Friday, April 30, 2010

परिंदा , भाग-७९

घर में कोहराम का माहोल था. गाँव में भी कई दिनों तक शोक का माहोल था. नौटंकी बंद करा दी गयी. रंजन अपनी नौटंकी कंपनी को लेकर कहाँ गया, किसीको कुछ पता नहीं चला. लोगों की परेशानी का सबब ये था कि अजय जैसा मिलनसार लड़का अचानक कहाँ गायब हो गया ?अजय सबका प्यारा था, वह बड़ों का सम्मान और छोटों से प्यार करता था. कोई भी यह नहीं जान पाया कि चन्दा का क्या हो गया और अजय को आसमान निगल गया या धरती खा गयी ?
उधर मुंबई में चन्दा जीवन से जद्दोजहद कर रही थी, उसके पास ज्यादा रुपये तो थे नहीं, जो थोड़े बहुत बचे थे वे सब खर्च हो गए, चन्दा स्वाभिमानी थी, जब उसे लगा कि अब बैठकर नहीं खाया जा सकता तो उसने काम करने की ठानी , इस उम्र में उसे कौन काम देता ? किसी ने उसे बतया कि मुंबई के बार में लड़कियां डांस करती हैं तो उसने भी एक लेडीज बार में नृत्य करना शुरू कर दिया. कठिन परिश्रम करके वह जीवन यापन करने लगी. अजय का चेहरा उसके दिलो दिमाग से उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था. अजय की माँ की बातें , अजय का भोलापन , सब उसे याद आने लगे, उसे अजय का प्रेम प्रस्ताव याद आ रहा था . उसकी बातों में वजन था. भले ही उसकी उम्र छोटी थी लेकिन उसका वजूद भारी था. वह परिपक्व नजर आ रहा था. उसे हंसी आने लगी. उम्र के किस मोड परआकर अजय ने उसे प्रेम का प्रस्ताव रखा . काश कुछ साल पहले आता, उसके सामने प्रेम का प्रस्ताव रखता तो शायद उस वक्त वह हाँ भी कर देती. अब क्या कहे वो ? पहले तो वह माँ की सेवा करने की खातिर शादी नहीं कर पाई, और जब माँ भी दुनिया से चल बसी तो किसी ने, किसी ने भी उसे प्रपोज नहीं किया, क्यों ? क्यों वह अब तक कुंवारी रही ? उसने क्यों नहीं खुद किसी से बात नहीं चलाई . उसकी किशोरावस्था में भी तो एक लड़के ने उस

से प्यार करने का एलान किया था, मगर ठुकरा दिया था उसने . उसको भी फिर से ट्राई किया जा सकता था.
लेकिन अब क्या किया जा सकता है ? जो गुजर गया सो गया , वक्त किसीका इन्तजार नहीं करता . एक बार हाथ से निकला तो निकल गया. चन्दा को वे क्षण भी अच्छी तरह याद थे जब अजय ने उसके गालों को छुआ था, उसके होठों को स्पर्श किया था और फिर वो पल भी आया जब उसने अपने तपते हुए होठ उसके अधरों से सटा दिए थे. ऐसा लगता है जैसे वह जन्मों -जन्मों का प्यासा था, और खुद वह भी तो ऐसी ही प्यास महसूस कर रही थी. उसे कितना आनंद आया था उस वक्त. जीवन की भागदौड में वह असली सुख ही भूल गयी थी , सारा जीवन उसने किसी न किसी के लिए त्याग करके ही गुजार दिया. मगर कभी भी अपनी जिंदगी अपने तरीके से नहीं जी. उसने कितना स्वर्णिम मौक़ा गँवा दिया था. आखिर उसने अजय को इस बार इनकार क्यों कर दिया ? अजय उसे दिलो जान से चाहता था . फिर उसने क्यों ऐसा किया कि बेवजह अजय को ठुकरा दिया , इतना ही नहीं खुद उसने जुबान पर तआला भी लगा दिया, उससे घर , गाँव छोड़ने को कहा तो उसके लिए भी राजी हो गयी, इतना बड़ा जुल्म उसने सहन कैसे कर लिया .
उसे अजय जैसे प्यार करने वाले को इस तरह ठुकराना नहीं चाहिए थे. भले ही ठुकराया नहीं मगर उसने हाँ भी तो नहीं किया . उसने अजय जैसे खूबसूरत, टूट-टूटकर चाहने वाले अजय को इस तरह निराश नहीं करना चाहिए था , आखिर वह किस्से घबरा गयी ? जब अजय ही किसीसे नहीं डरता तो वह क्यों डर गयी ? उसे भी अजय का साथ देना चाहिए था . लेकिन अब क्या हो सकता है ? पछताए क्या हॉट है , जब चिड़िया चुग गयी खेत ?आह.... वह एक लंबी आह भरके रह गयी . अब न जाने अजय कहाँ होगा ? उसका क्या हाल होगा ? उसे एक बात पर क्जरूर संतोष था कि जब अजय उससे प्यार कर रहा था तो उसने उसे रोका नहीं , टोका नहीं. अगर रोक-टोक करती तो अब बहुत पछताना पड़ता.

















Thursday, April 29, 2010

parinda , bhag-77

मैं आपको चुटकुला सुनाऊंगी, आप अगर कहेंगे तो आपको अच्छेअच्छे भाषण भी दूंगी. कहीं रहोगे तो थोडा बहुत खाना भी बना सकती हूँ, आप तो जानते ही हैं कि मुझे वेज पुलाव बनाना आता है. कितना अच्छा होगा जब हम दोनों मुसीबतों का सामना करेंगे , और फिर जब हम दोनों मिल जायेंगे तो दुःख भी सुख में तब्दील हो जायेंगे .. मिल जुलकर हम चंदाबाई को
आखिरकार ढूंढ ही निकालेंगे . मुझे कितनी खुशी होगी जब आपको वो मिल जायेंगी ... मैं तो पागल हो जाउंगी खुशी से . मुझे ले चलो न अपने साथ ...
अजय- ऐसा कैसे हो सकता है कि तुम मेरे साथ चलो , जानती हो तुम बदनाम हो जाओगी ,, तुम्हारे घरवाले बदनाम हो जायेंगे . . कोई उन्हें जीने भी नहीं देगा ...
स्वीटी- मगर जब लोगों को सच्चाई का पता चलेगा तब तो सबक्लो अपनी गलती का एहसास होगा . आखिर सत्य कभी हारता थोड़े ही है . सच को थोड़ी देर के लिए
भले ही छिपाया जा सकता है मगर उसे नष्ट नहीं किया जा सकता .
अजय- नहीं स्वीटी, तुमने इतना कह दिया यह भी मेरे लिए काफी है, मैं इसको हमेशा याद रखूंगा . तुम्हारा इतना ही साथ देना मेरे लिए बहुत है. मेरे लिए दुआ करना .
स्वीटी- एक बात पूछूं ? क्या आपको मेरी ज़रा भी याद नहीं आएगी ? क्या आपको यहाँ से जाने में, मेरा मतलब है मुझे छोड़कर जाने में ज़रा भी तकलीफ नहीं हो रहे ?
अजय- ओह... अब मैं जाना चाहूँगा . अपना ख़याल रखना . मैं तुम्हें बहुत मिस करूँगा .. अगर मेरे घरवाले मेरे बारे में पूछें तो मेरी मजबूरी बता देना . ऐसा करना कि
मेरी तरफ से तुम उन्हें कन्वेंस करने की कोशिश करना प्लीज. ठीक है न...
स्वीटी- जी. मैं भी आपको बहुत मिस करूंगी. मैं देवी में के मंदिर में आपकी कामयाबी की प्रार्थना करने जाउंगी , और सुनो व्रत भी रखूंगी. मुझसे संपर्क में रहना . फोन
जरूर करना , और आप भी अपना ख़याल रखना खाना समय से खा लिया करना , ये न भूलना कि गाँव में कोई आपकी वापसी का इन्तजार कर रही है .
और फिर अजय ने देखा कि स्वीटी अपनी आँखों से आंसू पौंछने की असफल कोशिश कर रही थी, वह इस द्रश्य को ज्यादा देर तक नहीं देख सकता था .उसे तो बस
अपने मिशन पर पहुचने की जल्दबाजी थी, घर से उसनेखर्चे के लिए रुपये निकाले और बिलकुल सबेरे ही उसने शहर की तरफ छलांग लगादी . उसकी निगरानी करने वाले लोग
शौच वगैरह के लिए गए हुए थे, जब वह मौक़ा पाकर दूध की गाड़ी में बैठकर शहर पहुच गया. इसके बाद गोल्डन टेम्पल एक्सप्रेस गाड़ी में बैठकर वह मुंबई आ गया.

और उसके पीछे स्वीटी बेचारी आह भर्ती रह गयी, वह जन चुकी थी कि अजय चंदाबाई से शादी करने के लिए बेताब है और करके ही दम लेगा , इसके बावजूद पता नहीं वह उसको इतना क्यों चाहती थी कि अजय के जाते ही बीमार जैसी हो गयी, उसने खाना-पीना सब त्याग दिया, सब लोग उसकी यह हालत देखकर हैरत में रह गए . कोई यकीं भी नहीं कर सकता था कि फूल जैसी दिखने वाली स्वीटी सूखकर इतनी जल्दी काँटा हो जायेगी. डॉक्टर भी परेशान हो गए. कोई परेशानी भी नहीं थी लेकिन वह ठीक भी नहीं नहीं हो पा रही थी. वह ज्यादातर शून्य में निहारती रहती थी . अजय के माता-पिटा को जैसे ही अजय के घर से भागने की खबर मिली, वे पागल जैसे हो गए. अजय की माँ तो इतनी परेशान हुई कि कई घंटों बाद उसे होश आया . अजय के पिता अजय को तलाश करने की कोई कसार नहीं छोड़ी, जो भी कुछ हो सकता था वह उपाय किया गए, अखबार , रेडियो में सूचना देने के अलावा पुलिस को सक्रीय कर दिया गया,. सूचना देने वाले को दस हजार का इनाम देने की घोषणा की गयी मगर कोई फायदा नहीं हुआ, अजय कहीं कोई पता नहीं चल पाया.










Tuesday, April 27, 2010

parinda , bhag-76

अजय - शुक्रिया स्वीटी, तुम थक गयीं होंगी , चाहो तो अपने कमरे में जा सकती हो. कैदी तो मैं हूँ लेकिन आपको बेवजह कैद भोगनी पद रही है. मेरे कारण तुम्हें भी परेशानियां उठानी पद रही हैं, मैं खुद भी तुम्हारे लिए कुछ करने की बजाय अपने लिए सहयोग मांग रहा हूँ. क्या सोचती होंगी तुम भी ?
स्वीटी- अरे , ये क्या लेकर बैठ गए ?मेरी खिंचाई कर रहे हो क्या ?थोड़ी देर बैठने दोगे अपने पास ?
अजय- आइये न,यहाँ बैठें , मुझे भी तसल्ली सी मिलती रहेगी. तभी बात बनेगी . वरना मैं तो बोर हो-होकर ही मर जाऊँगा ,बहुत तनाव महसूस कर रहा हूँ ...
स्वीटी- तनाव हमारे जीवन का हिस्सा नहीं है। यह हमारे अपने शरीर, दिमाग, संवेदनाओं और ऊर्जा को व्यवस्थित न कर पाने की अयोग्यता है। मनोवैज्ञानिक फ्रेड बुशमैन के अनुसार यह प्रकृति, तंत्र और आसपास के परिवेश की कार्यप्रणाली की समझ की कमी और सही तरीके का उपयोग न कर पाने की अयोग्यता है। अगर यह समझ विकसीत हो जाए तो तनाव जैसा जीवन में कुछ नहीं रह जाता। व्यक्ति को तनाव मुक्त होने के लिए सर्वश्रेष्ठ जीवन जीने का संकल्प लेना चाहिए, जहां वे तनाव के बगैर उस जीवन की ओर बढे। सर्वश्रेष्ठ जीवन जीने का तात्पर्य सर्वश्रेष्ठ बने से है। सर्वश्रेष्ठ जीवन जीने के लिए व्यक्ति को सर्वप्रथम जीवन में एक उद्देश्य खोजना चाहिए। अच्छा महसूस करना और अपने भीतर शांत होना इस कोशिश का हिस्सा है। जब भी आप अपने निर्घारित किये लक्ष्य की ओर बढते है और तनाव आपका रास्ता रोक ले, तो पहले शांत मन से सोचिए की क्या वास्तव में यह वजह उचित है, हमारे भीतर एक आभासी तनाव या डर होता है, जिसका वास्तव में कोई अस्तित्व ही नहीं होता है लेकिन फिर भी वह हम पर हावी रहता है और हमे बहुत से कामों से दूर कर देता है। कई बार हम बेवजह तनावग्रस्त हो जाते है। यदि हम ठंडे दिमाग से सोचें तो जिस वजह से हम तनावग्रस्त होते है, वह दरअसल हमारे मन का एक वह्म मात्र होता है। जिंदगी इतनी मुश्किल नहीं है, जितना उसे बना दिया गया है। जिंदगी की घूरी कोई और नही बल्कि खुद हम और केवल हम हम अपनी जिंदगी को डिजाइन कर सकते हैं। विज्ञान भी हमारे अंदर छिपे डिजाइनर के पक्ष को मानता है। अपने आप को पहचान पाने की क्षमता हमारे डीएनए में बुनी होती है। कोई भी कार्य शुरू करें तो अपने आप में आत्मविश्वास रखें। हर पल तनाव के शिकार होने के बजाय बेहतरीन तरीके से जिएं। अतीत और भविष्य के बारे में चिंता कर आप उस पल को नष्ट कर रहे होते है, जो वर्तमान में आपकी मुस्कुराहट की वजह है। वैसे तो तनाव व्यक्ति के मन की एक सामान्य अवस्था है, जो विभिन्न कारणों से हो सकता है, लेकिन ये तनाव ये तनाव परिस्थितियों के अनुरूप होता है, जो परिस्थितियों के ठीक होने के बाद स्वत: ही ठीक हो जाता है। पर कोई तनाव बहुत लंबे समय तक बना रहे और व्यक्ति के दैनिक कार्यो व उसके पारिवारिक जीवन को बाघित करने लगे तो यह चिंता का एक विषय है। इस तनाव से बचने के लिए कुछ ऎसे उपाय है, जो अपको रोजमर्रा होने वाले तनावों से दूर रखेगें। जिस काम को पूरा होने को लेकर आपको संदेह हो, उसके पूरा होने पर चिल्लाएं, ताली बजाएं। यह आपके तनाव के दौर की थकान को मिटा देगा। अलग-अलग विषयों में अपनी रूची विकसित करें। अलग-अलग सोच वाले दोस्त बनाएं। तनाव की वजह क्या हैक् यह एकमात्र सवल है, जो आपके तनाव को खत्म कर सकता है। जिंदगी में खुश रहने के दो तरीके है। पहला सभी कुछ में यकीन करना और दूसरा सभी कुद में संदेह करना। दोनों तरीके आपको तनाव से बचाते है। छोटी खुशियों की तलाश बंद न करें क्योकी मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि यदि व्यक्ति खुश रहता है और विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी खुशी को बनाये रखता है, तो वह तनाव से निकलने में कामयाब हो सकता है। अत: आप अपने आसपास उन छोटी-छोटी खुशियों को ढूंढे जो आपको सुकून और ताजगी दें। मजे का रसायन चिंता को कम करता है और हमे हर पल का आनंद देता है। शोघ यह बताते है कि खुशी जीवन में मुफ्त मिलने वाली चीजों से ज्यादा हासिल होती है।

Sunday, April 25, 2010

pyar ka parinda , bhag-74

अजय- तो फिर ये धन्यवाद शब्द किसके लिए बना है ? परायों को भी न दें , अपनों से भी परहेज करें ,,, तो आखिर इसका करें क्या ? अब आप ले ही लीजिए ...मानता हूँ कि धन्यवाद नाम का यह शब्द आपके किसी काम नहीं आएगा मगर इससे कोई नुक्सान भी तो नहीं हैं. तुम्हारा दिल तो वैसे ही बड़ा है, यह भी किसी कोने में पड़ा रहेगा .
पहली बार खुलकर हंसी थी स्वीटी, अजय कि बातों ने माहौल को ज़रा सी देर में ही रंगीन बना दिया था, पहले वाला अजय फिर से दिखने लगा. जब स्वीटी उसके साथ होती थी तो वह बहुत चुटकुले सुनाता था. स्वीटी खूब ठहाके लगाकर हँसती थी , और तब अजय उसके भोले और चमकते चेहरे को देखता ही रह जाता था. स्वीटी ने सामान्य होकर कहा-
- वाह, अब मजा आया है . अब आप वही पहले वाले अजय बाबू नजर आ रहे हैं. ये माना कि हम पिछले कुछ सालों से नहीं मिल पाए मगर इसका मतलब ये तो नहीं कि आप हमें एकदम से भूल जाएँ, औपचारिकताएं बरतने लगें. ऐसा कहीं होता है क्या है. अगर कुछ साल नहीं मिले तो क्या हुआ उससे पहले तो हम हर महीने मिलते रहे हैं. कई -कई दिन हम साथ खेलते थे. जानते हो तुम मुझे किसी औअर लड़के की जोड़ीदार बन्ने ही नहीं देते थे , अगर कभी ऐसा हुआ तो आप मुझसे अनाराज हो जाते थे. जब हम छोटे थे तो खेल कूद से थकने के बाद हम एक ही बेड पर सो जाया करते थे. काश... वे दिन लौट सकते अजय बाबू. वह किसी बेफिक्र उम्र थी , किसी बात का गम नहीं था. बस हंसी का माहोल रहता था. खाने-पीने और खेलने कूदने में किसी तकलीफ का ध्यान ही नहीं रहता था, लेकिन अब हम सयाने हो गए हैं. बड़ा होकर आदमी कितना सयाना हो जाता है न. हर बात में स्वार्थ , हर बात में अपना मतलब तलाशने लगता है . काश/ हम फिर छोटे बन सकें, फिर उसी माहोल में रह सकें, जहां से हमारी दोस्ती शुरू हुई , एक गीत तो तुमने सूना ही होगा- चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों.
अजय- हां, सूना है, मेरा भी फेवरिट गीत है. मैं इसे अक्सर गुनगुनाता रहता हूँ. अरे ये क्या तुम्हारी आँखों में क्या हुआ ? कोई परेशानी है क्या ? शायद तुम्हारी आँखों में आंसू हैं ?
स्वीटी - नहीं , रात को ज्यादा पढ़ने के कारण कभी-कभी इनमे पानी आ जाता है.
अजय- सच ? तो फिर तू आर ई पी एल की सिनेरेरिया मर्तिमा नामक दवा अपनी आखों में दिन दिन में तीन बार तीन -तीन बूंदे डालो , मेरा विश्वाश है कि हमेशा के लिए फिट हो जाओगी. तुम्हारी ये झील सी आँखें बहुत खूबसूरत हैं, मेरे लिए तो दोनों जहाँ यही हैं. इनको सुन्दर और सुरक्षित बनाए रखिये , दुनिया को इनकी जरूरत है.
स्वीटी- आप तो ऐसा कह रहे हैं, जैसे डॉक्टर कहता है ... क्या बात है , आजकल इश्क के साथ-साथ डॉक्टरी भी सीख ली है क्या ? या फिर आपकी दोस्त आपको ये नुस्खे सिखा रही है ?
अजय- असल में जो तायल अंकल हैं, उन्हें तो आप जानती ही होंगी , अरे वही डॉक्टर तायल , जो अमेरिका में प्रेक्टिस करते हैं. खुद उनकी आँखों में यहाँ तकलीफ रहने लगी. जब वे पापा से मिलने आये तो उन्होंने अपनी परेशानी बताई , पापा ने उन्हें सिनेरेरिया मार्तिमा आर ई पी एल नामक शीशी दे दी. पहले तो वे हिचकिचाए मगर जब वे ठीक हो गए तब उन्हें हिन्दुस्तानी दवा की ताकत का एहसास हुआ.तुम्हें मालूम है जब वे अमेरिका लौटे तो इस अद्भुत दवा कि कई शीशिया अपने साथ ले गए . तुम्हें यकीं नहीं होगा मगर अब वे अमेरिका में इसी दवा की जय जयकार कर रहे हैं.
स्वीटी अरे हाँ, याद आया ... इस कंपनी तो सेक्स पावर बढाने की दवा भी बहुत फेमस हैं. शायद विगोरा - हाई पावर ... मैंने सही कहा ना ? अब तुम्हें इसकी जरूरत भी पड़ेगी . शादी जो करने जा रहे हैं ...
अजय- तुम भी स्वीटी , खूब मजा ले रही हो . अब समय है तुम्हारा मजा लेने का.
स्वीटी-अच्छा ये बताओ , तुम्हें बहुत याद आ रही है क्या , अपनी दोस्त की ? इसलिए पूछ रही हूँ कि बात करते -करते अचानक तुम ना जाने कहाँ खो जाते हो ?
अजय- सच कहूँ तो हाँ, और इससे भी बुरा हाल मेरा तब होता यदि तुम यहाँ नहीं होती . पता नहीं उस हालत में मैं क्या करता ?












