आलू के चिप्स की जगह उन्हें सलाद दें और कोला की जगह पानी।

घबराहट, तनाव, डिप्रेशन को दूर करने के लिए ली जाने वाली दवाइयां भी महिलाओं की सेक्स में दिलचस्पी कम करती हैं. बर्थ कंट्रोल पिल्स महिलाओं की ऑव्यूलेशन साइकल में बदलाव लाती है और इस वजह से भी फिजिकल इंटीमेसी में उनकी इच्छा पर असर डालती है.
हमारी सोसाइटी में सेक्स को लेकर लड़कियों को कभी खुलने नहीं दिया जाता। ऐसे में उनके मन में सेक्स को लेकर तमाम सवाल व दुविधाएं रहती हैं, जिससे कई बार शादी के लंबे अर्से बाद तक वे अपने हसबैंड के साथ सहज नहीं हो पातीं , जबकि छमिया तो कुंवारी कली थी.उसका डरना स्वाभाविक ही था.उसने सुनी और पढ़ी बातों पर अमल करना शुरू कर दिया. उसने कहा-
-तुम बहुत खूबसूरत हो छमिया, तुम्हें देखकर मुझे बड़ी खुशी मिलती है. जब तुम करीब आती हो तो ऐसा लगता है जैसे मैं स्वर्ग में आ गया हूँ. एक बार मेरी बन जाओ ,अगर तुम्हें उजाले में शर्म आती है तो हम लाईट बंद कर देंगे .
भाग-५
छमिया ने मुंशीजी की तरफ ऐसे देखा जैसे वह उसकी बात से सहमत होने की कोशिश कर रही हो. फिर अपनी आवाज में सख्ती लाते हुए उसने कहा-
-मैं ऐसी –वैसी नहीं हूँ मुनशीजी , भले ही जान निकल जाए मगर मैं तुम्हारे हाथ लगने वाली नहीं हूँ. मैं अपने मोहल्ले की दूसरी लड़कियों जैसी नहीं हूँ. भले ही मेरे माँ –बाप गरीब हैं मगर वे इज्जतदार हैं. हम लोग रूखी –सूखी खाकर भी खुश हैं. मैं जानती हूँ तुम हमें उधार क्यों देते हो, मेरी खातिर ही न, वरना बिना स्वार्थ के तो तुन चीटीं को भी दाना डालने वाले नहीं हो .
मुंशीजी- तुम जो कहो कहती रहो, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता , मैं बस इतना जानता हूँ की जीवन में पैसा भी बहुत अहम रोल निभाता है, अगर तुम ये कमा सकती हो तो कमाती क्यों नहीं हो, लक्ष्मी तुम्हें बुला रही, तुम्हारा द्वार खटखटा रही है और तुम हो की उसे ठुकराए ही जाती हो, ऐसा गज़ब क्यों करती हो, आ जाओ मेरी बांहों में, तुम्हारी सब दरिद्रता दूर कर दूँगा. यकीन मानो मैं तुम्हारे लिए कुछ भी करने को तैयार हूँ.
छमिया ने नखरा दिखाते हुए कहा-
-अच्छा मैं भी तो जानू कि मेरे लिए तुमने अपने मन में क्या- क्या अरमान सजाकर रखे हैं ? क्या चाँद सितारे तोड़ने वाले हो मेरी खातिर ?चलो हटो, ये काम तुम्हारे बस का नहीं है, कोई नया लड़का ही ऐसी बात कह और कर सकता हूँ, जितनी देर मैं तुम्हारे पास खादी हूँ, अगर तुम्हारी जगह पर कोई हम उम्र लड़का होता तो हजारों वादे कर डालता और एक तुम हो कि बस बुड्ढों जैसी बात करने पर तुले हुए हो .मुंशीजी- ऐसा मत कहा करो, दिल को बुरा लगता है, मैं अभी जवान हूँ, जवान लड़कों से अच्छा परफोर्म कर सकता हूँ, मैं प्रेम करने का हर तरीका जानता हूँ, तुम्हें भी प्रणय क्रीडा में निपुण कर दूँगा. मेरा भरोसा करो, एक बार मुझे इस अमृत रस को पीने कि इजाजत दे दो.
छमिया- इस अमृत को तो वही पिएगा मुन्शीजी, जो मेरे दिल का राजा होगा, जो मेरे मन को कब्जे में करेगा , जो मेरा दिल चुराएगा . समझे. ये कोई प्रसाद नहीं है कि इसे हर किसीको बाँट डालूँ,
मुन्शीजी- तो क्या मैं नहीं हूँ तुम्हारे दिल में , मैं तुम्हें अच्छा नहीं लगता ? अगर ये बात सच होती तो अब तक तुम यहाँ नहीं खादी होतीं , चली गयीं होती अपने घर और वहाँ से अब तक कोई न कोई शिकायत करने आ गया होता , तुम भी समझी ?
छमिया- सही बात है , मैं भी सिर्फ इसलिए रुकी हूँ क्योंकि तुमने आत्महत्या करने कि धमकी दी है , मैं नहीं चाहती कि कोई बुजुर्ग मेरी वजह से मारा जाए,
मुंशीजी- ओहो , मैं कितनी बार समझा चुका हूँ कि मुझे ऐसा मत बोलो, मुंशीजी ही ठीक है, तुम तो मुंशी भी कह सकती हो, खुशी होगी मुझे .मैं तुम्हें जितना सुख दे पाऊंगा उतना दूरसा कोई नहीं दे सकता, जानती हो मैंने पूरा काम शाश्त्र पढ़ा है . पत्नी को बिस्तर पर कैसे खुश रखा जाता है इसका ज्ञान मुझसे ज्यादा किसीको नहीं हो सकता. तुम चाहो तो मैं तुमसे शादी करने के लिए तैयार हूँ. दूकान में से आधा हिसा तुम्हें दूँगा, तुम्हारे लिए अलग से प्लाट खरीदकर बढ़िया दोमंजिला मकान भी बनवा दूँगा. कोई टेंशन नहीं है. तारे –वारे तोड़ने वाली बात सब खोटी होती हैं, तुम जानती हो उनका हकीकत से कोई वास्ता नहीं होता.मगर मैं व्यवहारिक हूँ, कोई झूठा वादा नहीं करता . जो सच है वो सच है. झूठी बात करना मुझे पसंद नहीं , बस सबके सामने इस शादी को गुप्त रखना होगा.
छमिया- इसका मतलब तुम मुझे रखैल बनाकर रखना चाहते हो. सीधे –सीधे क्यों नहीं कह देते, मुझे भी घुमा फिराकर कहने कि आदत नहीं है. साफ़ कहती हूँ, मुंह पर कहती हूँ चाहे अच्छा लगे या बुरा. जूती मारती हूँ ऐसे प्लाट और दूकान पर . समझे ?

