Sunday, August 31, 2008

भाग-94

तुम्हारा दुःख भी इसी तरह दूर कर दूंगा... फ़िर कभी तुम किसी मर्द जात से शिकायत नहीं कर पाओगी... मेरे ख़याल से अभी तुम्हें ऐसा कोई मर्द ही नहीं मिला जोतुम्हें सुख के सागर में गोते लगवा सकें... मैं आज तुम्हें एक नईदुनिया से रूबरू कराऊंगा...
बिजली- ये मर्द लोग भी न, बड़े स्वार्थी होंतेहैं... अपने मतलब के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहते हैं और जब मतलब निकल गया तो ;पहचानते भी नहीं...
सलीम - ये तुम्हें किसी ने ग़लत जानकारी दी है...
बिजली- तुम बातें तो बहुत अच्छी करते हो... आज तुम्हारा दम भी देख ही लेती हूँ...
सलीम- तुम्हारी कोठा मालकिन भी मुझे अब तक याद करती है... इसीसे तुम मेरे दम का अनुमान लगा सकती हो... अपने मुह से अपनी तारीफ क्या करूँ, सब बातें तुम्हें आशा ने भी सुना ही दी हैं...
उसकी बहकी -बहकी बातें सुकर बिजली मन ही मन कुढ़ रही थी... वह चाहती थी की सलीम उससे शारीरिक सम्बन्ध न बनाए, लेकिन यह बात वह अपनी तरफ़ से कहना नहीं चाहती थी...उसकी इच्छा थी की सलीम ख़ुद ही इनकार कर दे ...वह जानती थी की जैसेही सलीम उसके साथ हम बिस्तर होगा, वैसे ही वह ऐड्स का शिकार हो जायेगा... बिजली बेहद खूबसूरत थी लेकिन ऐड्स ग्रस्त थी... आशा ने अपना बद्ला लेने के लिए यह साजिस रची थी... इस काम के लिए बिजली को अच्छी -खासी रकम भी मिलती थी... सलीम इस सबसे बेखबर था... वह अपने पूरे कपड़े उतार कर बैठ गया... उसने बिजली को पूरी तरह से निर्वस्त्र कर दिया... वह मुस्कराने लगी... आशा तो पहले ही उन दोनों को ऐसी दवा पिला चुकी थी, जिसे पीकर वे दोनों कामोत्तेजना की आग में झुलसने लगे थे.... सलीम जल्दी के मूड में नहीं था इसके बावजूद वह अपने मन पर काबू नहीं रख पा रहा था... उसको यह समझ कर हैरत हुई की उसका अपने आप से पूरी तरह से नियंत्रण हट चुका था... बिजली ने उसको अपने ऊपर खींच लिया... सलीम बोली-
- कंडोम कहाँ है ? निकालिए...
बिजली- उसकी क्या जरुरत है... मुझे वह अच्छा नहीं लगता... बड़ी गिल -गीली सी लगती है...
सलीम- बिना कंडोम के यह सब करना ठीक नहीं होता...
बिजली- इसमें हर्ज भी क्या है ... एक बार कर लेते हैं ... बाद में लगा लेंगे ...
सलीम थोडी देर तक तो तर्क देते रहा , मगर बिजली की जिद के आगे झुक गया... उसने सोचा की आशा के मुताबिक अभी एक ही ग्राहक ने उसकी नथ उतारी है... उस समय तो कंडोम लगाया ही होगा... फ़िर अब इसकी क्या जरुरत है... और फ़िर एक बार से क्या होता है ? उसकी इसी सोच के कारण वह बिजली के झांसे आ गया... अगले ही पल वे दोनों एक दूसरे में समाने लगे ... बिजली चीख रही थी... सलीम बड़ी बेदर्दी के साथ हावी हो रहा था... वह चाहता था की जितने हो सकें उतने जोर-जोर से प्रहार किए जाएँ ताकि बिजली उसकी मर्दानगी की कायल हो सके...उसने बिजली से पूछा-
- अब कैसा लग रहा है ?
बिजली - बहुत दुःख हो रहा है ...
सलीम- बस थोडी देर रुको, जितना दुःख हो रहा है , उससे कई गुना सुख मिल जाएगा...अगर मुझसे मेरे मन की बात जानो तो मैं बहुत खुश हूँ... सचमुच, कंडोम से इतना मज़ा नहीं आता...

Saturday, August 30, 2008

भाग-93

आशा मम ही मन खुश थी... उसको इंतकाम लेने में बहुत सुकून मिलता था... उस रात उसने अपने हाथों से बिस्तर सजाया ... कई साल पहले सलीम ने जो खेल उसके साथ खेला था, आशा ने भी वही खेल दोहराया ... उसने पहले से ही सलीम की शराब में कामोत्तेजना बढ़ाने वाली दवा मिला दी थी ... उस दवा ने जब अपना असर दिखाना शुरू किया तो सलीम की काम वासना भड़क उठी... आशा ने बिजली को उसके करीब ही बिठा दिया था... वह जब बिजली की आंखों में झाँक कर देखता तो उसको करंट सा लगता था ... उसने बिजली से कहा-
- तुम बहुत खूबसूरत हो... आशा की खोज का भी जवाब नहीं है... अगर तुम मेहनत और प्यार से काम करोगी तो एक दिन तुम भी आशा की तरह बड़ी बन जाओगी... ऊपर वाले ने तुम्हें जो हुस्न की दौलत दी है, वह हर किसी को कहाँ मिलती है... बस इतना करना है की तुम्हें इनकी हट बात माननी होगी...
बिजली- मैं यहाँ रहना नहीं चाहती... मुझे अपने घर जाना है...
सलीम-इसे भी घर ही समझिये... अगर तुमको यहाँ कोई परेशानी है तो मुझसे कहो, मैं उस परेशानी का हल निकलवा सकता हूँ... मैंने बहुत से पत्थरों को तरस कर हीरा बनाया है... तुम्हें भी बना दूंगा॥
बिजली - और तुम ख़ुद पत्थर के पत्थर ही रहे... बड़ी हैरत की बात है...
आशा- क्या कहती हो मेरी बिजली रानी ... ये बहुत बड़े आदमी हैं...
बिजली - जो इंसान अपनी बेटी की उम्र की लड़की के साथ रंगरेलियां मनाना चाहे उसका बड़प्पन आसानी से समझ में आता है ...
आशा- तुम इनके साथ रात बिताओगी तो बहुत आनंद उठाओगी... मैं भी तो उस आनंद को प्राप्त कर चुकी हूँ...
सलीम- मैं तुम्हें ऊपर से ही बूढा नज़र आता हूँ... जब मेरे साथ कुछ पल बिताओगी तब समझ पाओगी ...
जब वे दोनों बातों में उलझे हुए थे तो आशा ने बिजली को भी कामोत्तेजना बढ़ाने वाला विशेष शरबत पिला दिया ... उसे पीते ही बिजली की भाषा बदलने लगी... उसका हर अंदाज़ बदलने लगा... अब वह ख़ुद ही चर्चा में मज़ा लेने लगी थी... जब आशा ने उसको एक सिगरेट जलाकर उसके हाथ में थमादी तो वह जोर-जोर से काश लगाने लगी...उसका बटन टूटने लगा था... काम वासना की चिंगारियां उसके जिस्म को झुलसा रही थीं...वह कातिल अंगडाइयां ले लेने लगी...सलीम ने उसके सीने पर हाथ फिराना शुरू कर दिया ... अब वे उस शानदार कमरे में दोनों ही बचे थे... बिजली इतनी उत्तेजित हुई की उसने अपने ऊपरी वस्त्र उतारने शुरू कर दिए... सलीम भी उसका सहयोग करने लगा... वह क्या जानता था की जिस बिजली के साथ वह आनंद की कल्पना कर रहा था, वह उसकी जान की सबसे बड़ी दुश्मन थी... वह उसे तोहफे में ऐड्स की सौगात सौपने वाली थी... वह ऐड्स,जिसका पूरी दुनिया में कोई इलाज नहीं है...वही बिजली कह रही थी-
- अचानक यह मुझे क्या हो गया है ? मेरे शरीर से आग की चिंगारियां क्यों निकलने लगीं ?
सलीम- थोडी देर में ये शांत हो जायेगी... इसी लिए तो मुंबई से यहाँ पर विशेष तौर पर लाया गया है... मैंने अब तक तुम जैसी न जाने कितनी लड़कियों की तकलीफ दूर की है... आज वे सब सुखी हैं... तुम्हारी मालकिन आशा का दर्द भी तो मैंने ही दूर किया था... तुम फ़िक्र न करो...

Friday, August 29, 2008

भाग-92

सलीम उसका गुनाहगार ही तो था... उसने आशा को प्यार की आड़ लेकर वैश्या बना दिया था... सबसे ज्यादा नफरत वह सलीम से ही करती थी... आज वही सलीम उसके रहमो करम पर उसीके सामने गिडगिडा रहा था... आशा के मन में तो कुछ और ही चल रहा था... वह दांतों से अपने निचले होठ को काट रही थी... सलीम उसके प्लान को समझ नहीं पाया... आशा उसको अपने हाथों से पैग बनाकर पिला रही थी... अपने लिए एक सिगरेट सुलगाकर आशा ने धुएं के छल्ले उडाने शुरू कर दिए... फ़िर सलीम की आंखों में आँखें डालकर बोली-
-क्या तुम्हारे लिए भी सिगरेट जला दूँ ?
सलीम- मैंने तीन सालों से सिगरेट छोड़ रखीं हैं ,लेकिन अगर तुम कहोगी तो जहर भी पी लूँगा...
उसकी बात पर आशा ऐसे ठहाका मारकर हंसी, जैसे किसी बच्चे ने कोई अटपटी बात कहदी हो... उसने बिजली को आवाज़ दी... वह चंचल और शोख लड़की थी ... उसने अभी-अभी जवानी की दहलीज पर कदम रखा था... उसे जो कोई एक बार देख लेता था, वह उसीका होकर रह जाता था... आशा के सिवाय किसी को भी यह मालूम नहींथा की बिजली को ऐड्स है... दो वर्ष पहले, जब वह बहुत छोटी थी, तभी उसके साथ एक हवसी ने बलात्कार किया था.... तभी से वह बलात्कार की शिकार हो गई... आशा ने उसका टेस्ट करवाया था... जिन लोगों से वह नफरत करती थी उनको प्यार से बिजली के हवाले कर दिया करती थी... बिजली के संपर्क में आकर आशा का शिकार इतना दीवाना हो जाया करता था की कंडोम भूलकर उसके साथ प्रणय क्रीडा में मस्त हो जाता था... और यहीं से उसकी उलटी गिनती शुरू हो जाया करती थी... बिजली को आशा ने अपना सबसे बड़ा हथियार बना रखा था... सलीम के लिए भी उसने बिजली को ख़ास तौर पर मिशन पर लगाया था... उसने सलीम के सामने ही बिजली से पूछा-
- साहब को खुश कर सकती हो ? मेरे बिल्कुल ख़ास हैं... इन्हें आज मुंबई से बुलाया गया है... मुंबई के बारे में तो तुमने सुना ही होगा... वहां पर एक से बढ़कर एक हसीना मिलती हैं... पता नहीं इनको यहाँ का स्वाद पसंद आएगा भी की नहीं ? वैसे ये पुराने रसिया हैं... बहुत खेले खाए हैं... पहले यहाँ की हजारों कलियों को मसल चुके हैं...
बिजली- मैं अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करुँगी...आप निश्चिंत रहें ...
आशा - इतना ख़याल रखना की ये आम ग्राहक नहीं हैं... मेरे जानो -जिगर हैं...
सलीम - तुम फ़िक्र न करो, अब मैं बिजली को समझा दूंगा...