Saturday, April 24, 2010

pyar ka parinda, bhag-73

स्वीटी- दिल छोटा न करो, मैं जब तक हूँ तब तक तुम्हें किसी तरह कि कोई तकलीफ नहीं होने दूंगी. और ये कैद कि क्या बात कर रहे हो ? ऐसा कैसे हो सकता है, अंकल -आंटी कितना चाहते हैं तुम्हें, अपनी जान से भी ज्यादा. तुम्हारे सिवाय वे और किस पर जन देंगे. आखिर आप उनकी इकलौती संतान जो हैं. अपने अकेले बेटे को कोई कैसे तकलीफ देना चाहेगा, कैद का तो सवाल ही नहीं उठता ... मैं हूँ आपके साथ.
अजय ने स्वीटी की तरफ ऐसे देखा जैसे कोई किसी संत महापुरुष को देखता है .स्वीटी कि आँखों में सहयोग के भाव थे, उसकी मुस्कान बेहद मोहक थी. अजय को स्वीटी की उपस्थिति से बल मिल रहा था. आजकल उसे बेगाना जैसा बना दिया गया था, उसकी माँ भी उसके सामने ज्यादा नहीं आ रही थी. दिन में एकाध बार आ भी गयी तो खिची -खिची सी रहती थी. बिना कहे सुने लंबे -लंबे कदम रखती हुई निकल जाती थी. और अजय के पिता विजयप्रताप सिंह तो एक बार भी उसके सामने उपस्थित नहीं हुए , कोई बात नहीं हुई. अब अजय पूरी तरह से नौकरों के हवाले था. ये नौकर उसके पिता के वफादार थे. घर में गम जैसा माहौल था. अजय को अभी तक पाता नहीं चला कि चन्दा कहाँ पर है, उसे कहीं भेज दिया गया है या फिर भगा दिया गया है. उसके दोस्तों के घर आने पर पाबंदी थी. फोन को देखना तो दूर उसका ख़याल भी नहीं आये , ऐसे इंतजाम किये गए थे. एक बस स्वीटी ही ऐसी थी जो मौत के घर में सुकून कि तरह थी. वह हवा के शुद्ध झोंके कि तरह थी. वह प्राण दायक वायु की तरह थी. स्वीटी ही उसकी एकमात्र दोस्त थी. और यह सब जानबूझकर किया जा रहा था, स्वीटी और अजय के रिश्ते की बात तो पहले से ही पक्की थी, बस औपचारिकता का जामा पहनाया जाना था. और जब अजय और स्वीटी के परिजनों को लगा कि पानी अब हद से गुजरने लगा है तो फ़ौरन स्वीटी को कवच बनाकर भेज दिया गया, इसके पीछे उनकी सोच ये थी कि अगर स्वीटी अजय के साथ रहेगी तो उसके सामने वह चन्दा जैसी उम्रदराज महिला को जल्द ही भूल जाएगा और स्वीटी के प्यार में खो जाएगा, स्वीटी थी भी गजब कि जीनियस और सुन्दर, वह अभी कली ही तो थी. मुस्कराती तो फूल झरने लगते थे, अभी-अभी उसके सीने के उभार बढ़ने ही शुरू हुए थे, ललचाए लोगों कि द्रष्टि से बचने के लिए अब स्वीटी अपने यौवन के उभारों को छिपाने लगी थी, मगर दुपट्टे में भला हिमालय को समाया जा सकता है क्या ? स्वीटी को जब अजय काफी देर तक घूरने लगा तो मुस्कराते हुए पूछने लगी-
-ऐसे क्या देख रहे हो अजय बाबू, मेरा साथ अच्छा नहीं लग रहा है क्या ? शायद आपकी दोस्त बहुत खूबसूरत होगी, और किस्मतवाली भी जो आप जैसा चाहने वाला दोस्त मिला. आप जैसा प्यार करने वाला मिला. ऐसा नसीब हर किसीका नहीं होता. सब लोगों को प्यार के बदले प्यार नहीं मिलता. सुना है सबको पूरा जहाँ नहीं मिलता. कोई जिसे टूटकर चाहता है, वह किसी और को चाहता है. दस्तूर सा लगता है , जमाने का.
अजय- तुम कैसे बहकी-बहकी शायरों जैसी भाषा बोल रही हो. लिखने -लिखाने का भी शौक है क्या ?
स्वीटी- हाँ , शायरी तो दर्द से जन्म लेती है. जब सीने में दर्द का तूफ़ान उठता है तो उस समय कुछ शब्द कुलबुलाने लगते हैं, लोग इन शब्दों को शेरो शायरी , कविता या गीत गज़ल का नाम दे देते हैं. मैंने भी थोडा बहुत लिखा है , मगर वह क्या है, कैसा है, कुछ पता नहीं. जो दिल में आता है , उसे कागज़ पर उतारती रहती हूँ.
अजय- वाह, बहुत गुनी हो तुम तो. तुम आज हारी थकी बातें क्यों करती हो, तुम भी तो जहां में किसी से कम नहीं हो, कितना मीठा बोलती हो, कितनी अच्छी बातें करती हो, वो क्या कम किस्मत वाला होगा जिसे तुम्हारा साथ मिलेगा, जो तुम्हें चाहेगा वह भी तो दुनिया का सबसे किस्मतवाला होगा. मैं दुआ करूँगा कि कि तुम्हें चाहने वाला सबसे सुन्दर,, सबसे ताकतवर और सबसे ज्यादा समृद्ध और सुखी हो , ताकि वह तुम्हें हमेशा खुश रख सके.
स्वीटी- शुभकामनाओं के लिए शुक्रिया अजय बाबू....
अजय- इसमें शुक्रिया कि क्या बात है ? क्या कभी अपनों को धन्यवाद दिया जाता है ?











Friday, April 23, 2010

bhaag-72

बल्कि वह हंसकर मेरे सीने से लिपट गयी . मैंने अपने हाथ खड़े किये और वह उनमे समा गयी .उसका दिल जोर -जोर से धड़क रहा था और धडकनें साफ़ कह रही थीं कि वह भी मुझसे जी जान से मोहब्बत करती है मगर जमाने के जुल्मों सितम से डरती है. जब मैंने उसकी आँखों में झंका तो वहाँ मेरे लिए प्यार का सागर उम्दा हुआ मिला . मेरे अलावा और कौन जान सकता है कि वह मेरे लिए इस जन्म और जीवन का अनमोल तौहफा था. मैं उस नज़ारे को अभी तक भूल नहीं पाया हूँ.
स्वीटी- कैसे भूलोगे , नहीं भूल पाओगे , कोई इंसान अपना पहला प्यार नहीं भूल पायेगा . दरअसल जब प्यार करने कि उम्र होती है तो हम लोग सपने में ही अपने प्यार का अक्स तलाशने लगते हैं, सोचते हैं कि वह ऐसा होगा या वैसा होगा ? और जब वह किसी दिन हमारी आँखों के सामने आता है तो हम उसे देखते रह जाते हैं, वह हमारे दिल कि गहराइयों में बस जाता है. फिर पूरे जीवन भर हम उसे भूल ही नहीं पाते. यह किसी एक का माला नहीं है बल्कि दस्तूर बन चुका है . आप किसीसे से पूछकर देखें , कोई नहीं कह सकता है कि वह अपने पहले प्यार को कभी याद नहीं करता. कभी न कभी , कहीं न कहीं वह याद आ ही जाता है.
अजय- तुम इतनी अच्छी तरह से , इतने दावे के साथ कैसे कह सकती हो ? क्या तुम भी किसी से प्रेम करती हो ? या तुमने भी किसीसे प्यार किया था , और उसे अब भुला नहीं पा रही हो ?
स्वीटी- प्यार ? हाँ.... किया भी था और नहीं भी. याद भी है और नहीं भी. मैंने रिसर्च किया है कि कोई भी अपनी पहली चाहत को भुला नहीं पाता. दैट्स आल....
अजय- समझ गया , तुम अपनी प्राइवेसी शेयर नहीं करना चाहतीं, यही ना... कोई नहीं , मैं जिद नहीं करूँगा.
स्वीटी- ये बात तो बिलकुल भी नहीं है अजय बाबू, सच्चाई इसके ठीक विपरीत है. अगर मेरा वश चले तो हर बात सिर्फ तुम को ही सुनाऊँ. आपसे ही बातें करती रहूँ. सिर्फ और सिर्फ आपको देखती रहूँ. मगर यह मेरे हाथ में है क्या ? मेरे वश में है क्या ? नहीं न .......
चन्दा के ख्यालों में सर से पाँव तक डूबे अजय का कुछ देर के लिए ध्यान हटा , स्वीटी कि बातों को समझने कि कोशिश करने लगा मगर फिर जल्द ही चन्दा की यादों में खोकर रहा गया. याद आने लगे वे क्षण , जब उसने चन्दा को अपनी बांहों में भर लिया था, बेखयाली में वह उसका चुम्बन लेता चला गया. उसके होठों पर ताबडतोड चुम्बन की बौछार करने लगा. चन्दा अपने आपको मुक्त करने कि कोशिश भी नहीं कर रही थी.उस वक्त अजय को एहसास हुआ था कि चन्दा सिर्फ और सिर्फ उसके लिए ही बनी थी. कुदरत ने अब तक उसकी शादी कहीं और जगह पर इसीलिए नहीं होने दी थी ताकि वह उसको हो सके. उसने कहा भी तो था-
-मालिक ने तुमको मेरे लिए ही इस दुनिया में भेजा है वरना अब तक तुम इस तरह कुंवारी ही नहीं रहती, तुम्हें मेरी बात माननी होगी, यह जानना होगा कि किस तरह खुद कुदरत भी हमें एक दुसरे से मिलाती है. एक अनजानी शक्ति हमको एक दुसरे से मिलाने का प्रयास करती हैं. जोडियाँ ऊपर ही तय हो जाती हैं.
चन्दा- मुझे डर लग रहा है, अपने आपके लिए कोई डर नहीं है. डरती हूँ कि कहीं तुम्हारा अहित न हो जाए .
अजय- मेरे रहते हुए तुम्हारा कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता . मैं अपनी जान भी दे दूंगा , मगर तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगा, तुम मेरी जान हो, मेरी आन -बाण शान और सम्मान हो, तुम मेरे जीने का मकसद हो.
चन्दा- बस करो अजय बाबू, मैं तो नाचीज हूँ, मेरी इतनी तारीफ़ भी न करो. मैं तो आपके पैरों कि धुल भी नहीं हूँ.
स्वीटी- कहाँ खो गयी अजय बाबू, अब हमको यहाँ से चलना चाहिए ...
अजय- थोड़ी देर और कड़ी रहो, तुम हो तो हौंसला बना रहता है. बड़ा अच्छा लग रहा है. आनंद आ रहा है. समय कैसे कट गया पता ही नहीं चला. बाद में मुझे कैद करके काल कोठरी में डाल दिया जाएगा.क्या तुम जानती हो कि मुझे यहाँ से जाने के बाद अपने ही कमरे में कैद कर दिया जाएगा ... मैं किसी से मिल नहीं सकता, अपनी मर्जी से कहीं जा नहीं सकता. किसी को पत्र भी नहीं लिख सकता. अगर कोई बाहर से मुझसे मिलना चाहता है तो वह ऐसा नहीं कर सकता. ले देकर एक तुम ही ऐसी हो जिससे मैं बात कर सकता हूँ, मिल सकता हूँ.













Thursday, April 22, 2010

bhaag-71

जिस तरह तपते रेगिस्तान में प्यासे को पानी मिलने से संतुष्टि मिल जाती है, उसी तरह मुझे आनंद मिल रहा है, तृप्ति मिल रही है. मैं नहीं जानता था की तुम इतनी अच्छी हो. चलो आज से हमारी दोस्ती पक्की रही. जान जाए पर यह दोस्ती नहीं टूटेगी. मैं चाहूँगा की तुम मुझे चन्दा से मिलाने की कोशिश करो, जानता हूँ की हमारे और तुम्हारे परिवार वाले हम दोनों की सगाई करना चाहते हैं, लेकिन ज़रा सोच तो सही, जब मैं पूरी तरह से समर्पण नहीं करूँगा, दिलो दिमाग से तुम्हारे साथ नहीं रहूँगा, तुम्हें अच्छी तरह से प्यार नहीं कर पाऊंगा तो फिर ऐसी स्शादी का मतलब क्या होगा, मेरा तन, मन समर्पण सब कुछ तो चन्दा के साथ है. चन्दा मेरी रग -रग में बस चुकी है. खून में समा गयी है.
स्वीटी- मैं आपकी भावनाएं समाजः सकती हूँ. मैं पूरी कोशिश करुँगी , इस रिश्ते को निभाने की. इसका मतलब ये नहीं की मैं आपको पसंद नहीं करती. आप तो मेरे लिए बेहद आदरणीय हैं. आप मुझे हद से ज्यादा पसंद हैं. कितनी ही रातें मैंने आपकी यादों में गुजारी हैं. आपके सपने देखे हैं. आपकी मुस्कान सदैव मेरी आँखों में समाई रहती है, जब हम बचपन में खेलते थे, तो मुझे बहुत खुशी होती थी. आपको अपना बनाने की ख्वाहिशें पाला करती थी. मगर जब आपको कोई और पसंद है तो मुझे भी ऐतराज नहीं. मैं खुद भी तो चाहती हूँ की बस आपको खुश होते देखती रहूँ. आपकी खुशी ही मेरे लिए सब कुछ है. आपकी एक मुस्कान के आगे मैं नतमस्तक हूँ. मेरा हर संभव प्रयास रहेगा की मैं आपको कुछ खुशियाँ अपनी तरफ से उपलब्ध करा सकूं. इसके लिए जो चाहे परना पड़े परवाह नहीं है.
अजय- शुक्रिया स्वीटी, मुझे तुमसे यही उम्मीद थी,आशा करता हूँ, तुम मुझे माफ कर दोगी. मैं दिल के आगे मजबूर हूँ. इश्क के आगे मजबूर हूँ. क्या करू यार मुझे कुछ समझ ही नहीं आता . चन्दा के आगे सब बौने नजर आते हैं. मेरी दुनिया बस चन्दा के इर्द -गिर्द आकर सिमट गयी है, रबबा कभी किसको यह रोग न लगाये .
स्वीटी- ऐसा भी ना कहो अजय बाबू, इश्क पर यूं तोहमत लगाना ठीक नहीं है. काश, कोई मेरे दिल से पूछे की प्यार क्या है ? इसका रंग कैसा है , खुशबू कैसी है ? प्यार कैसे होता है ? कब होता है ? काश, कोई जाने मेरे नजरिये से. तब बड़ा आनंद आएगा , बड़ी खुशी मिलेगी. मोहब्बत का असली मजा तो वही लूटता है जो इसमें मर मिटना जानता है , जो त्याग करना जानता है. प्यार को सिर्फ और सिर्फ त्याग से ही जीता जा सकता है.
अजय- तो , तुम्हारा मतलब है की मुझे भी अब त्याग करना होगा , ये घर बार छोड़ना होगा. काश , मैं ऐसा कर पाता , लेकिन माँ के स्नेह की जंजीरें , खानदान के इज्जत का सवाल मेरे पाँव में बेडियाँ डाल देते हैं. कोई सच्ची सलाह दो, जिससे मैं अपनी मोहब्बत को हासिल कर सकूं.
स्वीटी- जिसे ट्यूम इतना चाहते हो, जिस पर अपनी आन, बांन , शान कुर्बान करने को तैयार हो , क्या तुमने उसके सामने अपने प्यार का इजहार भी किया है , या अभी तक ?
अजय- हां, मैंने पहले पत्रों के द्वारा और फिर स्वयम जाकर भी अपनी मोहब्बत का इजहार किया है.
स्वीटी- तो क्या प्रतिक्रया हुई, उसने स्वीकार कर लिया ? मेरा मतलब आसानी से स्वीकार कर लिया क्या ? क्या वह भी तुम्हारी तरह तुम्हें टूट-टूटकर चाहती है ? क्या पहले से भी वह तुम्हारे बारे में सोचा करती थी, तुम्हें चाहा करती थी, रातों को तुम्हारे ख्वाब देखा करती थी ? क्या कुछ बताया इस बारे में ?
अजय -उसने कहा की वह मुझसे उम्र में बहुत बड़ी है. लोग क्या कहेंगे ? उसने पहले मुझे समझाया और जब मैं नहीं माना , और मैंने जिद की कि अगर वह मुझे नहीं मिली तो मैं अपनी जान दे दूंगा. तब जाकर उसका दिल पसीजा , हांलाकि इसे तुम इमोशनल ब्लेकमेल नहीं कह सकती. क्योंकि मैंने सारी बातें स्पष्ट कर दी थी, और कहा था कि वे चाहें तो इनकार कर सकती हैं.
स्वीटी- फिर ? क्या वह मान गयी ?
अजय- शायद ... क्योंकि उसने इनकार भी तो नहीं किया था.












