भाग-४४
जुनैब- ठीक है, बताता हूँ. उस वक्त वहाँ का माहौल काफी भावुक हो चुका था. विनीता के साथ -साथ उसका पति भी लज्जित सा, टूटा सा नजर आ रहा था. तब वहाँ के गंभीर माहौल को मैंने संभाला . मैं बोला-
- अरे जाने भी दो. जो हुआ सो हुआ. किसी ने किसी का धन तो नहीं चुरा लिया, गला तो नहीं काट दिया, किसी ने कोई ऐसा काम नहीं किया जिससे देश द्रोह की बू आती हो. यह अपनी -अपनी खुशी की बात है, मेरी तो ऐसी कोई इच्छा नहीं है की मुझे कुछ करना ही है. मैं तो सीधा लड़का हूँ. आप लोगों को मेरी उपस्थिति ने खुशी दिलाई इसके लिए खुश हूँ. मैं होटल चलता हूँ. घर जाने से पहले कोशिश करूँगा आप लोगों से मिलने की. और हाँ, अगर मैं या मेरे दोस्त तुम्हारे किसी काम आ सकें तो बिंदास बताना . तुम्हें खुशी देकर मुझे भी खुशी होगी .
विजय चोधरी - ऐसे थोड़े ही चलेगा . ऐसा कहीं होता है क्या ? घर पर कोई मेहमान आये और ऐसे ही चला जाए ये तो अच्छी बात नहीं है. मैं अभी आता हूँ. तुम लोग छाय नाश्ता करलो. विनीता , तुम खास ख़याल रखना जुनैब का.
सलमा- कहीं वो तुम दोनों को इसलिए तो अकेला छोड़कर नहीं गया ताकि उसकी गैर मौजूद्गगी में तुम अपना टांका फिट कर सको. एक हसीं लड़की और जवान लडका अगर कमरे में अकेल हों तो कुछ -कुछ हो ही जाता है.
जुनैब -तुमने ठीक अनुमान लगाया . नौकरानी नाश्ते की प्लेट सजा चुकी थी. म,आइने महसूस किया कली नौकरानी मुझे कुछ अजीब सी नजरों से घूर रही थी. या तो वह उससे पहले भी इस तरह के द्रश्य देख चुकी थी. या यह जानना चाहती थी की मैं उन लोगों का क्या लगता हूँ. वह सावली मगर कसे हुए बदन की टनाटन दिख रही थी. मैंने उसके सीने की तरफ देखा तो पता चला की उसके यौवन उभार काफी हद तक दिख रहे थे, मेरी नजर पड़ने के बाद उसने छोटे से दुपट्टे से उन्हें ढकने का भी प्रयास किया था. यह मामला बड़ा अजीब लग रहा था. मेरी नजर उस नौकरानी पर लगी थीं, और मेरे सामने निहायत खूबसूरत और प्यासी म,महिला बैठी थी. ऐसी महिला जो शादी शुदा होकर भी कुंवारी थी और जिसे अपनी जिस्मानी प्यास बुजहने की अनुमति उसके पति से भी मिल चुकी थी. नौकरानी के जाने के बाद उसने रिमोट से वहाँ का दरवाजा बंद कर दिया . खिडकी तो पहले से ही बंद थीं. इसके बाद उसके अपने दोनों हाथ ऊपर करके एक जोरदार अंगड़ाई ली जैसे दिखाना चाहती हो जैसे अब जाकर उसे थोड़ी सी तसल्ली मिली है. जुनैब ने काजू कतरी का एक टुकड़ा अपने मुंह में डाला और विनीता की आँखों में आँखें डालकर बोला-
- आपकी नौकरानी नाश्ता बहुत अच्छा तैयार करती है. ऐसा स्वाद मैंने पहले कभी नहीं देखा .
विनीता- अच्छा, अगर ऐसी बात है तो उसके यौवन उभारों के बारे में भी अपनी राय दीजिए न, बताइये की तुमने ऐसी गोलाइयां भी किसीकी नहीं देखीं, मैं तुइम्हें देख रही थी. जब तुम उसकी जवानी पर लार टपका रहे थे . वह भी जानबूझकर तुम्हें अपनी यौवन चोटियों के दर्शन करवा रही थी. जानती हूँ मैं सब कुछ.
जुनैब- इस बात में कोई दो राय नहीं है. वास्तब में यह सही है. उसकी गोलाईयां भी हिमालय की तरह सख्त और सुन्दर थीं, आँखें तो वहाँ से हटने के लिए ही तैयार नहीं थीं, ऐसा लगता है जैसे वे बिलकुल अनछुई थीं.
विनीता- अगर तुम सचमुच अनछुई गेंद का स्पर्श करना चाहते हो तो मेरे ब्क्लाउज के हुक खोल दो. तुम नाश्ता करते रहो, और मैं तुम्हें बिलकुल अनछुई जवानी का दर्शन कराती हूँ. इसे देखकर तुम सब कुछ भूल जाओगे.
जुनैब- मगर तुम तो अपने पति के सामने इनकार कर चुकी हो. कह चुकी हो की किसी गैर मर्द के साथ तुम शारीरिक सम्बन्ध नहीं बना सकतीं.
विनीता- हाँ , मगर तुम गैर कहाँ हो. मेरे होठों का रसपान कर चुके हो तुम. मेरे जिस्म का एक-एक अंग देख चुके हो, उसे चूम चुके हो. क्या इसके बाद भी तुम गैर रह जाते हो ? तुम मेरे पति के सामने मेरा सम्मान करते हो. उनको भी आदर देते हो. इससे उनका स्वाभिमान बढ़ जाता है. वे तुम पर जान न्यौछावर करने लोअगे हैं, मगर साथ में वे ये भी जानते हैं की समस्या वहीं की वहीं पर है. यानी वे मेरी शारीरिक जरूरतों को पूरा नहीं कर सकते . वे जान गए हैं , तुमसे शरीफ लड़का और कोई नहीं होगा,. तुम्हारी जगह पर कोई और होता तो उनके सामने ही मेरे साथ सम्बन्ध बनाने की जड़ी करने लगता . अममाला संभालने की बजाय बावला हो जाता. हमको ब्लैकमेल करने लगता . मगर तुम सबसे अलग हो. सबसे खास हो.
जुनैब- ओह. तो अगर उनकी गैर मौजूदगी में हम दोनों अपनी इच्छाएं पूरी करते हैं तो उन्हें कोई फर्क नहीं पदता.
विनीता- समझदार के लिए इशारा काफी होता है. आज तक मैं सुहागरात के लिए तरसती रही हूँ. जब तुम आ ही गए हो तो मेरी कुंवारापन उतार दो.
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