आशा के चेहरे पर मुस्कराहट नाचने लगी... उसको बहुत खुशी हो रही थी... वह चाहती थी की सलीम ऐड्स का मरीज बनकर बची हुई जिंदगी जिए... उसका तीर बिल्कुल सही निशाने पर जाकर लगा था... सलीम ने पैग पर पैग पीने शुरू कर दिए... वह नशे में चूर होकर न जाने क्या-क्या बकता रहा ...

Thursday, August 28, 2008

भाग -९१

आशा- बड़ा एहसान किया मुझ पर ... कोई कितनी भी कोशिश क्यों न करले मगर पहले प्यार को नहीं भुला सकता ... तुम भी तो मेरा पहला-पहला प्यार हो ... तुमको बहुत मिस किया है मैंने...
सलीम- पहला नहीं दूसरा... पहला तो मेरे ख़याल से राजू था न... देखो , कितने बरस हुए लेकिन मैंने अभी तक तुम्हारे दोस्त का नाम याद कर रखा है...
आशा- और मेरी नहीं कहोगे... मैं बनना तो चाहती थी देवी, मगर तुमने मुझे वैश्या बना डाला ... मुझे कोठे पर बेच दिया ... फ़िर प्यार करती हूँ तुमसे ... ऐसी कौन सी रात होगी जब मैंने तुम्हें याद न किया हो...
सलीम- मैं तुम्हारे प्यार को सलाम करता हूँ...
आशा- घर -परिवार के बारे में कुछ बताओ ...
सलीम - जैसा था व् ऐसा ही हूँ... मेरा कोई नहीं है इस दुनिया में... तुम्हारे सिवाय...
आशा- शादी नहीं की ?
सलीम- नहीं... पूरी जिंदगी बस प्यार- मोहब्बत में ही गुजर गई... मैं सबसे प्यार करता रह, सब पर भरोसा जताता रहा, फ़िर भी तन्हाईयाँ मिलीं...
आशा- जो सबसे प्यार करने का दावा करता है, वह किसी से प्यार नहीं करता, और जो सब पर भरोसा करने का दम भरता है वह किसी पर भरोसा नहींकर पाटा... दुनिया इसी तरह की है... तुम्हारे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ है...
सलीम- तुम ठीक कहती हो ... अब अगर तुम इजाजत दोगी , तो तुम्हरी चौखट पर पड़ा दो रोतो खाता रहूँगा...
आशा- ये सब इतना आसान नहीं होता सलीम ... कहने और करने में बड़ा अन्तर होता है... हो सकता है तुमसे भी अभी किसी ने बस इतनी सी ही, यानी सिर्फ़ दो रोटियों की ही तमन्ना की हो और इसका झांसा देकर तुमने न जाने कितनी बड़ी कीमत वसूली हो... यह सब होता है... मगर हमको भो यह सब सहने के लिए ख़ुद भी तैयार

Wednesday, August 27, 2008

भाग-90

इस धंधे में आकर भी अगर कोई लड़की पीना शुरू न करे , यह कैसे सम्भव है ?शबाब और शराब का मेल न हो तो सारा मज़ा बेकार हो जाता है... क्या तुम यह भी भूल गए की पहला जाम मुझे तुमने ही पिलाया था... शरबत में मिलाकर... शराब के साथ-साथ तुमने उसमें कामोत्तेजना बढ़ाने वाली दवा भी तो मिला राखी थी... उसे पीते ही मैं गर्म होकर तुमसे लिपटने लगी थी... याद आया ...
सलीम- छोडो भी... बहुत पुराणी बातें हैं... गढे हुए मुर्दे उखाड़ने से क्या फायदा ?
आशा- हाँ , ये बात भी ठीक ही है... क्या फायदा ? आज भी तुम हर बात फायदे के हिसाब से करते हो... अच्छा है... आओ, आज अपने हाथों से जाम पिलाऊंगी...
सलीम- वाह... क्या बात है ... यह घुंघराले बालों वाली लड़की कौन है ?
आशा- बड़े चालाक हो तुम... तुम्हारी नज़र भी शातिर है... आखिरकार उस छिपे हुए आइटम को ढूंढ ही लिया...
सलीम - हुस्न के असली पारखी तो हम ही हैं... पहले हम लोग ही देखते हैं...
आशा- लो , पैग बना दिया है... सच कहते हो ... अगर इन कोठों पर रोजाना घुंघरुओं का अलग-अलग संगीत्ब सुनाई देता है तो उसमें सबसे बड़ा योगदान तुम जैसे लोगों का ही होता है...
सलीम- कौन है ये ? कमसिन नज़र आती है...
आशा- एकदम करारी है... अभी-अभी तो हाथ लगी है... इसने बड़ी मुश्किल से नथ उतरवाई है... नाम तो इसका बिजली है , मगर यह सचमुच की बिजली है... तुम्हें भी देखते ही करंट लग गया ना ?
सलीम- कितने देती हो ताज़ा माल का ?
आशा - माल अच्छा हो तो पैसे की कोई सीमा नहीं है ... तुम कल से काम पर लग जाओ ...
सलीम-कल से काम पर जोर-शोर से लग जाता हूँ... आज इस क़यामत का आनंद चख लेता हूँ.... खूब मज़ा आएगा... अगर तुम कहो तो मैं तुम दोनों को साथ-साथ भी संतुष्ट कर सकता हूँ...
आशा- मैं कहीं भागी थोड़े ही जा रही हूँ.... मैं तो आख़िर तुम्हारी ही हूँ...
सलीम- बात तो तुम आज भी ऐसी करती हो की कलेजे के पार हो जाती हैं... पहले कितनी झिझकती थीं तुम ?
आशा- हाँ, पहले की तो बात ही कुछ और है ... उन बातों को अब याद करने से क्या फायदा... उस वक़्त तो मैं बिल्कुल भोली थी और तुम इतने ही मक्कार ...
सलीम- इसी बहाने मुझे गालिउँ भी दे रही हो... शराब भी पिला रही हो...
आशा- अरे नहीं... दरअसल , इस लाइन में आते ही मेरी जुबां भी गन्दी हो चुकी है... होठों पर हमेशा गालियाँ राखी रहती हैं... ये सारी देन भी आपकी ही है...
सलीम-मैंने जब मुंबई में यह सुना की तुम इतनी दौलतमंद हो गई हो तो बड़ा अच्छा लगा... तुम्हारे भेजे हुए आदमी के साथ तुंरत यहाँ चला आया ... तुम बुलाओ और मैं ना आऊँ ... भला यह कैसे हो सकता है...
























Tuesday, August 26, 2008

भाग-89

वह सफलता की सीढियां चढ़ती जा रही थी... कहते हैं की जब दौलत आती है तो कई बुराइयां भी साथ लाती है... आशा भी उद्दंड और घमंडी हो गई थी... उसका मिजाज़ बेहद सख्त हो गया... वह अपने कोठे की वेश्याओं के साथ बहुत मारपीट करती थी... उसके साथ जो गद्दारी हुई थी, वह उसका बदला लेने की हर सम्भव कोशिश करती थी... भ्रष्ट अफसरों ने उसके होसलों को और भी बढ़ा दिया था... इस प्रकार आशा टॉप लेबल की वैश्या से टॉप लेबल की कोठे मालकिन बन गई थी... उसने सलीम को भी ढूंढ लिया था... उससे आशा ने इतना खतरनाक इंतकाम लिया की सुनने वालों के भी रोंगटे खड़े हो जाएँ... उसने पहले सलीम को अपने पास बुलाया और प्यार से कहा-
- शुक्रिया सालीम... अगर तुम ना होते तो आज मैं इतनी ऊंचाई पर नहीं पहुच पाती... किसी ऑफिस में क्लर्क होती या फ़िर सब्जी की कोई छोटी-मोटी दूकान खोलकर बैठी होती... तुमने एहसान किया मुझ पर ... अगर वैश्या नहीं बनाया होता तो आज मेरे ये थाट-बाटनहीं होते... मैं बार -बार तुम्हारा आभार मानती हूँ...
सलीम- तुम मेरा मजाक तो नहीं उड़ा रही हो ?
आशा- कमाल है ... क्या तुम मजाक के लायक हो... मैंने तुम्हें खोजने में कोई कसार नहीं छोड़ी... लेकिन तुम ठहरे नम्बर एक के दलाल ... तुम मिले तो मुंबई की बदनाम गलियों में मिले... आख़िर मैंने तुम्हें पा ही लिया...
सलीम- तुमने घर बसाया की नहीं ?
आशा - अब मजाक तुम कर रहे हो सलीम, जिस लड़की की आबरू इस तरह लूट ली जाए , उसका घर भला कैसे बस सकता है... अगर तुमने मुझे जिस्म की मंदी में नीलाम नहीं किया होता तो शायद शादी भी हो ही जाती... खैर, छोडो... ये सब बेकार की बातें हैं... जिस राह से जाना ही नहीं उसके कोस गिनने से क्या फायदा ...
सलीम-अब मेरे लिए क्या आदेश है ?
आशा- तो क्या अब भी तुम दलाली कर सकते हो ? अब तो तुम्हारी उम्र भी काफी हो गई है...
सलीम - इससे क्या फर्क पड़ता है ... आज भी मैं तुम्हारे लिए एक से बढ़कर लड़की का प्रबंध कर सकता हूँ...
आशा - हाँ -हाँ , क्यों नहीं ?चोर भले ही चोरी छोड़ दे लेकिन हेरा फेरी नहीं छोड़ सकता... तुम तो वैसे भी पक्के दलाल हो... तुम जैसा सख्त जान दलाल हो तो बाट ही क्या है ?क्या अब भी शराब और शबाब का शौक रखते हो या ढलती उम्र के साथ-साथ जोश और जवानी भी रुखसत हो गए ?
सलीम- क्या कहती हो आशा ?मर्द कभी बूढे नहीं होते... सोलह साल की कमसिन भी पानी मांगने लगेगी...
आशा- एक आइटम है मेरे पास ... बहुत खतरनाक है... अभी-अभी नाथ उतरी है... अगर इच्छा हो तो आज रात पेश करूँ... तुम्हें निराशा नहीं होगी...
सलीम- नेकी , और पूछ-पूछ ?
आशा- ठीक है ... फ़िर , पीने -पिलाने का दौर शुरू कर देते हैं...
सलीम -क्या तुम भी पीने लगी हो ?
आशा- तुम भी कभी-कभी बच्चों जैसी बात करने लगते हो सलीम...

Monday, August 25, 2008

भाग -८८

पहला ग्राहक जब उसके पास आया तो वह अपना दोस्त बनाकर आशा के पास ले गया ... आशा तो काम वासना की आग में बुरी तरह जल रही थी... उसने कोई एतराज दर्ज नहीं कराया ... सलीम मंजा हुआ खिलाडी था... उसने बहुत अच्छी तरह से आशा को मना लिया... उस रात आशा को वैश्या बनाने की शुरुआत कर दी गयी ...सलीम के अलावा दो अन्य लोगों ने उसके जिस्म का लुत्फ़ उठाया... आशा को पता ही नहीं चला की वह कब टॉप डिमांड की वैश्या बना दी गयी और कब उसको कोठे पर बेच दिया गया... सबसे हैरत की बात तो ये थी की उसके पेट में पल रहे गर्भ को भी गिरा दिया गया था... सलीम एक नम्बर का गद्दार निकला था... जब आशा को असलियत की जानकारी हुई तो काफी देर हो चुकी थी... उसकी दुनिया लुट चुकी थी... वह बहुत रोई...