Wednesday, April 21, 2010

भाग-७०

कुछ देर तक वे दोनों खामोश रहे , अजय तो शून्य में निहार रहा था , जब एक मिनिट तक मौन छाया रहा और फिर अजय बोला -
-तुम तो जानती ही होंगी की ...मैं किसी और से...
स्वीटी-हाँ उडती -उडती खबर मिली है की आप किसी उम्रदराज महिला के आकर्षण के शिकार हो ... क्या उन्हिकी यादों के शिकार हो. जरूर वह कोई किस्मत वाली होगी. क्या मुझे नहीं मिलवाओगे उनसे ?
अजय- तुमसे क्या छिपाना , मैं उस उम्रदराज , हाँ उम्रदराज महिला के आकर्षण का नही बल्कि उसकी मोहब्बत का शिकार हूँ. ये सब कब हुआ , कैसे हुआ , नहीं जानता ... लेकिन अफ़सोस की बात
तो ये है की मेरी भाव नाओं को कोई भी समजहने के लिए तैयार नहीं है. सब लोग मुझे मूर्ख समझ रहे हैं. लेकिन मैं जो कर रहा हूँ, वह अच्छी तरह सोच समझकर ही कर रहा हूँ. मैंने चन्दा से प्यार
किया है, कोई मजाक नहीं. मैं जानता हूँ की लोग चाहे मुझे कमसिन समझे , मगर सच्चाई ये है की मैं पूरे होश -हवाश में उसको चाहता हूँ, उस पर अपनी जान न्यौछावर करता हूँ.
स्वीटी -मैं समझ सकती हूँ ... लेकि अपना अनुभव सुनती हूँ. सिर्फ फिल्मों में ही नहीं, बडी उम्र के पुरूष , स्त्री की ओर वास्तविक जीवन में भी युवाओं का रूझान अब काफी देखने को मिल रहा है। कुछ अरसा पहले एक युवती ने टीवी पर खुलेआम अपने से ज्यादा उम्र के प्रोफेसर से प्यार को कबूल किया। प्रौढ से प्रेम गलत नही पर इस प्यार का भविष्य संदेह में ही रहेगा।
अपने से ज्यादा उम्र के पुरूष स्त्री की ओर युवतियां व युवक अकसर इसलिए झुक जाते हैं, क्योंकि उन की मैच्योरिटी उन्हे काफी प्रभावित करती है। घीरगंभीर युवतियां, जो आज के दिखावा भरे युग को पसंद नहीं करती,उन्हे अपने हमउम्र लडकों में प्रभावित करने लायक कोई बात दिखाई नहीं देती। उघर प्रौढ प्रौढा को भी अपनी युवा प्रेमिका या प्रमिका से बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं होतीं। ढलती उम्र में भी जबरदस्त पर्सनैलिटी व जिंदादिली युवतियों व युवकों को उनकी तरफ आर्कषित करती है।
उस वक्त प्रौढ और युवा दोनों ही यह समझते हैं कि प्यार के लिए कोई सीमारेखा तय नहीं होती। युवा के प्यार में पड कर प्रौढ या प्रौढा का दिल भी अचानक जवान हो जाता है और वह अपनी प्रौढा पत्नी या पति से उन्मुख होने लगते हैं । युवती या युवक को भी समाज की ज्यादा चिंता नहीं होती क्योंकि वे समझते है कि उन्हे अपना जीवन अपने तरीके से जीने का पूरा हक है।
इस प्रकार की रिलेशनशिप का भविष्य डार्क होता है। अकसर युवा इस रिलेशनशिप को लेकर काफी भावुक हो जाते हैं और परिवारजनों के खिलाफ चले जाते हैं। उन्हे समझाने का कोई फायदा नहीं होता क्योंकि वे अपनी जिद पर अडे रहते हैं। उन्हे समझना चाहिए कि इस रिश्ते का कोई भविष्य नहीं है। अंत में दुख, अकेलेपन व कुंठा के सिवा कुछ नहीं मिलता। ऎसे में आप को अपने भविष्य के बारे में अवश्य सोचना चाहिए।
इस प्रकार के प्यार में युवती के परिवारजन अकसर उसे समाज की दुहाई देतें हैं, लेकिन उसको सही मार्गदर्शन नहीं दे पाते। परिवारजनों को अपनी बेटी , बहन को इस प्यार के नेगेटिव और पोजिटिव दोनों पहलुओं से अवगत कराना चाहिए ताकि वह परिजनों को अपना दुश्मन न समझे। बडी सूझबूझ से उसे सभी तथ्यों के बारे में अवगत कराएं , तभी वह अपने भलेबुरे को समझ पाएगी।आप यह सुनकर शायद नाराज हो जाएँ , ये समझें की मैं आपको बहका रही हूँ. मगर ऐसी कोई बात नहीं है. हाँ, ये सच है की आप मुझे बहुत अच्छे लगते हैं. मैं आपको पूजने की हद तक चाहती हूँ, लेकिन इसका अर्थ ये नहीं की आपको पाने की काह में मैं आपका अहित सोचूंगी. यह तो कभी सोचना भी मत. मैं आपके साथ हूँ. आपके हर निर्णय के साथ हूँ .
अजय- शुक्रिया दोस्त... बहुत -बहुत धन्यवाद ... कहते हैं की डूबते को तिनके का सहारा होता है. तुम अकेली हो जो इस परिवार से मेरा साथ दे रही हो .. वरना... वरना तो सब मेरे प्यार के दुश्मन हैं. समझते हैं ना जाने मैंने कौन सा गुनाह कर दिया है. तुम बहुत अच्छी हो स्वीटी. मैं सैल्यूट करता हूँ तुम्हें.
स्वीटी - तो फिर हम दोस्त हुए ?
अजय- हाँ, पक्के. मेरी मदद करना चाहती हो तो चंदाबाई के बारे में जानकारी दे सकती हो, वह इस वक्त कहाँ है, किस हाल में हैं ? क्या वहाँ तक मेरा सन्देश पहुचा सकती हो ?
स्वीटी- इस वक्त वह कहाँ है, ये तो कहना मुश्किल है , मगर इतना जानलो की वह इस गाँव में नहीं है. गाँव छोड़कर कहीं जा चुकी है, अगर मुझे ज़रा भी पता चला तो आपको जरूर बताउंगी. मेरा वादा है .

Monday, April 19, 2010

BHAAG-69

मैं तो बड़े अरमान लेकर आई हूँ, मुझे बताया गया था की आप मेरे बचपन के दोस्त हैं. मुझे तो बहुत सी बातें याद हैं, क्या आप सब कुछ भूल गए ? आपको याद नहीं जब हम नीलीपीली साडी वाला खेल खेलते थे . कटना आनंद आता था ? कभी-कभी चोर सिपाही वाला भी खेल खेलते थे . कितने अच्छे दिन थे ? याद है की नहीं ?
अजय-सच कहूँ तो मुझे कुछ भी याद नहीं हैं, मैं इन दिनों कुछ परेशान सा हूँ ... क्या हम बाद में बात नहीं कर सकते ?
या किसी और सब्जेक्ट पर बात करें. जहां तक मुझे मालूम हैं, अआपके और मेरे पिता के बीच कुछ बातें हुईं हीं, मैंने भी उडतउडती सुनी हैं , शायद वे लोग हम दोनों के बीच एक नया रिश्ता कायम करना चाहते हैं. विवाह का रिश्ता.. मगर मैं किसी और का नाम लूं तो ...? क्या बुरा नहीं लगेगा तुम्हें ?
चन्दा -प्रेमी की भावना होती है कि तुम अगर मुझको न चाहो तो कोई बात नहीं, पर किसी गैर को चाहोगी तो मुश्किल होगी। अबे मजनूँ मियाँ जब वो तुमको ही नहीं चाहती तो टेंशन काहे को लेते हों। प्यार और चाह में फर्क करना सीखो। प्यार स्वतंत्रता का पक्षधर है और चाहत तुम्हारे दिमागी दिवालिएपन की सूचना। जरा प्यार करके तो देखो। थोड़ा-सा प्यार हुआ नहीं कि अधिकार जताने लग जाते हो। जैसे बस अब ये मेरी है। मेरी के लिए जीना भी तो सीखो, मरने की झूठी कसमें मत खाओ।
आमतौर पर पुरुष का चित्त खानाबदोश होता है। घर बनाना या बसाना तो स्त्री ने सिखाया है वरना यूँ ही जिंदगी मारी-मारी फिरती थी। तब समझो इस मनोविज्ञान को कि प्रेमिका की भावना क्या होती होगी। प्रेमिका हर चीज में स्थायित्व ढूँढती है। प्रेमी की हर हरकत पर वह नजर रखती है कि कहीं बदल न जाए सनम।
इसीलिए तोड़ दो वे सारे बंधन जिसमें प्रेम नहीं। निश्चत तौर पर ऐसा कहना बहुत आसान है लेकिन ऐसी सोच सभी की हो जाएगी तो 99 प्रतिशत संबंध टूट जाएँगे।स्वीटी कहती जा रही थी लेकिन अजय तो अपने दोस्त की सलाह पर उलझा हुआ था, उसके दोस्त ने ही तो कहा था की अगर वह परेशान है तो उन्हें गले लगाकर इस बात का एहसास दिलाएँ कि वह आपके लिए कितना मायने रखती है। उनकी छोटी-छोटी बातों का भी ख्याल रखें, क्योंकि यह प्यार का बहुत जरूरी हिस्सा होता है।
कभी-कभी उनके पसंदीदा गाने भी उन्हें सुनाएँ, चाहे आपकी आवाज कितनी भी खराब क्यों न हो। उनके दोस्तों के सभी कुछ समय बिताएँ।उनके नोट्स आप तैयार कर दें। अपने परिवार के लोगों और दोस्तों से भी उन्हें मिलाएँ, इससे आपके प्रति विश्वास बढ़ेगा।
उनके बालों को प्यार से सहलाएँ, इससे उन्हें सुकून मिलेगा। कभी-कभी आप उनके साथ मस्ती भरा खेल भी खेलें, जैसे गुदगुदाना, गोद में उठाना, कुश्ती करना।पार्क लेकर घूमने जाएँ और अपने दिल की बातें कहें। हँसाने के लिए जोक्स सुनाएँ।
आधी रात को उनकी खिड़की के नीचे छोटे से पत्थर का टुकड़ा फेंकें और उन्हें बताएँ कि आप उन्हें कितना 'मिस' कर रहे हैं। सोते वक्त उनके नीचे गिरते हाथों को अपने हाथों में ले लें।
अपने नामों को पेड़ पर लिखकर घेरें। जब वह आप में पूरी तरह खो जाए तो उसे प्यार से चूमें। उन्हें कभी-कभी अपने कंधों पर उठाएँ। उनके लिए फूलों का तोहफा ले जाएँ।
अपने दोस्तों के बीच भी उनके साथ वैसा ही व्यवहार करें, जैसा आप अकेले में करते हैं।उनकी आँखों में देखकर मुस्कराएँ।
आपकी जो तस्वीर उन्हें पसंद हो उन्हें जरूर दें।उनके साथ डांस करें, अगर म्यूजिक न हो तो भी।बारिश में उन्हें चूमें। हमेशा अपने प्यार का इजहार करते रहें।
मगर बेचारा अजय कोई उपाय नहीं कर पाया, कुछ नहीं कह पाया. इस वक्त उसे एक सच्चे सलाहकार , सच्चे हमदर्द की जरूरत थी.

Sunday, April 18, 2010

bhaag-68

लोग उसकी वाक् पटुता के भी कायल थे , मगर अजय तो जैसे पत्थर हो चूका था. उस किसी बात का कोई असर ही नहीं था . वह उसकी तरफ रस भरी , आश भरी निगाहों से देखती लेकिन कोई फायदा नहीं होता. उसे अजय की आँखों से उदासी दिखाई देती, यह बेहद पीडाजनक बात थी, उसने कहा भी-
- आपको कोई गम तो नहीं है अजय बाबू, कुछ परेशान दिखाई देते हो ? मैंने सुना है की किसीसे अपना गम कह देने भर से ही दिल हल्का हो जाता है , हो सकता है की आपको भी इससे कुछ राहत मिले. मुझे कहदो . मैं हर संभव प्रयास करुँगी की आपकी समस्या का समाधान हो सके. मुझ पर यकीं किया जा सकता है. मुझे अपनी दोस्त समझो, यहाँ आपके और मेरे सिवाय कोई तीसरा मौजूद नहीं है . मैं हमराज बनी रहूंगी.बुरा ना मानो तो कहूँ की यहाँ प्यार का लफडा नजर आता है . और मरी कुछ सहेलियों या जान पहचान वालों की प्रतिक्रिया आपको सुनाती हूँ. यह सही है पर यह प्यार एक विशेष उम्र का तोहफा होता है जिसका एहसास आपको हमेशा अच्छा लगता है। इलेवन्थ-ट्वेल्थ के आसपास की वह उम्र होती है जब आपको कोई जुनून की हद तक अच्छा लगने लगता है। इस उम्र में सही-गलत का ज्यादा ज्ञान तो होता नहीं...।'

संजोगिता हँसते हुए कहती हैं-' प्यार एक एहसास है और दुनिया में कुछ अगर हमेशा रहने वाला है तो यही है। मैं दुनिया में फियर और लव को ही यूनिवर्सल ट्रूथ मानती हूँ। इसमें भी प्यार ही ऐसा है जो हमेशा हमारे साथ रहता है। यह हमारी पर्सनेलिटी से जुड़ा है।'

प्यार एक से होता है या अधिक से, पूछने पर चारू हँसते हुए कहती हैं कि एक समय में तो एक से ही होता है! प्यार तो वैसे हम जिससे भी बात करते हैं, मिलते हैं, सभी से रहता है। हाँ, कोई खास एक ही होता है जिसके लिए हमारे मन में 'एक्सट्रा इमोशन्स' रहते हैं।

क्या प्यार साल-दर-साल चल सकता है, इस प्रश्न पर शुभ्रा का कहना है कि यदि हम दूर-दूर रहें तो यह संभव हो सकता है। तो क्या पास में रहने में प्यार कम हो जाता है, इस पर जरा दार्शनिक होकर कहती हैं-'यह समझ के ऊपर है। प्यार बहुत बड़ी चीज है। जब हमें किसी से ज्यादा प्यार हो जाता है तो वाकई उसमें रब दिखता है। उसे हम देखते नहीं, उसका सजदा करते हैं।

जब वह हमारे सामने खुलता है, उसकी कमजोरियाँ हमारे सामने आती हैं, उन कमजोरियों के साथ भी उसी नजर से उसे देखते रहें यह थोड़ा मुश्किल है। हम उसे बदलने की कोशिश करते हैं। इस पर वह खीजता है। लड़ाई-झगड़े शुरू हो जाते हैं। हम किसी को उसके गुण-दोषों के साथ स्वीकार करें, तभी प्यार साथ में रहने पर बढ़ सकता है।

इस साल ट्वेल्थ की परीक्षा दे रहीं कृतिका यादव को फिलहाल तो डॉक्टरी के एंट्रेंस एक्जाम में सफलता पाने और बोर्ड एक्जाम में अच्छे मार्क्स लाने के अलावा दूर-दूर तक कोई और बात नहीं सूझती। सुबह सात से दोपहर दो तक स्कूल, फिर दोपहर तीन से पाँच बोर्ड एक्जाम की ट्यूशन, शाम 6 -7 एक और ट्यूशन, रात आठ से साढ़े दस तक पढ़ाई और फिर आधा घंटे अगले दिन स्कूल की तैयारी...। इन सबके बीच कृतिका को अपने गाल पर उग आए नए पिंपल तक को देखने की फुर्सत नहीं तो भला प्यार जैसी चीज के बारे में वे कैसे सोच सकती हैं?

हाँ... उन्हें यह जरूर मालूम है कि डॉक्टर बनने के बाद उनके सामने लड़कों की लाइन लग जाएगी! और यह भी कि उनकी जिससे शादी होगी, वही उनका सच्चा प्यार होगा। ऐसा उनकी मम्मी कहती हैं! इसलिए फिलहाल ऐसी 'फालतू' बातों में वे वक्त जाया नहीं कर सकतीं।

दूसरी ओर इलेवन्थ में पढ़ रहे अक्षत कुलकर्णी मानते हैं कि प्यार मतलब गर्लफ्रेंड और गर्लफ्रेंड का साथ थोड़ा खर्चे भरा तो है लेकिन इससे दोस्तों में 'रेप्यूटेशन' बढ़ जाती है। हालाँकि उनकी कोई गर्लफ्रेंड नहीं है पर शायद कॉलेज में जाकर वे बना लेंगे। वे मानते हैं कि फर्स्ट इंप्रेशन का बहुत फर्क पड़ता है। सच्चे प्यार की कहानियाँ तो बस फिल्मों में दिखाते हैं, असल जीवन में ऐसा कुछ शायद ही होता होगा। लाइफ को प्रैक्टिकल एप्रोच के साथ जीना चाहिए और प्यार में इमोशनल होना मूर्खता है।

शाश्वत प्यार का मतलब वे समझ नहीं पाए लेकिन उन्हें इतना जरूर मालूम है कि ब्रांडेड कपड़ों, सनग्लासेस, बाइक और टैटू से लड़कियाँ इंप्रेस होती हैं। ऐसा उनके दोस्त यश ने उन्हें बताया है, इसलिए जल्द ही अक्षत भी अपनी पॉकेटमनी बचाकर नए सनग्लासेस तो खरीद ही लेंगे।
ये कुछ ऐसे उदाहरण हैं, जो मैंने आपके सामने रखे हैं. तो अगर आपका भी किसी के साथ कोई चक्कर है तो कोई बात नहीं , उसे भूल जाइए , आपकी कंपनी देने के लिए मैं हूँ ना.

bhag-67

और फिर चन्दा ने ही तो उसे कुछ टिप्स दिए थे. उसीने तो बताया था की एक दोस्त ने उस्सको समझाते हुए कहा था
प्यार को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। प्यार को बंया करने का अंदाज समय के साथ बदलता रहता है। हर कोई चाहता है कि वह अपने पार्टनर को खुश रखे। प्यार एक दूसरे के जीवन को रंगीन बनाता है। लेकिन आधुनिक समय में बदलती सोच के कारण अक्सर एक दूसरे की पसंद-नापसंद को लेकर असमंजस की स्थिति रहती है। इस उलझन को दूर करने के सुझाव निमन हैं। सरप्राइज तो सभी को पसंद आता है। खासतौर पर महिलाओं को सरप्राइज मिलने पर ज्यादा खुशी होती है। आप अपने साथी को अचानक प्रोग्राम बनाकर डिनर या फिल्म के लिए आमंत्रित करें। प्यार के यही छोटे-छोटे पल जीवन को खुशियों से भर देते हैं और छोटे-छोटे सरप्राइज प्यार की नींव को धीरे-धीरे मजबूत करते हैं। यदि आपको अपने पार्टनर के साथ वक्त बिताए काफी समय हो गया हो तो उनके लिए वक्त निकालें। एक दूसरे का साथ प्यार को बढ़ाता है और रिश्तों में दूरियों को कम करता है। जब आप एक दूसरे से मिलें तो एक दूसरे को गले लगाएं। अपने पार्टनर के साथ बाहर घूमने जाएं। अगर बाहर घूमने जाएं तो घर से एक दूसरे का हाथ पकडकर बाहर निकलें। आपके साथी के मन में अपनेपन का एहसास बढ़ेगा। पार्टनर का छूना लडकियों को अच्छा लगता है। लेकिन मर्यादा का ध्यान रखें। एक साथ समय बिताकर आप अपने प्यार का इजहार बिना कहे भी कर सकते हैं।
तारीफ सुनना हर महिला को अच्छा लगता है। यदि आप उनके मेकअप या कपडों की तारीफ करें तो आप उनका मूड बदल सकते हैं। आप उनके स्टाईल और मेकअप की तारीफ करें। ।
महिलाओं को व्यस्त पुरूष ज्यादा पसंद आते हैं। महिलाओं को पीछे-पीछे घूमने वाले लोग बिल्कुल पसंद नहीं आते। महिलाएं ऎसे पुरूषों को ज्यादा पसंद करती है जिनके पास अपना विजन, पैशन, अच्छी एज्यूकेशन और बिजी लाइफ हो। बात करने और उठने बैठने का तरीका ऎसा हो जो सब पर जादू कर दे। इसलिए आपकी पर्सनैलिटी अट्रेक्टिव होनी चाहिए। इसलिए खुद की पर्सनैलिटी को निखारें।
इन बातों का ध्यान रखकर आप महिलाओं को आकर्षित कर सकते हैं। साथ ही अपने प्यार को इन छोटी-छोटी बातों को दिखाकर बढ़ा भी सकते हैं।
अजय के दिमाग में यह बात घूम रही थी की अब वह करे तो क्या करे ... झील सी मोटी आँखों वाली स्वीटी उसे प्यार से ऐसे निहार थी जैसे रेगिस्तान में कोई सदियों का प्यासा पानी की कुछ बूंदों के लिए तरस रहा हो. अजय की माँ ने स्वीटी को पहले ही इशारा कर दिया था की उसकी अजय के साथ शादी हो सकती है , और इसी कारण स्वीटी जान ही गयी की अब तो अजय से
दोस्ती करनी ही पड़ेगी, वह शालीनता की हद भी नहीं पार करना चाहती थी और साथ ही अजय की माँ ने उसे उसको जो जिम्मेदारी दी थी, उसको पूरा भी करना चाहती थी.
उसके पिता विधायक थे ही , इस कारण पब्लिक डीलिंग का काम वह अच्छी तरह से कर लिया करती थी. उसकी चचेरी बहन तो अक्सर उसे यह कहकर चिढाती थी
की " बड़ी होकर अपनी स्वीटी तो पब्लिक रिलेशन ऑफीसर बनेगी. मगर वह तो बेचारी किसीसे कुछ भी नहीं कहती