Friday, January 15, 2010

छमिया , भाग -०४
मुंशीजी के दिल पर पहाड़ सा टूट पड़ा , जिस कमसिन फूलझडी को वह अपने दिल में बसाना चाहता था , वही उसकी नजरों से ओझल हो रही थी, उसका दिल बैठने लगा. हिम्मत जुटाकर आवाज दी-
-छमिया , सुनलो छबीली . अगर आज गयीं तो मुझे ज़िंदा नहीं पाओगी. पीछे लौटो . आओं एक बार वरना मैं जान दे दूंगा . अब तो बस जान ही जायेगी ....
और फिर अगले ही पल चमात्कार हो गया, छमिया गेट बंद करके अंदर घुसी चली आ रही थी. मुंशीजी की आँखें हैरत से फटने लगीं, तो क्या छमिया सचमुच उससे प्यार करने लगी है , अगर ऐसा नहीं होता तो वह वापस क्यों आती ? और खुद ही गेट बंद करके क्यों आती ? क्या इसका मतलब वह भी जवानी का आनंद चखना चाहती है , वह इन्हीं ख्यालों में उलझा था की छमिया की खनखानाती आवाज आई –
-मरना है तो गंगाजी में जाओ न, मेरे मत्थे ह्त्या क्यों जड़ते हो ? बड़े आये जान देने वाले .
मुंशीजी- जब तक मैं तुम्हारे जोवन का रस नहीं चख लेता तब तक किसी भी हालत में मरने वाला नहीं हूँ, तुम समझती नहीं, किस हद से गुजर चुका हूँ जानती भी हो की नहीं ? अरे मेरे तन-बदन में आग लगी है और तुम मुस्करा रही हो, इसी मुस्कान, बस इसी मुस्कान पर तो मेरी जान अटकी हुई है.
छमिया- आप भी उल्लू बनाने में माहिर हैं मुंशीजी, क्या तुम्हारे छोटे भाई की पत्नी से तन की आग शांत नहीं होती जो मेरे पीछे पड़े हुए हो. मैं भी सब कुछ जानती हूँ तुम्हारे बारे में , तुम्हारा भाई दूकान में सोता है और तुम उनकी पत्नी के साथ गुलछर्रे उड़ाते हो ..
मुन्शीजी- तो क्या मुफ्त में मजे उडाता हूँ, ये सारी दौलत किसके लिए है ?मगर अब उसमे दम नहीं रहा , कहाँ वह बूढ़ी खाल और कहाँ तुम करारा माल . तुम्हारे साथ प्यार करने में अलग ही मजा आएगा.
छमिया- जब वह कड़क थी तो मजा आता होगा ?
मुंशीजी- हाँ, तब की बात अलग थी, तब तो वह ऐसी लगती थी जैसे की इलाहाबादी अमरुद, वो गदराया बदन, वो कसी हुई जवानी , मगर तुमसे ज्यादा अच्छा नहीं. जिस तरह तुम्हारा आकर्षक सीना है वह मैंने बहुत कम देखा है, मैं इन गोलाइयों का बड़ा शौकीन हूँ, इन्हें छूने और मसलकर प्यार करने की बड़ी इच्छा है. आओ ना करीब आकार बैठो, मैं तुम्हारी सभी तकलीफों को दूर कर दूंगा.
छमिया- मैंने सुना है अपनी जवानी में तुम बड़े रंगीन मिजाज थे, यहाँ तक की जब तुम्हारे भाई की शादी हुई तो उसे तो शराब पिलाकर तुमने अलग सुला दिया था और दुल्हन के साथ तुम्हीं ने सुहागरात मनाई थी ? सच है ये ?
मुन्शीजी- हाँ, छमिया. मैं तुमसे कोई बात नहीं छिपाऊंगा. यह भी सच है की तुम्हारे मोहल्ले में दो चार को छोड़कर सभी महिलाओं के साथ मैं मौज मस्ती कर चुका हूँ, मगर जबसे तुम पर नजर पडी है, यहीं पर आकार ठहर गयी है, तुम्हारे सिवाय कोई निगाह में चढता ही नहीं है.
छमिया- मेरा सपना छोड़ दो मुंशीजी, मैं तुम्हारे हाथ आने वाली नहीं हूँ, मैं जानती थी की तुम ऐसे ही कमीने हो इसीलिए मैंने कभी खुद कोई चीज तुमसे उधार नहीं ली, वरना उधार के बदले इज्जत की मांग कर बैठते. है न ?
मुंशीजी- तुम कुछ भी बोलो छमिया, मैं बुरा नहीं मानता. मुझे हर बात अच्छी लगती है. तुम भले ही जूतों से मार लो लेकिन एक बार, ऐ छमिया. बस एक बार इस यौवन का आनंद उठाने दो. मुझे मस्ती के रंग में रंग जाने दो.

Tuesday, January 12, 2010

छमिया के सवाल

रसिया के जवाब

भाग-०१

प्रेम ,रोमांस, रहस्य , सस्पेंस , शिक्षा , और मनोरंजन से भरपूर मर्मस्पर्शी धारावाहिक कहानी . एक अंक पढ़ने के बाद आप जिसका हर अंक पढ़ना चाहेंगे

उसका मादक यौवन बड़ा रसीला था. सीने के उभार तो ऐसे थे जिन्हें कोई एक बार देखले तो दीवाना हो जाए, होठों से जैसे शराब के जाम छलकते थे, आँखें ऐसी जिनमें सागर भी डूबने को मचल उठे, ज़ुल्फ़ ऐसी कि घटाएं भी शर्मा जाएँ और जवानी ऐसी कि स्वर्ग की अप्सरा भी पनाह मांगे, जुबान ऐसी कि शहद की मिठास भी फीकी पड़ जाए. उस अलबेली हसीना का नाम था छबीली . लेकिन मौहल्ले के ज्यादातर लोग उसको छमिया कहकर ही पुकारते थे. उम्र कि कमसिन ही थी मगर हर समय उसके इर्द गिर्द भँवरे मंडराते ही रहते थे. नौजवान तो नौजवान , बूढ़े भी उसकी एक झलक पाने को बेताब रहते थे. वह अजूबा थी. रईस लोगों ने छमिया के करीब आने के लिए उसके किसान पिता को मुंह माँगा कर्ज दे रखा था, वह भी कम ब्याज पर . मुंशी रामलाल तो अपने सगे भाई पर भी ब्याज कि रकम नहीं छोड़ते थे मगर छमिया के पिता से कभी ब्याज कि बात तक नहीं की. न मांगने पर भी वे हजार दो हजार रुपयों का कर्ज दे दिया करते थे. उनकी बड़ी दूकान थी , वहाँ पर हर चीज मिलती थी, मगर छमिया के लिए किसी चीज का कोई मोल नहीं था. छमिया जब भी दूकान पर जाती तो मुंशी रामलाल उसे बडी हसरत से निहारते , बड़े चाव से बुलाते. खाने पीने की किसी भी चीज पर मानो छमिया का जन्मसिद्ध अधिकार था. वह कुछ भी लेकर जा सकती थी, उन चीजों के पास न तो उससे नकद लिए जाते थे और न ही उसके पिता के एकाउंट में ही लिखे जाते थे. वह हमेशा मुस्कराते हुए दूकान में प्रवेश करती थी और मुंशीजी के सीने पर बिजलियाँ गिराकर चली जाती थी. राम्लाम नाम के ही मुंशी थे, वरना वे इस दूकान के मालिक थे. उनकी कोई संतान नहीं थी. उनकी शादी भी कम उम्र में ही हो गयी थी और फिर जल्द ही उनकी पत्नी का देहांत भी हो गया, इसके बाद उन्होंने फिर कभी विवाह नहीं किया. अपनी ही दूकान में उन्होंने अपने छोटे भाई को भी रख लिया था, देखा जाए तो सब संपत्ति उसके भाई के लिए ही थी. मगर उम्र के ५० बसंत देख चके मुंशी रामलाल के दिल में अब कुछ-कुछ होने लगा था. छमिया ने उनके मस्तिष्क में भूचाल सा मचा दिया, चाहकर भी वे अपने दिल से उस चंचल सूरत को निकाल नहीं पा रहे थे. उस दिन जब छमिया अपनी किसी गिरी हेई चीज को उठाने के लिए नीचे झुकी थी तो उसके यौवन उभार देखकर मुंशीजी का कलेजा मुंह को आ गया, मन में चिंगारी सी उठने लगीं, जी में आया कि आगे बढ़कर छमिया को अपने गले से लगा ले , उसकी अदाओं ने मुंशीजी को दीवा बना डाला था , सोचने लगते कि इस दौलत का आखिर क्या होगा. उन्होंने अथाह संपत्ति कमाकर रखी थी. इतनी दौलत में से अगर कुछ हजार या लाख खर्च भी हो जाएँ तो क्या फर्क पड़ता है. मगर छमिया जैसी हूर परी अगर उनके जीवन में आ जाती है तो जी ते जी स्वर्ग पाने जैसा सुख मिल सकता है. यह मानव तन पाने का सौभाग्य सफल हो सकता है, वरना ऐसे ही आये और ऐसे ही चल पड़े जैसी स्थिति हो जायेगी, फिर उनको ख्याल आता है अपनी उम्र का . वे ५० के और छमिया मुश्किल से १६ साल कि. कितना अंतर है उम्र में. फिर वे गीत गुनगुनाने लगते. ना उम्र कि सीमा हो , ना जन्म का हो बंधन , जब प्यार करें दो दिल तो देखे केवल मन. यही रीत बनाकर तुम मेरी रीत अमर कर दो. होठों से छू लो तुम , मेरे गीत अमर कर दो. और फिर अगले ही पल उनको लवगुरु कि याद आयी, लव गुरु उर्फ बटुकनाथ चौधरी ने जैसे अपनी छात्रा के साथ विवाह रचाकर मिसाल पेश कि, वैसे वे भी तो कर सकते थे. आखी अब भी वे पूरी तरह फिट हैं और छमिया को बेड पर पूरा सुख दे सकते हैं.फिर उन्होंने आईने में अपना अक्ष देखा , लवगुरु से तो ठीक ही दीखते थे. जब उस रोज छमिया ने कोई सामान नहीं लिया तो मुंशीजी ने पूछा-

-क्या बात है छम्मो , आज कुछ नहीं खाओगी.