कई दिनों तक खाना भी नहीं खाया , यहाँ तक की एक दिन अपना सर भी फोड़ लिया... आत्महत्या करने की कोशिश की, मगर कोई फायदा नहीं हुआ... उसने मौत मांगी लेकिन वह भी नहीं मिल पाई... कई ग्राहकों से उसने अपनी व्यथा सुनाई... तब भी उसकी इस नर्क से रिहाई नहीं हो पाई... आशा को मोहब्बत के नाम से नफरत हो गयी... उसका दुनिया के हर रिश्ते से विश्वाश उठ गया... उसको रोजाना हवस के भूखे भेदियों के सामने परोस दिया जाता था... जब वह इनकार करती तो कोठे की मालकिन उसे बहुत बड़ी सज़ा दिया करती थी... यातना सह-सहकर आशा इतनी सख्त हो गयी की धीरे-धीरे उसने कोठे की जिंदगी को पूरी तरह से आत्मसात कर लिया... वह प्यार के नाम से ही चिढ़ने लगी थी... कोठे की नर्क भरी जिंदगी जीते-जीते उसने यह तय कर लिया की अब वह दिल्ली की सबसे बड़ी कोठा मालकिन बनकर दिखायेगी... जब कोई उसके सामने प्यार-महब्बत की बात करता तो उसका खून खौल उठता था... क्रूर ग्राहकों ने उसकी संवेदनशील भावनाओं को एकदम मृत कर दिया था... वह इतनी सख्ती से पेश आती की देखने वाला देखकर दंग रह जाता था... कुछ साल के बाद ही उसने मौका पाकर अपनी मालकिन की ह्त्या करदी... पुलिस से सैटिंग करके उसने ह्त्या को आत्महत्या का रूप भी दे दिया था... इसके बाद वह ख़ुद कोठा मालकिन बन बैठी... यह ज्यादा बड़ा कोठा नहीं था, जगह भी किराए पर थी, मगर शुरुआत के लिए इतना ही काफी था... आशा ने फ़िर मुड़कर नहीं देखा ... जिस्मफरोशी के आकाश पर उसका नाम चमकने लगा... उसके कोठे पर रोजाना नई-नयी लड़कियां आने लगीं... वह ऊंची रकम देकर ऐसी लड़कियां अपने कोठे पर रखती थी की हर समय ग्राहकों की लाइन लगी रहती थी... आशा के पास जब दौलत आयी तो वह और भी ज्यादा तरक्की करने लगी... उसने एक कोठा और चालू कर दिया था... किस्मत उसका साथ दे रही थी... नेता से लेकर अफसर तक उसके कोठे का स्वाद चखते थे...

Sunday, August 24, 2008

भाग-८७

वह तो सलीम की चिकनी -चुपडी बातों में फंसकर रह गयी थी... यह उम्र का बड़ा नाज़ुक दौर होता है... संभलगए तो संभल गए वरना फिसले तो गए तो काम से... आशा भी अपने यौवन के भार को संभाल नहीं पाई थी... पहली बार जब उसके कदम डगमगाए तो वह राजू को अपना जिस्म सौंप बैठी थी ... बाद में वह सलीम के झांसे में आ गयी... सलीम दलाल था... गर्म गोश्त का नम्बर एक व्यापारी ... उसने आशा को अपने जाल में ऐसे उलझाया की वह कुछ समझ ही नहीं पाई... सलीम ने उसको ट्रेन से दिल्ली से पहले ही उतार लिया था... अब वे दोनों एक दूसरे में समाने का प्रयास कर रहे थे... सलीम जोर-जोर से प्रहार कर रहा था... आशा चीख -चिल्ला रहा थी... सलीम बेरहमी से चोट पर चोट कर रहा था... हैरत की बात तो ये थी की इसके बावजूद भी वह राजू को छोड़ नहीं रही थी बल्कि उसको और भी आमंत्रित कर रही थी...सलीम अपनी ताकत का पूरा इस्तेमाल कर रहा था... इस मामले में तो वह खिलाड़ियों का खिलाडी था... अब तक वह आशा जैसी सैकडों लड़कियों के साथ बिस्तर पर रासलीला कर चुका था... उसका तरीका यह था की पहले तो वह किसी लड़की को तलाश करता था... परेशान , गरीब या विशेष परिस्थितियों में फंसी हुयी लड़कियां आसानी से उसके चंगुल में फंस जाया करती थीं... वह पहले तो प्रेम जाल का इस्तेमाल करता था, धीरे-धीरे उसे नशे की आदत लगाता था , बाद में अश्लील फिल्में दिखाकर , कामोत्तेजना बढ़ाने वाली दवा खिलाकर वह उसके बदन में काम वासना की आग लगाने का काम करता था... इसके बाद वह उस लड़की को पैसे के लालच में फंसाकर बड़े आराम से किसी कोठे पर बेच दिया करता था... उसका यही पेशा था... उसने कुछ ऐसे फिक्स ग्राहक भी बना लिए थे जो एक या दो रात के लिए उससे खुबसूरत लड़की की मांग किया करते थे... वह भी उनकी पसंद की कसौटी पर खरा उतरता था...आशा के साथ भी उसने यही खेल खेला... पहले तो उसने आशा के गदराये हुए बदन का जी भरके लुत्फ़ उठाया, जब दिल भर गया तो उसको ऐसी फ़िल्म दिखाई जिसमें एक लड़की कई मर्दों के साथ हमबिस्तर होती है, इसके बावजूद भी वहखुश रहती है... एक महिला तो एक ही रात में अलग-अलग पाँच मर्दों के साथ मज़ा लेती है, इसके अलावा वह उन मर्दों का एहसान भी मानती है और उन्हें फीस के तौर पर मोटी रकम भी देती है... इस फ़िल्म ने आशा को बिल्कुल बेहया बना दिया था... वह ख़ुद ही सलीम से ऐसा करने की जिद करने लगी... सलीम का तो मकसद भी यही था... वक्ह तो आशा की भावनाओं को भड़काकर अपना उल्लू सीधा करना चाहता था... आशा ख़ुद ही उसकी हसरत पूरी किए दे रही थी ... वहबहाने से बाहर गया और अपने कुछ ग्राहकों को उसी लोज में आने की दावत दे आया ... सभीको उसने अलग-अलग टाइम दिया था...

Saturday, August 23, 2008

भाग -८६

अब तुम बिन कैसे जिया जाएगा ? भगवान् ने तुम्हें मेरे पास इसीलिए भेजा है ताकि हम दोनों एक साथ मिलकर रह सकें... जब तक ऊपर वाले की मर्ज़ी नहीं होती , तब तक इंसान कुछ नहीं कर सकता...
सलीम- बहुत सही... तुमने बिल्कुल ठीक पहचाना है... यहाँ हर काम मालिक की रजामंदी से ही होता है... पत्ता- पत्ता उसका मोहताज है... हमारी हर साँस उसीकी देन है... सबका मालिक एक है... वो तो हमने यहाँ आकर अलग-अलग धर्म या जातियाँ बना डाली हैं...
आशा- इस दुनिया के हिसाब से भले ही तुम्हारा मज़हब दूसरा है, मगर मैं इस बात को नहीं मानती... मुझे तो तुम अपने जैसे ही लगते हो...
सलीम- मुझे भी तुम अपनी बिछुडी हुई प्रेमिका नज़र आती हो... मानो, तुम पहले किसी जन्म में मुझसे जुदा हो गयी हों...
आशा- मेरा जिस्म झुलस रहा है... तन-मन तरस रहा है....
सलीम- फिक्र ना करो, मैं तुम्हारी समस्या अच्छी तरह से जान गया हूँ... इसका समाधान इसी प्रकार होगा, जैसे वो काला हवसी फ़िल्म में कर रहा है...
आशा- ना बाबा... ऐसा ना करो, ये गज़ब कभी मत करना ... मेरे प्राण निकल जायेंगे... मर जाउंगी मैं...
सलीम- ऐसा तुम्हें सिर्फ़ लगता है... होगा कुछ नहीं... मस्ती तो तभी आएगी, जब कुछ अलग होगा...
आशा की आँखें हैरत से सिकुड़ती चली गयीं... वह अश्लील फ़िल्म देखने में मस्त थी...एक काला हवसी नाबालिग़ लड़की की यौवन पंखुडियों को बुरी तरह से मसल रहा था... उसका हावी होने का अंदाज़ बेहद भयानक था... एक बार तो आशा का दिल भी चाहा की वह भी उसके जैसा खेल खेल ले , मगर कुछ सोचकर वह चुप हो गयी... सलीम उसके जिस्म को चूम रहा था... जब उसका हाथ आशा की जाँघों पर फिसलता तो वह आह भरके रह जाया करती थी... सलीम की उँगलियाँ धीरे-धीरे उसके यौवन द्वार पर हरकत करने लगीं तो आशा बहुत आह भरने लगी... सलीम ने पूछा-
-अब तो आनंद आने लगा होगा ना ?
आशा-नहीं... बिल्कुल नहीं... अब तो पहले से भी ज्यादा बेचैनी होने लगी है...यूँ लगता है जैसे की मेरे शरीर में किसी ने बम फिट कर दिया है... अब यह बम फटने के कगार पर है...
सलीम - प्यार का यह खेल ऐसा होता है की इसमें पहले बदन को तकलीफ देनी ही पड़ती है... बाद में जो सुख मिलता है वह हमेशा याद रखने लायक होता है...
सलीम को अब महसूस लगा था की आशा कामूत्तेजना के शिखर पर बैठ चुकी है... मंजिल पर पहुचाये बिना उसे चैन आने वाला नहीं था...उसने शरबत का एक गिलास आशा को पीने के लिए दे दिया... यह वही शरबत था जो सलीम ने उसको ट्रेन में पिला दिया था... उस शरबत में कामोत्तेजना बढ़ाने वाला तथा नशीला पदार्थ मिला हुआ था.


Friday, August 22, 2008

भाग -८५

आशा- तुम ठीक कहते हो... अब मैं भी वर्तमान में जीने की कोशिश करुँगी...