Thursday, April 15, 2010

bhaag-66

दोस्ती या प्रेम के रिश्तों का बन जाना संयोग हो सकता है, पर इन्हें बनाए रखना कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। लंबे और मधुर रिश्तों के लिए सबसे जरूरी होता है, आपसी सामंजस्य और समर्पण का भाव। जीवन में वही रिश्ता सफल होता है, जिसमें न तो अहं का भाव हो और न जीत की भावना। अपने साथी को जिताना ही सबसे बड़ी जीत मानी जाती है।अगर अपना दिल हार सकते हो तभी तो किसीको जीत पाओगे ..
अजय के जेहन में इस वक्त चन्दा का चेहरा था, उस चन्दा का जिसे वह दिलो जान से चाहता था और जिसकी सूरत उसकी रग -रग में बस चुकी थी. स्वीटी इसलिए खामोश थी , क्योंकि वह अजय के दिल की बात जानना चाहती थी. अनुमान लगाना चाहती थी की आखिर ऐसी कौन से चिंता है, जिससे वह अंदर ही अंदर घुला जा रहा है. तभी उसे याद आया की

जीवन में ऊंचाइयों को छूने की स्थिति हमेशा नहीं आती। जब भी कोई अपने लक्ष्य को छूने की कोशिश में फिसलता है, उसे सहारे की जरूरत महसूस होती है। और यही वह वक्त होता है, जब रिश्तों की परीक्षा की घड़ी आती है। जब भी ऐसे हालात आते हैं, अपने साथी को ऐसे संभालें और सहारा दें कि आपका रिश्ता सार्थक हो जाए।

एक दार्शनिक ने कहा भी है- 'तुम्हारा मित्र तुम्हारे अभावों की पूर्ति है।' इस एक वाक्य का अर्थ काफी गूढ़ है। यदि वास्तव में हम साथी के अभावों को भर देते हैं तो वह रिश्ता सार्थक हो जाता है, जो इसी उद्देश्य के लिए बंधा था।

किसी भी रिश्ते की पहली शर्त है कि उसमें सहिष्णुता हो। क्योंकि जीवन में जिसमें सहन करने की शक्ति न हो, वह सुखी नहीं रह सकता और न अपने साथी को ही सुख दे सकता है। फिर चाहे रिश्ता दोस्ती का हो, प्रेम का या फिर पति-पत्नी का। रिश्तों के अवमूल्यन से बचने के लिए सबसे जरूरी तत्व है कि सभी एक-दूसरे की भावनाओं का आदर करें और समर्पण का भाव रखें।

समर्पण भी ऐसा कि जिसमें स्वार्थ की कोई मिलावट न हो, क्योंकि रिश्तों का पूरा बंधन विश्वास की जिस डोर से बंधा होता है, वह स्वार्थ की जरा-सी आँच से भी झुलस जाता है। और जो रिश्ता किसी स्वार्थ के वशीभूत होकर बांधा जाता है वह ज्यादा लंबा सफर तय नहीं कर पाता और किसी न किसी मोड़ पर आकर उसकी कलई खुल जाती है। इसलिए जरूरी है कि रिश्तों के प्रति गंभीरता बरती जाए और कोशिश भी की जाए कि इनमें कोई खराश न आए।

खून के रिश्तों या पारिवारिक रिश्तों के अलावा जो रिश्ते दिल के रास्ते पर बँधते हैं, उनका सबसे जरूरी तत्व है, भावनात्मक रूप से उसकी गर्माहट को हमेशा महसूस किया जाना। क्योंकि रिश्तों के बीच की गर्माहट जब भी ठंडी होने लगती है, जुड़ाव के धागे चटकने लगते हैं और एक दिन ऐसे रिश्ते हमेशा के लिए समाप्त होकर दिल के किसी कोने में सिर्फ याद बनकर रह जाते हैं। हर किसी के जीवन में ऐसी यादों की कमी नहीं होती, जब वे पीछे छूटे जीवन के किसी मोड़ पर अपने रिश्तों को छोड़ आए हों।

ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि हम उनमें भावनात्मकता का रंग नहीं भरते। स्कूल, कॉलेज या छोड़ चुके दफ्तरों को याद कीजिए, जहां कोई न कोई ऐसा अजीज साथी जरूर होगा, जो तब तो आपके बहुत नजदीक था पर आज नहीं है। ऐसा इसलिए कि आपने उन रिश्तों को सहेजकर नहीं रखा। जीवन की इस आपाधापी में रिश्तों की अहमियत को महसूस करना जरूरी इसलिए भी है कि आज सबसे अनमोल चीज रिश्ते ही तो हैं।अजय सोचने लगा की उसका सबसे अहम रिश्ता तो चन्दा के साथ था, पता नहीं उसका क्या हुआ ? अपने पिता के तेवर देखकर वह इतना तो जान ही गया था की मामला गडबड हो चूका है और अब आर यार पार की लड़ाई लड़ने का समय आ गया है . लेकिन यह अच्छा वक्त नहीं था. अगर इस समय वह बगावत की बात करता तो उसके खानदान की बुराई के साथ-साथ चन्दा की भी बदनामी हो सकती थी. और यही बात वह चाहता नहीं था. वह तो चंदा को खुश देखना चाहता था, और अपने करीब देखना चाहता था. वह चन्दा के सुर्ख गुआल्बी अधरों को हमेशा चखने का इच्छुक था. वह उसके यौवन की खुश्बू को हमेशा -हमेशा के लिए अपने बदन में महसूस करना चाहता था. स्वीटी उसके चेहरे पर उतारते चढ़ते भावों को पढ़ने का प्रयास कर रही थी.

bhaag-65

तडपकर रह गया अजय... उसका ध्यान तो चंदाबाई में अटका पड़ा था . न वह उससे मिल सकता था और न ही उसे कोई सूचना ही मिल पा रही थी . हर व्यक्ति का प्यार का अंदाज जुदा होता है। उसके घुलने-मिलने का अंदाज अलग होता है। कुछ लोगों के साथ आप बहुत ही सरलता से सारी बातें कर लेते हैं। अपनी हर बात, शौक, चाहत बिना झिझक बोल देते हैं। बिताया हुआ समय आपको सुकून और संतुष्टि से भरा लगता है। ऐसे में स्वाभाविक है कि उस व्यक्ति की चाहत और याद बार-बार आपको बेचैन करेगी। उसे भूल पाना आसान नहीं होगा। पर, उस रिश्ते की दबी आग को हवा देना अपने आशियाने को खुद जलाने के समान है। उसे याद आने लगे वे पल जो उसे चन्दा के साथ बिताये थे .
रिश्तों की कोई निर्धारित परिभाषा नहीं होती। कोशिश भी की जाए तो शायद कोई ऐसी परिभाषा नहीं ग़ढ़ी जा सकती जो रिश्तों को गहराई से परिभाषित कर सके। आशय यह नहीं कि रिश्ता कोई उलझी हुई इबारत है जिसे समझाया नहीं जा सकता, बल्कि असलियत यह है कि 'रिश्ता' जीवन की सफलता का एक बड़ा मानक है, जिसे कुछ शब्दों में अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता।

कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जो पूरा जीवन बदलकर रख देते हैं, पर कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं जिनके जुड़ने का अफसोस जीवन भर होता है और इस तरह के रिश्ते की कसक जीवनभर सालती रहती है।

सामाजिक जीवन में सामान्यतः रिश्तों को दो भागों में विभाजित किया जाता है। एक रिश्ता वह जो खून से बंधा होता है, दूसरा रिश्ता जो हम स्वयं गढ़ते हैं। भारतीय परिवेश में खून के रिश्तों को सबसे ज्यादा अहमियत दी जाती है और माना जाता है कि खून का रिश्ता ही सही मायने में जीवन का जुड़ाव होता है, और इससे बढ़कर रिश्ता होता है वैवाहिक संबंधों का।

इससे इतर जो रिश्ते होते हैं वे न तो खून से बंधे होते हैं और न उनमें सामाजिक दायित्वों का ही कोई बंधन होता है। दरअसल सही रिश्ते वे ही होते हैं, जो सारे बंधनों से मुक्त होकर सिर्फ दिल से बंधे होते हैं। इस बात से कई लोगों को एतराज भी हो सकता है, पर सच यही है कि खून के रिश्ते तो इत्तफाक से बनते हैं।
एक परिवार के सदस्यों का आपस में रिश्ता सिर्फ इसलिए होता है कि उन्हें इत्तफाक ने मिलाया होता है। कुछ हद तक यही बात सामाजिक परिवेश में तय होने वाले वैवाहिक संबंधों पर भी लागू होती है। सिर्फ एक नजर में एक-दूसरे को देखकर वैवाहिक संबंधों की स्वीकृति दे देना और फिर जीवनभर उस रिश्ते को निभाना वास्तव में रिश्तों में बंधना नहीं बल्कि समझौता है।

असल रिश्ता तो वह है, जो हम अपनी पूरी समझ-बूझ और परख के साथ तथा अपनी पसंद से बनाते हैं। फिर चाहे वह रिश्ता दो दोस्तों के बीच का हो या फिर प्रेमियों का या फिर पड़ोसियों के बीच का पारिवारिक-सा रिश्ता ही क्यों न हो। सभी में यह बात 'कॉमन' है। कोई भी रिश्ता इत्तफाक या सामाजिक दबाव में नहीं बना।

अपने पूरे जीवन में हम कई लोगों से मिलते हैं। कुछ हमें अच्छे लगते हैं तो कुछ को हम पहली नजर में खारिज कर देते हैं। संपर्क में आने वाले कुछ लोगों से बार-बार मिलने और बात करने की इच्छा होती है और यही आकर्षण दोस्ती या प्रेम की मजबूत गाँठ बन जाता है। ठीक यही बात समीप रहने वाले दो परिवारों के बीच भी होती है। बहुत सारे लोगों के बीच रहकर भी ऐसे लोग उंगलियों पर गिनने लायक ही होते हैं, जिन्हें हम अपने बहुत नजदीक मानते हैं।

उन्हें अपने दिल की बात बताने का भी मन करता है और उनके दिल की बात सुनने की भी इच्छा होती है। अक्सर देखा जाता है कि स्कूल, कॉलेज या दफ्तरों में कई जोड़ी दोस्त होते हैं। सभी एक साथ रोज मिलते तो जरूर हैं पर सभी को जब भी बातचीत का अवसर मिलता है, वे गुटों में बंट जाते हैं। इसका सीधा-सा अर्थ यही है कि जो जिसके साथ निकटता महसूस करता है, वह उसी के साथ समय भी गुजारना चाहता है।

रिश्तों को जीवन की सफलता और असफलता के मामले में भी एक बड़ा मानक माना गया है। कब, कौन-सा रिश्ता या कौन-सी दोस्ती व्यक्ति को सफलता की ऊंचाइयों पर पहुंचा दे, कहा नहीं जा सकता लेकिन यदि परिस्थितियां अनुकूल न हों तो इसका उलट भी हो सकता है। ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है, जब किसी साथी की मदद से व्यक्ति शिखर पर पहुंच गया, पर सारा दारोमदार इस बात पर निर्भर है कि आप अपने रिश्ते के प्रति कितने गंभीर हैं।अजय अपना दिल टटोलकर देख रहा था . उसका चन्दा के साथ कैसा रिश्ता है ? क्या वह इस अनजाने रीश्ते को कभी भूल सकता है ? कभी खत्म कर सकता है ? स्वीटी उसके भोले चेहरे को निहार रही थी और वह अपनी ही दुनिया में मस्त था .
भाग-६४
चंदा- मुझे अपनी कला पर भरोसा है. मैं अकेली जी रही थी, अकेली जी लूंगी.जब मुझे यहाँ कल का सूरज भी नहीं देखना है तब अपनी कम्पनी का सब ताम-झाम
यहीं छोड़ना होगा, और मैं इसके लिए सहर्ष तैयार हूँ, जब आप सब लोग इसीमे खुश हैं तो मैं भी इसीमे अपनी खुशी तलाश लुंगी , मैं हमेशा के लिए चली जाउंगी.
मेरे पास जो नकद जमा पूँजी है , उसीसे अपनी बसर कर लुंगी.
माँ- तुम हमें समझने की कोशिश तो करो , यह जान तो लो की मैं सच्चे दिल से ये सब कर रही हूँ. भगवान साख्शी है, इस वक्त मेरे मन में तुम्हारे लिए पूरा आदर
सम्मान है, पूरा प्यार है. जब हर साल तुम यहाँ आती हो और अपना खेल खत्म करके जाती हो तब भी तो हम तुम्हें बख्शीश देते थे , तो अब क्या हो गया , क्या अब
इतनी पराई समझ रही हो की ज़रा सी सी बात भी नहीं मान सकती. प्लीज ये रखलो, बुरे समय काम आयेंगे.
चन्दा- जब आपका प्यार मेरे साथ है तो मुझे किसी बुरे वक्त की परवाह नहीं है, आपके इसी आदर से मुझे ऊर्जा मिलती रहेगी. यकीं मानिए मैं खुश रह लुंगी.
माँ- एक प्रार्थना और है चंदाबाई ...
चन्दा - आप आदेश करें, मेरी तरफ से निराशा नहीं मिलेगी.
माँ- तुम्हारे जाने वाली बात अजय को मत बताना, तुम्हें उसीकी की कसम है... चुपचाप चली जाना , हमारी जीप थोड़ी देर के बाद दरवाजे तक आ जायेगी , जब
उसमें बैठकर जा सकती हो . स्टेशन तक या उससे आगे जहाँ तक जाना हो, जीप जायेगी . आशा करती हूँ तुम इस खानदान और मेरी मजबूरियों को समझोगी
अजय के पिता विधान सभा का चुनाव लड़ना चाहते हैं, एक बड़ा राजनीतिक दल उनेहं टिकेट दे रहा है , अगर इस बार उन्हें टिकट मिल गया तो वे जीत
भी जायेंगे , मगर तुम्हारे और अजय के बीच का रिश्ता उन्हें चुनाव हरा सकता है, अजय के रिश्ते की बात जिस खानदान से चल रही हैं, वह बड़ा खानदान है
राजनीति में भी उनका अच्छा -खासा दखल है. अगर अजय का रिश्ता वहाँ हो गया तो विअज्य निश्चित है , वर्ना.....
चन्दा- मैं समजह गयी , मेरी वजह से आपके खानदान को कोई तकलीफ नहीं आएगी. मैं वादा करती हूँ.
और फिर इसके बाद चन्दा उसी शाम चली गयी , कहाँ गयी , क्यों गयी ? किसी को इस बात का पता नहीं चला . हाँ , चन्दा ने अपने मैनेजर रंजन को जरूर एक
पत्र लिखा था, इसी से नौटंकी कंपनी संभाल गयी, रोजाना न्तामाशे होते रहे , मगर चन्दा के आकर्षक न्रत्य और दिल को छूने वाली संवाद अदायगी दर्शकों को जरूर खली
. मगर कोई यह नहीं जान पाया की चन्दा कहाँ गयी. अजय को उसके कमरे में नजरबंद कर दिया गया. उसका घर से बाहर निकलना, दोस्तों से मिलना बंद कर दिया
गया, एक तरह से उसे कैदी जैसा ही बना दिया था, लोगों का सोचना था की समय के साथ सब कुछ ठीक हो जाएगा . धीरे -धीरे अजय के सर से चन्दा का भूत उतर जाएगा.
इसिलए स्वीटी नाम की उस लड़की को गहर बुला लिया गया था , जिससे अजय के रिश्ते की बात चल रही थीं, ताकि उन दोनों में नजदीकियां बढ़ सकें. स्वीटी अपने
नाम की तरह ही स्वीट थी. सादगी की मूरत, मुस्कराए तो फूल झडें और हंसदे तो हीरे -मोतियों की बरसात हो जाए. बड़ा हसीं मंजर था.बाग में कोयल कुक रही थीं, भँवरे मंडरा रहे थे . अजय और स्वीटी वहाँ खड़े हुए फूलों को निहार रहे थे, अजय के पिता ने कई बोडी गार्ड छोड़ रखे थे. उन्हें देखकर अजय सिहर उठता था. स्वीटी पूछ रही थी-
- लगता है आपको मेरा यहाँ आना अच्छा नहीं लगा ? कहीं खोये -खोये लगते हो . मुझे तो लगता था की मुझे यहाँ देखकर तुम खुशी से फूले नहीं समाओगे मगर शायद ऐसा नहीं लगता . शायद मैं गलत थी.
भाग-६४
चंदा- मुझे अपनी कला पर भरोसा है. मैं अकेली जी रही थी, अकेली जी लूंगी.जब मुझे यहाँ कल का सूरज भी नहीं देखना है तब अपनी कम्पनी का सब ताम-झाम
यहीं छोड़ना होगा, और मैं इसके लिए सहर्ष तैयार हूँ, जब आप सब लोग इसीमे खुश हैं तो मैं भी इसीमे अपनी खुशी तलाश लुंगी , मैं हमेशा के लिए चली जाउंगी.
मेरे पास जो नकद जमा पूँजी है , उसीसे अपनी बसर कर लुंगी.
माँ- तुम हमें समझने की कोशिश तो करो , यह जान तो लो की मैं सच्चे दिल से ये सब कर रही हूँ. भगवान साख्शी है, इस वक्त मेरे मन में तुम्हारे लिए पूरा आदर
सम्मान है, पूरा प्यार है. जब हर साल तुम यहाँ आती हो और अपना खेल खत्म करके जाती हो तब भी तो हम तुम्हें बख्शीश देते थे , तो अब क्या हो गया , क्या अब
इतनी पराई समझ रही हो की ज़रा सी सी बात भी नहीं मान सकती. प्लीज ये रखलो, बुरे समय काम आयेंगे.
चन्दा- जब आपका प्यार मेरे साथ है तो मुझे किसी बुरे वक्त की परवाह नहीं है, आपके इसी आदर से मुझे ऊर्जा मिलती रहेगी. यकीं मानिए मैं खुश रह लुंगी.
माँ- एक प्रार्थना और है चंदाबाई ...
चन्दा - आप आदेश करें, मेरी तरफ से निराशा नहीं मिलेगी.
माँ- तुम्हारे जाने वाली बात अजय को मत बताना, तुम्हें उसीकी की कसम है... चुपचाप चली जाना , हमारी जीप थोड़ी देर के बाद दरवाजे तक आ जायेगी , जब
उसमें बैठकर जा सकती हो . स्टेशन तक या उससे आगे जहाँ तक जाना हो, जीप जायेगी . आशा करती हूँ तुम इस खानदान और मेरी मजबूरियों को समझोगी
अजय के पिता विधान सभा का चुनाव लड़ना चाहते हैं, एक बड़ा राजनीतिक दल उनेहं टिकेट दे रहा है , अगर इस बार उन्हें टिकट मिल गया तो वे जीत
भी जायेंगे , मगर तुम्हारे और अजय के बीच का रिश्ता उन्हें चुनाव हरा सकता है, अजय के रिश्ते की बात जिस खानदान से चल रही हैं, वह बड़ा खानदान है
राजनीति में भी उनका अच्छा -खासा दखल है. अगर अजय का रिश्ता वहाँ हो गया तो विअज्य निश्चित है , वर्ना.....
चन्दा- मैं समजह गयी , मेरी वजह से आपके खानदान को कोई तकलीफ नहीं आएगी. मैं वादा करती हूँ.
और फिर इसके बाद चन्दा उसी शाम चली गयी , कहाँ गयी , क्यों गयी ? किसी को इस बात का पता नहीं चला . हाँ , चन्दा ने अपने मैनेजर रंजन को जरूर एक
पत्र लिखा था, इसी से नौटंकी कंपनी संभाल गयी, रोजाना न्तामाशे होते रहे , मगर चन्दा के आकर्षक न्रत्य और दिल को छूने वाली संवाद अदायगी दर्शकों को जरूर खली
. मगर कोई यह नहीं जान पाया की चन्दा कहाँ गयी. अजय को उसके कमरे में नजरबंद कर दिया गया. उसका घर से बाहर निकलना, दोस्तों से मिलना बंद कर दिया
गया, एक तरह से उसे कैदी जैसा ही बना दिया था, लोगों का सोचना था की समय के साथ सब कुछ ठीक हो जाएगा . धीरे -धीरे अजय के सर से चन्दा का भूत उतर जाएगा.
इसिलए स्वीटी नाम की उस लड़की को गहर बुला लिया गया था , जिससे अजय के रिश्ते की बात चल रही थीं, ताकि उन दोनों में नजदीकियां बढ़ सकें. स्वीटी अपने
नाम की तरह ही स्वीट थी. सादगी की मूरत, मुस्कराए तो फूल झडें और हंसदे तो हीरे -मोतियों की बरसात हो जाए. बड़ा हसीं मंजर था.

