Sunday, March 13, 2011

कुंवारी सुहागिन , भाग--1२
ूजन- और तुम जादूगरनी हो, मर्दों को अपने वश में करने का मन्त्र जानती हो.
अमृता- मैं अब जाना चाहती हूँ, प्लीज मुझे जाने दीजिए.
पूजन- इनकार किसने किया है , बुलावा भी किसने दिया था ?
अमृता- मैं सचमुच चली जाउंगी, फिर अकेले में बैठकर इसे मसलते रहना.
पूजन- यह तो अब सही जगह पर जाकर ही दम लेगा. मुझसे ज्यादा इसकी जरूरत आपको ही है. यह तुम्हारे मन में चल रही उथल-पुथल को दूर करेगा . एक बात का ध्यान और रखिये , अगर तुम्हें एक बार भी इसे
पाने की आदत लग गयी तो फिर जल्दी से यह आदत छूटती नहीं है; कामक्रीड़ा एक ऐसा खेल है जिसे खेलने के लिए मन हमेशा तरसता रहता है. यह एक ऐसे लड्डू का नाम है जों मिलता नहीं तो कोई बात नहीं मगर
एक बार मुंह लग गया तो भूलता भी नहीं.
अमृता- कितनी भी तारीफ़ क्यों न करो , मुझे फर्क पड़ने वाला नहीं है. तुम्हारी अश्लील बातें भी मेरे ऊपर कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाएंगी . जब मेरे सामने भाभी और उनका आशिक शारीरिक सम्बन्ध बना रहे थी. दोनों
नग्न अवस्था में एक दूसरे से पिलते हुए थे, उनके खास अंग भी हरकत करते हुए मुझे दिख रहे थे, इसके बावजूद भी जब मेरा मन नहीं डिगा तो अब कैसे कुछ हो पायेगा ?
पूजन- झूठ बोलती हो, अभी-अभी तो तुमने कहा था की उस वक्त तुम्हारे बदन में आग लगने लगी थी, तुम बेचैन हो उठी थीं और तुमने अपने इन उभारों को खुद ही मसलना शुरू कर दिया था.
अमृता- हाँ, वो तो सामान्य बात है, लेकिन मैंने काम सुख तो नहीं लिया. मैं तो जान ही गयी थी की भाभी का आशिक मुझे पाना चाहता था, अगर मेरे मन में ज़रा भी ऐसी कोई बात होती तो मैं मौज मस्ती कर सकती थी.
पूजन- ठीक है, मेरे एक सवाल का जवाब दो. हम जों बात कर रहे हैं, ये बेहद निजी बातें हैं. ऐसी बातें करने के लिए तुमने मुझे ही क्यों चुना ?
अमृता- तुम भरोसे लायक हो,. नामी कवी हो. तुम भी अपनी प्रतिष्ठा का ख़याल रखते हुए कोई काम करोगे. अगर मैं मना कर दूंगी तो मुझे हाथ नहीं लगाओगे.
पूजन- ठीक है और अगर तुम मौज मस्ती चाहोगी तब तो हाथ लगा सकता हूँ न ?
अमृता- हाँ, अगर भविष्य में कभी मेरे मन विचलित हुआ तो अलग बात है. वैसे भी आपको तो कोई कमी है ही नहीं. आपके पास तो मुझसे भी सुन्दर महिलायें मौजूद रहती हैं . आपकी रात को रंगीन बानाने के लिए
कितनी ही नहीं लड़कियां मिलती रहती हैं.
पूजन- बात भी सच है लेकिन तुम सबसे अलग हो मेरी जान. आज तुम आ ही गयी हो तो कामरस का सेवन करती जाओ. मेरा यकीन मानो , कुछ नहीं होगा.
अमृता- कैसे गारंटी दे सकते हो ? कुछ भी हो सकता है.
पूजन- हम सुरक्षित सम्बन्ध बनायेंगे. कंडोम का इस्तेमाल करेंगे , इससे न तो गर्भवती होने का डर रहेगा और ना ही किसी यौन रोग का.
अमृता- अच्छा, अगर ऐसी बात है तो कुछ महीनों इन्तजार कर लीजिए , अभी मैं पूरी १८ साल की नहीं हुई हूँ.
पूजन - तुम जों बता रही हो ये शादी की उम्र है, काम सुख प्राप्त करने की नहीं. कामसुख के लिए तो तुम पहले से ही तैयार हो.
अमृता- अच्छा जी, बहुत सयाने हो. किसी भी तरह से मुझे पाना चाहते हो. तुम मर्दों में यही तो होता है. अपने मतलब से मतलब रखते हैं, दूसरों का दर्द नहीं समझते.
पूजन- अगर मुझे तुम्हारे दर्द का एहसास नहीं होता तो यह प्रस्ताव नहीं रखता. तुम्हारा दिल जानता है की मैं बेहतर समझता हूँ वरना तुम अपने घर की इज्जत की बात मुझको नहीं बताती .
अमृता- मैंने जिस भरोसे के साथ तुम्हें अपने दिल का हाल बताया है, उसे बनाए रखना भी आपकी जिम्मेदारी बनती है.
पूजन- हाँ, ये बात तो है. और मैं अपनी जिम्मेदारी भी निभानी जानता हूँ, जब तक ज़िंदा रहूंगा , इस राज को अपने सीने में ही रखूंगा. अगर मैं तुम्हें प्यार करने की सलाह दे रहा हूँ तो उसके पीछे भी यही सोच है
की तुम्हारा अहित नहीं चाहता. तुम्हारा भी मन कर रहा है मगर औरत होने की कारण अपने मुझ से कह नहीं सकतीं, सोचो , अगर तुम्हारा पाँव गलत जगह फिसल गया तो क्या होगा ?
मैं तो जों भी करूँगा वह तुम्हारी खुशी के लिए करूँगा. इससे तुम्हारे तन या मन पर किसी भी तारह का गलत प्रबहाव नहीं पडेगा. इसके विपरीत तुम्हारा मन खिल उठेगा . तुम्हारा चेहरा भी निखर उठेगा .
तुम जीवन को पोजीटिव नजरिये से देखने लगोगी .
अमृता- ऐसा करना पाप नहीं होता क्या ?
पूजन- कौन कहता है ? तुम अपनी इच्छा से अगर इस शरीर को थोड़ा सा आराम देना चाहती , थोड़ा सा सुख पाना चाहती हो तो बुराई क्या है ?

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