सलीम समझ गया की उसका तीर बिल्कुल सही निशाने पर लगा है... वह काफी दिनों से एक ऐसे हीरे की तलाश में भटक रहा था जो उसे मोटी रकम दिलवा सके... सलीम जीबी रोड का टॉप का दलाल था... वह नई-नई हसीनो को पटाकर लाया करता था, बाद में उनको किसी कोठे पर बेच दिया करता था... सलीम गोरे रंग का आकर्षक युवक था... वह जब मीठी -मीठी बात करता तो शिकार उसके जाल में आने से बच नहीं सकता था... आशा भी उसके चंगुल में फंस गयी... सलीम ने उसको शरबत में नशीली दवा मिलाकर पिला दी थी ...उस दवा को पीते ही आशा के जिस्म से काम वासना का तूफ़ान उठने लगा था... उसको सलीम की हर बात सच्ची लग रही थी... जब सलीम उसकी यौवन निशानियों को जोर-जोर से मसल रहा था, ठीक उसी वक़्त गाड़ी ने जोरदार ब्रेक मारे ... आशा पूछने लगी-
-यह अचानक क्या हो गया ?अभी तो मज़ा आने वाले था की यह कमबख्त गाड़ी ही रुक गयी...
सलीम - मेरे रहते हुए चिंता करने की कोई बात नहीं है... ये देखो , स्टेशन आ गया है... यहाँ पर मेरे कई दोस्त रहते हैं... अगर तुम्हें कोई एतराज नहीं हो तो हम दोनों रात को यहीं पर रुक जाते हैं...खूब मज़ा आएगा...
आशा- इसमें एतराज करने की क्या बात है ? चलो, मैं तैयार हूँ...
सलीम ने अपने बैग से अपनी एक जोड़ी चप्पल निकाल कर आशा को देदीं... वह नंगे पाँव ही घर से भाग
आई थी... जैसे ही गाड़ी घर पर रुकी, वे दोनों उससे नीचे उतर गए... सलीम की खुशी का ठिकाना नहीं रहा... वह आशा को सीधे एक लोज में ले गया... दोनों ने स्नान करने के बाद थोड़ा सा खाना खाया और फ़िर बिस्तर पर आ गए ... सलीम ने एक ऐसी फ़िल्म की सीडी चालू करदी , जिसे देखते ही आशा के शरीर से अंगारे बरसने लगे...वह बोली-
- क्या ये लोग सचमुच में वही करते हैं, जैसा की फ़िल्म में दिखाया जा रहा है...?
सलीम - हाँ , बिल्कुल... ये द्रश्य सचमुच फिल्माए गए हैं....
आशा- कितना सुख मिल रहा होगा इन सबको ?
सलीम-यह कल्पना से बाहर की बात है...
आशा- हम दोनों भी इसी तरह एक दूजे में समा जाते हैं... यहाँ से अब दिल्ली कितनी दूर रह गयी है ?
सलीम- ज्यादा दूर नहीं... बस यूँ समझो, जैसे की हम दिल्ली में ही बैठे हुए हैं...
आशा- ये जिन्दगी सपनों जैसी होती है न ?
सलीम - सच कहा तुमने ... सपने में इंसान उड़कर न जाने कहाँ से कहाँ पहुच जाता है... तुम अपनी देखो, तुम भी तो इसी तरह मिल गयीं... मिलते ही मेरे जीवन का एक ख़ास हिस्सा बन गयी...
आशा- और तुम ? तुम तो मेरे जीने का मकसद बन चुके हो...

Tuesday, August 19, 2008

भाग-८२

प्यार तो वो हसीं एहसास है , जिसका उदय तन की नहीं मन की गहराई से होता है। सनम कोई कपडों की तरह बदलने की चीज नहीं होते... मुझे राजू से बेंतिहाँ moहब्बत थी... शायद उसकी जगह अब कोई नहीं ले पायेगा...
सलीम-तुम्हारा दर्द मैं अच्छी तरह से समझ सकता हूँ... मेरा ख़याल है की वक़्त सबसे बड़ा मरहम होता है... यह गहरे से गहरे ज़ख्मों को भरने की कुव्वत रखता है... सब कुछ ठीक हो जाएगा... लो शरबत पीलो ...
उनीदी सी आशा ने गिलास अपने हाथ में थाम लिया... पहले घूँट ने ही उसकी आंखों की रौशनी बढ़ा दी थी... अगले ही पल वह पूरा शरबत गतागत पी गयी... उसे बड़ा आनंद आया ... सलीम से कहने लगी-
- बहुत अच्छा शरबत है... मज़ा आ गया... कौन सा है ?
सलीम- तुम आम खाओ , पेड़ गिनने से तुम्हें क्या हासिल होगा ?अगर ज्यादा स्वाद लग रहा है तो और पी लो...
आशा- एक गिलास और दे दीजिये... अरे , रहने दो... फ़िर आप क्या पियेंगे ? आपको भी तो जरुरत पड़ेगी...
सलीम- मुझसे ज्यादा तुमको इसकी जरुरत है... यह शरबत तुम्हें तन-मन को सुखी बना देगा...
आशा- वाकई ... दम है...
सलीम -अभी से कैसे जान पाओगी...दम तो तब पता चलेगा, जब समर्पित होकर मेरी बांहों में आओगी...
उसकी बात पर नाराजगी प्रकट करने के बजाय खिलखिलाकर हंस पड़ी थी आशा... सलीम ने भी राहत की साँस ली...साथ ही दूसरा गिलास भी पेश कर दिया ... सलीम ने चारोंतरफ़ निगाह उठाकर देखा ... डिब्बे में कुछ ही लोग थे, वे भी गहरी निद्रा में सो रहे थे... सलीम ने एक सिगरेट सुल्गाली और उसका धुंआ आशा के मुह पर छोड़ने लगा...आशा ने एक जोरदार अंगडाई ली... मुस्कराते हुए बोली-
-तुम लोग ये सिगरेट क्यों पीते हो ? इसमें कैसा स्वाद मिलता है ?
सलीम- तुम ख़ुद ही देख लो ना... मेरे बताने से तुम कैसे जान पाओगी ?
आशा ने बेहिचक सलीम के हाथ से सिगरेट ले ली... उसने जब जोर का सुट्टा मारा तो उसे खांसी आ गयी... सलीम उसको धीरे- धीरे दम मारने की नसीहत दे रहा था... वह मन ही मन बड़ा प्रसन्न था...उसकी मन की तमन्ना पूरी होने जा रही थी... सलीम ने आशा को जो शरबत पिलाया था, उसमें मादकता और उत्तेजना बढ़ाने वाली दवा मिली हुई थी... उसे पीते ही आशा के स्वभाव में जबरदस्त परिवर्तन होने लगा था... विचार बिल्कुल बदल गए थे... आदतें बदलने लगीं थीं...जो आशा सिगरेट को कभो छूती भी नहीं थी, वही अब सुट्टे पर सुट्टा लगा रही थी... उसके मन में कामवासना की ज्वाला भड़क उठी थी... सलीम अपनी तरफ़ से ऐसी हर कोशिश कर रहा था, उसके पास एक ऐसी किताब भी मौजूद थी जिसमें महिला-पुरुषों की आपत्तिजनक तस्बीरें छपी हुई थीं... जब आशा ने वे तस्बीरें देखीं तो उसका सीना धडकना शुरू हो गया..ऐसे अंतरग चित्र उसने पहले कभी नहीं देखे थे...वह बोली-
-आह... ये तस्बीरें आपको कैसी मिल गयीं ?
सलीम- अच्छी लग रही हैं ?
आशा- सिर्फ़ अच्छी ? मज़ा आ गया... बस एक ही परेशानी है ?
सलीम- बोलो ना, मेरे रहते तुम्हे कोई तकलीफ हो ही नहीं सकती ...

Sunday, August 17, 2008

फोटो १


फोटो aman


भाग -८०

बस एक बार सहारा चाहिए... जीवन भर आपके पाँव धो-धोकर पीउंगी...आपका नाम क्या है ?
युवक- मेरा नाम सलीम है...
आशा- बहुत बढ़िया...
सलीम-लगता है तुम जल्दबाजी में आयी हो... शायद रुपये- पैसे भी नहीं लेकर आयी...
आशा- जी... जान बचानी भरी पड़ रही थी... बस यही एक राह थी... जैसे भी बन पड़ा , भाग आयी...
सलीम- मैं समझ गया ... फ़िर तो टिकेट भी नहीं ले पाई होंगी... कोई बात नहीं... मैं अगले स्टेशन से तुम्हारी टिकेट खरीद लूँगा... वहां पर ये गाडी काफी देर तक रूकती है... काम हो जाएगा... आज इसमें भीड़ नहीं है वरना कभी-कभी तो पैर रखने की जगह भी नहीं मिल पाती ... देखो न, कई सीटें खाली पड़ी हैं...
आशा- हाँ, वो तो है... अगर आप अगले स्टेशन पर टिकेट ले लेंगे तो अच्छा रहेगा...
सलीम-तुम चिंता मत करो... मैं हूँ न..
सलीम ने अपना वायदा निभाया था... रात का समय हो चला था ... उस डिब्बे से ज्यादातर सवारियां उतर चुकी थीं... जो मौजूद थीं वे सो गयीं ... आशा नीचे वाली सीट पर लेट गयी, गाड़ी के हिलने -डुलने के कारण उसके सीने से दुपट्टा सरक गया.... उसके उरोज चान की तरह चमकने लगे... सलीम के दिल में हलचल सी होने लगी, उसने दूसरी लाईट भी जलादी...अब वह आशा की ज़वानी की उभरी हुई निशानियों को बेहतर ढंग से देख सकता था... उसने एक गहरी आह भरी... अपने होठों पर जीभ फिराते हुए उसने आशा के ख्याल को अपने दिल से निकालना चाहा, सोने की कोशिश की मगर सफल नहीं हो पाया... उसकी आंखों के सामनेआशा का गदराया हुआ यौवन दिखाई दे रहा था... उसने चरों तरफ़ निगाह दौडाई,जो लोग थे, वे सोये हुए थे... सलीम ऊपर से उतरकर नीचे आ गया... आशा नींद में डूबकर अपने राजू के सपनो में खोई हुई थी... सलीम आहिस्ता से उसके करीब आकर बैठ गया, धीरे-धीरे हाथ बढाकर वह उसके सीने की गोलाइयों की तरफ़ हाथ बढ़ाने लगा... थोडी देर में उसका हाथ सही जगह पर पहुँच चुका था... स्पर्श करते ही वह आनंद के सागर में डूब गया...सलीम अपने हाथों का दवाब बढाता जा रहा था... एक गहरी आह भरके उसने दूसरे उभार पर भी दवाब बना दिया... अब उसका चेहरा आशा के बिल्क्मुल करीब था... वह उसकी गर्म साँसों को अच्छी तरह से महसूस कर सकता था... जब आशा करवट बदलने के लिए दूसरी औरपलटने लगी तो उसे लगा जैसे उसके शरीर से कुछ सता हुआ है तो उसने आँखें खोल दीं... सलीम ने अपने हाथ तुंरत पीछे हटा लिए... अपने पास सलीम को देखकर पहले तो आशा डर ही गयी... बाद में जब यह जान गयी की कोई और नहीं वह सलीम है, तो उसकी जान में जान आयी... हदबदाकर बोली-
- आप यहाँ क्या कर रहे हैं ?
सलीम- मेरा वहां मन नहीं लग रहा था... बहुत कोशिश की लेकिन नींद नहीं आयी... तुम भी यहाँ अकेली सो रहीं थीं तो मैंने सोचा की तुम्हारे पास आकर ही बैठ जाऊं ... बुरा न मानो तो एक बात कहूँ ?
आशा- कहिये...
सलीम - तुम बहुत सुंदर हो... तुम्हें देखकर पहली नज़र में मुझे तुमसे प्यार हो गया था...