Wednesday, April 14, 2010

चन्दा वैसेतो नाचने गाने वाली थी, मगर महानता और त्याग में वह अजय की माँ से भी बहुत आगे निकल गयी. उसने जिस शालीनता और
सज्जनता के साथ अपनी बात रखी , वह काबिले तारीफ़ थी. अजय की माँ ने सोचा की काश | चन्दा की उम्र छोटी होती तो कितना अच्छा
होता. कितना बढ़िया होता अगर चन्दा भी उसके बेटे अजय की उम्र की होती, और उसका जन्म किसी कुलीन परिवार में होता . " अगर ऐसा होता भी तो क्या
, क्या तब अजय से उसकी शादी कर दी जाती ? क्या तब ये संभव होता की अजय और चन्दा हमेशा -हमेशा के लिए एक हो जाते ? मन के किसी कोने
से आवाज आई ,'तो अब क्या प्रोब्लम है ?नहीं , नहीं ऐसा नहीं हो सकता . कभी नहीं हो सकता . चाहे जो हो जाए . वह दिल ही दिल चंदा की तारीफ़
भी कर रही थी , उसके पति तो राजपूत हैं , समाझ्सेवक हैं , तो क्या ऐसे प्रतिष्ठित व्यक्ति से ऐसी उम्मीद की जा सकती है ? उन्होंने चन्दा के सामने रखैल
बन्ने का प्रस्ताव रखा था लेकिन चन्दा ने पटरानी बन्ने से इनकार कर दिया , अगर उस वक्त वह दौलत के लालच में आ जाती तब क्या होता ? आज चन्दा भी
उसीकी की आर्थिक हैसियत की होती. मगर वह धर्म से डिगी नहीं . आज तक कभी उसने इस बात का जिक्र भी नहीं किया क्योंकि उसके पति ने उससे बहुत विनती की
थी, चन्दा क्षमाशील भी थी . त्यागी भी थी. लेकिन थी तो अजय से बहुत बड़ी , और वो भी नर्तकी . सोच विचारने के बाद उसने कहा -
-अब तुम ही मेरी मदद कर सकती हो, तुम ही हो जो मुझे खुशियाँ दिला सकती हो .
चन्दा- सौभाग्य होगा मेरा ,आपकी मदद कर पाऊँ इससे अच्छा क्या होगा ? आप आदेश करें , मैं सहर्ष तैयार हूँ. आपके हुक्म की तुरंत तामील की जायेगी .
माँ- यह मेरा आदेश नहीं , बल्कि मेरा निवेदन है , एक माँ तुमसे हाथ जोड़कर विनती कर रही है. मेरे बेटे को आजाद करदो प्लीज. अजय के पिता के सर पर भूत सवार है
वे मरने मारने पर उतारू हो गए हैं. तुम यहाँ से चली जाओ . अगर कल सुबह के उजाले तक तुम यहाँ दिखाईं दी तो बहुत गज़ब हो जायेगा यकीं मानो , यह घर फिर
घर नहीं रहेगा . सालों पहले तुमने जिस घर को बचाया था, वह आज नहीं बच पायेगा. कयामत आ जायेगी .
चंदा- समझ गयी ठकुराइन साहिबा . आप मुझे गाँव निकाले का आदेश दे रही हैं.
माँ- नहीं, बहन .... ऐसा ना कहो , एक मजबूर माँ अपनी झोली फैलाकर भीख मांगने आयी है...
चन्दा- आह... बड़े लोगों की यही अदा होती है . बहन भी कहती हैं और हाथ में तलवार भी रखती हैं. कोई बात नहीं , मैं आपको निराश नहीं करुँगी, बेशक मैं कल सुबह का
उजाला इस गाँव का नहीं देखूंगी. मैं अभी अपने मैनेजर को नौटंकी का चार्ज दे देती हूँ , और फिर इस शहर से इतनी दूर चली जाउंगी की मैं तो क्या मेरी
याद भी नहीं आ पाएगी , एहसानमंद हूँ आपकी. बड़ा उपकार है मुझ पर. मैं इस खानदान का सदैव सम्मान करती रहूंगी . मुझसे आपको कोई अहित नहीं होगा.
माँ- मैं तुम्हारे लिए कुछ भेंट लेकर आई हूँ, हाथ जोड़ती हूँ , अन्यथा मत लेना. इस थैले में छोटी सी रकम है. सिर्फ दस लाख . तुम जहां भी जाओगी , इस रकम से अच्छा घर मकान बनवाकर
सकती हो. कोई काम धंधा कर सकती हो. सम्मान के साथ जीवन जी सकती हो ...
चन्दा के दिल पर बड़ी ठेस लगी . आहिस्ता से तडपती हुई बोली-
-बहुत खूब ठकुराइन . आखिर आपने असली रंग दिखा ही दिया . आप मेरा प्यार खरीदने आयी हैं. आप ऐसा कर सकती हैं क्योंकि आप मालिक है , कुलीन हैं, दौलतमंद हैं

Tuesday, April 13, 2010

भाग -६२

मुझे अफ़सोस है .. मुझ जैसी नाचीज के कारण आपको यहाँ तक आना पड़ा. आप ही बताएं मैं क्या करू ? असल में...
माँ- असल में बात शायद ये है की नौटंकी से अब ज्यादा कमाई नहीं हो रही होगी , अब तुम्हारी उम्र भी वो नहीं रही की गाँव-गाँव जाकर मेहनत कर सको , और मेहनत मशक्कत के बाद दिन भर भांड मटका सका सको, यही ना ? तो तुमने सोचा होगा की इसका कोई इलाज ढूंढा जाए , और अजय से अच्छा इलाज और क्या हो सकता है ? अभी बच्चा है, नादाँ है . उसे आसानी से बहकाया जा सकता है , उसको आराम से फुसलाया जा सकता है और उसके सहारे दौलत भी कमाई जा सकती है . मैं असली बात समझ गयी ना ?
चन्दा - नहीं ठकुराइन साहिबा, क्या आप बी ही ऐसा सोच रही हैं ? क्या आपको लगता है , मैं ऐसा सोच भी सकती हूँ
माँ- आँखों देखी कैसे झुठला सकती हूँ चंदाबाई , मैंने अभी भी अजय को तुम्हारी चौखट से जाते हुए देखा है , इसे मैं क्या समझूं, उसकी तरह मैं तो बच्ची नहीं हूँ, उसकी तरह मेरी आँखों पर तो पट्टी नहीं बंधी है . मैं समझ सकती हूँ की कोई लड़का अकेली लड़की के कमरे में क्या कर रहा होगा ?
चन्दा- प्लीज, ऐसा अनर्थ मत कीजिये , मुझ पर न सही तो कम से कम अपने बेटे पर तो भरोसा कीजिये , जिस तरह गंगा पवित्र है, उसी तरह मेरे और अजय बाबू के रिश्ते पवित्र हैं. मैं अजय बाबू को यही सब समझा रही थी. मैं उनको परेशान नहीं देखना चाहती, वरना कबका दांट देती . यह मुझसे हो नहीं पायेगा मालकिन. आप लोग मालिक हैं, मैं तो आपके टुकड़ों पर पलने वाली कनीज हूँ. मेरी क्या औकात की मैं आपके सामने नजर ऊंची करके भी बात कर सकूं.
चन्दा सौम्य लहजे में अपनी बात रख रही थी, उसकी समस्या यह थी की वह अजय की बुराई भी नहीं करना चाहती थी , इसलिए खामोश होकर बात कर रही थी. वह अजय के परिजनों से भी नहीं उलझना चाहती थी. वह जानती थी की अजय जो चाह रहा है, उससे ऐसा ही बबाल होना निश्चित है . वह दर्द से तडपकर कह रही थी. अजय की माँ भी उसकी बातें सुनकर थोड़ी सी सामान्य हुई, उसकी आवाज की सख्ती खत्म हो रही थी , अपने हाथ मलते हुए अजय की माँ कह रही थीं-
-अब तुम ही कहो , हम कया करें, वह हमारा अकेला लाल है. अकेले बेटे की शादी मैं धूमधाम से करना चाहती हूँ. एक से बढ़कर एक सुन्दर लड़कियों के रिश्ते अभी से आने लगे हैं, अब तुम खुद बताओ , क्या तुम्हारी और उसकी जोड़ी अच्छी लगेगी ? जब तुम लोग सड़क पर निकलोगे तो लोग कहेंगे देखो दादी -पोते जा रहे हैं. तुम खुद कहो ...
चन्दा- मैंने उनको बहुत समझाया है, आप भी उंच नीच समझाइये , मैं नहीं चाहती की उनका कैरियर खराब हो, उनका भविष्य मेरी वजह से बिगड़े . मैं आपके परिवार की खुशहाली चाहती हूँ, इसके लिए अगर मुझे जान भी कुर्बान करनी पड़े तो मैं पीछे नहीं हटूंगी . आप हुक्म करें , मुझे क्या करना है ? फ़ौरन हुक्म की तामील होगी .
माँ- सच ? तुम मदद करोगी हमारी ?
चन्दा- जी हाँ, मई हर तरह तैयार हूँ. जान से बढ़कर तो कुछ भी नहीं , ये भी हाजिर है . और हाँ आपने सच कहा. अब मेरी ऐसी उम्र नहीं रही की मैं गाँव -गाँव तम्बू लगाती फिरूं, दिन भर नाच गाना करू, लेकिन ये सच नहीं है की आगे की जिंदगी के लिए मुझे दौलत चाहिए . और ये भी बिलकुल गलत है की मैं अजय बाबू की मार्फ़त आपसे दौलत लूटना चाहता हूँ. आपके एहसान पहले से ही मुझ पर कम हैं क्या ? दौलत भी कम नहीं . मेहनत और ईमानदारी से इतना कमा लिया है की सात जन्म भी चाहूँ तो बैठकर खा सकती हूँ. दौलत के लिए मैं अजय बाबू का सहारा क्यों लेती ठकुराइन साहिबा , जबकि ठाकुर साहब तो बहुत साल पहले मुझे अपनी पटरानी बनाने के लिए तैयार थे. अगर मैं उस वक्त हाँ कर देती तो जसी दौलत की आप बात कर रही हैं, उसमे से आधे की हिस्सेदार मैं भी होती . अगर मैं गलत कह रही हूँ तो जाओ, जाकर अपने पति से पूछ लो. मेरी बात झूठी निकली तो जो चाहो सजा देना. मैंने साफ़ इनकार दिया था, अपने शरीर को स्पर्श भी नहीं होने दिया , जब मैंने तुम्हारा सुहाग ही नहीं छीना तो बेटा क्या छीनुंगी .
अजय की माँ थर-थर कांपने लगी. जिस स्वाभिमान और गर्व के लिए अजय की माँ ने सब कुछ त्याग दिया था, आज उनका सब स्वाभिमान , सारा गर्व चूर-चूर हो गया. चन्दा ने बड़ी शालीनता से अपनी बात राखी , मगर उसीने अजय की माँ के सीने में भूचाल ला दिया. इस वक्त वे खुद को बहुत बौनी महसूस कर रही थीं. एक नाचने -गाने वाली ने त्याग का जो उदाहरण पेश किया था उससे वे खुद ही दबती चली गयीं.

Monday, April 12, 2010

भाग-६१

अजय की माँ बहुत तैश में थी . कल तक जिस चन्दा की संवाद अदायगी पर वह जान छिडकती थी ,जिसे वह नायिका समझते थी आज वही उसे दुनिया की सबसे बड़ी खलनायिका समझ रही थी. आखिर एक औरत आसानी से ये कैसे सहन कर सकती है की कोई अन्य औरत उसका बेटे उससे हमेशा के लिए छीन ले. चन्दा यही तो करना चाहती थी . वह उसके इकलौते और होनहार बेटे अजय को उससे छीन लेना चाहती थी. इस वक्त उनके मन में भावनाओं की आंधी चल रही थी. वे उस औरत से मिलकर आज फाइनल बात कर लेना चाहती हैं, अपने बेटे की जिंदगी से उसे निकाल फेकना चाहती हैं , भले ही इसके लिए कुछ हजार या लाख भी खर्चा हो जाएँ तो गम नहीं, वे नहीं चाहतीं की अजय के पिता पर पागलपन सवार हो जाए और वे गुस्से में आकार चंदा को मौत के घाट उतार बैठें. अगर ऐसा हुआ तो सबसे ज्यादा नुक्सान तो अजय की माँ का ही होगा न. उनका सुहाग उजाड जाएगा . चन्दा का क्या बिगडेगा. लोग तरह- तरह की बातें करेंगे. विरोधी लोग मजा उडायेंगे , इसलिए वह ऐसे स्थिति आने देना ही नहीं चाहती . भले ही उसे कुछ भी क्यों न करना पड़े. अगर जरूरत पडी तो वह चन्दा के हाथ जोड़ेगी , पांवों में गिर जायेगी. क्षत्राणी होकर भी वह न्रत्य करने वाली के सामने झुक जायेगी. चाहे जो हो वह अपने इकलौते बेटे को हासिल करके रहेगी . मन में इसी तरह सोचती हुई वे चन्दा के द्ववार पर जा पहुँची . इधर-उधर देखकर उन्होंने दरवाजे पर दस्तल दी. अगला द्रश्य देखकर उनकी आँखों में अंगारे दहकने लगे. उनके पाने बेटे अजय ने ही दरवाजा खोला था. दोनों माँ बेटों की आँखें मिलीं. बेटे की आँखों में विद्रोह के भाव साफ़ दिख रहे थे. माँ ने उलझना ठीक नहीं समझा . बस इतना ही कहा -
--आप घर चलें कुवर साहब , हम ज़रा चंदाबाई से कुछ बात करना चाहते हैं .
अजय- आप इनसे ऐसी कोई बात न कहना जिससे इनके स्वाभिमान को ठेस पहुंचे , या मुझे बुरा लगे .
माँ- ठीक है, मैं इसका ख़याल रखूंगी . हमारे घर मेभूचाल आने वाला है, मैं उसीको टालने की कोशिश कर रही हूँ. अब यह बात सिर्फ
मुझ तक ही सीमिट नहीं रही. आपके बाबूजी भी सब कुछ जान गए हैं. वे बहुत गुस्से में हैं, आप जा रहे हैं , मगर जब उन के सामने जाएँ तो
आप भी ये ख़याल रखें की वे आपके जन्मदाता हैं, पिता हैं , और मेरे पति हैं. आप ख़याल रखें की कोई बात उनकी शान के खिलाफ नहीं कहनी
चाहिए . क्योकी उनके अपमान को मैं अपना अपमान और उनके सम्मान को अपना सम्मान समझती हूँ. मैं जानती हूँ की आप एक शिष्ट पुत्र हैं ,
इसके बावजूद अगर यह सब याद दिला रही हूँ तो इसका भी कुछ मान रखना . आपका गर्म खून है , इसलिए अपने आपको काबू में रखना .
अजय- अगर आप अपना वादा निभाती हैं तो यकीं करें मैं भी बेजुबान रहूंगा. अगर वे मेरी गर्दन भी कट दें तो मुझे गम नहीं , मैं उफ़ तक नहीं करूँगा.
अजय की बातों ने उसकी माँ के खून में तो गर्मी ला दी थी, मगर फिर भी वह चुप रही . आज उन्हींका बेटा उनसे जबान लड़ा रहा था , कह रहा था की "अगर आप अपना वादा याद रखेंगी तो
वह भी उनकी बात मानेगा. यह सब चन्दा की वजह से ही तो रहा था. चन्दा गेट की आड में सब कुछ सुन रही थी. वाज जानती थी की अब उसकी खैर नहीं है. उसके मन में बुरे -बुरे ख़याल
आने लगे . जब तक्ल अजय की माँ ने घर के अंदर प्रवेश किया. यह घर भी उनकी हवेली के ही एक हिस्से में था , और चन्दा की सुरक्षा के लिहाज से उन्होंने उसे दिया था. चन्दा ने अदब के
साथ कई बार झुककर और नजरें नीची कर उनका स्वागत किया. अजय की माँ ने अभिवादन का कोई जवाब दिए बगैर कहा-
-वाह, बहुत सुन्दर लग रहियो हैं, चंदाबाई . मैंने तो आज देखा है करीब से . तभी तो मैं कहूँ. तभी अजय का दिल आगया है . तुम तो जानती ही हो , वह बालक है , भला बुरा क्या जानेगा.
वह तो अभिनय भी नहीं करना जानता , और तुम ठहरी मंजी हुई नामचीन कलाकार . खैर, क्या चाहती हो ?
चन्दा- मैं समझी नहीं ठकुराइन साहिबा. आप मुझे गलत न समझिए प्लीज. सालों से आपका नमक खाती आ रही हूँ. आपने ही मुझे सहारा दिया. इतने सारे कलाकार और कर्मचारी आपकी इनायत
की बदौलत ही कमा खा रहे हैं. मैं आपके परिवार की बहुत एहसानमंद हूँ. समझ में नहीं आता क्या करून ?
माँ- वह तुमसे उम्र में बहुत छोटा है, बिलकुल बच्चा है. बच्चा कैसे खिलौने के लिए मचलता है, लड़ता -झगडता है और ना दिलाओ तो मारने पर भी उतारू हो जाता है . और अगर फिर उसको मन पसंद
खिलौना दिलवा दिया भी जाए तो कुछ खास फायदा नहीं , वह थोड़ी देर के बाद ही उसको तोड़ फोडकर फेंक देता है. इस वक्त यही हाल अजय का है . वह तुमको खिलौना समझ रहा है .
चन्दा- मैं बहुत शर्मिन्दा हूँ, मेरो वजह से आप लोगों को यह तकलीफ उठानी पडी. मैं... मैं... क्या कहूँ ? क्या करू? कुछ समझ नहीं प् रही हूँ ?