छमिया- नहीं . आज कुछ भी खाने का मूड नहीं है.

Monday, January 11, 2010

मोहब्बत , भाग अंतिम

और वह मन ही मन राज को चाहने लगी थी, अपना समझने लगी थी लेकिन राज ऐसा निर्मोही था कि उस पर ध्यान ही नहीं देता था, वह समाजसेवा में ही मस्त था, पढ़ने के बाद जो समय मिलता , उसमे वह समाज कि भलाई के कार्य किया करता था, उसके पास प्यार मोहब्बत जैसी फालतू चीजों के लिए वक्त ही कहाँ था, जब कभी स्वीटी का मुकाबला राज से होता तो वह इस तरह नादाँ बनकर निकल जाया करता था जैसे कि वह उसे जानता ही न हो. पड़ोसी होने के कारण जान पहचान तो थी लेकिन राज बेरुखी भरा व्यवहार ही करता था. इससे स्वीटी के मन कि बेचनी बढ़ जाया करती थी, उसके मन का क्षोभ बढ़ता जा रहा था, उसे गम इस बात का था कि राज उसके सौंदर्य का अपमान कर रहा था, उसके जैसी बला कि सुन्दर लड़की कि तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखना हुस्न का अपमान नहीं तो और क्या था ? वह दुखी होकर राज को सबक सिखाने के बारे में सोचने लगती, उसका घमंडी मन आहात हो चुका था. वह पहले से ही जिद्दी थी मगर राज के रूखेपन ने उस आग को और भी हवा दे दी थी, तभी तो उसने अपनी सहेलियों से मिलकर राज को मजा चखाने कि योजना बनाई थी. यह उसके षड़यंत्र का ही हिस्सा था कि पहले राज को अपने यौवन के जाल में उलझाया जाए और फिर उसका दिल तोड़कर उसे हमेशा के लिए तदपने के लिए छोड़ दिया जाए. इसी पर अमल करके पहले उसने राज के साथ अंतरंग रिश्ते बनाए और फिर तुरंत रंग बदलकर उस पर जबर्दस्ती करने का आरोप लगाने लगी. राज सचमुच डिस्टर्ब हो गया , लेकिन फिर भी उसने स्वीटी पर एक भी आरोप नहीं लगाया, वह खुद झुकता रहा मगर एक बार भी उसने स्वीटी पर आरोप नहीं लगे , उसकी शालीनता देखते ही बनती थी.वह गज़ब का धैर्यवान था. यूं तो स्वीटी उस पर बहुत गंभीरतापूर्वक आरोप लगा रही थी लेकिन धीरे धीरे उसको यह एहसास होने लगा कि राज के साथ वह कुछ ज्यादा ही ज्यादती कर रही थी,भले ही मन मन में वह राज से कितनी भी जलन रखती थी, लेकिन थी तो आखिर लड़की . और लड़कियों का मन बहुत भावुक होता है, स्वीटी भी आहिस्ता-आहिस्ता यह समझने लगी कि राज जैसा सच्चा और अच्छा लड़का इस दुनिया में मिलना मुश्किल है. वह सोच ही रही थी कि उसे राज कि आवाज सुनाई दी-

-मैं बहुत नादाँ हूँ , बिना सोचे समझे ही तुम्हें अपने दिल में बसा बैठा, तुमको अपनी बना बैठा, अपने दिल में मोहब्बत का मंदिर बनाकर उसमे तुम्हारी तस्बीर लगा बैठा. मैं क्या जानता था कि मैं तुम्हारे काबिल नहीं हूँ, तुम्हारे दिल को मेरे कारण जो ठेस पंहुची है, मुझे इसका बहुत अफ़सोस है. मैं कोशीश करूँगा कि इस तकलीफ को थोड़ी सी कम कर सकूं. यह संभव भी है कि नहीं, पता नहीं.

स्वीटी- चुप रहिये राज... अब मैं कुछ नहीं सुनना चाहती.

राज- पता नहीं तुम मुझे कभी माफ कर पाओगी भी नहीं ? सारी गलती मेरी ही है, जब तुम मना कर रही थीं तो मुझे छोड़ देना चाहिए था. मैंने ही तुम्हारी हर बात मानने का वादा किया और मैं ही भूल गया, मैं तुमसे प्यार का दावा भी करता रहा और तुम्हारे दिल कि भावनाओं को भी नहीं समझ पाया, लानत है ऐसी मोहब्बत पर. सच कहती हो तुम, मैं बलात्कारी ही हूँ, मुझे सजा होनी ही चाहिए. मेरी शिकायत दर्ज होनी चाहिए. दस-बीस साल जेल की हवा खाऊंगा तो अक्ल आएगी.

स्वीटी- नहीं राज. ऐसा मत कहिये. तुम बहुत अच्छे हो , तुम गुनाहगार नहीं बल्कि देवता हो. मोहब्बत के देवता. म्फब्बत के मसीहा हो तुम, तुमने मेरी आँखें खोल दीं, मोहब्बत कि असली परिभाषा बता दी है तुमने, आज मैंने जाना कि जो मोहब्बत करता है वह अपने चाहने वाले पर आरोप लगा ही नहीं सकता, उसके अपने महबूब में कुछ नेगेटिव दिखता ही नहीं, दिखेगा भी कैसे ? वह तो हर समय महबूब की मोहब्बत में खोया रहता है, मुझे माफ कर दीजिए, मैं तुम्हारी मोहब्बत की परिक्षा ले आरही थी, मैंने ही तुम्हें जिस्मानी संबंधों के लिए उकसाया और फिर तुम्हें भड़काने के लिए ऐसे गंभीर आरोप लगाए , मगर तुम तो मोहब्बत के सच्चे मसीहा निकले .... समाप्त ...

कल से पढिये एक और धारावाहिक कहानी.

Sunday, January 10, 2010

मोहब्बत , भाग-७४

मगर चाहकर भी कोई तरकीब निकल नहीं पा रही थी, मन में यही भाव उठते थे की अब वह जरूर किसी बड़ी उलझन में फंस गया है, उसे यह बात भी अच्छी तरह से पता थी की एक क़त्ल की सजा भी फांसी ही होती है और दो क़त्ल की सजा भी वही , इसलिए उसके मन में इच्छा जाग्रत हुई की क्यों न वह दूसरी बार भी स्वीटी के साथ मधुर शारीरिक सम्बन्ध बनाए , हो सकता है इस बार उसे अच्छा लगे और उसकी शिकायत प्रशंसा में बदल जाए, और अगर वह उसकी शिकायत भी दर्ज कराती है तो बाद में भी उतनी ही सजा होगी जितनी की अब होगी. तभी तो उसने दो पैग और तैयार किये , स्वीटी की तरफ गिलास बढाता हुआ बोला-

- आई एम् सोरी यार, मैं कुछ समझ नहीं पाया था, मेरी मति मारी गयी थी, चलो गम गलत करते हैं, थोड़ा सा इंजॉय करते हैं. शायद तुम्हें भी इसकी आवश्यकता है. ले लो.

स्वीटी- नहीं मैं अब नहीं पीना चाहती. मुझसे सहन नहीं हो पायेगा.

राज- उस रात तो तुम पैग पर पैग चढाये जा रही थीं, अब अचानक क्या हो गया, मुझे पिलाना सिखाकर तुम खुद क्यों पीना भूल रही हो. जब दांत थे तो चना नहीं और चने अब हैं तब दांत नहीं हैं. एक पैग ली लीजिए , अच्छा फील होगा.