Thursday, August 14, 2008

वीरेंद्र कुमार गुप्ता


मैं सभी भाषाओं की फिल्में करना चाहता हूँ - वीरेंद्र गुप्ता

मुंबई, कई भाषाओं की फिल्मों में अपने कुशल निर्देशन का ज़लवा बिखेरने वाले फ़िल्म निर्देशक वीरेंद्र कुमार गुप्ता ने कहा है की वे सभी भाषाओं से प्रेम करते हैं और सभी भाषा की फिल्मों को निर्देशित करना चाहते हैं... नए निर्माताओं की फ़िल्म करने से भी उन्हेंं कोई परहेज नहीं है... वीरेंद्र गुप्ता फ़िल्म इंडस्ट्री में एक ऐशे शख्श के रूप में मशहूर हैं , जो सबकी मदद करने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं...इसी कारन उनकी लोकप्रियता तेज़ी से बढती जा रही है... एक मुलाकात के दौरान गुप्ता ने बताया की उनकी भोजपुरी एल्बम - हंसा अकेला जाए , मोगन क टोली तथा सैंया ले गईलेgअवन्वा रिलीज हो चुकी हैं... आने वाली भोजपुरी फ़िल्म का नाम है-उडे चुनरिया सावन में । उनकी आने वाली मराठी म्युसिक एल्बम है-भानो बाई ची नज़र काढा, माझी बायको नखरेवाली ,माझा मित्र गणेशा । गुजरती एल्बम का नाम है-जय चुडैल माँ। इस एल्बम में मणिलाल बरोद और मूसा भाई ने गाया है। लाल बाग्चा राजा और मैया क नगरिया भी उनकी आना वाली एल्बम हैं । इस प्रतिभाशाली निर्देशक को सही ब्रेक का इंतजार है।





Wednesday, August 13, 2008

भाग-76

वह इंसान के स्वभाव और विचारों के बारे में सोच रही थी... तभी आशा ने उसको टोक दिया-
- किस सोच में फंस गयी ? मुझे लगता है किसी गहरे सोच में पड़ी हुई हों ?
मालती- मैं सोच रही थी की अब हमको काफी देर हो चुकी है... ज्यादा शराब से तुम्हें परेशानी होती रहती है...
- मुझे ही क्या ज्यादा शराब से तो सबको परेशानी हो सकती... शराब की छोडो, अगर कुछ भी हद से ज्यादा खाया -पीया जाए तो नुक्सान पहुचाता ही है... लेकिन सवाल ये है की ज्यादा पी कौन रहा है... अभी तो दिल भी नहीं भरा और तुम टोका -टोका -टाकीकरने लगीं... ऐसे नहीं चलेगा... आज तो जी भरके पिलानी पड़ेगी...
मालती- ठीक है बाबा... एक छोटा सा पैग और तैयार कर देती हूँ... वैसे भी बहुत छोटे -छोटे पैग ही बना रही हूँ, वरना अब तक तो कब का मामला गड़बड़ हो गया होता...
-तुम सबकी आदतें पता हैं मुझे... तुम लोग करते तो मेरे फायदे के लिए हो लेकिन ये हुई तो चीटिंग ही ना ?
मालती- अब आप कुछ भी कहें,कुछ भी होता हो और आप कुछ भी कहें , मगर हमें अपना काम तो सही तरीके से करना ही पड़ेगा... लीजिये आपका जाम बनकर तैयार है...
आशा शराब के प्रभाव में आ चुकी थी... उसकी आँखें सुर्ख लाल हो गयी... चंदा का चेहरा उसकी आंखों के सामने घूमने लगा ... अब वह बेहद संजीदा नज़र आ रही थी... वह पलंग से उठकर बाथरूम तक गयी ... मुंह पर छीटे मारे तथा किसी से फोन पर कुछ बातचीत की... जब कोई खास बात होती थी तभी आशा ख़ुद बात करती थी वरना तो वह नौकरों से ही नम्बर डायल करवाया करती थी... मालती के करीब बैठकर उसने कहा-
- तुमने बताया नहीं ,किस गहरी सोच में डूबीं हुई हो ? मुझसे झूठ नहीं बोला जा सकता...
मालती- आपकी नाराजगी की वज़ह से मैं नहीं बोल पा रही थी...

Tuesday, August 12, 2008

भाग-७५

उफ़ , ये मर्द लोग भी बड़े बेदर्द होते हैं... मेरी जान निकली जा रही थी और वह उस समय इजाज़त की बात कर रहा था... मैंने कहा-
- कौन सी इजाज़त की बात कर रहे हो तुम ?तुम्हारा इरादा मुझे छेड़ने का तो नहीं है ? मेरी साँस अटक रही है ... दिल जोर-जोर से धड़क रहा है और तुम ऐसे समय में मुझसे ना जाने कौन से

जन्म की दुश्मनी निकाल रहे हो .... अगर यूँ ही सताने के लिए यहाँ बुलाया था तो ठीक है , मैं यहाँ से चली जाती हूँ... तुम यहाँ अकेले बैठकर पत्थरों से इजाज़त लेते रहना...

मालती- तुम्हारी धमकी का कुछ असर हुआ की नहीं ?

- हाँ , बहुत असर हुआ ... राजू तुंरत लाइन पर आ गया... उसने मेरे होठों से अपने दहकते हुए होठ गढादिए ... मैं उसकी बांहों में झूल गयी... वह काफी देर तक मेरे अधरों का रसपान करता रहा... मेरे जिस्म में सनसनी सी दौड़ गयी... मैं खुश थी... अन्दर ही अन्दर मेरे मन में लड्डू फ़ुट रहे थे... यह मेरी जिन्दगी का पहला सुखद अनुभव था... मैं राजू के शरीर में समा जाना चाहती थी... मेरे उतावलेपन को वह भी महसूस कर रहा था... तभी तो उसने मेरे अत्यन्त नाज़ुक अंगों से छेड़छाड़ करनी शुरू करदी... ऐसा लगता था मानो, दुनिया की सारी ताक़त मुझमें ही समा गयी हो... जोश के मारे मैं राजू को भी अधर कर दिया करती थी... राजू ने मदहोशी के आलम में पूछा -

- अब कैसा लग रहा है ?

- मेरे धड़कनें नहीं सुन रहे हो ?

राजू - ये तो और भी न जाने क्या-क्या कह रही हैं ?

- इनको सुनना और समझकर उस पर अमल करना आपका काम है...

राजू- मैं अपने भाग्य पर यकीन नहीं कर पा रहा हूँ... तुम्हारा चाँद जैसा बदन मेरी बांहों में है, यह सपने जैसी बात है... आह, कितनी ख़ूबसूरत हो तुम...

- मेरे लिए तो यह कल्पना से भी बाहर की बात है... अब तुमसे अलग रहकर जी नहीं सकती...

राजू- मैं भी कैसे जी पाऊंगा... मेरा हाल तो तुमसे भी बुरा है...

मालती-वाह...वाह ... कितना बेहतरीन समय था... बड़ा आनंद आया होगा...

- हाँ ... उस आनंद को शब्दों में व्यक्त करना मुश्किल है... एक पैग और तैयार करो... बाहर शोर सा कैसा है ? कोई शराबी ग्राहक आ गया है क्या ? किसी को देखने भेजदो ...

- मालती ने आशा के लिए जल्दी से एक पैग तैयार किया और कुतूहलवश ख़ुद ही देखने चली गयी ... कुछ देर के बाद जब वह वापस आई तो देखा की आशा की आँखें अंगारों की तरह दाहक रही थीं... आशा को बताया-

- चंदा का आशिक आ गया है... लड़के लोग ने उसकी अच्छी खासी खातिरदारी करदी है, यह उसीका हंगामा है...

- ओह , उसे तो आना ही था... फ़ोन करके बतादो की अब यहाँ से आगे उसे मारें पीतें नहीं... कहना की यह हमारा आदेश है... खामखाँ मर -मरा गया तो बेवजह पाप लगेगा ...





Friday, August 8, 2008

बोलीवुड में दर्द की चर्चा जोरों पर


मासूम फ़िल्म कंपनी के बहु चर्चित म्यूजिक एल्बम दर्द के गायकों -उदय नारायण और बिल्लू वारसी ने मीरा रोड के भव्य रिकॉर्डिंग स्टूडियो में अपनी शानदार आवाज़ में गीत रिकॉर्ड कराये। उदय नारायण भोजपुरी के सुपर स्टार गायक हैं... हिन्दी में भी इन्होने कई फिल्मों में अपनी मधुर आवाज़ के ज़लवे बिखेरे हैं। दर्द में उदय ने तीन गीत गाये हैं । कई फिल्मों में अपनी मखमली आवाज़ का जादू चलाने वाले बिल्लू वारसी उभरते हुए गायक हैं । बिल्लू ने दर्द में एक गीत गाया है। दर्द के संगीतकार अमन श्लोक हैं। सुप्रसिद्ध संगीतकार अमन श्लोक ने दर्द में पाँच गीत गाये हैं । बोलीवुड में दर्द की चर्चा जोरों पर हो रही है । इसमें कुल नौ गाने हैं । हर गीत एक से बढ़कर एक है। दिल को छूने वाले ये गीत देश - विदेश के लोगों को खूब पसंद आयेंगे । इस एल्बम के निर्माता और गीतकार मुकेश कुमार मासूम हैं। मुंबई संध्या के कार्यकारी सम्पादक और राष्ट्रीय पत्रकार संघ - (मुंबई )के अध्यक्ष मुकेश मासूम ने इससे पहले मायावती के जीवन पर बन रही फ़िल्म -बहन जी , दी ग्रेट ग्रेट सिस्टर में भी गीत लिखे हैं। श्रोताओं को इस एल्बम का बे सबरी से इंतजार है। दर्द के गीतों के मुखड़े इस प्रकार हैं- १, दर्द देते है वो हंसकर दवा देना नहीं सीखा , जफा दिन रात करते हैं , वफ़ा देना नहीं सीखा । २, जब चाहा दिल को लूट लिया , जब चाहा दिल को जला दिया , सब भाद में जाए प्यार वफ़ा , हमें ख़ाक में इसने मिला दिया । ३, ख़ाक में दिल के टुकड़े बिखर जायेंगे, खुश रहो हम सितमगर चले जायेंगे । ४, कहदो ये आईने से देखे न घूर के,आकाश छू रहे हैं नखरे हुज़ूर के । ५, मस्त-मस्त तेरे जोवन पे मेरा दिल भी लट्टू हो गया, मैं पीके टट्टू हो गया। ६, दिल तोड़कर, मुह मोड़कर हमें छोड़कर जाने वाले, तू भी सुख से न सोयेगा, लहू के अश्क रुलाने वाले। ७, पहली नज़र में हमको अपना सा लगा वो, सच पूछिए तो जाने क्यों , सपना सा लगा वो । ८,जा मेरी तरह तू भी अब प्यार को तडपेगा, ठुकराया जिसे तूने, उस यार को तडपेगा । तथा , जबसे तुम्हें दिलबर - दिलबर अपना बनाया है, ना नीद ही आई , ना चैन आया है। हर उम्र और हर वर्ग के लोगों को इस सुहाने दर्द का इंतजार है