Sunday, April 11, 2010

bhag -60

मगर उसके दोस्त की यह बात बेचारे अजय के जीवन में खरी नहीं उतरी , वह अपनी माँ के सामने खूब झुका, उनसे अपनी मोहब्बत की भीख माँगी , लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. उसकी माँ भी पत्थर की तरह सख्त हो गयी. आम दिनों में अजय रोजाना शेरे वाली माँ के मंदिर जाता था मगर उसने निर्णय किया की अब वह मंदिर नहीं जाएगा, जब हाड मांस की असली माँ ही ने ही उसे दुत्कार दिया तो मंदिर में तो पत्थर की माँ है. वहाँ जाने से क्या मिलेगा ? और क़यामत उस समय आयी जब अजय के पिता विजयप्रताप सिंह के सामने यह भेद खुला .यह भेद खोलने वाली कोई और नहीं उसको जन्म देने वाली माँ ही थी. अजय के पिता ने जब यह समाचार सूना तो मानो भूकंप आ गया.
उस पर पागलपन सवार हो गया, वह अपनी बन्दूक निकालने लगे . बड़ी मुश्किल से उसे लोगों ने रोका. वे चन्दा को मौत के घाट उतारना
चाहते थे . उनके चेले चपाटे भी खूब गुसे में थे. सबका एक ही मत था की चन्दा को या तो मौत की सजा दी जाए या फिर उसे गाँव निकाला
दिया जाना चाहिए. अजय की माँ ने उसको समझाया , उंच -नीच का वास्ता दिया और कहा-
- आप यह क्या गज़ब ढा रहे हैं. उस नामुराद के चक्कर में अपने खानदान का नाम खराब करना चाहते हैं , जानते हैं अगर उसे कुछ भी हुआ तो
मामला टूल पकड़ लेगा . आपके विरोधियों की भी कोई कमी नहीं है. मौक़ा देखकर सब दुश्मन एक हो जायंगे . फिर आपका विधायक बन्ने का सपना
महज एक सपना ही रह जाएगा. औरत का मुद्दा बनाकर विरोधी आपको घेरने का अवसर नहीं छोड़ेंगे. यह जोश में आकार होश खोने का वक्त नहीं है
शान्ति से काम करना है, बिलकुल प्यार से. तभी ऐसा हो सकता है की सांप भी मर जाए और लाठी भी नहीं टूटे. आप अपना लक्ष्य ध्यान रखिये ,
अर्जुन की तरह सिर्फ मछली की आँख पर अपनी आँख गढाए रखिये . आपका लक्षय है विधायक बनना , वो भी इसी आने वाली योजना में . टिकट
ऐसे ही आसानी से नहीं मिला करते. आपने पार्टी के लिए इतनी मेहनत की है . चन्दा देते हो. हर कार्यक्रम में बढ़ -चढ कर हिस्सा लेते हो. लोगों के काम
करते हो. अपने खर्चे से कितनी ही गली पक्की कराई हैं. कितने ही लोगों को दूसरी पार्टी से तोड़कर इस पार्टी में लेकर आये हो , यह सब कुछ बेकार चला जाएगा
अगर अब समझदारी से काम नहीं लिया गया तो .
विजयप्रताप- तो फिर आप ही बताएं , हम क्या करें, क्या हाथ पर हाथ धरे चुप बैठे रहें ? हमारे इकलौते बेटे को हमसे छीनने की कोशिश की जा रही है और
हम कुछ न करें ? आखिर ये दौलत, शौहरत, राजनीति किसके लिए है ? जब हमारा बेटा ही हमसे दूर हो जाएगा तो इतनी मेहनत हम किसके लिए करें ?
अजय की माँ अजय के पिता की बात सुनकर थोड़ी देर के लिए खामोश हो गयी , फिर अपने होठ काटते हुए बोली-
- इतना आसान नहीं है हमसे हमारे बेटे को जुदा करना . मैं मिलूंगी चन्दा से, उसे प्यार से समझाऊँगी . भीख मांगूंगी उससे अपने बेटे की . वह भी आखिर एक औरत
है, मेरा दर्द वह जरूर समझेगी . और अगर फिर भी नहीं मानी तो आप आजद है. जो चाहें सलूक करें , हमें मंजूर होगा . अगर उसे दुनिया से उठाना हुआ तो पहली
गोली उसके सीने में मेरी होगी. फिलहाल आप नौटंकी चलने दें. जब तक का उसका करार है , उसे पूरा होने दें. गाँव वालों को कुछ भी पता नहीं चलेगा . अगर नौटंकी रूकती है
तो तरह-तरह की बातें होंगी. और इस नौटंकी को देखने के लिए सिर्फ इसी गाँव के लोग तो नहीं आते. आसपास के कम से बीस गाँव के लोग आते हैं. इसलिए कुछ बवाल करना
ठीक नहीं है. इस मामले को मुझे सौंप दीजिए , मैं अपने तरीके से हेंडल करती हूँ. क्या अब वह मुझे मिल सकती है , शायद हाँ, यह समय उससे मिलने का है . आप रुकें
मैं जाकर आती हूँ. उससे विस्तार से बात करती हूँ, आखिर वह चाहती क्या है ? क्या उसे दुनिया में मेरा ही बेटा मिला था फांसने के लिए ?
वह बुदबुदाती चन्दा के कमरे की तरफ चलदी . उसके दिल में भभूडे से उड़ रहे थे.

Friday, April 9, 2010

bhaag-59 रविवार अंक के लिए

लेकिन ऎसा भी नहीं होता कि प्रेम बिलकुल नजर ही न आएं, व्यवहार में बदलाव आपके बीच दूरियां बढ़ने का तीसरा संकेत है। क्या आपके साथी का अब आपकी बातों पर ध्यान नहीं जाता। गंभीर बातों को सुनकर भी अनसुना कर देते हैं। आपकी बातों का जवाब झुंझुलाकर देतें हैं। बेवजह गुस्सा करना, सारे लक्षण उनके व्यवहार में नजर आ रहे हैं तो आप समझ लें कि ये खतरे की घंटी है।
यदि आपका साथी आपके साथ अंतरंग पल नहीं बिताना चाहती तो समझे कि दूरियां बढ़ रही हैं। बेहद कठिनाई से बाहर जाने के बने कार्यक्रम में देखती हैं कि वहां केवल आप दोनों ही नहीं, कुछ और भी परिचित हैं जिनके बारे में आपको पता भी नहीं था। आपके साथी का उपेक्षापूर्ण व्यवहार दूसरों को यह जता रहा है कि आपके संबंधो में क़डवाहट आ रही है। यह स्थिति कष्टपूर्ण है। ऎसी स्थिति आपके रिश्ते के लिए खतरे की घंटी है।
यदि आपको ऎसा महसूस हो रहा है कि आपका साथी दिन-प्रतिदिन कुछ बदल रहा है। यदि आपका साथी अपने व्यक्तित्व को लेकर पहले से ज्यादा सजग हो रही है। यदि नित नए और फैशनेबल परिधानों की ओर उनका ध्यान जा रहा है। अचानक आए इन बदलावों से जान ले कि आपके साथी के जीवन में कुछ नया और रोमांचक चल रहा है। हो सकता है कि आपकी जगह कोई और लेने की कोशिश कर रहा है।अजय सोचने लगा की उसकी प्रेमिका तो उस पर भरोसा करने के लिए तैयार है . हाँ उसकी माँ जरूर गैरों जैसा व्यवहार कर रही है .अजय के एक दोस्त ने उसे समझाया था की एक्सपेक्टेशंस का मैच न हो पाना भी इसकी एक वजह है। दोनो पार्टनर एक दूसरे से एक्सपेक्टेशंस रखते हैं। जब इनकी एक्सपेटेशंस एक दूसरे से मैच नहीं होती तो प्यार की जगह तनाव ले लेता है। मनोचिकित्सकों का भी मानना है की वैवाहिक संबंघो में दरार आने का मुख्य कारण दो लोगो के बीच की एक्सपेटेशंस का मैच न हो पाना है। हम एकदूसरे से अपेक्षा तो करते हैं पर उस की अपेक्षा पूरी करने की कोशिश नहीं करते।
4. बिगडते संबंघो का एक कारण कम्यूनिकेशन गैप भी है। अपने दिल की बात मन में ही रखते हैं, साथी से खुलकर बातचीत नहीं करते ,जिस की वजह से छोटी-छोटी बात पर गलतफैहमियां पैदा होने लगती हैं।
समझें प्यार को - यह जानना जरूरी है कि वास्तव में आप प्यार को क्या समझते हैं। प्यार में दर्द, समझौता और त्याग भी होता है। जो प्यार करते हैं उन्हे प्यार के हर पहलू से खुद को जोडना होता है। जिंदगी उतारचढाव का नाम है, जिस में खुशी और गम एकसाथ होते हैं। अत: कठिन समय में एकदूसरे का साथ देने का प्रयास करते रहना चाहिए।
जरूरी है शेयरिंग - आपसी तकरार से बचने के लिए जरूरी है कि एकदूसरे की भावनाओं को समझें,अपनी समस्याओं तथा खुशियों के बारे में एकदूसरे को बताएं। शेयरिंग से आपसी संबंघ मजबूत बनते हैं। अच्छे बुरे अनुभवों को एकदूसरे से बांटने से बीच की दूरी समाप्त हो जाती हैं।
स्वय को दूसरे की जगह रखे - पतिपत्नी दोनो एकदूसरे के समकक्ष हैं। यदि किसी कारणवश आपके साथी का मूड खराब है तो तकरार करने के बजाय चुप रहने की कोशिश करें। अकसर ऎसा होता है कि पतिपत्नी दोनों की ही बातें सही होती हैं पर वे एकदूसरे को अपनी जगह रख कर नहीं सोच पाते। अगर वे खुद को दूसरे की जगह रख के सोचे तो समस्या स्वत: ही \
सुलझ जाएगी।
और समझदारी से इस स्थिति से बचा जा सकता है। इस का एक उपाय यही है कि समझौते के लिए तैयार रहें। प्रेमी और प्रेमिका दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब आप आपस में अपनी समस्याएं और प्यार शेयर करते हैं तो झुकने में हिचकिचाहट कैसी ? जितना आप झुकेगें उतना ही हरदम जीतेगें। एक्सपेक्टेशंस का मैच न हो पाना भी इसकी एक वजह है। दोनो पार्टनर एक दूसरे से एक्सपेक्टेशंस रखते हैं। जब इनकी एक्सपेटेशंस एक दूसरे से मैच नहीं होती तो प्यार की जगह तनाव ले लेता है। मनोचिकित्सकों का भी मानना है की प्यार में दरार आने का मुख्य कारण दो लोगो के बीच की एक्सपेटेशंस का मैच न हो पाना है। हम एकदूसरे से अपेक्षा तो करते हैं पर उस की अपेक्षा पूरी करने की कोशिश नहीं करते।
अपने दिल की बात मन में ही रखते हैं, साथी से खुलकर बातचीत नहीं करते ,जिस की वजह से छोटी-छोटी बात पर गलतफैहमियां पैदा होने लगती हैं। जानना जरूरी है कि वास्तव में आप प्यार को क्या समझते हैं। प्यार में दर्द, समझौता और त्याग भी होता है। जो प्यार करते हैं उन्हे प्यार के हर पहलू से खुद को जोडना होता है। जिंदगी उतारचढाव का नाम है, जिस में खुशी और गम एकसाथ होते हैं। अत: कठिन समय में एकदूसरे का साथ देने का प्रयास करते रहना चाहिए।
आपसी तकरार से बचने के लिए जरूरी है कि एकदूसरे की भावनाओं को समझें,अपनी समस्याओं तथा खुशियों के बारे में एकदूसरे को बताएं। शेयरिंग से आपसी संबंघ मजबूत बनते हैं। अच्छे बुरे अनुभवों को एकदूसरे से बांटने से बीच की दूरी समाप्त हो जाती हैं।
प्रेमी और प्रेमिका दोनो एकदूसरे के समकक्ष हैं। यदि किसी कारणवश आपके साथी का मूड खराब है तो तकरार करने के बजाय चुप रहने की कोशिश करें। अकसर ऎसा होता है कि प्रेमी और प्रेमिका दोनों की ही बातें सही होती हैं पर वे एकदूसरे को अपनी जगह रख कर नहीं सोच पाते। अगर वे खुद को दूसरे की जगह रख के सोचे तो समस्या स्वत: ही सुलझ जाएगी। शुरूआत में आकष्ण की वजह से प्रेमी -प्रेमिका परस्पर झगडों पर घ्यान नहीं देते पर घीरे-घीरे झगडना एक रूटीन हो जाता है। घैर्य और समझदारी से इस स्थिति से बचा जा सकता है। इस का एक उपाय यही है कि समझौते के लिए तैयार रहें। प्रेमी -प्रेमिका दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। हम आपस में अपनी समस्याएं और प्यार शेयर करते हैं तो झुकने में हिचकिचाहट कैसी ? हम आप झुकेगें उतना ही हरदम जीतेगें।

Monday, April 5, 2010

भाग-५८ (शनिवार अंक के लिए )

मेरी इस बात को हमेशा याद रखना की यदि आपको भी अपना सच्चा प्यार मिल गया है, जिसने आपके जीवन को खुशियों, उमंगों, उल्लास व नए सपनों से भर दिया है तो उस साथी को अपने से कभी जुदा मत होने दो तथा अपने जीवनसाथी को जिंदगी की हकीकत बनाकर अपने प्यार को सदा के लिए अपना लो।
आदमी जब मुश्किलों से हारकर टूट जाता है, तब प्यार उसकी ऊर्जा बन उसे फिर से ज‍ीवित करता है। आपका सच्चा प्यार ऐसे वक्त में भी आपका साथ निभाता है, जब दुनिया आप पर नफरत व आलोचनाओं के तीर बरसाती है। अपने साथी का हौसला आपके लड़खड़ाए कदमों को फिर से खड़ा होने की हिम्मत व दुनिया का सामना करने की ताकत देता है।
दुनिया की तो आदत होती है सवाल करने की और अच्छे को बुरा बताने की। यदि आप दुनियावालों के सवालों से परेशान होकर अपने सच्चे साथी का साथ छोड़ देते हैं तो आपसे बड़ा मूर्ख व कायर और कोई नहीं होगा। यह खूबी तो आपमें होना चाहिए कि आप दुनिया के सवालों का जवाब किस तरह से देते हैं। यदि आपका साथी आपकी हिम्मत है, आपकी प्रेरणा है तो वहीं भविष्य में लोगों के हर सवाल का जवाब बन जाएगा।
ऐसा कहा जाता है कि हमेशा निंदक को अपने साथ ह‍ी रखना चाहिए, ऐसे लोग आपकी बुराई का चिट्ठा आपके सामने खोलकर रख देते हैं परंतु आज जमाना पूरी तरह से बदल गया है। अब निंदक को बगैर बुलाए ही हर जगह उपलब्ध हो जाते हैं। नए जमाने के ये निंदक आपकी प्रतिष्ठा को धूमिल करने में एक पल की भी देर नहीं करते हैं।
यदि हम जमाने चक्कर में आकर अपने सच्चे प्यार से जुदा होते हैं, तो आप बहुत बड़ी मूर्खता करते हैं। इस दुनिया की तो यह रीत ही है कि वो सच्चे प्रेमियों की राह में हमेशा बाधाएँ व मुश्किलें पैदा करती है। यह खूबी तो आपमें चाहिए कि आप मुस्कुराहट व आत्मविश्वास से कैसे उन लोगों के होंठ सिलते हैं।
प्यार को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। प्यार को बंया करने का अंदाज समय के साथ बदलता रहता है। हर कोई चाहता है कि वह अपने पार्टनर को खुश रखे। प्यार एक दूसरे के जीवन को रंगीन बनाता है। लेकिन आधुनिक समय में बदलती सोच के कारण अक्सर एक दूसरे की पसंद-नापसंद को लेकर असमंजस की स्थिति रहती है।
अजय चन्दा को पूरी ताकत के साथ समझा रहा था और वह सोचने की कोशिश कर रही थी. अजय को किसी पत्रिका में लिखी बात ध्यान आ गयी .उसमे लिखा था की अपनी प्रेमिका को सरप्राइज गिफ्ट देना चाहिए . सरप्राइज तो सभी को पसंद आता है। खासतौर पर महिलाओं को सरप्राइज मिलने पर ज्यादा खुशी होती है। प्यार के छोटे-छोटे पल जीवन को खुशियों से भर देते हैं और छोटे-छोटे सरप्राइज प्यार की नींव को धीरे-धीरे मजबूत करते हैं। यदि आपको अपने पार्टनर के साथ वक्त बिताए काफी समय हो गया हो तो उनके लिए वक्त निकालें। एक दूसरे का साथ प्यार को बढ़ाता है और
रिश्तों में दूरियों को कम करता है। जब आप एक दूसरे से मिलें तो एक दूसरे को गले लगाएं। अपने पार्टनर के साथ बाहर घूमने जाएं। अगर बाहर घूमने जाएं तो घर से एक दूसरे का हाथ पकडकर बाहर निकलें। आपके साथी के मन में अपनेपन का एहसास बढ़ेगा। पार्टनर का छूना लडकियों को अच्छा लगता है। लेकिन मर्यादा का ध्यान रखें। एक साथ समय बिताकर आप अपने प्यार का इजहार बिना कहे भी कर सकते हैं।
तारीफ सुनना हर महिला को अच्छा लगता है। यदि आप उनके मेकअप या कपडों की तारीफ करें तो आप उनका मूड बदल सकते हैं। आप उनके स्टाईल और मेकअप की तारीफ करें। ।
महिलाओं को व्यस्त पुरूष ज्यादा पसंद आते हैं। महिलाओं को पीछे-पीछे घूमने वाले लोग बिल्कुल पसंद नहीं आते। महिलाएं ऎसे पुरूषों को ज्यादा पसंद करती है जिनके पास अपना विजन, पैशन, अच्छी एज्यूकेशन और बिजी लाइफ हो। बात करने और उठने बैठने का तरीका ऎसा हो जो सब पर जादू कर दे। इसलिए आपकी पर्सनैलिटी अट्रेक्टिव होनी चाहिए। इसलिए खुद की पर्सनैलिटी को निखारें।
इन बातों का ध्यान रखकर आप महिलाओं को आकर्षित कर सकते हैं। साथ ही अपने प्यार को इन छोटी-छोटी बातों को दिखाकर बढ़ा भी सकते हैं।
रिश्तों को जुडे़ चाहे कितना भी समय हो चुका हो, उनमें रोमांस हमेशा बने रहना चाहिए। यदि आपको लग रहा कि कुछ बदलाव आ रहा है और स्थितियां पहले कि तरह नहीं है, तो सचेत होने की जरूरत है। रिश्तों को बनाने में सालों लगते है और टूटने में एक पल भी नहीं लगता।

भाग-५७ (शुक्रवार अंक के लिए )

चन्दा - भगवान पर तो मैं भी विश्वाश करती हूँ लेकिन मुझे अपनी तकदीर से बहुत शिकायतें हैं,. मैंने जब-जब और जो-जो भी चाहा है, मुझे कभी नहीं मिला. यहाँ तक की मेरे पास मेरी सबसे प्यारी चीज एक माँ ही थी, उसे भी मुझसे छीन लिया गया मुझसे वो अक्सर कहा करती थी की पहले प्यार की पहली नजर को हर किसी ने अनुभव किया होगा, ये एक ऐसा अनुभव है जब आपके लिए आपका साथी पहली प्राथमिकता होता हैं, ऐसे में आपसे मिलने के लिए वक्त से पहले पहुँचना और घंटों इंतजार करना प्रेम रूपी तपस्या का ही एक हिस्सा होता है। वक्त बीतने पर जब सामंजस्य बढ़ जाता है
तारीफ सुनना हर व्यक्ति को अच्छा लगता हैं, लेकिन नारी जैसी निर्मलता पुरुषों में कम होती हैं। हो सकता हैं वो आपकी उम्मीद पर पूरी तरह नहीं उतर पाए, या अपनी भावनाओं को शब्दों में ना ढाल पाए। आपके किसी तोहफे पर धन्यवाद जैसे औपचारिक शब्दों की उम्मीद रखने की बजाय उसकी आँखों में उतर आई प्रसन्नता को देखने की कोशिश करें। भावनाएँ महसूस करने के लिए होती है जरूरी नहीं कि उन्हें शब्द दिएँ जाएँ। शब्दों के सफर में अक्सर अर्थ बदल भी तो जाते हैं।
ऐसे ही कुछ विचार होते हैं पुरुषों के, चाहे वह पत्नी हो या प्रेमिका वो उसमें हर रूप को खोजने की कोशिश करता है। आप अपने हर रूप को उसके सामने कितना साकार कर पाते हो यह आप पर निर्भर करता है। उसकी छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा कर, निराशा के समय में हिम्मत दिलाकर, खुशी के पलों की सहभागिता बन आप नारी के हर रूप को साकार कर सकती है
लड़कियाँ अपनी सारी भावनाएँ दूसरों के सामने बड़ी सहजता से जाहिर कर देती हैं। अगर उन्हें किसी बात से नाराजगी भी होती है तो वे उसे सबके सामने जाहिर कर देती हैं। लड़के इस मामले में काफी धैर्यवान और गंभीर होते हैं। लड़कों में छोटी-छोटी बातों को लेकर बेवजह बहस या रोक-टोक करने की प्रवृत्ति नहीं पाई जाती है। कई बार ऐसा भी होता है कि किसी छोटी-सी बात पर या बेवजह भी लड़कों को बहुत तेज गुस्सा आता है और ऐसी स्थिति में आपसी संबंधों में दरार पड़ने तक की नौबत आ जाती है।
अजय- ठीक है चन्दा, लोग कहते हैं प्यार ऐसा होता है, प्यार वैसा होता है। यह हम सभी ने सुना है लेकिन क्या कभी हमने सच्चे प्यार को महसूस भी किया है? प्यार, जिसे आज भी संसार हीन दृष्टि से देखकर प्रेमियों को हँसी का पात्र बनाता है लेकिन इन बदनाम प्रेमियों में से कुछ प्रेमी ऐसे भी होते हैं, जिनका प्यार उन्हें जीवन की एक नई दिशा देता है व सफलता के द्वार खोलता है।
अक्सर हमने सुना है कि प्यार के चक्कर में पड़कर अच्छा खासा आदमी बर्बाद व नाकारा हो गया लेकिन कभी-कभी चाहे-अनचाहे हमारे कानों में ऐसे भी किस्से सुनाई देते हैं,
यदि आपका साथी समझदार है तो वो आपकी हर मुश्किलों को हल करके आपका जीवन सँवार देगा। मानव की कौम वैसे भी बहुत बुद्धिमान है परंतु किस वक्त पर कौन सा फैसला हमारे हित में होगा, इस दाव में अक्सर हम सभी मात खा जाते हैं। ऐसी दुविधा की स्थिति में आपका साथी ही आपको सही राह दिखा सकता है। समझदार साथी आपकी हर मुश्किलों को चुटकी में हल करके आपके चुप्पी साधे होंठों पर हँसी ला देता है।
आदमी जब मुश्किलों से हारकर टूट जाता है, तब प्यार उसकी ऊर्जा बन उसे फिर से ज‍ीवित करता है। आपका सच्चा प्यार ऐसे वक्त में भी आपका साथ निभाता है, जब दुनिया आप पर नफरत व आलोचनाओं के तीर बरसाती है।

