Wednesday, June 22, 2011

भाग-५०

जुनैब - तुम जरूरत से ज्यादा गंभीर हो रही हो. इतना ज्यादा इमोशनल होने होने की ठोस वजह मैं अभी तक नहीं समझ पाया हूँ, जहाँ तक मेरे अपने सोचने की बात है तो मैं इस तरह से सोचता हूँ, भले ही आपके पति को एक गलत आदत है. वे पुरुषों की तरफ आकर्षित होते हैं और उनसे स्पर्श कर सुख प्राप्त करते हैं. समाज में एक वरिष्ठ अधिकारी को ऐसा काम शोभा नहींज देता मगर ये भी सच है कि ऐसा करने वाले या ऐसा चाहने वाले वे अकेले नहीं है. देश में लाखों लोग ऐसे हैंजो समलिंगी होते हैं. तो ये उनकी व्यक्तिगत प्रोब्लम है. मुझ पर उनका दिल आया और कुछ पल मेरे साथ बिताकर उन्होंने सुख लिया ,कोई दिक्कत नहीं. दिक्कत इसलिए नहीं क्योंकि इससे मुझे कोई हानि नहीं हुई. उन्होंने मेरे साथ किसी तरह का दुर्व्यवहार नहीं किया . और इस बात को मैं भी अच्छी तरह से जानता हूँ कि आपके पति मिस्टर विजय चोधरी वडील के बुरे इंसान नहीं हैं, न जाने किसी तरह से वे गंदी आदत के शिकार हो गए हैं. मैं उनकी इस आदत को बदल तो नहीं सकता , हाँ इतना तो हो ही सकता है कि हम उनकी इस गलत को बढ़ावा भी न दें . अगर मैं उनका कहना मानकर उन्हींके सामने तुम्हारे साथ शारीरिक सम्बन्ध बाना लेता तो इससे उनके हौंसले और बुलंद हो सकते थे, हो सकता है कि वे रोजाना किसी लड़के को यहाँ पर लेकर आते और हर उस इंसान के सामने तुम्हें परोस देते. अगर तुम एक बार राजी हो जाती तो फिर जीवन भर तुम्हें उनकी बात माननी ही पड़ती . हो सकता है कि किसी गलत आदमी के संपर्क में आकार तुम्हें एड्स या उसी तारह की कोई दूसरी बीमारी लग जाती . उस स्थिति में तुम्हारा तो जीवन हजी नर्क बन जाता . मैंने इस कारण उस समय तुमसे इनकार किया था. इसका मतलब तुमने अलग ही समझ लिया. तुमने शायद जाना कि मैं तुम्हें ठुकरा रहा हूँ. मैं कोई साधू नहीं हूँ और नामर्द तो हरगिज नहीं . हाँ, तुम मेनका जैसी अप्सरा अवश्य हो. तुम्हें देखकर तो किसी बाल ब्रह्मचारी का दिल भी पिघल जाता. वह भी तुम्हारी अदाओं के जलवों का शिकार हो जाता. यह बात मैं दावे के साथ कह सकता हूँ. हो सकता है कि आपके पति उस तरह के नहीं हों, मगर मैंने जो महसूस किया वह बतला दिया है. मैं कभी भी दिल ही दिल में घुटकर नहीं रह जाता. जो बात दिल में होती है उसे जुबान पर ले ही आता हूँ. चाहे इसका बुरा मानो या भला .

विनीता - तुम जो सोचोगे , जो करोगे या जो कहोगी वह हर हालत में ठीक ही होगा. गलत कला सवाल ही नहीं उठाता है., मैं तो मानती हूँ कि तुम्हारा हर शब्द मेरे लिए गीता की तरह है. माननीय है , पूज्यनीय है., इससे आगे और मैं क्या कहूँ ?

जुनैब- मुझसे इतना प्यार मत करो विनीता. मैं पागल हो जाउंगा . मैं उस लायक नहीं हूँ . तुम बेवजह एक पत्थर को देवता बनाने पर तुली हो. जबकि देवता देवता होते है. वे पत्थर नहीं हो सकते.

विनीता - दिल से चाहोगे तो पत्थर भी खुदा हो जाएगा .

जुनैब- इतना मत चाहो उसे वह बेवफा हो जाएगा .

विनीता - वाह.. वाह ... क्या बात है, यानी कि तुम भी कह लेते हो. लिख लेते हो. मुझे यह हाजिरजवाबी अच्छी लगी .

जुनैब- इसमें तारीफ़ जैसी भी कोई बात नहीं है,. यह शेर मैंने थोड़े ही लिखा है, किसी बड़े शायर का है , तुमने पहली लाइन बोली तो मैंने उसको पूरा कर दिया, किसी बड़े शायर का है,मैंने इसमें कुछ खास नहीं कर दिया .

विनीता - भले ही यह शेर किसी बड़े शायर का है मगर देखने वाली बात ये है कि इसे जानते कितने लोग हैं ?

जुनैब- बस आपका भी जवाब नहीं है, हर बात का तोड़ रखती हो अपने पास.

विनीता - बात बनाना तो कोई आपसे सीखे, पता भी नहीं चलता और लंबे चौड़े झाड पर चढ़ा देते हो. कभी ये भी सोचा है कि इतने ऊंचे पेड़ से गिरकर बच भी जायेंगे क्या ? या हड्डी पसलियों का कचूमर बन जाएगा . मैं जब मोहब्बत की गर्मागर्म अबत करती हूँ तो तुम नैतिकता की बात करके बात को बदल डालते हो. हो सकता , तुम्हारी बातें मेरे लिए फायदेमंद हों, मगर जिंदगी रहेगी तब तो फायदा -नुक्सान रहेगा .अगर समझो मैं अभी की अभी मर जाती हूँ तब फायदे का क्या होगा ?

जुनैब- मैं तुम्हें मरने नहीं दूंगा .

विनीता- जीने भी तो नहीं दे रहे. कहाँ जीने दे रहे हो ? बस एक एहे धुन सवार हो गयी है. न न और सिर्फ न. अरे बाबा इस न को हाँ में बदलने के लिए मुझे क्या करना होगा ?चलो अब फैसला तुम्हें पर डालती हूँ., पहले ही कह चुकी हूँ, मुझे तुम्हारी हर बात मंजूर है. मैं उसमे कोई अडंगा अडाने वाली नहीं हूँ. कोई ऐसा रास्ता निकालो जिससे तुम्हारी नैतिकता भी बनी रहे, मेरे पति का स्वाभिमान भी बना रहे और मेरी प्यास भी बुझ जाए.

जुनैब- इसका फार्मूला है मेरे पास.

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