Wednesday, August 6, 2008

भाग-७०

जी तो चाहता है की सारी दुनिया छोड़कर अब तुम्हारे पास इसी गाँव में रह जाऊं ...
- यहाँ रहकर क्या खाओगे ? यहाँ पर तो वही मेहनत मजदूरी है , वह भी ठीक ढंग से नहीं मिलती... अगर नसीब से महीने में दो-पाँच दिन काम मिल भी गया तो पैसे का कोई ठिकाना नहीं रहता ...
राजू-तुम्हारा यह चाँद जैसा चेहरा देख-देखकर तो मैं भूखा भी रह लूँगा... रही बात तुम्हारी , तो इतना भर तो यहाँ कमा ही लूँगा ... क्या तुम्हें अपने दोस्त पर भरोसा नहीं है ? हम तो तुम्हें अपनी जान बना चुके हैं, तुम अपना दोस्त भी नहीं मान सकतीं ?
- अरे ये क्या कहते हो ? हम तो तो तुम्हें अपना सब कुछ बना चुके हैं... अपना तन -मन सब तुम्हारे सुपुर्द कर दिया है ... अब चाहे दर्द देना या दवा देना , वफ़ा देना या दगा देना ... जिस हाल में रखोगे, रह लुंगी... मैंने तो अपनी चाची की बातों पर भी यकीन करना छोड़ दिया है...
राजू- अच्छा, क्या कहती हैं तुम्हारी चाची ?
- यही की परदेसियों से कभी प्रीत नहीं लगानी चाहिए...
राजू- क्यों ?
-क्योंकि पहले तो मीठे बोल बोलकर दिल जीत लेते हैं ... बाद में हमेशा के लिए न जाने कहाँ गायब हो जाते हैं... प्यार का रोग लगाने में माहिर होते हैं तुम जैसे... तुमने ये गीत नहीं सुना-पदेसियों से न अँखियाँ लगाना, परदेसियों को है एक दिन जाना...
राजू- फ़िक्र मत करो, मैं उस तरह का परदेसी नहीं हूँ की सिर्फ़ चैन लूटकर ही चला जाऊं की सिर्फ़ दिल से ही संतोष करलूं... मैं तो अपनी इस परी को भी उडाकर अपने साथ ले जाऊँगा...
- जाओ ... बहुत देखे ले जाने वाले... अगर हिम्मत है तो मेरी माँ से अज मेरा हाथ ,मांगकर देखो ...
राजू- इतनी जल्दी ?
- क्या हुआ ? सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी ? आशिकी का भूत सर से उतर गया होगा ?
राजू- ये क्या कह रही हो तुम ? मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ ... मैं तो खुश हूँ... आज क्या , तुम कहो तो अभी जाकर यह शुभ काम कर लेता हूँ... बस तुम्हारा साथ चाहिए...ऐसा न हो की तुम्हारी ही जुबान लड़खडाने लगे...
यह जंग मैं अकेला नहीं जीत सकता... जब तुमसे तुम्हारी राय पूछी जाए तो हाँ जरुर करना...
- ठीक है ... मेरा काम मुझे ध्यान है ... तुम अपनी बात पर ध्यान देना ...
राजू- अच्छी बात है ... तो, चलें ?
- बहुत शैतानी कर रहे हो ... मुझे इस तरह राह में तड़पती हुई ही छोड़ जाओगे ? मेरे होठ प्यास से सूख रहे हैं ... बदन टूट रहा है ....
राजू- इस मिलन के लिए तुम थोड़ा सा एतराज उठा रहीं यहीं ना, अब सोचता हूँ की तुम्हें सामाजिक और कानूनी रूप से अपनी बनाने के बाद ही हम प्रेम क्रीडा करेंगे... कहीं ऐसा न हो की तम
अपने मन में कुछ भ्रान्ति पाल लो , तुम सोचो की मैंने तुम्हारा जिस्म हासिल करने के लिए ही यह सब किया... मेरे दिल की इच्छा ये है की तुम मुझे मेरे सच्चे प्यार की खातिर याद करो ...
-वो तो बहुत पहले की बात है... अब तो मैं भी तुम्हारी बात से ही सहमत हूँ...
मालती-ओह्ह , बड़ा शातिर था तुम्हारा राजू ... अब समझ में बात आयी ... वह तुम्हारे साथ शारीरिक सम्बन्ध भी बनाना चाहता था और तुम पर एहसान भी करना चाहता था... बड़ी होशियार होती है ये मर्द जात ...
- अब मेरी भी सुनोगी या फ़िर अपनी ही कहती रहोगी ?
मालती- मैं तो ख़ुद बैचैन हूँ , यह जानने के लिए की फ़िर क्या हुआ होगा ?
- शर्म न जाने उस दिन कहाँ चली गयी थी ...




दर्द


cमीरा रोड स्थित गीता नगर के वी एस रिकॉर्डिंग स्टूडियो में बहुचर्चित म्यूजिक एल्बम दर्द की रिकॉर्डिंग के अवसर पर संगीतकार अमन श्लोक और रिकॉर्डिस्ट राजेश यादव दिखाई दे रहे हैं। इस एल्बम के निर्माता और गीतकार मुकेश कुमार मासूम हैं । यह एल्बम मासूम फ़िल्म कंपनी के बैनर तले बनाया जा रहा है। बतादें की अब मीरा रोड में भी एक भव्य रिकार्डिंग स्टूडियो खुल गया है। स्टूडियो के मालिक वी एस बच्चन हैं।

भाग -६९

हांलाकि , सुरभि की मौत का बड़ा अफ़सोस हुआ था मुझे... राजू का मन भर आया था... उसका जोश भी ठंडा पड़ चुका था ... मैंने राजू के संवेदनशील अंग को टटोल कर देखा... उत्तेजना नाम की कोई चीज मौजूद नहीं थी... यह मेरा पहला प्यार था... इससे पहले किसी भी पुरूष ने मेरे शरीर को नहीं छुआ था... मेरी दो सहेलियां आपस में प्यार करती थीं... वे अकेले में मौका पाकर एक दूसरी के साथ खिलवाड़ किया करती थीं... वे अक्सर मुझसे कहा करती थीं की एक दूसरी को चूमने और अन्य अंगों से छेड़छाड़ करने में बहुत आनंद मिलता है... उन्होंने मेरे जिस्म से भी छेड़छाड़ करने का प्रयास किया, लेकिन मैंने उनको धमका दिया था... उनको ऐसा करते देख मुझे घिन सी आती थी... इसी कारन मैंने उससे पहले किसी लड़की से भी अपने किस्म को छूने नहीं दिया था... मैंने जब राजू की तरफ़ हसरत भरी निगाहों से देखा तो वह फ़ौरन समझ गया... बोला-
-इच्छा तो मेरी भी हो रही है मगर...
मैंने उसके सीने से अपनी गोलाएयों को रगड़ते हुए कहा-
- अगर-मगर मैं क्या जानूं , क्या मैंने कहा था की मुझे बांहों में लेकर चूमना शुरू करदो... प्यार का महत्व क्या बार-बार मैं ही बता रही थी... तुम शहर में रहने वाले भी बड़ी कमाल की बात करते हो... पहले तो दि९ल में इश्क की आग लगा देते है और फ़िर बाद में तडपाना चालू कर देते है...
राजू-उस तरफ़ चारपाई खादी करदो... कोई दीवार फांदकर अन्दर आ गया तो?
- अब यहाँ कोई नहीं आएगा... किसी को डकैती डालनी है जो इतनी ऊंची दीवार फांदने का दुस्साहस करेगा...
मेरी बातों ने राजू के ऊपर गजब का असर छोड़ा था... उसने चीते जैसी फिरती दिखाकर मुझे अपने कब्जे में कर लिया... मैंने अपनी आँखें बंद करलीं ... अब वह मेरे समूचे जिस्म को सहला रहा था, चूम रहा था... मेरे रौंगटे खड़े हो गए ... मैंने अपने आपको पूरी तरह से राजू के सुपुर्द कर दिया था ... वह बार-बार मेरी तारीफ कर रहा था... मेरे रूप और संवेदनशील अंगों की तारीफ करते- करते वह मेरे होठों का रसपान करने लगा था...मुझ पर नशा सा छाने लगा... जिस्म से अंगारे से दहकने लगे ... मैंने कहा-
- ये मुझे क्या हो रहा है राजू, मैं इस दुनिया से दूर किसी अनोखी दुनिया में पहुच गयी हूँ... मेरी प्यास और भी बढती जा रही है... तुमने मुझे बेचैनियों को भंवर में धकेल दिया है...
राजू- यही तो असली आनंद है मेरी जान... इसको महसूस करो... इसी से तुम्हें अथाह सुख मिलने वाला है...
मैंने उसकी बात मानली ... वह मेरी जंगों को सहलाने लगा तो मेरे मुह से आहें निकलने लगीं... मैंने अपनी पूरी ताकत समेटकर उसे बांहों के घेरे में कैद कर लिया... वह थोड़ा सा कसमसाया, मेरे उभार उसके सीने में गढ़कर कामोत्तेजना की चिंगारी छोड़ रहे थे... जब उसने अपने होठ वहां पर रखे तो मैं जबरदस्त विचलित हो गयी...राजू मुस्करा रहा था... मैंने उसको बताया-
- यह मेरा पहला अनुभव है, इससे पहले मैंने कभी किसी को हाथ भी नहीं रखने दिया...
राजू- जानता हूँ ... तभी तो तुम इतनी परेशान नज़र आ रही हूँ...धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा... अब मैं इस गान में कुछ दिन और rahunga ...

Tuesday, August 5, 2008

भाग-६८

शराब पीकर आशा की आवाज़ लड़खडाने लगी थी... मालती उसे पीने के लिए मना करती तो वह उस पर भड़क जाती थी... वह अपने पहले आशिक राजू की दास्ताँ सुना रही थी... उसके कोठे की चंदा ने उसके दिल में हलचल मचा दी थी... सख्त मिजाज़ वाली आशा नेमालती के समक्ष अपना दिल खोलकर रख दिया था... मालती पूछ रही थी-
-फ़िर सुरभि ने व्योम को अपना जिस्म सौंपा की नहीं ? वैसे ऑफर कम नहीं था... उसकी जगह पर अगर कोई और लड़की होती तो देखते ही देखते अमीर बन गयी होती... बस एक बार व्योम को ही तो खुश ही तो करना था... वह कौन सा उसे खा लेता... जो कुछ बिगड़ता ,उस व्योम का ही बिगड़ता... आदमी बड़े- बड़े दावे करता है... सोचता है की बिस्तर पर उसके होश फाख्ता कर देगा, मगर वह आख़िर क्या बिगाड़ लेगा... दो मिनट में उसकी घूप में हाँफते हुए कुत्ते सी हालत हो जाती है...
आशा- हाँ, ये राज तुम और हम से ज्यादा कौन जान सकता है ?
मालती- सुरभि के बारे में कहो न, क्या हुआ ?
आशा- सुरभि ने व्योम से साफ कह दिया की वह अपनी जान से खेल सकती है लेकिन किसी गैर मर्द के साथ जिस्मानी सम्बन्ध नहीं बना सकती ... व्योम पहले से ही सुरभि की अदाओं का दीवाना था, शराब और ब्लू फ़िल्म ने उसको और भी पागल बना दिया... जब उसे लगा की सुरभि किसी भी हालत में उसकी बात मानने वाली है तो उसने सुरभि वाले कमरे में पेट्रोल छिड़ककर जलती हुई माचिस की तिल्ली फेंक दी... कुछ ही पलों में सुरभि धू-धूकर जलने लगी... व्योम ने वहां के सबूतों को मिटा दिया... पुलिस स्टेशन और फायर ब्रिगेड को सूचित करने के बाद वह फ़ुट-फूटकर रोने लगा ... उसने अपनी पत्नी को भी फ़ोन कर दिया था... फायर ब्रिगेड कर्मचारियों ने आग पर तो काबू पा लिया था, मगर सुरभि को नहीं बचाया जा सका था... व्योम ने खूब रिश्वत दी, पानी की तरह नोट बहाए लेकिन एक ईमानदार पुलिस अधिकारी को सुरभि का लिखा हुआ वह लैटर लग गया ,जो उसने मने से पहले लिखा था... सुरभि ने उसमें अपने साथ हुई हर बात को विस्तृत में लिखा था... उसके आधार पर व्योम को गिरफ्तार कर लिया गया... उसकी दौलत का घमंड उसके किसी काम नहीं आया... कानूनके लंबे हाथों ने उसको अपनी गिरफ्त में ले ही लिया ... उसने कोशिश तो बहुत की थी... यहाँ तक की राजू के सामने भी कई करोड़ रूपये की पेशकश की गयी मगर उसने सभी प्रस्तावों को ठुकरा दिया... राजू की दर्द भरी कहानी सुनकर मेरी भी आँख भर आई ... वह हालत का टूटा हुआ था... उसको प्रेम की जरुरत थी... मैंने सच्चे दिल से उसको अपना मीत मान लिया... अब मैं मन ही मन उसका आदर भी करने लगी थी... मैं उसकी बाहों में कैद थी, वह मेरे आग्रह पर मुझे यह सब सुना रहा था... हम लोग मंजिल के बिल्कुल करीब आकर वापस लौट रहे थे... इससे थोड़ा सा बुरा लग रहा था...

