भाग-५५
मैं समझता हूँ कि इसमें तुम्हारी कोई कमी नही है. यह सिर्फ एक दुर्घटना है जो किसी के साथ भी हो सकती है. इसमें तुम्हारा कसूर जब होता तब तुम भी इसमें किसी न किसी रूप में इन्वोल्ब होती .
सलमा- मैं तुम्हारे लायक नहीं हूँ. मैं अपवित्र हो चुकी हूँ. मैं बदनसीब हूँ.
जुनैब- जिस्म तो मर जाता है, मिट जाता है. ये मिट्टी का बना है. असली चीज तो प्यार है. प्यार के बिना इंसान जीवित नहीं रह रह सकता. जब तक दुनिया है तब तक प्यार रहेगा .सब कुछ मिट सकता है सिवाय प्यार के . मैंने भी तुमसे सच्चा प्यार किया है. इस प्यार का जिस्म से कोई मतलब नहीं है. अगर तुम्हारे साथ किसी ने अमानवीय हरकत की है तो ये तुम्हारा नहीं उसका दोष है, इससे तुम्हारा बदन अपवित्र नहीं हुआ बल्कि उस बलात्कारी का जिस्म ही अपवित्र हुआ है, उसकी नीयत तो पहले से ही गंदी थी अब उसकी आत्मा भी गंदी हो गयी है. सूरज की तारफ थूकने वाले का जो हश्र होता है, वही उसका हुआ है. इसमें तुम्हारी क्या कमी है ?
सलमा- जिसने बचपन में मेरे साथ रेप किया था वह भी एक मर्द था और आप भी एक मर्द हैं, मगर दोनों में कितना फर्क है . वो एक शैतान था और तुम एक देवता जैसे हो. आज मालूम हुआ , एक जैसी शक्ल के दिखने वाले लोग भी कितना अलग हो सकते हैं. आपके विचार आसमान से भी ऊंचे हैं. मेरा भी फर्ज बनता है कि मैं भी एक उच्च आदर्श प्रस्तुत करू, ताकि तुम्हारे आदर की पात्र बन सकूं.
जुनैब- काश , तुम मेरे दिल में झाँक पाती, काश तुम समझ पाती कि मैं तुम्हें कितनी मोहब्बा करता हूँ, तुम्हारा कितना सम्मान करता हूँ. सम्मान की शुरुआत ही प्यार से होती है. अगर मन में प्यार नहीं है तो कुछ नहीं है. प्यार पहली सीढी होती है, यहाँ से आगे बढते हुए जाया जाता है. और मैं तो पहले से ही सारी हदें पार कर चुका हूँ. सारे रास्तों को छान बैठा हूँ.
सलमा- मुझे डर लगता है. मेरा कलेजा कांपता है. सोचती हूँ जरूर कोई अनहोनी होने वाली है. क्योंकि अचानक इतनी खुशियाँ एक साथ किसीको नसीब नहीं हो सकतीं,तुम मुझे जीता प्यार डे रहे हो , वह अनमोल है, अतुल्य है. अमर है. मगर मुझे भी कुछ करने का मौक़ा दीजिए , मैं चाहती हूँ कि जिस शरीर को एक पापी भोग चुका हो उससे तुम्हारे पवित्र हाथ का स्पर्श भी नहीं होना चाहिए , वरना मैं अपने आपको माफ नहीं कर पाउंगी .
जुनैब- तुम ये कैसी बहकी-बहकी बातें कर रही हो ?
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