स्वीटी- मैं कुछ भी समझ नहीं पा रही हूँ, मैं तुमसे क्यों बात कर रही हूँ, क्यों लड़ रही हूँ और लड़ने के बाद भी यहाँ पर रुकी क्यों हूँ, यह सब मेरी समझ से परे है.

राज- इसीलिए तो कहता हूँ, इसे पीलो , थोड़ी देर में ही मजा आने लगेगा .

कुछ समय तक तो स्वीटी राज की तरफ देखती , ठीक ऐसे जैसे की अजनबी की तरफ देख रही हो. फिर उसने हाथ में प्याला थाम लिया. यह राज की उम्मीद से परे था. उसे लगा की स्वीटी थक गयी है, पहली बार उसने शारीरिक सम्बन्ध बनाए हैं इसलिए हो सकता है की वह थक गयी हो और तभी इस तरह के बयान दे रही हो. उसने फैसला किया की वह उसे सिर्फ हंसायेगा, मौज मस्ती कराएगा और फिर उसको घर छोड़ आएगा. स्वीटी ने अगेन चीयर्स बोलने ने बाद पीना शुरू कर दिया. जब उसने पैग खत्म किया तो राज ने सिगरेट सुलगाकर उसके हाथ में दे दी . अब वह धुएं के छल्ले उड़ा रही थी, राज के मन में वही द्रश्य बार- बार उमड़-घुमड़ रहे थे जब उसने स्वीटी के होठों से होठ सटाकर एक दीर्घ चुम्बन लिया था तो वह कैसे कसमसा गयी थी , कितने जोश और जज्बात भरे क्षण थे वे, वह कितना खुश था. स्वीटी का नग्न जिस्म उसके दिलो-दिमाग पर बिजली सी गिरा रहे थे. वह उन क्षणों को बेकार समझ रहा था जो उसने अब तक स्वीटी के साथ नहीं बिताए ये. स्वीटी जब सांस लेती तो उसका सीना ऊपर नीचे होता था, राज की आँखों में वासना की चमक उभर उठती थी, वह आहिस्ता आहिस्ता उन यौवन के उभारों को दबाने लगता था, उनको चूसने की कोशिश करने लगता था, बड़ा ही रोमांटिक मंजर था . राज के साथ-साथ खुद स्वीटी भी मदमस्त थी. हांलाकि उसे राज ने अपने कब्जे में कर रखा था मगर वह अपने आपको छुडाने का महज नाटक रही थी, वह सिर्फ मोहब्बत के पक्ष में ही नहीं थी बल्कि जिस्म की पूरी गर्मी को शांत करना चाहती थी. राज उस नई दुनिया से परिचित तो नहीं था लेकिन उसे वह जग सबसे न्यारा और प्यारा जरूर लग रहा था. स्वीटी का बदन बेहद खूबसूरत था, फिल्मों की कई बड़ी नायिकाएं भी इतना सुन्दर जिस्म नहीं रखती होंगी जितना की स्वीटी का था, राज का जिस्म मजबूत और मनमोहक था, ऐसा लगता जैसे उसने जिम में अथक परिश्रम करके उसे बनाया हो, यही एक कारण था की स्वीटी का दिल उस पर आ गया.

Saturday, January 9, 2010

मोहब्बत के मसीहा , भाग-७३

क्या मैंने ही कहा था की आओ , आकर मेरे साथ सेक्स करो, प्रेम करो . क्या मैंने ही कहा था की शराब और प्यार से दोस्ती करनी चाहिए . अब तो कुछ याद करो, अब तो सोचो की ये शब्द किसके हैं .
स्वीटी- मेरी जान पर बन आई है और तुम क्या कह रहे हो , मेरी कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है . अब मैं जाना चाहूंगी , मेरा दिल कहता है की कुछ गलत हो रहा है . और इस गलत -सही के चक्कर में मेरी जान भी जा सकती है. मुझे अगर ज़िंदा देखना चाहते हो तो यहाँ से जाने दो.
राज- मेरी स्वीटी, मेरी जान , मुझे लगता है कुछ गलतफहमी हो रही है तुमको. मैं यार हूँ तुम्हारा, प्यार हूँ तुम्हारा . इस प्यार को इस ठुकराना ठीक नहीं है. मैं अपनी जान से भी ज्यादा मोहब्बत तुमसे करता हूँ, मेरा यकीन क्यों नहीं मानते हो. मैं अब एक पल भी जी नहीं पाऊंगा. हर घड़ी , हर वक्त बस तुम ही तुम दिखाई दोगी , तुम मेरे दिल में धडकन बनकर समा चुकी , मेरे जिस्म में लहू बनकर बहने लगी हो . अब कैसे जीऊँगा मैं, मेरे प्यार की कुछ तो कद्र करो , मेरी मोहब्बत का ऐसा इम्तहान भी मत लो. मुझे अपनी पलकों में बसालो , मेरे जीने का मकसद हो तुम. मुझे सिर्फ तुम्हारे जिस्म से नहीं , तुम्हारे वजूद से भी इश्क हो गया है.मैं तुम्हें दिल की गहराइयों में बसा चूका हूँ. तुम्हें अपनी मान चूका हूँ, मैं तुम्हारे मान - सम्मान , स्वाभिमान और हर विचार हर इच्छा का दिल से सम्मान करूँगा , हमेशा तुमको अपनी आत्मा में बसाए रखूँगा .

राज की तड़प सुनकर स्वीटी मन ही मन बहुत खुश हो रही थी, यही द्रश्य तो वह चाहती थी, उसका मकसद यही तो था. वह राज को खून के आनसो रोते देखना चाहती थी, अपने मकसद में वह काफे हद तक कामयाब भी हो रही थी, मानव स्वभाव ऐसा ही होता है, जब प्यार करते हैं तो बहुत प्यार करते हैं और नफरत की तो हद पार कर देते हैं, बेचारा राज तो ऐसे भंवर में उलझा था की उसे कुछ भी समझ में नहीं आता था, वह यही सोचता की आखिर उससे भूल कहाँ हुई, पहले तो स्वीटी इसलिए नाराज होती थी की वह सेक्स के प्रति उदासीनता बरतता था और वही स्वीटी अब इसलिए नाराज होने का दावा कर रही थी उसने जिस्मानी सम्बन्ध क्यों बनाए , मगर उसकी क्या गलती थी, उससे तो स्वीटी ने ही ऐसा करने के लिए कहा था, फिर के व्यवहार में अचानक बदलाव क्यों आ गया ? आखिर ऐसी क्या परेशानी थी जो बातचीत से हल नहीं हो सकती. क्या स्वीटी का स्वभाव ही ऐसा है , और अगर यही सच है तो क्या ऐसी लड़की के साथ सारा जीवन बिताया जा सकता है . क्या ऐसी लड़की को अपना जीवन साथी बनाया जा सकता है ? अब वह कुछ अलग अत्रीके से सोचने लगा और स्वीटी अपने चेहरे पर उदासी का नकाब ओढकर बैठी रही . राज ने उसे आख़िरी बार समझाने की कोशिश की, उसके करीब गया, और कंधी पर सर रखकर बोला-

- क्या तुम एक बार , सिर्फ एक बार मुझे माफ नहीं कर सकतीं ?

स्वीटी- तुम तो कहते हो की मैंने कोई गलती ही नहीं की है, तो फिर गलती किस बात की ? माफी तो मुझे मांगनी चाहिए.

राज- तुम माफी क्यों मांगोगी ? मैं हूँ ना ... मैं कर लूँगा ये सब. बस एक बार मुझे माफ करदो. सिर्फ एक बार , फिर मैं तुम्हें जीवन भर प्यार कर लूँगा, तुम्हारे क़दमों में हर खुशी डालूँगा , हर सुख दूँगा. कोई भी तकलीफ नहीं होने दूँगा. मेरा दावा है.

स्वीटी- मैं तुम्हारे व्यवहार से दुखी हूँ, मुझे एकांत चाहिए प्लीज.

राज की समझ में नहीं आरहा था की वह क्या करे , दिल जोर-जोर से धड़कने लगा ,. उसको अनहोनी की आशंका सताने लगी, सोचने लगा की अब वह ऐसा क्या करे की जिससे स्वीटी अपने पुराने रंग ढंग में लौट आये

-


Thursday, January 7, 2010

मोहब्बत , भाग-७१

जो मर्द होते हैं वे तो कभी भी ऐसी घटिया बात नहीं सोचते . और जो कायर होते हैं उसकी विचारधारा ही नेगेटिव होती है.