Monday, August 4, 2008

भाग ६७

व्योम-अब मैं वर्तमान में जीने लगा हूँ... तुम मुझे एक नया जीवन दे सकती हो ... मैं जिंदगी से बहुत दूर होता जा रहा हूँ... इस दुनिया में सिर्फ़ तुम्हीं ऐसी हो जो मुझे इस दल दल से निकाल सकती हो...
सुरभि- मतलब, यह आप समझ चुके हैं की जो कुछ किया जा रहा है वह ग़लत है... ? दुनिया में ऐसे -ऐसे लोग भी मौजूद हैं जो बड़ी से बड़ी जंग जीत लेते हैं... काश, आप अपने मन को जीत पाते... अगर ऐसा होता तो मेरा जीवन भी कलंकित होने से बच जाता और आप की आत्मा भी पवित्र बची रहती ...

मैंने आपका नमक खाया है, मेरी हार्दिक इच्छा है की आप भी इस घोर पाप को करने से बच जाएँ ... इससे पहले तो आपके मन में इस तरह के कुविचार कभी नहीं आए थे ... अपने दिल में बैठे शैतान को ख़त्म कर दीजिये... सोच लीजिये की मैं आपकी ही बेटी हूँ... अपनी बेटी पर कोई इतना ज़ुल्म नहीं करता.... एक बार अपने मन में यह ख़याल लाकर देखिये की अगर कोई इंसान आपकी बेटी के साथ ऐसा करता, उसकी इज्ज़त लूटने की कोशिश करता और यह ख़बर आपको मिल जाती तो आपको कितना गुस्सा आता... जब गाँव में मेरे भाइयों और पिता को आपकी दुष्टता के बारे में पता चलेगा तो वे भी तुम्हारे खानदान को जीवित नहीं छोडेंगे...

व्योम-मुझ पर तुम्हारी किसी धमकी का कोई असर होने वाला नहीं है...

सुरभि उसे बातों में फंसाकर समय बरबाद करना चाहती थी, ताकि घर कोई सदस्य वहां पर आ जाए... व्योम ने बोतल खोलकर शराब पीनी शुरू कर दी थी... वह बड़ा चालाक था... अपनी साजिश को अंजाम तक पहुचाने के लिए उसने परिवार के सदस्यों को पहले ही घर से बहार भेज दिया था ... उसने आहिस्ता-आहिस्ता गुप्त दरवाजे को तोड़ने में सफलता प्राप्त कर ली थी... सुरभि उससे भो ज्यादा होशियार निकली... वह दूसरे कमरे तक पहुच चुकी थी... व्योम के लिए हैरत की बात यह थी की सुरभि ने दरवाजे पर लगे ताले को आखिरकार कैसे तोड़ दिया ?उसके मन का जोश शांत हो चुका था ... सुरभि के गदराये हुए जिस्म को पाने की इच्छा का कत्ल होता दिख रहा था ... काम वासना की आग में तपते हुए वह शिष्टाचार और सम्मान को भूल चुका था... अब उसको न तो समाज का डर था और न ही क़ानून का ... उसने एक बार फ़िर कहा-

व्योम- तुम मेरे सामने विद्वान बन्ने का ढोंग रच रही हो, मगर इतनी सी बात समझने की कोशिश नहीं करती की अपने खुबसूरत जिस्म का तुम क्या करोगी ? इसका अचार तो नहीं डाला जा सकता... तुमने ये शेर तो सुना ही होगा- ऐ गुस्ताख , हसीं बदन पर इतना गुमान न कर ,हर शख्श का आख़िर चूर-चूर गुमा होता है... जानकर भी सब कुछ अनजान बन्ने वाले, यही बदन बाद-ऐ- दफ़न कीडों का मका होता है... जब मरने के बाद इस शरीर को कीडे ही खाने वाले हैं तो मैं तो आख़िर इंसान हूँ ... इसे मुझे सौपने में क्या दिक्कत है....

सुरभि- आप मरने के बाद भी मेरे शरीर को अपवित्र नहीं कर सकते ...

व्योम-तुम मेरी नफरत को सहजता के साथ स्वीकार करने के लिए तैयार हो लेकिन मोहब्बत को ठुकरा रही हो... प्यार का दम भी भरती हो और मेरे प्यार को इस तरह से ठुकरा रही हो...

सुरभि- आप प्यार की नहीं वासना की बात कर रहे हैं

Sunday, August 3, 2008

भाग ६५

टीवी पर चल रही अश्लील फ़िल्म ने व्योम के दिलो-दिमाग को झकझोर कर रख दिया था...

वह अब पहले से ज्यादा कामुक हो चुका था... सुरभि उन सब बातों को एक कागज पर उतारती चली जा रही थी... उसने व्योम को सही रस्ते पर लाने के उद्देश्य से कहा-

-यह मेरा हाड -मांस का शरीर पता नहीं आपको कैसे भा गया है ? इसमें अब क्या रखा है ? तुम्हें तो यह बात भी पता नहीं होगी की मेरी कोख में राजू का बच्चा पल रहा है...

व्योम- मुझे उस सब से कुछ लेना -देना नहीं है... मैं तो सिर्फ़ इतना जानता हूँ की तुम जैसी भी हो, मुझे पसंद हो... मैं तुम्हारी हर अदा पर फ़िदा हूँ... अगर राजू तुम्हारे शरीर के साथ खिलवाड़ कर रहा है तो इसमें तुम्हारी कोई कमी नहीं है... अभी तुम भोली और नादाँ हो... तुमने दुनियादारी नहीं देखी .... वह तुम्हारे सीधेपन का ग़लत फायदा उठा रहा है... जब समझोगी तो देर हो चुकी होगी... तुम्हें समझना चाहिए... वह दुबला-पतला , मरियल सा गरीब आदमी तुम्हारे सामने ऐसा लगता है जैसे हूर के साथ लंगूर...

सुरभि- इस दुनिया में एक से एक हूर मौजूद है, जो कम पैसे में तुम्हें शारीरिक सुख दे सकती हैं ...

व्योम- क्या करूँ, तुम्हारे अलावा कोई लड़की दिल में chadhti ही नहीं है... और तुम्हारी सूरत नज़रों से उतरती ही नही है... पहले तो तुमने मेरे दिल में दीवानगी के तार छेड़ दिए , अब मुझे इस तरह सता रही हो... अगर आज मैं तुम्हें कत्ल कर देता हूँ और मुझे सज़ा हो जाती है तो इसके लिए मैं अकेला ही जिम्मेदार नहीं रहूँगा... तुम भी बराबर की गुनाहगार रहोगी ... मैं जो करने जा रहा हूँ , अगर यह पाप है तो यह काम मैं तुम्हारी वज़ह से कर रहा हूँ... जब तुम मेरे घर में झाडू लगाने आती थीं तो जानबूझकर मेरे सामने झुक जाती थी... तुम्हारे ब्लाउज से झांकते हुई गोलाईयां देख-देखकर मैं इतना uttejak हो चुका हूँ की अब कुछ समझ नहीं पाटा हूँ... मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी है ...

सुरभि- उन बातों के लिए एपी मुझे कैसे दोष दे सकते हैं... मैं तो नौकरानी ठहरी...मुझे आपके घर की ठीक तरीके से साफ सफाई करनी पड़ती है... उस वक़्त मेरा ध्यान सिर्फ़ काम पर रहता है... मैं कैसे जानूंगा की कौन मेरे शरीर को छिप-छिपकर देख रहा है... यह तो देखने वालों का दोष हुआ ना ... मैं तुम्हारी बेटी की उम्र की हूँ... क्या आप मुझे माफ़ नहीं कर सकते ? इस दुनिया में करोडो लोग है, मुझे छोड़ दीजिये ...

व्योम- तुम्हारी खातिर मैं भिखारी होने के लिए तैयार हूँ... बस एक बार मुझे देह सुख लेने दो...

सुरभि-मैं उस तरह की नही हूँ... अगर होती तो अब तक समर्पण कर चुकी होती...

व्योम-तुम उस तरह की हो क्यों नहीं जाती ?तुम्हें परेशानी कहाँ हो रही है ?पूरा मामला राजी -खुशी में सुलझ जायेगा... रातों -रात तुम करोड़पति बन सकती हो...

सुरभि-आप अच्छे इंसान हैं ... आपकी पत्नी ने मुझे यहाँ बहुत स्नेह दिया है... कोई ऐसा काम मत करो , जिससे उन्हें शर्मिंदा होना पड़े...

व्योम- उसको पता तो तभी चलेगा न जब मैं तुम्हें जिंदा छोदुँगा...

सुरभि- कत्ल का भूत अपने सर से उतार दो ... मैं एक गरीब और मजबूर औरत हूँ... अगर मेरी हाय लग गयी तो आपकी सात पुश्तें भी चैन से नहीं रह पाएंगी..

व्योम- मैं इतनी लम्बी बात नहीं सोचता

बड़हिया के 858 महादलित परिवारों को सिर छुपाने के लिये छत नहीं

बड़हिया के 858 महादलित परिवारों को सिर छुपाने के लिये छत नहीं
Aug 03, 12:30 am
लखीसराय। सरकार द्वारा अनुसूचित जाति को महादलित की उपाधि देकर समतामूलक समाज की परिकल्पना को मूर्तरूप देने के लिये महादलित आयोग का गठन किया गया है लेकिन आजादी के 60 वर्ष बीत जाने के बाद भी अति पिछड़ा बहुल बड़हिया प्रखंड क्षेत्र में ढाई हजार आबादी वाले दलित समुदायों की आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक हालत दयनीय है। यहां के महादलितों का जीवन जानवरों से भी बदतर है। स्थिति यह है कि बड़हिया प्रखंड के सिर्फ शहरी क्षेत्र में मुसहर, डोम जाति के लोग जिंदा रहने के लिये चूहा, घोंघा व अन्य जानवरों को मारकर खाने को विवश है। अनुसूचित जाति, जनजाति, कल्याण विभाग बिहार सरकार के निर्देश पर कराये गये सर्वेक्षण के अनुसार 23 जुलाई को महादलितों के सर्वेक्षण रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि सिर्फ बड़हिया प्रखंड के 858 महादलित परिवारों को सिर छुपाने के लिये छत नसीब नहीं है।
इतना ही नहीं इन परिवारों के करीब दो हजार सदस्य पूरी तरह खानाबदोश की जिंदगी जीने को विवश हैं। इन्हे न तो सरकारी योजना का लाभ मिलता है न ही न्यूनतम मजदूरी दी जाती है। सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार बड़हिया अंचल अंतर्गत मुसहर जाति के 354 परिवार, डोम 39, मेहतर 9, धोबी 387 एवं पासी जाति के 69 महादलित परिवारों का सर्वेक्षण किया गया है। भूमि व भवनहीन इन दलित परिवारों की त्रासदी यह है कि अपने पेट के लिये स्वयं जिंदगी व मौत से लड़ रहे है। सर्वेक्षण के अनुसार इन दलित बस्तियों के 6-14 वर्ष उम्र के पांच सौ बच्चे अब भी स्कूल से वंचित है तथा पुरुष व महिलाओं में साक्षरता दर मात्र दो प्रतिशत है जबकि 98 प्रतिशत दलित पूरी तरह निरक्षर व अनपढ़ है। नपं स्थित वार्ड नं. एक कौआकोल गोलभट्ठा, डोमटोला, मुसहर टोला आदि मुहल्ले में खुले आसमान के नीचे रह रहे इन दलितों की जिंदगी भगवान भरोसे है।

