कुंवारी सुहागिन , भाग-२
अमृता- मै दुनिया से नहीं डरती सर. बस मुझे कविता लेखन सिकह दीजिए और मंच पर चांस दे दीजिए.
पूजन- कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है, जैसे तुम्हें कविता पसंद है, उसी तरह हमें भी कुछ पसंद आ सकता है, उसे दे पाओगी ?
अमृता- आप बोलिए तो सही, जितनी फीस चाहेंगे मैं डैडी को बोल दूंगी .
पूजन- मुझे इन लाल होठों का चुम्बन चाहिए. यही मेरी धन दौलत है. यह मुझे दे पाओगी ?
अमृता- मै जाती हूँ सर. आप तो गंदी बात करते हैं. मैं नहीं रुकूंगी यहाँ पर. मै तो आपको शरीफ समझती थी लेकिन आप तो उस्ताद निकले. क्या इसी खातिर अब तक शादी नहीं की ? गुलछर्रे उड़ाने
के लिए ही कुंवारे बने बैठे हो ? मुझे नहीं सीखनी कविता. इस तरह तो तुम मुझे ही कविता बना डालोगे .
पूजन- अरी बावरी ... कैसी बच्चों जैसी बात करती हो ? मेरे ख़याल से अब तुम १६ साल से कम की नहीं हो. स्वीट सिक्सटीन हो. यही उम्र होती है प्यार करने की, बाद में तो उलझन ही उलझन हैं.
मेरी करीब आकर बैठ जाओ. मैं जानता हूँ की तुम्हारे मन में भी प्यार का खेल खेलने की तमन्ना है. मुझे मालूम है की बहुत दिनों से तुम मेरे घर के सामने से बन ठनकर क्यों निकलती हो ? चाहकर
भी तुम मुझे छोड़कर जा नहीं पाओगी, क्योंकि तुम खुद ही यहाँ आना चाहती थी और अब , जबकि मौक़ा मिल गया है तो तुम कैसे जा सकती हो ?
अमृता- अच्छा जी, आप क्या ज्योतिषी हैं जों सबके मन की थाह जान लेते हैं . आपको कैसे पता चला ? सच-सच बताओ तो मैं रुकती हूँ .
पूजन- मैं कई दिनों से महसूस कर रहा था की तुम यहाँ से बड़ी प्यासी नजरों से घूरती रहती थीं, मै समझ गया की अमृता अब यौवन की दहलीज पर कदम रख चुकी है , इसलिए आनंद का कोई मार्ग खोज रही
है. मुझे तुम्हारा चेहरा बहुत अच्छा लगता है. जब तुम हँसती हो तो तुम्हारे गालों में जों गड्ढे पड़ते हैं, ये मेरे मन को मोह लेते हैं. मैं बावरा सा हो जाता हूँ. कई बार तो रात को सपने में भी तुम्हारे साथ रोमांस
का स्वाद चख चुका हूँ. खूब मजे किये हैं तुम्हारे साथ, भले ही सपने में ही सही.
अमृता- यही बात मै कहने वाली थी. एक रात मैंने सपना देखा की मै तुम्हारे साथ यहाँ से बाहर किसी शहर में काव्य पाठ करने गयी हूँ, वहाँ पर होटल में हमारे लिए अलग- अलग कमरे बुक हैं मगर मैं आपके
कमरे में न जाने कैसे पहुच गयी हूँ, और फिर वहीं पर तुमने मेरे साथ गंदा काम कर दिया है.
पूजन- ये क्या बार -बार तुम गन्दा-गंदा कहते रहती रहती हो . प्यार कोई गंदी चीज नहीं है. गालों या होठों को चूमना भी कोई गंदी बात नहीं है. यह तो प्यार को इजहार करने का एक तरीका है. अब एक बात तो
साफ़ हो गयी है की जों तुम्हारे मन में है वही मेरे मन में भी है. हम दोनों एक ही पथ के राही हैं.
अमृता- अब मैं चलूँ, देर हो रही है, कोई देख लेगा तो क्या सोचेगा ?
पूजन- दुनिया की फ़िक्र छोड़ दो मेरी जान. दुनिया तो न जाने क्या- क्या कहती रहती है ? अपने दिल की सुनो और वही करो जिसे तुम्हारा दिल और दिमाग चाहता है.
अमृता- देखो न मेरा दिल कितनी जोर-जोर से धड़क रहा है.
पूजन- यह धडकन डर के लिए नहीं है बल्कि मोहब्बत के लिए है. तुम मुझसे मोहब्बत करने लगी हो, शायद इसलिए दिल धड़क रहा है.
अमृता- मैं तो अभी १६ साल की हूँ और आप ४० की उम्र के हैं. मेरे पिता की उम्र के हैं आप . आपके साथ प्यार अटपटा नहीं लगता ?
पूजन- बिलकुल अटपटा नहीं लगता. आखिरकार तुम्हें बनही २४ साल बाद ४० साल का होना ही है. इसमें कौन सी नई बात है.
अमृता- लोग तो हसेंगे इस सम्बन्ध पर .
पूजन- उन्हें हँसने दो, हमें अपना काम करने दो. मेरे करीब आ जाओ, मेरी बांहों में समा जाओ. प्यार का ऐसा मजा चखाउंगा की सारा डर निकल जाएगा .
पूजन ने झपट्टा मारकर अमृता को अपने बाहुपाश में कास लिया. अमृता का दिल सचमुच धड़क रहा था. उसके सीने के उभार जब ऊपर-नीचे होते तो पूजन की आँखों में वासना की चमक बढ़ जाती थी. उसने
अमृता के उन उभारों पर अपने दोनों हाथ रख दिए और उन्हें आहिस्ता-आहिस्ता दबाने लगा . अमृता की साँसें मानो थम गयीं. उसने अपनी आँखें बंद करलीं और अपने आपको ढीला छोड़ दिया/. उसकी चुप्पी देखकर
पूजन का हौसला और भी बढ़ गया. उसने अमृता के सुख होठों पर अपने होठ रख दिए और उसके मुख में अपनी जीभ घुमाने लगा . अमृता कुंवारी थी, उसने हाल में यौवन कीसीढ़ी पर कदम रखे थे, पूजन के हाथो
का दवाब अपने सीने पर पाकर वह बेहद उत्तेजित होने लगी.
Thursday, March 3, 2011
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