राज-समझ गया जैसे की आपकी होती है. जैसे आप बोल रही हैं. पहले कहती थीं की सेक्स का मतलब प्यार होता है और अब यह सिद्ध करने पर तुली हुई हो की सेक्स का अर्थ बलात्कार होता है . मैं भी कितना नादाँ हूँ, जो अगली ही मुलाक़ात में तुम पर अपनी जान छिडकने लगा, तुम्हें अपना सब कुछ समझ बैठा. और तुम भी तो कहती थीं की मेरे बिना जी नहीं पाओगी, तुम्हारा तो बयान था की मुझे पूजने की हद तक चाहती हो, अगर इसमें ज़रा भी सच्चाई है तो फिर अब तुम्हारे बयान इतनी तेजी से कैसे बदल रहे हैं, क्या कारण है की मेरी किसी भी बात पर तुमको यकीन नहीं हो रहा, तुम्हारा तो दावा था की दुनिया जितनी मोहब्बत तुम मुझसे करती हो उतनी किसी से भी नहीं करतीं यहाँ तक की किसी देवता से भी नहीं.

स्वीटी- जी हाँ, ये सच था, मगर तुमने क्या किया ? क्या मेरे उस भरोसे की ज़रा भी इज्ज्जत की ? क्या मुझे इस काबिल समझा की मैं हमेशा उस प्यार और आदर को बरकरार रख सकूं. ?

राज- ऐसा कौन सा पहाड़ टूट पड़ा ? ऐसा क्या हो गया की जो व्यक्ति कुछ क्षण पहले देवता था वह अगले ही क्षणों में शैतान बन गया. ऐसा कर दिया ?

स्वीटी- यही तो दुःख की बात है की इतनी बड़ी बात तुम्हें कुछ नहीं लग रही है.

राज- जब मैं इसकी गंभीरता तुम्हें बता रहा था तब मानी थी तुमने मेरी बात ?तब तो परिहाषा ही बदल डाली थी और अब कहती हो की आसमान टूट गया है, की जमीन फट गयी है, जाओ , मुझे फांसी पर चढ वादों . करादो मेरी एफ आई आर , वरना मैं खुद पुलिस स्टेशन चला जाऊँगा. करदो अपने आपको पुलिस के हवाले. चिंता मत करो , मैं तुम्हारा नाम नहीं बताऊंगा. तुम्हें बदनाम करने का मुझे कोई शौक नहीं है. मैं खुद इस गुनाह की सजा भुगातुन्गा .

स्वीटी- मैं कुछ नहीं जानती, सिवाय इसके की तब मैं नादाँ थी और ...

राज- और अब पी एच डी करली है तुमने ? यही न ? अब तुम शेक्सपियर की भी उस्ताद हो गयी हो. मुझे दोबारा तलब हो गयी है, प्यार करना है तो बोलो या फिर घर चलते हैं. तुमने मेरे मुंह को खून लगा दिया है, मुझे जन्नत का दरवाजा दिखाकर हमेशा के लिए दरवाजे बंद कर रही हो, मेरे मासूम दिल को ऐसे ना तोडो प्लीज. मुझे अपनी बांहों की कैद में रखलो, मुझे अपनी स्याह जुल्फों की छाँव में बुलालो . सजा ही देना चाहती हो तो कुछ इस तरह की दो, जिससे लगे की मैंने प्यार की खातिर ही कुछ खोया , मगर यह क्या तुम तो जा रही हो....

स्वीटी- जी हाँ, मैं जा रही हूँ, तुम यहाँ बैठकर भजन कीर्तन करो. बाजार से चाहो तो किसी पेशेवर लड़की को बुला सकते हो, उसके साथ बैठकर इस तरह का प्यार कर सकते हो, किसीको कोई ऐतराज नहीं होगा , ना ही मुझे और ना ही उस बाजारू लड़की को. अगर कोई खानदानी लड़की होगी तो वह तो अपने मान , सम्मान , स्वाभिमान और इज्जत के लिए लड़ेगी ही.

अगर तुम्हारी इज्जत पर कोई तकलीफ आती है तो तुमसे पहले मैं खुद अपनी जान पर खेल जाऊँगा, मैंने तुम्हारा कहना मानकर ही तुम्हारे साथ प्रणय क्रेडा आनंद उठाया है औअर अगर तुम कहो की मैं आग के दरिया में कूद जाऊं तो वो भी करुंगे. मेरी तरफ से हर ओप्शन खुला है, इक बस तुम्हारे आदेश का इन्तजार है

Wednesday, January 6, 2010

मोहब्बत , भाग-७०

राज- और मैंने यही तो किया, फिर जो कुछ हुआ सो हुआ , मैं क्या कर सकता हूँ, मजा तुमने भी तो लिया.सच कहूँ तो तुमने मुझसे भी ज्यादा आनंद लिया है, भूल गयी उन क्षणों को जब तुमने मुझे कसकर पकड़ लिया था और मेरे इस संवेदनशील अंग पर तुमने मालकिन की तरह कब्जा जमा लिया था.

स्वीटी- नहीं, यह झूठ है, मैं इसे देखते ही डर गयी थी, पसीने- पसीने हो गयी थी. मैंने साफ़ इनकार भी क्र दिया था लेकिन तुम नहीं माने , तुम जोर जबरदस्ती करने लगे थे. अगर मैं कोई सख्त कदम उठाती तो भी तुम मानने वाले नहीं थे. मैंने महसूस किया की तुम्हारी आँखों में खून उतर आया था. मैं अगर ज्यादा इनकार करती तो संभव है तुम मेरी जान ही ले लेते .

राज- तुम्हारी तबियत तो ठीक है, मैं अपनी जान की जान लूँगा. अरे अगर राह में कोई चींटी भी घायल हो जाए तो मैं अपने सीने में दर्द महसूस करता हूँ.अगर रास्ते में कोई पक्षी भी परेशान दिखा तो मैं उसको अस्पताल तक पहुचाता हूँ, इसके बावजूद तुम कहती हो की मैं तुम्हारी जान ले लेता. यह हास्यास्पद मगर मुझे तकलीफ पहुचाने की बात है .

राज अपने दिल को मसल रहा था और स्वीटी मन ही मन खुश हो रही थी. राज की तकलीफ उसको खुशी प्रदान कर रही थी. किसी अजीब दुनिया है ये, यहाँ पर लोग अपनी खुशी से कम खुश होते हैं और दूसरों के दुःख से ज्यादा खुश होते हैं. यह आम बातें हैं जो संभवतह हर जगह, हर शहर और हर देश में मिल जायेंगी. राज अपने आपको ही कोस रहा था, काश, वह सपना के साथ ही नहीं आता तो पार्टी में उसकी मुलाक़ात स्वीटी से भी नहीं होती और स्वीटी के साथ उसकी इतनी नजदीकियां भी नहीं बढ़तीं, ना ही अब उसे इस स्थिति का सामना करना पड़ता. वह उस मन्हूश घड़ी को कोसने लगा जब उसने शराब को हाथ लगाया और फिर उसीके चक्कर में वह स्वीटी के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध बना बैठा, अब उसे समझ आया की वह जो भी अपने बुजुर्गों से सुना करता था वे सब बातें ठीक थीं. वह स्वीटी के असली रंग को पहचान ही नहीं पाया था. और अब जाना भी तो बहुत देर हो चुकी है. राज ने कुछ सोच समझकर कहा-

-अब जो हुआ सो हुआ उसे तो वापस लाया नहीं जा सकता मगर तुम जो भी बोलो मैं करने के लिए तैयार हूँ. तुम कहो तो पैर पकड़ कर माफी मांग लूं. तुम कहो तो मैं शादी करने के लिए तैयार हूँ, इसके लिए मुझे कोई जल्दबाजी भी नहीं है, जब चाहोगी हम कर लेंगे. कोई और विकल्प हो तो वो भी कहो .

स्वीटी- एक बार क़त्ल करके सोरी बोलने से कुछ नहीं होता. जो इज्जत एक बार चली गयी वह तो वापस नहीं आती.