चन्दा - मेरे ख़याल से प्यार कभी थोपा नहीं जाता। यह तो एक अहसास है, जो जीवन में किसी के आगमन के साथ साथ स्वत: ही आता है। यह सत्य है कि सच्चा प्यार इस दुनिया में बहुत कम लोगों को मिल पाता है।मैं इस मामले में खुश नसीब हूँ, मगर मुझे सोचने का मौक़ा चाहिए था. शायद तुम ऐसा करना नहीं चाहते . अगर मुझे कुछ समय मिला होता तो हो सकता है की मैं कुछ निर्णय ले पाती.
अजय- तुम्हारी आँखें चुगली कर रही हैं. तुम मोहब्बत करती हो मुझसे . मगर डरती हो

भाग-५६ (गुरूवार अंक के लिए )

अजय को बताया गया था की जब प्रेम पनपता है तो अहंकार टूटता है। अहंकार टूटने से सत्य का जन्म होता है। यह स्थिति तो बहुत ऊपर की है, यदि हम प्रेम में श्रद्धा मिला लें तो प्रेम भक्ति बन जाता है, जो लोक-परलोक दोनों के लिए ही कल्याणकारी है। इसलिए गृहस्थ आश्रम श्रेष्ठ है, क्योंकि हमारे पास भक्ति का कवच है। जहाँ तक मीरा, सूफी संतों की बात है, उनका प्रेम अमृत है।
साथ ही अन्य तमाम रिश्तों की तरह ही प्रेम का भी वास्तविक पहलू ये है कि इसमें भी सामंजस्य बेहद जरूरी है। आप यदि बेतरतीबी से हारमोनियम के स्वर दबाएं तो कर्कश शोर ही सुनाई देगा, वहीं यदि क्रमबद्ध दबाएं तो मधुर संगीत गूंजेगा। यही समरसता प्यार है, जिसके लिए सामंजस्य बेहद ज़रूरी है।
प्रेम के पौराणिक पक्ष को लेकर पहला सवाल यही दिमाग में आता है कि प्रेम किस धरातल पर उपजा-वासना या फिर चाहत....? माना प्रेम में काम का महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन महज वासना के दम पर उपजे प्रेम का अंत तलाक ही होता है। जबकि चाहत के रंगों में रंगा प्यार जिंदगीभर बहार बन दिलों में खिलता है, जिसकी महक उम्रभर आपके साथ होती है।
सामान्यतः समाज में विवाह के बाद प्रेम संबंध की अनुमति है। दूध के रिश्ते का निर्वाह तो सभी करते हैं, इसके अलावा निकट के सभी रक्त संबंध भी वर्जित क्षेत्र माने जाते हैं, जैसे- चचेरे, ममेरे, मौसेरे, फुफेरे भाई-बहन या मित्र की बहन या पत्नी आदि। किसी बुजुर्ग का किसी किशोरी से प्रेम संबंध भी व्याभिचार की श्रेणी में आता है। ऐसा इसलिए भी है कि एक सामाजिक प्राणी होने के नाते नियमों की रक्षा करना हमारा कर्त्तव्य भी है।
और बस इसी बात पर भड़क गया था अजय. कोई बुजुर्ग किसी किशोरी से प्रेम क्यों नहीं कर सकता ? या कोई बुजुर्ग महिला किसी किशोर से प्रेम या शादी क्यों नहीं कर सकती. उस स्थिति में जबकि दोनों एक दुसरे को चाहते हों, और एक साथ जीवन बिताने की तमन्ना रखते हों. इंसान को सहारे की जरूरत तो ढलती उम्र में ही पड़ती है , अगर सब कुछ ठीक हो तो किसीको किसीकी आवश्यकता ही न पड़े. कुदरत की किसी भी अवस्था में दोष निकालना अजय को नागवार गुजरता था. उसे समाज के इन्हीं नियमों से नफरत थी. उसे जब यह प्रसंग याद आया तो उसने चन्दा से पूछा-
- ईश्वर के मानने वालों से क्या यह उम्मीद की जानी चाहिए की वे ईश्वर के बनाए लोगों से नफरत करें? कोई किसी भी जाती का हो, किसी भी धरम , प्रदेश आयु या रंग का हो, उसे बनाया तो कुदरत ने ही है. जो समाज के ठेकेदार हैं , वे अपनी बात को मनाने के लिए ही उलटे सीधे नियम बनाते हैं . ताकि फायदा वे उठा सकें और बहाना धर्म का लिया जा सके. इन ठेकेदारों की मानो तो सब ठीक -ठाक है और अगर नहीं मानो तो कहते हैं की धर्म की हानि हो गयी. यह कैसा धर्म ? और किसी हानि. अगर कोई धर्म प्यार को रोकता है, और नफरत को बढ़ावा देता है तो मेरे लिए यही उचित है की मैं ऐसे धर्म को ही मानने से इनकार करदूं. प्रेम को तो ऋषि मुनियों ने भी पवित्र माना है, फिजीकल एट्रेक्शन नेचुरल हैं जिससे कोई भी दूर नहीं रह पाया है। हमारे समाज में कुछ नियमों को संस्कार का रूप दिया है जिसे कई बार युवा वर्ग अपनाने से मना कर देते हैं इसका मतलब यह नहीं कि वह सिर्फ आपसे फिजीकल एट्रेक्शन की वजह से जुड़ा है। यदि आप इन नियमों का पालन करना चाहते हैं तो आप पर निर्भर करता है कि नाराज होने या उसका तिरस्कार करने की बजाय प्रेम से समझाएँ। दैहिक संबंध से परे एक और चीज बहुत महत्वपूर्ण होती है वह है स्पर्श जो उसे अपनत्व का एहसास दिलाता है। इसलिए उसे गलत समझने के बजाय अपनी लिमिटेशन का अहसास कराएँ।


चंदा- जानते हो , तुम कितनी बड़ी बता कह रहे हो, जानते नहीं हो अकेले होकर जमाने से जंग का एलान कर रहे हो .
अजय- मैं अब अकेला कहाँ हूँ, तुम जो हो मेरे साथ . और फिर भगवान भी तो सत्य का साथ देते हैं.

भाग -५५ एडवांस (बुधवार अंक के लिए)

और उसने यह भी तो कहा था की नासमझी में व लोगों की वाहवाही लूटने के लिए ऐसे प्रेमी जल्दबाजी में शादी तो कर लेते हैं परंतु जब मधुर दांपत्य जीवन की शीतल बयार में दुख के थपेड़े लगते हैं तब वे अपने फैसले पर पछताते हैं और इस सुंदर रिश्ते को प्यार, मोहब्बत से जीने के बजाय बोझ समझकर बेमन से ढोने लगते हैं। आखिर यह क्या है? आपने तो प्यार किया है। अपनी मर्जी से अपना जीवनसाथी चुना है फिर जीवन में इतनी असंतुष्टि क्यों?

आपका साथी भला-बुरा कैसा भी हो, यदि आपके प्यार में ताकत है तो वो उसको पूरी तरह से बदल देगा। याद रखें जीवन में सभी को सबकुछ मिल जाए यह संभव नहीं है। समझौता तो हर इंसान को करना पड़ता है और यदि थोड़ा सा समझौता व नम्रता आपके संबंधों को मधुर बनाता है तो उस समझौते में हर्ज ही क्या है?मगर सवाल ये है की वो समझौता करे तो किस्से करे . उसका दिल तो बस इतना ही जानता है की सारी तकलीफ अब चन्दा थी, सारा आरमा भी वही थी. दर्द
भी वही थी और दवा भी . वह फौरन भागकर चन्दा के कमरे पर पहुच गया. उस समय वह तैयार होकर रिहार्सक्ल के लिए निकल रही थी. नौटंकी शुरू होने से
पहले वे लोग थोड़ी देर के लिए रिहर्सल किया करते थे, चन्दा भले ही मंजी हुई और पुरानी लकार थी, इसके बावजूद वह रिहर्सल जरूर करती थी. तभी वह जीवंत अभिनय
कर पाती थी. उसकी महानता का राज यही था. तभी तो लोग उसकी कला के दीवाने थे. अजय ने जब उसे देखा तो देखता ही रहा गया. चन्दा भी अजय को एकटक
निओहार रही थी. दोनों कीआँखें मिलीं तो एक अलग ही माहौल तैयार हो गया. चन्दा को अपने सीने में हलचल सी महसूस होने लगी. उसने अजय के चेहरे से नजरें हटानी चाहीं
मगर ऐसा कर न सका. अजय के चाँद जैसे चेहरे से भला नजरें कैसे हट सकती थीं. बेहद चुम्बकीय आकर्षण था. अजय भी चन्दा की झील सी आँखों में डूबकर रहा गया. चन्दा
के दिल में बम से फूटने लगे . चाहकर भी वह निगाह हटा न सकी. फिर धीरे से बोली-
-ये हमें क्या हो गया है अजय बाबु, आँखें तो तुम्हारे चेहरे से हटने के लिए तैयार ही नहीं हैं. इनका कसूर माफ कीजिये , भले ही इन्होने दुनिया देखी है, मगर इन्हें दुनिया
के बारे में ज़रा भी इल्म नहीं है. कहियी कैसे आना हुआ ?
अजय- कसूर तो हम दोनों के दिलों का है, बेचारी आँखों को क्यों कसूरवार ठहराती हो . असली चोर तो ये कमबख्त दिल है . जो कब चोरी हो जाता है, और कब चोरी
कर लेता है, पता ही नहीं चलता . मोहब्बत के इस सफर में अगर दोषी हैं तो दोनों मुसाफिर हैं , मैं ज्यादा कसूरवार हूँ. अपनी बांहों की कैद में हमेशा के लिए कैद करके
सजा की रस्म अदा कर डालिए, मैं दुनिया से टकराने का जज्बा लिए घूमता हूँ. आज माँ से भी साफ़-साफ़ कह दिया है. हो सकता है की कल तुम्हारी नौटंकी का शो
इस गाँव में न होने दिया जाये , हो सकता है की तुम्हें और भी यातनाएं दी जाएँ , मगर हर कदम पर तुम अपने अजय को अपने साथ पाओगी. हर सांस में तुम्हें अपना अजय महसूस होगा. मेरा यकीन तो करो. मेरी आँखों में देखो, यहाँ तुम्हें सच्चाई नजर आएगी.
चन्दा- कोई मुझे ये तो बताए की प्यार होता क्या है ? यह किस जादू का नाम है ? और ये जादू किया कैसे जाता है ?
अजय- प्यार नशा है , जादू है. सब ठीक है , मगर कैसे होता है , क्यों होता है ? कितना होता है ? जैसे सवालों के जवाब नहीं मालूम. हाँ लोग जरूर ये कहते हैं की लचीलापन ही प्यार है, लचीलापन पूरी तरह समर्पण से आता है, जहाँ न कोई सीमा है न शर्त। प्यार एक एहसास है, भावना है। प्रेम परंपराएँ तोड़ता है। प्यार त्याग व समरसता का नाम है।

प्रेम की अभिव्यक्ति सबसे पहले आंखों से होती है और फिर होंठ हाले दिल बयाँ करते हैं। और सबसे मज़ेदार बात यह होती है कि आपको प्यार कब, कैसे और कहाँ हो जाएगा आप खुद भी नहीं जान पाते। वो पहली नजर में भी हो सकता है और हो सकता है कि कई मुलाकातें भी आपके दिल में किसी के प्रति प्यार न जगा सकें।

प्रेम तीन स्तरों में प्रेमी के जीवन में आता है। चाहत, वासना और आसक्ति के रूप में। इन तीनों को पा लेना प्रेम को पूरी तरह से पा लेना है।

भाग-५४

अजय अवाक रह गया. माँ तो हवेली के अंदर जा चुकी थी . अजय अपनी जगह पर चुपचाप खडा रह गया. आज पहली
बार अजय ने अपनी माँ के सामने इस तरह से बहस की थी. वह अपनी आत्मा के अंदर विवेचना करने लगा , क्या उसे
वो सब कहना कहना चाहिए था जो उसने कहा. ? क्या उसे अपनी माँ को इस तरह जवाब देना चाहिए था ? क्या कोई
बेटा अपनी माँ से ऐसा कहता होगा ? क्या वह अपने माता -पिता को उनकी परवरिश का सही सिला दे रहा है ? क्या उसकी जिंदगी
माँ -बाप की दी हुई अमानत नहीं है ? तो क्या हुआ अगर माँ-बाप ने अपनी औलाद से कुछ उम्मीद लगा लीं ? क्या हुआ जो
उन्होंने एक अच्छी बहु का ख़्वाब देखा ? उनको इतना तो हक है ही. हमको दुनिया में वही लोग लेकर आये, बोलना सिखाया ,
चलना सिखाया , तहजीब सिखाई , अच्छे -बुरे का फर्क सिखाया और जब हम बड़े हो गए , अपने आपको समृद्ध समझने लगे तो ये हाल
है की माँ को ही अपना फैसला सुनाने लगे. अजय की आत्मा उसे धिक्कारने लगी. उसे लगा की उस्ससे बहुत बड़ा पाप हो गया है . और इस पाप
का अब सिर्फ एक ही प्रायश्चित है- मौत. यानी आत्महत्या. अगर वह इस जान को ही खत्म करदे , तब ? क्या तब भी वे मेरी मजबूरी को
नहीं समझेगी ? क्या तब भी वह अपनी जिद पर अड़े रहेंगे ? या फिर और भी माँ- बाप इससे सबक लेकर अपने बच्चों को आजाद रखेंगे
उन्हें उनकी मर्जी से फैसला लेने के लिए स्वतंत्र छोड़ देंगे . फिर अगले ही पल दूसरे तरह के विचारों ने अजय को धिक्कारा - मनुष्य का जन्म सिर्फ एक
बार ही तो मिलता है, उसको इस तरह नादानी से गंवाना उचित नहीं. जिंदगी की उम्र बहुत ज्यादा तो नहीं होती, फिर क्यों इस तरह निराश होना चाहिए ,
जैसे भी हालात हों उनका मुकाबला करना ही इंसान का फर्ज है. किसी शायर ने कहा भी तो है- जिंदगी जिंदादिली का नाम है , मुर्दे क्या ख़ाक जिया करते हैं.
जब आदमी परेशान होता है तो उसकी सोच भी नेगेटिव होती चली जाती है. जबकि उसे उस वक्त पोजीटिव सोच की जरूरत होती है. अजय भी थोड़ी देर के
लिए तो निराशा के भंवर में झूलता रहा और फिर जल्द ही सकारात्मक द्रष्टिकोण के रथ पर सवार हो गया. उसे सबसे पहले चन्दा से बात करने की जरूरत
थी , क्योंकि अगर वही पीछे हट गयी तो फिर उसका क्या होगा ? वह कहिनका नहीं रहेगा. अगर चन्दा मान जाती है तो ठीक , वरना वह उसे मनाने की
कोशिश करेगा , अगर उसने भावनाओं को समझ लिया तो बाकी सब काम आसान हो जायेंगे. फिर उसे अपने दोस्त के वे शब्द याद आने लगे . उसने कहा था-प्यार का हकीकत बन जिंदगी में रस घोलना केवल किस्मतवालों के साथ ही होता है। बहुत कम लोग ऐसे होते हैं, जो सही समय पर सही फैसला लेकर अपने प्यार को अपना लेते हैं वरना कई लोग तो बदनामी के डर से उसे बीच राह में ही छोड़कर किनारा कर लेते हैं।

कहते हैं जब प्यार हो ही गया है तो उसे जमाने से छिपाने से क्या फायदा? जमाने के डर से अगर आपने अपने प्यार का इजहार नहीं किया तो कहीं ऐसा न हो जाए कि आपका प्यार आपका इंजार करते-करते मायूस होकर अपना इरादा न बदल दे
शारीरिक आकर्षण में आकर लड़के-लड़कियाँ एक-दूसरे के साथ अतिशीघ्र संबंध तो बना लेते हैं किंतु उस आकर्षण के खत्म होते ही उतनी ही जल्दी संबंध विच्छेद भी कर लेते हैं। इस पर उनका तर्क होता है कि अब तुममें वो बात नहीं रही, जो पहले थी।

यदि आप प्यार करते हो, तो आपमें उस रिश्ते को जीवनभर निभाने की हिम्मत भी होनी चाहिए। आजकल के युवाओं का प्यार तो उस बदलते मौसम की तरह होता है, जो शादी की कोंपलों के खिलने से पूर्व ही अपनी तपिश का अहसास कराते हुए उन्हें जलाकर नष्ट कर देता है और अपना रुख पलट लेता है।

प्यार करने के बाद शादी की बात तो बहुत कम युवा करते हैं बाकी तो मौज-मस्ती करके भूल जाते हैं। यदि आपका साथी आपको अपनाने को राजी है तथा वो इस रिश्ते को शादी के पवित्र बंधन में बाँधना चाहता है तो इसमें हर्ज ही क्या है?