Friday, August 1, 2008

भाग ६४ अ

आपको याद होगा, सती सावित्री ने पतिव्रता व्रत का पालन कर यमराज से भी अपने पति सत्यवान को छुडा लिया था... भले ही मैं ऐसा न कर पाऊं ,मगर आपको निरुत्तर कर मुझे अपार खुशी हो रही है...
व्योम- मुझे चिढाकर तुम ज्यादा देर तक खुश नहीं रह सकती... बहुत जल्द मैं तुम तक पहुच जाऊँगा ... तुम मेरे घर में कैद हो... मेरी मर्जी के बिना तुम यहाँ से नहीं जा सकती... कुछ देर बाद तुम्हारा हसींन बदन मेरी बाहों में होगा... फ़िर देखना की मर्दानगी की ताकत क्या होती है... उसका सुख क्या होता है... उसके आगे तुम सभी बेमतलब की बातों को भूल जाओगी ... तुम्हारे सीने के उभारों को मसलने के लिए मेरे हाथ तरस रहे है... तुम्हे अपनी बाहों में भरने के लिए मेरी बाँहें बेताब हैं... मेरी दीवानगी का तुम जितना इम्तिहान लोगी, में uतना ही उग्र होता जाऊँगा... में तुम्हें बहुत देर से प्यार से समझा रहा हूँ , जरुरत पड़ी तो नफरत पर उतर जाऊँगा...
सुरभि- आप जानते हैं , किसी को इस तरह कैदकरना कितना बड़ा जुर्म होता है... मुझे छोड़ दीजेये , शायद में तुम्हें माफ़ कर सकूँ ... अगर अनजाने में कोई अपराध करता है तो उसको क्षमा भी किया जा सकता है , मगर यही काम जब जानकार करता है तो उसको अदालत भी सख्त से सख्त सज़ा देती है ...
व्योम-में तुम्हें प्यार का पथ पढा रहा हूँ और तुम मुझे क़ानून का डर दिखा रही हो... जिनके पास दौलत होती है, वे क़ानून को अपनी जेब में रखते हैं ... कोर्ट की ईंट-ईंट भी नोट मांगती है, इन्साफ भी उसीको मिलता है जिसके पास वकील को देने के लिए पैसे होते हैं... तुम्हारे पास क्या है ? जो है , उसका तुम फायदा नहीं उठाना चाहती ... तुम्हारे पास जो अनमोल हुस्न का खजाना है, उस पर तुमने टाला लगाकर बंद कर दिया है... इस ताले को खोलिए, में दौलत की बरसात कर दूंगा...में तुमसे जीवन भर के लिए कुछ नहीं चाहता ... बस एक बार इस रस भरी ज़वानी का आनंद चखने दो... में तुम्हें आजाद कर दूंगा... इस घर को तुम्हारे नाम कर दूंगा ... तुम्हारे बैंक में इतने पैसे जमा करा दूंगा की अपने पति और बच्चों के साथ पूरा जीवन खुशी से बिताओगी ...
सुरभि- तुम जिस दौलत पर इतना घमंड करते हो उससे मेरे जैसी एक अदनी सी लड़की का इंतजाम नहीं कर सकते... तुम्हे अहम् को चूर-चूर करने के लिए इतना ही काफी नहीं है ?
व्योम- मैं अन्तिम बार कहता हूँ , मेरी बात मान लो... आगे से समझाऊंगा नहीं...
सुरभि- ज्यादा से ज्यादा तुम क्या कर सकते हो ?
व्योम-मैं तुम्हें ख़त्म कर दूंगा ... तुमको इसी में जलाकर राख कर दूंगा ...
सुरभि- ये कौन सी नई बात हो जायेगी ? जलना तो एक न ऐक दिन सभी को है... मुझे मारने के बाद तुम्हारी हालत मुझसे भी बदतर हो जायेगी ... तुम्हे फांसी की सज़ा भी हो सकती है... जेल में जो यातनाएं मिलेंगी , वो अलग हैं... मेरी तरह तुम्हारा परिवार भी बरबाद हो जायेगा ... तुम्हारे बच्चे कितने अच्छे हैं, लोग उन्हें जीने नहीं देंगे ... तुम्हारे साथ-साथ वे लोग भी तबाह हो जायेंगे...
व्योम- कुछ नहीं होगा... मैं सबको खरीद लूँगा ...
सुरभि- अगर सबको खरीदना इतना ही आसान होता तो इस दुनिया में आम इंसान जी ही नहीं पाटा... सारे अमीर लोग ही दुनिया पर राज़ करते...
व्योम- तुम अगर मेरी नज़रों से देखने का प्रयास करो तो जान जाओगी...
सुरभि- तुम्हारा नजरिया ठीक नहीं है ....
सुरभि की यह आवाज़ टीवी की आवाज़ में ही दबकर रह गयी...अब वे दोनों एक खिड़की की मदद से एक दूसरे से वार्तालाप कर रहे थे... सुरभि उसे मनोवैज्ञानिक तरीके से ठीक करना चाहती थी... व्योम ने टीवी पर एक बेहद अश्लील फ़िल्म चलादी ताकि वह उसकी कम वासनाओं को भड़काकर उसके जिस्म को प्राप्त कर सके








भाग-६४

काम वासना की पूर्ति करने के लिए व्योम किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार था... सुरभि उसके मन में पल रहे खोट को तो समझ गयी थी, लेकिन यह ज्ञान उसको भी नहींथा की वह उसकी इज्ज़त पर हाथ दाल देगा... उसने अपनी समूची ताकत इकट्ठी करके व्योम को जोरदार दुलत्ती मारी... अब वह पलंग से दूर जा गिरा था... व्योम अपने आपको सभाल नहीं पाया था... इसीका फायदा उठाकर सुरभि ने हिरनी की सी कुलांच मारते हुए दूसरे कमरे में छलांग मार दी... जब तक व्योम उसे पकड़ पाटा, तब तक तो सुरभि अन्दर से कमरे का दरवाजा बंद कर चुकी थी... इस समय वह जिस कमरे में कैद थी, वह बिल्कुल अन्दर वाला कमरा था... व्योम ने टेलीफोन का तार भी डाला और टीवी की आवाज़ भी तेज़ करदी ताकि सुरभि की आवाज़ कमरे से बहार नहीं निकल पाये ... सुरभि को अब अन्हूनी की आशंका सता रही थी... उसे जल्द ही एक कागज़ मिल गया... सुरभि उसी पर अपने साथ हुए ज़ुल्म की दास्ताँ लिखने लगी... व्योम ने एक तीर और फेंकने की कोशिश की-
- अगर तुम मेरी बात मानती हो तो मैं तुम्हें रानी बनाकर रखूँगा...यह घर भी तुम्हारे नाम कर दूंगा ... सिर्फ़ एक बार मुझे अपने यौवन का रस चखने दो॥ यकीन मानो, उसके बाद मैं फ़िर कभी तुमसे कुछ नहीं कहूँगा... तुम तो रोजाना राजू के साथ मस्ती करती होंगी, मेरे साथ चाँद पल गुजारने में तुम्हारा क्या बिगड़ जायेगा / आखिरकार मैं भी इंसान हूँ , क्या कमी है मुझमें ? और उस भिखारी राजू में ऐसी क्या खासियत है, जिसकी खातिर तुम अपना घरबार भी छोड़ आयीं ...
नागिन की तरह फुंकारते हुए अन्दर से सुरभि की आवाज़ आई-
-सिर्फ़ जिस्म की भूख रखने वाला तुम जैसा हवसी इस रहस्य को क्या समझ पायेगा ? प्यार में बहुत शक्ति होती है,जिस तुम्हें इस शक्ति का अंदाज़ हो जायेगा, उसी दिन तुम इंसान बन जाओगे... शायद मेरी मौत के बाद तुम यह समझ पाओ ... मैं राजू के प्यार की पवित्रता को बरकरार रखने के लिए किसी भी हद से गुजर जाउंगी...
व्योम- तुम्हारा दिमाग तो ख़राब नहीं हो गया है... कहीं तुम्हारा मरने का इरादा तो नहीं है ? एक फटीचर की खातिर तुम अपनी जिंदगी को दांव पर क्यों लगा रही हो ? तुम मेरी दोस्त बनकर इस दुनिया में आने का असली आनंद उठा सकती हो... जिस तरह गाँव या शहर पसंद ना आने पर हम लोग उसे बदल देते हैं या फ़िर कुछ दिनों के लिए दूसरे गाँव या शहर चले जाते हैं , यह सब भी वैसा ही है... अब मेरी पत्नी मुझे उतना सुख नहीं दे पाती , जो पहले दिया करती थी... मुझे लगता है कि९ वो सुख मैं तुमसे हासिल कर पाऊंगा...अगर मेरे जैसी सोच तुम भी रखो तो इसमें बराए क्या है... यह जन्म हमें बार- बार मिलता है क्या ? फ़िर क्यों नहीं हम इसको मौज-मस्ती के साथ जियें... घुट-घुटकर जीना भी कोई जीना है...मैं चाहता हूँ की तुम भी अमीर बन जाओ ... दूसरे महिलाओं की तरह तुम्हें भी बन्ने -सवारने का हक है, तुम्हें भी आराम करना चाहिए... मन पसंद सिनेमा देखना चाहिए... मन पसंद कपड़े पहनने चाहिए... तुम्हें भी कर में घूमने का हक है... क्यों नौकरानी बनकर अपना भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही हो ?चलो, अपनी तो छोडो, कम से कम उस राजू के बारे में तो सोचो, जिससे तुम पये करने का दावा करती हो ... वह बेचारा जीवन भर इसी दरिद्रता की जिन्दगी गुजारता रहेगा... खैर , उसको भी अगर छोड़ दिया जाए तो अपने होने वाले बच्चे के बारे में तो तुम्हें सोचना ही चाहिए... क्या वे भी कीडे मकोडे की तरह रेंगते रहेंगे? कम से कम उन्हिकी की खातिर मेरी हसरत पूरी करदो...
सुरभि- तुम्हारे पास तो ये सब सुविधाएं हैं न व्योम, बड़ा घर है, कई शहरों में बंगलो हैं , ऑफिस हैं, कम्पनियां हैं, करोरों की नकदी है... इसके बावजूद तुम भिखारी बनकर मेरे सामने गिडगिडा रहे हो... अब तुम समझ गए होंगे की मेरे पास कुछ भी नहीं होते हुए सब कुछ है और तुम्हारे पास सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं... सच्चाई में यही ताकत होती है...