राज- इज्जत की बात तब आती है जब कोई जबरदस्ती करता है, धोखे से करता है, या बहला फुसलाकर करता हिया. तुम्हारे और हमारा मामला अलग है. यहाँ जो कुछ भी हुआ वह आपसी सहमति के बाद हुआ , तो इसको प्यार कहते हैं, इश्क कहते हैं. मैं पहले भी तुम्हारे बेहद इज्जत करता था और अब भी बहुत इज्जत करता हूँ, तुमसे प्यार करता हूँ मैं.

स्वीटी - कहना आसान और करना बहुत नुश्किल होता है, अब मैं अपने घर किस मुंह से जाऊं , कैसे नजर मिलाऊँ लोगों से, औरत के पास और होता है क्या है, मैंने इस उम्र तक इस कुमारी को बचाकर रखा था और तुमने सब तहस-नहस कर दिया. बर्बाद कर डाला मुझे . लूट ली मेरी इज्जत.

राज- तो फिर एक ही रास्ता बचता है , मेरा गला दबा दो , उतार दो मौत के घात. मैं कुछ नहीं कहूँगा. तुम्हारी खातिर मैं ऐसा करने के लिए भी तैयार हूँ. कहो तो मैं खुद ही जहर खाकर जान दे दूं, मगर तुम खुश रहो.

स्वीटी- जान देने की बात तो कायर करते हैं. मर्द नहीं.






Tuesday, January 5, 2010

मोहब्बत , भाग-६९
जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल आप कर रही थीं , उससे तो ऐसा लगता था जैसे की तुम खुद मुझसे बलात्कार करने वाली हो. तुम मुझे आमंत्रित कर रही थीं, प्यार और सेक्स के गुण सिखा रही थीं, अगर मेरी जगह पर कोई और होता तो जो काम अब हुआ है, वह तो बहुत पहले ही हो चुका होता. तुम्हें ध्यान है तुम मुझसे कह रही थीं-
प्यार का इजहार-ओ-इकरार और फिर रोजाना की मुलाकातें, एक-दूसरे को जानने-समझने की कोशिश, कभी रूठना, कभी मनाना और भी न जाने क्या-क्या...! लेकिन इसी राह में कुछ अनकही बातें ऐसी भी होती हैं, जो बार-बार दिल में कसक पैदा करती हैं। दिल कहता है बस उनके साथ, उनके हाथों में हाथ लेकर, उनकी आँखों में आँखें डालकर देखते रहें और समझते रहें अनकहे शब्दों की जबाँ।
राज- याद आये न , यही शब्द थे न ?
स्वीटी- तुम बोलते रहो , मैं याद करने की कोशिश करती हूँ.
राज- ठीक है . तुमने आगे कहा था-

सिर्फ उनके पास बैठने और निगाहों की जबाँ समझने तक ही आपका दिल नहीं रुकता। जैसे-जैसे प्यार परवान चढ़ने लगता है आपकी अभिलाषाएँ प्रबल होने लगती हैं। अब आप सिर्फ निगाहों में ही बातें नहीं करते आपके दिल में उठ रही लहर आपको इससे आगे बढ़ने के लिए उत्तेजित करती है। अब आप उन्हें अपनी बाँहों में भर लेना चाहते हैं, उन्हें चूमना चाहते हैं। लक्या आप ठीक से चुंबन लेना जानते हैं?
चुंबन लेना भी एक कला है और यदि आप इस कला में माहिर हैं तो इससे न सिर्फ आप संतुष्ट होंगे बल्कि आपके पार्टनर को भी अच्छा लगेगा।

अच्छा तो अब जरा आपको बता दें कि ये कला कैसे सीखी जाए लेकिन इसे सीखने के पहले एक बात का जरूर ध्यान रखें कि किसी भी प्रकार की जबर्दस्ती आपके प्यार में दरार डाल सकती है। अपनी उत्तेजना को काबू में रखें और प्रेम की मर्यादा बनाए रखें अन्यथा बाद में पछताने के सिवा कुछ नहीं रह जाएगा..
जब आप उनके साथ किसी रोमांटिक सी जगह पर बैठे हैं और आपका दिल बार-बार उन्हें चूमने के लिए कह रहा है लेकिन आप शायद इसलिए हिचक महसूस कर रहे हैं कि कहीं वो आपको गलत न समझ लें।

ना-ना इसमें इतना हिचकने वाली बात नहीं है। हो सकता है शायद उनके मन में भी यही हो बस इसे मुकम्मल स्वरूप देने की जरूरत है। क्या करें इसके लिए? उन्हें अपने करीब लाएँ और उनके कंधे या कमर में हाथ डालकर बैठे रहें। कुछ देर इस स्थिति में बैठे रहने के बाद उनका चेहरा अपने हाथों में लेकर उन्हें लगातार देखते रहें। आपकी ये क्रिया निश्चित ही प्रतिक्रिया के रूप में सामने आएगी। यानी कि उनकी भावनाएँ भी उभरकर सामने आने लगेंगी। अब फिर होना क्या है? वैसे भी जब आप इतने रोमांटिक तरीके से बैठे हैं तो चुंबन तो स्वाभाविक है।

जब आप उन्हें चूम रहे हैं तो आपके होंठों की क्या स्थिति हो, अब जरा इस पर बात कर ली जाए। उनके होंठों पर चुंबन लेते समय आप दोनों के होंठ कुछ इस तरह से हों जैसे कि चित्र में बताए गए हैं तो आप इसे अच्छे से अंजाम दे पाएँगे। यानी आपका ऊपरी होंठ उनके ऊपरी होंठ के ऊपर हो और निचला उनके निचले होंठ के अंदर। हाँ थोड़ा इस बात का भी ध्यान रखें कि आपके सिर विपरीत दिशाओं में थोड़े झुके हों और आपकी नाक एक-दूसरे से नहीं टकराए।

अपने होंठों को बिलकुल वैसी ही गति दें जैसे आप किसी च्यूइंगम को चबा रहे हों या फिर किसी गोली को चूस रहे हों। अं.... वैसे ये कोई बताने वाली बात नहीं है क्योंकि ये अपने आप ही हो जाएगा।

कुछ और रोमांटिक बनाने के लिए उन्हें अपने से थोड़ा दूर करें और फिर करीब खींचकर चूमें। अपनी जीभ उनके होंठों पर फिराएँ। उनके गालों पर, ठोढ़ी पर और गर्दन पर चुंबन लें। ये कुछ ऐसे करें कि आपकी भावनाएँ स्पष्टतः परिलक्षित हों। और हाँ इस बात का ध्यान जरूर रखें कि आपकी भावनाएँ पवित्र हों, किसी प्रकार का गलत विचार आपके मन में न हो। यदि ऐसा हुआ तो यह आपके चेहरे पर साफ तौर से झलकेगा और ये बात आपका साथी जरूर समझ जाएगा