Sunday, April 4, 2010

भाग-५३
कविता के शब्दों से अजय के दिल पर मरहम सा लग रहा था. माँ की जाली-कटी बातें भी ज्यादा बुरी नहीं लग रही थीं. वह जानता भी था की उसकी माँ का गुसा बहुत खतरनाक है, अगर बोलना शुरू किया तो जल्दी से रुकने का नाम ही नहीं लेती थीं, जितना प्यार करती थीं , वक्त आने पर उसे
जरा सी देर में निकाल भी लया करती थीं, मगर माँ तो आखिर माँ होती है. माँ को वह कैसे कुछ कह सकता था. और कोई अवसर होता तो शायद थोड़ा बहुत कुछ कहता भी , लेकिन अब तो हालात उसके बिलकुल भी पक्ष में
नहीं थे, अब तो बस वह यही चाहता था की कम से कम बाबूजी न सही तो माँ तो उसके पक्ष में रहे , अगर दोनों ही रूठ गए तो फिर क्या होगा, कैसे वह अपनी मंजिल तक पहुंचेगा . उसकी मंजिल तो आखिर चन्दा ही थी. और
अपनी चन्दा , अपनी प्रेयसी को पाने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकता था. कुछ भी कर गुजर सकता था. और फिर मा की सारी बातों को वह ऐसे नजरअंदाज कर गया जैसे की कुछ हुआ ही ना हो. जब माँ का गुस्सा थोड़ा सा
ठंडा हुआ तो अजय ने बस इतना ही कहा-
- जो कहना था कह लिया ना, ठीक है . कोई बात नहीं . मगर मेरी इतनी सी बात जानलो की मैं वही करूँगा जो मैं कह चुका हूँ.
माँ- तो कान खोलकर सुनलो. ऐसा हरगिज नहीं होगा . मेरे जी ते जी तो कभी नहीं. मैं अपने इकलौते बेटे को आत्महत्या करने की इजाजत कैसे दे सकती हूँ. अगर कोई दायाँ भी होगी तो अपने बेटे को ऐसा नहीं करने देगी.
अब आज से चंदाबी की नौटंकी खत्म. अब फिर कभी इस गाँव में नहीं होगी नौटंकी. आज ही उनके तम्बू-डेरा उखडवाये देती हूँ. नाच -गाकर लोगों का दिल बहलाने वाली ठकुराइन बन्ने का ख़्वाब देख रही है , जो की कभी पूरा नहीं होगा .
आज से चंदाबाई को देख भी नहीं पाओगे, और अगर फिर भी जिद की तो अंजाम मौत होगा . चन्दा की लाश कहीं सदती हुई मिलेगी. समझे. मैं भी क्षत्राणी हूँ. अगर प्राण करुन्म्गी तो जान की बाजी भी लग जाए तो गम नहीं.
मगर अपना धर्म जरूर निभाऊंगी. यह सिखाया जाता है हमें. सिखाया तो तुमको भी था मगर भूल गए हो सब कुछ. तुम्हें कुछ याद नहीं रहा.कसूर तुम्हार नहीं, लगता है हमारी परवरिश में ही कोई कमी हुई है. अब मैं तुम्हारे बाबूजी को कैसे मुंह दिखाउंगी , मैंने ही उनसे कहा था की बेटा बड़ा होनहार है, आगे चलकर खानदान का नाम रौशन करेगा.
कर दिया ना नाम रौशन , और इससे ज्यादा क्या होगा. अब हमारा होनहार नाचने वाली बुढ़िया के साथ ब्याह रचा रहा है. अच्छा सिला दिया है तुमने हमारे लाड -प्यार का . हमने क्या-क्या सपने देखे थे
तुम्हें लेकर. और तुम भी क्या खूब बेटे हो, माँ रो रही है, सामने खादी अपनी मजबूरी बता रही है , और एक तुम हो की माँ से जुबान लड़ा रही हो.
अजय- तो फिर ठीक है. सर कलम करदो मेरा. मार डालो मुझे , तब तो आपका धर्म भी निभ जाएगा. छत्रानी होने का असली फर्ज भी निभा सकोगी . लोग कहेंगे देखो ये है बहादुर माँ, जिसने फर्ज की खातिर अपने ही इकलौते
बेटे का क़त्ल कर डाला. लोग इनाम देंगे तुम्हें . अखबारों में फोटो भी छपेंगे . बहुत अच्छा लगेगा न.
और इससे आगे अजय कुछ नहीं कह पाया. तब तक तो उसकी माँ ने गाल पर ऐसा तमाचा मारा की आँखों के आगे अन्धेरा छा गया. बोलती बंद हो चुकी थी. को दुःख तो बहुत हो आरहा था क्योंकि पहली बार उसने अजय के गाल पर चांटा मारा था , मगर क्या करती ? अजय की तल्ख़ बातों ने उसे बेहद डिस्टर्ब सा कर दिया . अपने बेटे को पीटने के बाद वह रुकी नहीं, सीधी निकल गयी.
जाते-जाते वह अपने पल्लू से आंसू पौंछती जा रही थी. दिल में अजीब सा दर्द लिए वह चली गयी.

Friday, April 2, 2010

52

भाग -५२

और फिर वही हुआ , जिसकी आशंका थी. अजय के मन जय ने अपनी माँ के पैर पकड़ लिए . अब माँ को लगा की शायद उसका भूला भटका बेटा सही रास्ते पर लौट आया है .
उसे लगा की जैसे उसके आंसू देखकर भगवान को भी शायद दया आ गयी है तभी तो उसे उसका बेटा लौटा दिया है . वह मन ही मन अपने आराध्य देव को याद कर
रही है , लाख-लाख धन्यवाद दे रही है , मगर अजय के मन में तो कुछ अलग ही खुराफात पाँव पसार रही थी . अपनी माँ के चंरों पर सर रखकर भीगी आँखों और
रुंधे हुए कंठ से कहने लगा-
-माँ, तुम मेरे लिए देवी से भी बढ़कर हो. ये सच है की तुमने मुझे बहुत लाड-प्यार दिया. मेरी बहुत अच्छे से परवरिश की , ऐसी परवरिचश के लिए दुनिया तरसती है , मैं तो खुशनसीब
हूँ जो आपके घर में जन्म लिया , आज तक ऐसी मेरी कोई इच्छा नहीं जो आपने पूरी न की हो . आज अगर मैं अपने लिए एक छोटी सी खुशी मांग रहा हूँ तो उसे भी दे दीईजिये ,
मैंने जिस भी मंहगे से म्नाह्गे खिलौने पर हाथ रखा , उसे आपने दिलवा दिया , अब इसमें भी कौन सी परेशानी है . इसे भी करवा दीजिए. कह दीजिए बाबूजी से. कह दीजिए की
मुझे सिर्फ चन्दा ही चाहिए . चन्दा के अलावा मुझे जीवनसाथी के रूप में कोई पसंद नहीं है.
अजय की माँ क्षत्राणी थी, जानती थी की अजय बाल हठ कर रहा है , मगर जिद की तो वह भी पक्की थी. जब अजय की माँ को लगा की वह किसी भी हालत में उनकी बात सुनने वाला
नहीं है तो उसने गुस्से में तमतमाते हुए कहा-
- होश में आओ अजय , हमारे , लाड -प्यार , ममता और छूट का नाजायज फायदा मत उठाओ. खिलौने की बात अलग होती है और शादी -ब्याह की बात अलग. तुम जिस बात की रट लगाए
हो वह गुडिया-गुड्डे का खेल नैन है बल्कि जीवन भर के ठेके हैं, सर पर मोहर धरे ते , और कटेगो फंड मरे ते. सुनी है यह कहावत. यह सात जन्मों का बंधन होता है. जिसकी स्तुति में तुम
गीत पर गीत गाये जाते हो, वह ५० साल से भी ऊपर की है. सिंगार करके, चमक-दमक वाले कपडे पहनकर जब वह स्टेज पर आती , नाचती है, गाती है , तभी अच्छी लगती है . लेकिन जब उसके
चेहरे का सिंगार उतर जाएगा , तब तुम्हें उसके अंदर से बुढापे की झुर्रियाँ नजर आएँगी. जा उसका असली चेहरा देखोगे तब समझ में आयंगी मेरी बातें. जीवन भर वह कभी माँ नहीं बन पाएगी.
कुदरत का एक समय होता है, उस समय के बाद महिला किसी को जन्म नहीं दे सकती .इंसान शादी इसलिए करता है वह भी संसार को आगे बढ़ा सके, मगर अफ्सोसो तुम ऐसा नहीं कर सकोगे
लोग ताने मारेंगे,. उसे तुम्हारी माँ नहीं अम्मा कहेंगे. तब तुम्हारे सर से इश्क का भूत उतरेगा. प्यार खाने को नहीं देता, जब अपना घर बनाओगे , अपने लिए रोटी का इंतजाम करोगे तब
जानोगे की हाँ, किसीने कुछ कहा था . और मान लिया होता तो ठीक होता.इस सबसे बेपरवाह अजय का ध्यान चन्दा की तरफ था , उसे किसी कवी की पंक्तियाँ याद आ गयी -
खिले थे गुलाबी, नीले,
हरे और जामुनी फूल
हर उस जगह
जहाँ छुआ था तुमने मुझे,
महक उठी थी केसर
जहाँ चूमा था तुमने मुझे,
बही थी मेरे भीतर नशीली बयार
जब मुस्कुराए थे तुम,
और भीगी थी मेरे मन की तमन्ना
जब उठकर चल दिए थे तुम,
मैं यादों के भँवर में उड़ रही हूँ
अकेली, किसी पीपल पत्ते की तरह,
तुम आ रहे हो ना
थामने आज ख्वाबों में,
मेरे दिल का उदास कोना
सोना चाहता है, और
मन कहीं खोना चाहता है
तुम्हारे लिए, तुम्हारे बिना।

bhaag 52

bhaag-51

अगर मुझे वह मिल गयी तो जान लीजिए दुनिया की हर दौलत मिल जायेगी , लेकिन उसके बिना जग सूना है, जिंदगी का कोई खास अर्थ नहीं है. मैं जीवन की अहमियत को नजरअंदाज नहीं करता. मानता हूँ यह बेशकीमती है. बार-बार नहीं मिलता इंसान का जीवन. इसलिए मैं खुद कोई गलत कदम नहीं उठाउंगा, आप इत्मीनान रखें की मैं भावुकता में आकर या निराश होकर अपने आपको कोई नुक्सान नहीं पहुंचाऊंगा. हाँ , अगर कुदरती तौर पर मेरी सांस थम जाती है या कुछ और हो जाता है तो उसके लिए मैं जिम्मेदार नहीं हूँ.
माँ कितने भी गुस्से में क्यों न रहे लेकिन अपने बेटे का अहित नहीं चाहती.अजय की हारी थकी बातों से उसकी माँ को दुःख हो रहा था. सोच नहीं पाई की क्या जवाब दे ? उसने अपने माते में दर्द भी महसूस होने लगा. उसकी जी चाहा की अपने सर पर हाथ रखकर ,आँखें बंद कर जमीन में धंस जाए. या फिर कोई क़यामत आकार उसे बेहोश कर डाले , तब तक के लिए जब तक की उसका बेटा , इकलौता बेटा उसे वापस न मिल जाये. उसे लगा जैसे किसी अनजानी शक्ति ने उसके बेटे को उससे अलग कर दिया है , वरना उसका बेटा इतना सीधा और सरल है की माँ -बाप के इशारा करने भर से ही वह मान जाया करता था. उसने कभी नजर मिलाकर भी बात नहीं की. फिर अचानक ऐसा क्या हुआ की अजय अपना वास्तविक स्वभाव ही भूल गया. वह जानती थी की जादू टोना जैसी किसी चीज का कोई अस्तित्व नहीं मगर मामला जब अपने लाडले बेटे का हो हर किसीको आशंका सताने लगती है. अजय की माँ को भी लगा की शायद चन्दा ने कोई टोना टोटका कर दिया है , या फिर किसी सयाने भगत से वशीकरण मन्त्र प्राप्त कर उसे अपने वश में कर लिया है. तभी तो वह इतना बदल गया है . अजय की माँ ने वक्त की नजाकत को समझने का निश्चय कर लिया . जान गयी की जवान हो रहे बेटे के मुंह लगने से कोई फायदा नहीं होगा. बेहतर होगा की उसे बाद में समझाया जाये. व् आह जानती थी की इश्क की आग बहुत खतरनाक होती है. इसको जितना बुझाया जाए यह उतनी ही भडकती है. वह खतरे की घंटी को भांप चुकी थी , सो बेटे को प्यार से समझाते हुए बोली-
- बता , मुझसे तुम्हारा दुःख ना देखा जाएगा. देखो तो चाँद सा चेहरा कैसा मुरझा गया है, चलो आराम कर लो. मैं अभी दूध लाती हूँ. कुछ खा पी लोगे तो थकान उतर जाएगा. इसके बाद मैं खुद तुम्हारी मन पसंद लोरी सुनाकर तुम्हें सुला देती हूँ. ज़रा सो लोगे तो अच्छा रहेगा. उसके बाद फुर्सत में चंदाबाई के बारे में बात करेंगे. तुम्हारे बाबूजी को अभी यह बात पता चली तो बबंडर हो जाएगा, बात का बतंगड बनाने से बेहतर है की सही तरीके से इस उलझन को सुलझा लिया जाए. मैं सही समय देखकर इस बारे में तुम्हारे बाबूजी से बात करुँगी, तुम्हारी खातिर मैं समझाने की कोशिश भी करुँगी . फिर जो होगा देखा जाएगा . माहौल देखकर निर्णय लिया जाएगा .
अजय- सच माँ ? क्या तुम मेरी खातिर ऐसा करोगी ? प्लीज माँ, करो न ऐसा. बाबूजी तो आपकी हर बात मानते हैं , इसे भी जरूर मान जायंगे, आखिरकार वे भी मेरा सुख ही चाहते हैं ना. जब मैं उन्हें बताउंगा की मेरा हित किसमे है, किसमे नहीं , तो बात आ जायेगी उनकी समझ में.
माँ- हाँ, और वे मान जायेंगे, तुम्हारा हित अहित किसमे हैं? ठीक है ... काश ऐसा ही हो मेरे लाल. जानती हूँ उनका गुसा , तुम्हें ब्जुई तो पता है. ज़रा -ज़रा सी बात पर गुस्सा आ जाता है उनको. हार्ट के मरीज हैं, अगर उनको सदमा लगा तो हम सभीके लिये उचित नहीं रहेगा. ऐसा ना हो की गाँव के लोग तुम्हें ताना दें, कहें की बेटे की वजह से उसके पिटा की जान चली गयी, कुछ कहें तो चुप ही रहना , बुरा मत मानना .
अजय- माँ...... ये क्या कह रही हो, मैं अपने बाबूजी की जान क्यों लूंगा / ऐसा मत कहो प्लीज. उन्हें मेरी भी उम्र लग जाए, अगर कुर्बानी की जरूरत पडी तो मैं खुद अपनी जान कुर्बान कर दूंगा, मगर उन पर आंच भी नहीं आने दूंगा. मेरे जन्मदाता हैं. मेरे भगवान हैं वो
अजय की बातों से माँ के ह्रदय में भावनाओं का तूफ़ान उठने लगा. पिता के प्रति बेटे के मन का प्यार सुनकर भाव विभोर हो उठी, नैनों से सावन भादों जैसे बादल मंडराने लगे , कुछ देर बाद ही अँखियाँ बरसने लगीं. माँ ने अपने आँचल से आंसुओं को समेटना चाहा, मगर आंसू तो बड़े नाजुक होते हैं. एक बार फिसल गए तो फिसल गए , फिर जल्दी से कब्जे में नहीं आते.











Thursday, April 1, 2010

bhaag-50

ऐसी स्थिति तो नहीं हो जायेगी की न खुदा ही मिला , ना विसाले सनम. वह इसी तरह की बातें सोच रहा था . इनमे से कुछ नेगेटिव थीं और कुछ पोजीटिव.और बाहर से तो अजय की माँ दरवाजा थोक ही रही थी, वह जानती थीं की आजकल के लड़के उतने सहनशील नहीं होते. अगर दिल पर ले गए तो कुछ अनहोनी कर सकते हैं. ये नहीं जानते की जान कितनी कीमती होती है. कुदरत ने जिस चीज को प्यार से बख्शा , वह बेशकीमती चीज है -इंसान के रूप में जन्म देना. इस जन्म की इज्जत न कर किसी भी कारण से इसे खत्म कर लेना बहुत बड़ी मूर्खता है. कुछ युवा इसलिए आत्महत्या कर लेते है क्योंकि उनका चाहने वाला उन्हें ठुकरा देता है , या फिर जमाने वाले उनके प्यार को मान्यता नहीं देते. कुछ किसान या गरीब मजदूर इसलिए आत्महत्या कर लेते हैं क्योंकि वे घर की जिम्मेदारियों को सहन नहीं कर पाते या फिर कर्ज के बोझ टेल दबे होते हैं. कुछ महिलायें इसलिए आत्म्हत्या कर लेती हैं क्योंकि उनके परिजन ससुराल के हिसाब से दहेज नहीं दे पाते और फिर वे अपने आपको दीं -हीन कमजोर समझकर फांसी लगा लेती हैं अथवा किसी ट्रेन के नीचे कूद जाती हैं. सबसे बुरा हाल उन छात्रों का है जो स्कूल में सही रिजल्ट नहीं दे पाने के कारण इतने कमजोर हो जाते हैं की किसी भी तरह से प्राण त्याग देते हैं. अजय की माँ को लगा की कहीं अजय भी भावनाओं में बह्कर कोई गलत कदम ना उठा ले. क्योंकि ऐसे लोग अपना भला -बुरा बिलकुल नहीं समझते . बस जो करना होता है, कर डालते हैं. जबकि आत्महत्या करना सबसे बड़ा पाप है. इससे भगवान बुरा मानता है. अजय की माँ के बार- बार दरवाजा बजाने पर जब अजय ने गेट खोला तो उसका रो-रोकर बुरा हाल था. आंसुओं से आँखें सूज रही थीं. अजय की माँ ने उसे अपने गले से लगा लिया और उसके बालों पर मातृत्व प्रेम उंडेलने लगी. अजय को कुछ राहत मिली. वह कुछ बोलने का प्रयास करता तो उसकी हिचकियाँ बध जाया करती थीं. अजय की माँ उसे दिलासा दिला रही थी.उसे तसलली देते हुए कह रही थी-
- ये तुमने अपना क्या हाल बना लिया है मेरे लाल. तुम्हारी माँ का कलेजा पत्थर का नहीं है , जिसको कोई तकलीफ न हो. मेरे प्राण निकल जायेंगे मेरे लाल. मैं और तुम्हारी बाबूजी तुम्हारे बारे में कैसे -कैसे सपने देखते थे. की अपने बेटे के लिए चाँद सी बहू लायेंगे . वह ऐसी होगी, वैसी होगी. कितने ठाट से बरात निकालेंगे. आस-पास के सौ गाँव तक किसी राजपूत घराने की ऐसी शानदार बरात नहीं निकली होगी , जितनी हमारे लाल की होगी. तुम्हारे बाबूजी ने क्या -क्या सोचा था तुम्हारे विवाह के बारे में . मगर यह सब क्या हो गया. कैसे हो गया ? तुमने हमारे बारे में कुछ नहीं सोचा ? हम कोई तुम्हारे गैर तो नहीं., जो तुम्हें गलत राय, गलत सलाह देंगे. हम तो वही करेंगे जो तुम्हारे हित में होगा. जिससे तुम्हें फायदा होगा. हमारा क्या है बेटा , आज हैं कल नहीं. जो कुछ है , सब तुम्हारा है. हम तो इसलिए कह रहे थे की किसी राजपूत घराने की राजकुमारी ब्याहकर लायेंगे . इससे उस इलाके के वोट बेंक पर भी हमारा कब्जा हो जाता. जानते ही हो इस क्षेत्र में हमारी बिरादरी की ७० गाँव हैं,इतने वोटों के बल पर आराम से जीता जा सकता है बशर्ते की ये सब लोग हमारे पक्ष में हों. तुम्हारे बाबूजी भविष्य के विधायक हैं तो तुम आने वाले समय के सांसद . अपने ही हाथों अपने भविष्य का गला क्यों घोंटते हो मेरे लाल. माँ हूँ तुम्हारी , तुम्हें सही सलाह ही दूंगी. गलत नहीं.
अजय - मैं सब मानता हूँ माँ. सब कुछ जानता हूँ , मगर दिल के हाथों मजबूर हूँ . मैं अपनी राय पहले ही बता चूका हूँ. इससे अलग मुझे कुछ नहीं . मुझे चन्दा बाई को देखकर खुशी मिलती है . विधायक , सांसद या मंत्री बन्ने में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है. अच्छी बात वो है माँ जो हमें सुकून दे , खुशी दे. मुझे राजनीति में कभी खुशी नहीं