लवगुरु , भाग-१७ मेरी तरफ से हर पल यही कोशिश रहेगी कि आपको पूरा सुख मिले, संतुष्टि मिले और मेरा ऐसा साथ मिले जों जीवन भर तुम्हें किसी और लड़की के
साथ न मिल पाए . इसी बहाने आप जीवन भर मुझे याद करते रहें, मेरा चेहरा आपकी खूबसूरत आँखों के सामने टिका रहे. यही मेरा इनाम होगा. मेरे लिए इससे बढ़कर कोई
पुरस्कार नहीं हो सकता कि आप मुझे सुकून देने वाली, मस्ती देने वाली लड़की के रूप में याद करें, मैं आपको इस रात बहुत ही यादगार प्यार देने वाली हूँ.
मुंशीजी- सच ? तुम्हें देखकर लगता है जैसे मैं कोई सपना देख रहा हूँ . या किसी ऐसे लोक में आ गया हूँ , जहाँ सिर्फ सुख ही सुख हैं . दर्द का कोई नामोनिशान नहीं है .
एक ऐसे लोक में, जहाँ पर परियां निवास करती हैं . जों फूलों की तरह खिलती हैं, चिड़ियों की तरह चहचहाती हैं और अपनों की तरह. बिलकुल अपनों की तरह बतियाती हैं.
मैं लगभग जीवन के ५० बसंत देख चुका हूँ मगर मैंने कभी भी जीवन में धरती का ऐसा आदर्श रूप नहीं देखा. आज देखा तो प्रसन्नचित हूँ. मुझे तुम्हारी इस भोली मुस्कान
ने दीवाना बना दिया है . अगर तुम चाहो और तुम्हारे स्वाभिमान को ठेस नहीं पहुन्शे तो एक बात कहने की इजाजत चाहता हूँ .
डोली- ये क्या कह रहे हैं आप ? आप और मुझसे इजाजत चाहते हैं . अरे आप तो मालिक हैं मेरे. आज की रात के स्वामी . आज मैं अपनी लाइफ में इतना बड़ा काम करने जा
रही हूँ, अपना तन आपको सौंपकर अपने पारिवारिक दायित्व पूरे करने जा रही हूँ . और इसमें मेरे हमसफ़र आप है . सच क्लाहूँ तो यहाँ आने से पहले मैं बहुत डरी हुई थी.
सोचती थी ना जाने पहली रात को कैसा ग्राहक मिलेगा. शायद कोई शराबी , जिसके मुंह से बदबू आ रही होगी . जों सिगरेट के काश पर काश लगा रहा होगा और मुझे मिलते
ही मुझ पर भूखे भेडिये की तरह टूट पड़ेगा , मुझे गाली देगा , मारपीट भी क्र सकता है . और मैं सिर्फ सेवा करने के लिए चुनी गयी हूँ. इस रात मुझे किसी भी सूरत में , किसी
भी हालत में , किसी भी शर्त पर बस ग्राहक को सम्पूर्ण संतुष्टि देने के लिए चुना गया है . मुझे सब कुछ सहना है, सुनना है . मगर ग्राहक को कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए ,
चाहे वो मेरी जान ही क्यों न लेले. और इन भयानक कल्पनाओं के बीच आप मुझे ऐसे ग्राहक मिले जिससे बात करने को जी चाहता है, प्यार करने को जी चाहता है . अपना सब कुछ हंसी-हंसी
समर्पित करने को जी चाहता है . और आप है कि कुछ कहने के लिए मेरी इजाजत चाहते हैं. प्लीज कहिये आप .
मुंशीजी- ओके सबसे पहले तो शुक्रिया . मैं इतनी तारीफ़ के लायक तो हूँ नहीं , खैर, मैं ये कहना चाहता था कि अगर महीनेके दस हजार के बदले आपको हर महीन खाने -खर्चे से
अलग बीस हजार रुपये महीने मिल जाएँ और रोजाना नए- नए ग्राहक बदलने से भी मुक्ति मिल जाए तो क्या तुम इस नौकरी को छोड़ सकती हो ? मैं जस्ट पूछ रहा हूँ .
डोली- शायद नहीं , क्योंकि पता नहीं वह नया व्यक्ति कैसा होगा ? वह मेरा क्या इस्तेमाल करेगा , मुझे किस हाल में रहेगा यह कुछ भी स्पष्ट नहीं है . जबकि यहाँ की तस्बीर
मेरे सामने है, मैं जानता हूँ कि हर रात मुझे काम वासना के भूखे भेडियो के सामने बिछना है . उन्हें खुश करना है .
मुंशीजी- मैं अपनी बात कर रहा हूँ. अगर मैं तुम्हें अपने साथ लेकर चलता हूँ और सिर्फ अपने लिए रखूंगा . अपनी महबूबा बनाकर , अपनी जान बनाकर . अभी तक मैं
कुंवारा हूँ , हो सकता है विधाता ने अभी तक मुझे इसलिए कोई दुल्हन नहीं डी, क्योंकि तुम जों मिलने वाली थीं. और तुमसे हसीन कौन होगी इस दुनिया में ?
डोली- ओह . अभी तक कुंवारे हो . आप भी कोरे हैं, कुंवारे हैं और मैं भी कोरी, करारी और कुंवारी हूँ. खूब जोड़ी जमेगी. फिलहाल आपको दस हजार देकर काउंटर से
एक रसीद बनवानी होगी , उसी रसीद के जरिये हमको लोज में एंट्री मिल पायेगी.
मुंशीजी- लोज में क्यों ? जब हमारा कमरा बुक है तो ?
डोली- ये सवाल मैंने भी किया तो मुझे बताया गया है कि सुरक्षा के नजरिये से ऐसा किया जाता है. लोज ऐसे स्थान पर है जहां कोई परिंदा भी पर नहीं मार सकता .
मुंशीजी- ओह, हां, ये भी जरूरी है.लीजिए दस हजार रुपये , तुम काउंटर से रसीद बनवा लाओ , तब तक मैं तैयार होता हूँ .
डोली- ठीक है अपना ऑर्डर भी अभी लिखवा दीजिए ताकि हमारे वहाँ पहुँचते-पहुँचते ऑर्डर भी तैयार होकर पहुँच जाए.
कुछ ही देर में सब फोर्मेलिटी पूरी की जा चुकी थीं, जब डोली और मुंशीजी लोज में पहुंचे तो काफी खुश थे . वास्तव में होटल मैनेजमेंट ने खूब सुरक्षा
का ध्यान रखा था , डोली सजधजकर आयी थी, जब उसने अपने कपडे बदले और सिर्फ नाइटी पहनकर मुंशीजी के सामने आई तो उनका कलेजा धक् धक्धक्
करने लगा. झीनी-झीनी नाइटी से उसका अंग -प्रत्यंग साफ़-साफ़ झलक रहे थे. उसके यौवन के उभार देखकर मुंशीजी के मुंह में पानी आने लगा. बोले-
-वाह , सचमुच क़यामत नजर आती हो, मगर मेरे प्रस्ताव को हंसी में उडा चुकी हो