Sunday, January 3, 2010

मोहब्बत , भाग-६७
ताकि फिर कोई इच्छा , फिर कोई आरजू, फिर कोई उमंग बाकी न रहे, आ जाओ इन बांहों में, समा जाओ इन बांहों में , चखलो जवानी का असली आनंद , अगर एक बार रस को लूट लोगी तो फिर कोई तकलीफ नहीं हो पाएगी. मैं अपनी हसरत पूरी कर लेना चाहता हूँ, और तुमसे भी कहता हूँ की डर के आगे जीत है, इस डर को अपने दिलो दिमाग से निकाल फेंको , फिर देखो कहीं कोई मुश्किल नहीं होगी, कहीं कोई रुकावट नहीं होगी, अच्छा या बुरा सब कुछ हमारी फीलिंग्स के ऊपर निर्भर करता है. अगर हम खुले आसमान के नीचे भी संतुष्ट हैं तो वे सुकून भरी नींद सो सकते हैं. मैंने खुद अपनी आँखों से देखा है लोगों को जमीन पर सोते हुए, उन्हें कोई तकलीफ नहीं होती, उन्हें कोई गम नहीं होता, वे आराम से खाते हैं, खुश होते हैं और किसीसे कोई शिकवा नहीं करते, वे संतुष्ट हैं तो इसीलिए सुखी भी हैं. इसके अलावा वे लोग भी हैं जो बहुत कुछ मिल जाने पर भी सब कुछ पाने की लालसा करते हैं और हमेशा दुखी रहते हैं,
स्वीटी- प्लीज, मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो.
राज- इस जवानी का अचार डालोगी क्या ? जब तक है , तब तक इसका इस्तेमाल करो वरना ढल जाने पर कोई नहीं पूछेगा , यह मेरा डायलोग नहीं है बल्कि मैंने इसको एक फिल्म से याद किया है, मगर सटीक है , सही सिच्युएशन पर मारा है .
स्वीटी खामोश हो गयी, राज का हौसला हर पल बढ़ता ही जा रहा था, वह चाहकर भी असली मंजिल तक नहीं पहुच पा रहा था, वह चाहता था की पहले की तरह स्वीटी ही पहल करे और स्वीटी चाहती थी की यहाँ तक पहुचने में उसने बहुत पहल करली यहाँ से आगे अब राज ही पहल करे. आखिरकार राज को अपनी मर्दानगी का लाभ उठाना पड़ा , उसने नग्न स्वीटी के घुटनों को एक तरफ मोड दिया और उस पर हावो होना शुरू कर दिया, यह बहुत सुनहरे पल थे. दोनों के जिस्म काम्ज्वाला की आग में झुलस रहे थे. दोनों के होठ भी एक दुसरे के होठों से सटे हुए थे और फिर स्वीटी और राज उस हसीं गुनाह की तरफ बढ़ने लगे जिसके लिए वे लोग बहुत देर से तरस रहे थे. उन दोनों की साँसें फूल रही थीं. काम्ज्वाला ने उनको अपने आगोश में ले लिया. कुछ देर के बाद ही उनकी कामाग्नि शांत हो गयी. स्वीटी खूब चीखी चिल्लाई मगर थोड़ी देर के बाद उसे सब कुछ अच्छा लगने लगा था, वह राज का खुलकर साथ देने लगी थी. जब गर्मी पिघल गयी तो दोनों शांत हो गयीं, तो बदन ढीले होने लगे. सारी नैतिकता , सारी सज्जनता धरी की धरी रह गयी. राज कितना समझदार बनता था, होशियार बनता था. वह संस्कृति और सभ्यता का प्रहरी बनता था मगर जवानी के जोश के आगे वह भी नतमस्तक हो गया. झुक गया और काम वासना का गुलाम होकर वही भूल कर बैठा, जिसे अक्सर लोग जवानी में कर बैठते हैं. स्वीटी भी योग्य थी, विद्वान थी, बुद्धिमान थी मगर राज को बर्बाद करने के चक्कर में वह खुद ही बर्बाद हो गयी. यही होता है , जब हम किसी दूसरे को गिराना चाहते हैं तो उस चक्कर में पहले हम खुद ही गिर जाते हैं. यह जवानी की कहानी होती ही दीवानी है, यहाँ पर कदम बहुत संभाल-संभालकर रखने पड़ते हैं. और जब हम मुड़कर देखते हैं तो पता चलता है की कहीं न कहीं फिसल ही जाते हैं, ये है इस जवानी की रवानी का दस्तूर. जब जोश होता है तो कोई होश नहीं रहता और जैसे ही जोश ठंडा होता है तो सब हिसाब-किताब लगने शुरू हो जाते हैं. अच्छे –बुरे का ध्यान आने लगता है .
स्वीटी और राज के साथ भी तो यही हुआ, जब तक जवानी का खुमार था वे कामरथ पर सवार होकर आगे बढते गए , और जब बिलकुल करीब आकर एक दूसरे में समा गए, दो जिस्म एक जान बन गए तो ध्यान आया की उन्होंने कितनी बड़ी हद पार करदी है. जब तूफ़ान आकार गुजर गया तो स्वीटी बोली-
-यह क्या हो गया , हम लोग ये क्या कर बैठे ? आह. अब क्या होगा राज ?
राज- कुछ नहीं होगा, जो होना था सो हो गया... कोई चोरी तो नहीं की, किसीका डाका तो नहीं डाला. यह प्यार है , हम लोगों ने प्यार किया है, तुम्हीं ने तो कहा था की हम लोग बालिग़ हैं , और अगर अपनी इच्छा से एक दूसरे के जिस्म से कुछ सुख लेते हैं तो इसमें बुरा भी क्या है ?हम लोगों ने पूरे होशो हवास में ये क्षण शेयर किये हैं.
स्वीटी – लेकिन समाज तो इसे गलत मानता है न. शायद इसीलिए दिल में कुछ गलत हो रहा है. लगता है जैसे कुछ ठीक नहीं किया .

Saturday, January 2, 2010

मोहब्बत , भाग-६६
स्वीटी- मैं तो अब भी हंसकर ही तुम्हारे पास आयी थी लेकिन इस काले नाग को देखकर डर गयी हूँ, जान है तो जहां है वरना कुछ नहीं है. मुझे तो जान की पडी है.
राज- थोड़ी देर पहले तो बहुत बहादुर बनी फिरती थीं, कहती थीं की सारी दुनिया से टकरा जाओगी और अब देखते ही तुम्हारे पसीने छूट रहे हैं. मरने का डर दिखाने लगी हो. इसीके दम पर दुनिया से टकराने और उसे जीतने निकली थीं.
राज- तुम मुझे बहका रहे हो , मारना चाहते हो मुझे . मैं तुम्हारी बातों आने वाली नहीं हूँ, अगर जान बचेगी तो इश्क मोहब्बत की बातें होंगी , मुझे कायर कहलवाना पसंद है लेकिन मृत कहलवाना पसंद नहीं है. मुझे तो अब जाना है अपने घर . चलो हम लोग मूव करते हैं, प्लीज ... चलो ना ऐसे क्यों देखते हो मुझे ? मैं कह रही हूँ. चलो.,.
राज की आँखों में लाल डोरे तैर रहे थे, वासना की तेज आंधी ने उसको अपने आगओश में ले रखा था, वह इतनी जल्दी हार मानने वाला नहीं था, स्वीटी की बातें उस पर ज़रा भी प्रभाव नहीं दाल पाईं, उसने स्वीटी को कसकर पकड़ लिया और उस पर हावी होने की कोशिश करने लगा, वह स्वीटी के यौवन उभारों को आहिस्ता-आहिस्ता दबा रहा था, साथ ही एक हाथ से उसके यौवन द्वार पर भी दस्तक दे रहा था, उसे मालूम था की आज नहीं तो कभी नहीं,. कुछ दिन पहले भी उसके साथ यही तो हुआ था. पहले तो स्वीटी ने कामुक बातों से उसको कामोत्तेजित कर दिया, जब वह पूरी तरह गर्म हो गया तो उसे ध्जक्का दे दिया, राज आज बेवकूफ बन्ना नहीं चाहता था. आज उसने पक्का निर्णय कर लिया की चाहे जो हो जाए आज वह अपनी और स्वीटी की प्यास बुक्झाकर ही रहेगा, इसीलिए उसने स्वीटी पर चौतरफा हमले करने शुरू दियी, ताकि वार खाली न चला जाए. स्वीटी के होठों से होठ सताकत वह उसकी जीभ का रसपान करने लगा. उसका सख्त अंग स्वीटी के बदन से स्पर्श कर हंगामा मचा रहा था.स्वीटी अंदर से टूटने लगी, उसकी समझ में नहीं आ रहा था की आखिर क्या करे, एक तरफ तो राज का सानिध्य पाने की बेचैनी थी और दूसरी तरफ एक अनजानी दहशत , की कहीं कुछ हो गया तो क्या होगा,. स्वीटी कोरी , करारी और कुंवारी लड़की थी, भले ही वह विचारों से मॉडर्न थी, उसके कई दोस्त भी थे मगर वह चरित्रहीन नहीं थी, उसने पहले कभी किसी लड़के के साथ शारीरिक सम्बन्ध नहीं बनाए थे. वह बिलकुल अनछुई थी. उसने अपने आपको अभी तक ज़माने की रफ़्तार से सुरक्षित रखा था. राज ने जबसे उसके नग्न बदन को देखा तपो पगला गया था, वह स्वीटी के प्रत्येक अंग को चूम रहा था, स्वीटी की साँसें जोर –जोर से चल रही थीं, उनके बीच एक अजीब सी खामोशी चाई थी, बहुत देर के बाद राज ने खामोशी तोड़ते हुए कहा-
- वाह , मजा आ गया, तुम देखना तुम्हें ज़रा भी दुःख नहीं होगा, ज़रा भी तकलीफ नहीं होगी, सब कुछ ठीक हो जाएगा. तुम्हारी हर समस्या का समाधान हो जाएगा. बेवजह डरने से क्या फायदा है, आखिरकार एक न एक दिन तो ये सब करना ही होगा, अभी से सीख लोगी तो आगे के लिए अच्छा रहेगा वरना सुहागरात के दिन बहुत पछताओगी .
स्वीटी- तुम मेरी मजबूरी नहीं समझ रहे हो. मैं तुम्हारा यह हथियार देखकर बहुत दहशत में हूँ. वरना तो मैं खुद तुम्हारा साथ पाने के लिए तरस रही थी.
राज- इससे क्या डरना पगली , यह तो सिर्फ दिखावा है,जब सही वक्त आएगा तो इसका आकार अपने आप कम हो जाएगा. तुम्हें नहीं मालूम ?
स्वीटी- नहीं, मैंने पहले कभी नहीं सुना, ना कभी देखा . तुम वो पहले मर्द हो जिसके साथ मैं नग्न होकर प्रेमालाप कर रही हूँ.
राज- और मैं ? मैं क्या कृष्ण कन्हिया लगता हूँ, तुम वो पहली लड़की हो जो मेरियो जिंदगी में आई हो वरना तो मैं कभी क्सिसी लड़की के साथ दोस्ती करने से भी कतराता था, लेकिन तुम मेरी जिंदगी में आयीं तो ऐसी आयीं की मेरे विचार ही बदल गए, मेरा नजरिया ही बदल गया. सब कुछ नया –नया हो रहा है मेरी लाइफ में , तो फिर क्यों न एक यह काम भी नया हो जाए.
स्वीटी- मुझे कुछ अनजानी सी दहशत हो रही है,
राज – यह दहशत नहीं वहां है तुम्हारा. आ जाओ मेरी बांहों में, दूर क्यों हटाती हो, आ जाओ और मुझे अपने दिल के अरमान पूरे कर लेने दो, डूब जाने दो मुझे इस इश्क की गहराई में. डूब जाओ इस मस्ती के समुन्दर में.

Friday, January 1, 2010

मोहब्बत , भाग-६५
स्वीटी- हाँ मेरे राज, मैं खुद भी तो चाहती हूँ, मेरे तन –मन में जो आग लगी है, वह कम नहीं है. उसको बुझाना मैं भी चाहती हूँ.
राज- जब हम दोनों के तपते हुए जिस्म एक दुसरे से मिलेंगे तभी यह आग कम हो सकती है, लेकिन बुझ तो कभी नहीं पाएगी क्योंकि
यह ऐसी आग होती है, जिसे जितना बुझाओ उतनी ही भडकती है.
स्वीटी- बाद में भले ही भडकती रहे ,फिलवक्त तो तसल्ली हो जानी चाहिए, यहाँ तो एक पल के लिए भी चैन नहीं है.
राज- एक पैग मार लो कलेजे पर थोड़ी सी ठंडक पड़ जायेगी, भले ही ज्यादा नहीं पियेंगे मगर थोड़ी बहुत से तो कोई फर्क नहीं पड़ता. चलो चीयर्स करते हैं.
स्वीटी मुस्कराने लगी, शुरू हो गया पीने का दौर. पैग तैयार किये थे स्वीटी ने,राज खुश था. पहला जाम खत्म होते ही उन दोनों पर सुरूर छाने लगा. स्वीटी के बदन में जो आग लगी थी , वह जोरों से भडकने लगी. स्वीटी ने कातिल अंगड़ाई लेते हुए कहा-
-आह ... खूब आनंद आ रहा है, साथ ही बेचनी सी बढती जा रही है .
राज- मेरा तो इससे भी बुरा हाल है, अब हम दोनों ही इस रोग के शिकार हो चुके हैं.
स्वीटी ने राज का जवाब देने के बजाय अपनी बाँहें फैलादी, राज ने उसको अपनी तरफ खींच लिया, अब राज की आखों में लाल-लाल डोरे तैरने लगे. स्वीटी की मादक जवानी के सिवाय उसे कुछ नहीं सूझ रहा था, उसने स्वीटी को अपनी मजबूत बाहों के घेरे में कैद कर लिया और उसके होठों पर अपने होठ रख दिए, होठों की गर्मी से उन दोनों के अंदर ज्वालामुखी सा भडकने लगा. यह बहुत अलग अनुभव था. राज तो अपनी सुध बुध खो बैठा, उसके होठ काँप रहे थे, समूचा बदन भी थरथरा रहा था.
उसने स्वीटी के कपडे उतारने शुरू कर दिए. थोड़ी देर में स्वीटी बिलकुल निर्वस्त्र हो चुकी थी, राज ने जब उसके अंतिम वस्त्र को उतारना चाहा तो वह श्रम के मारे लाल हो गयी, मदर राज कहाँ मानने वाला था, वह तो काम वासना की भट्टी में पूरी तरह से खुल रहा था, अब राज कोई भी मौक़ा गंवाना नहीं चाहता था तभी तो उसने स्वीटी का वह आख़िरी कपड़ा भी उतार दिया था, अब वह एक हाथ सीने से लगाकर और दुसरे हाथ से अपने यौवन को छिपाकर खड़ी थी, मन में उमंग और तरंग के साथ एक अनजाना भय भी सता रहा था, मजाक- मजाक में ही वह इस हद तक जा पहुची थी. उसे परेशानी होने लगी , राज ने उस पर बाज की तरह झपटा मारा और उसे दबोच लिया, अब स्वीटी भी खुलने लगी, वह जान गयी की इस तरह छुई-मुई बन्ने से काम नहीं चलने वाला. राज खूब आक्रामक हो रहा था.स्वीटी ने भी उसका अनुसरण करना चाहा, उसने राज के बदन से कपडा हटाने शुरू कर दिए , थोड़ी देर के बाद वे दोनों एक जैसे हो चुके था. राज उसकी गोलाइयों को सहला रहा था, कभी- कभी उन्हें चूम लिया करता था, राज का स्पर्श पाकर स्वीटी सिहर उठाती थी, उस पर मदहोशी छाने लगती थी. राज का एक हाथ स्वीटी के यौवन की तरफ बढ़ रहा था, और जब उसने अपनी उंगली की कलाकारी दिखाई तो स्वीटी की चीख ही निकल गयी, राज ने उसके होठों से अपने होठ सटाकर कहा-
-ये क्या कर रही हो, इतने जोर से चीखोगी तो यहाँ पर तामाश्बीनों का मेला लग जाएगा, ये तो कुछ भी नहीं है, जब पूरा सुख लोगी तब क्या करोगी ?
स्वीटी- प्लीज राज, मुझे दर लगता है, मैं इससे आगे कुछ नहीं करुँगी. मुझे जाने दीजिए राज- उस दिन भी तुमने ऐसे समय पआर ही इनकार किया था , आज फिर कर रही हो, यह अच्छी बात नहीं है. भूखे आदमी के सामने पहले खाने की थाली रखो और फिर जब वह खाने के लिए तैयार हो और पहला टुकड़ा ही तोड़े और तुम उसके सामने से भोजन की थाली हटालो तो कैसा लगेगा ? बहुत बुरा न, मुझे भी इतना ही बुरा लग रहा है.मैं खुद भी तुम्हारा साथ देना चाहती हूँ मगर मेरे हालात को समझो , मैं परेशान हूँ, मेरी मजबूर भी तो जानलो. मुझे लगता है जैसे मेरा दम निकल जाएगा, मैंने कभी ऐसा किया नहीं न.
राज- और मैं कौन सा रोज-रोज करता हूँ , मुझे खुद भी तो पूर्व अनुभव नहीं है. मगर इतना जानता हूँ की तुम्हें तभी तक दर लग रहा है जब तक की हम एक नहीं हो जाते , एकाकार होते ही सब ठीक हो जाएगा. फिर तो खुद हंसकर आया करोगी मेरी पास.