Saturday, June 25, 2011

भाग-५३

तुमने कितने नखरे दिखाए हैं तब जाकर मुझे मिल पाई हो. अभी भी तुम्हारा ड्रामा खत्म ही नहीं हो रहा है. जब भी सुहागरात मानने का टाइम आता है तभी मुझे बातों में लगा देते हो . कभी कहती हो ये कहानी सुनाओ , कभी वो कहानी सुनाओ .

सलमा- अच्छा जी, हामारा ही जूता , हामारा ही इस्र. मैंने कहाँ रोका है, मैं तो आपकी खिदमत में हूँ जो चाहो सो करो. मैंने कब ऐतराज जताया है. तुम मालिक हो. जो चाहो करो.

जुनैब- तो इतनी दूर क्यों हो ? अब तो अगर बाल भर का फर्क हो तब भी मुझे सदियों जैसा फर्क दिखने लगता है. मैं चाहता हूँ कि तुम्हें अपने सीने में बसा लूं, तुम्हें अपना बना लूं. और फिर कभी तुम्हें अपने आप से अलग ही न होने दूं. मेरी आरजू उतनी सी है कि तुम्हें अपनी नस नस में बसाकर रखूँ. अगर मेरी आँखें देखें तो बस तुम्हारी सूरत ही देखें. अगर मेरे होठ किसी का स्पर्शज करें तो सिर्फ वे तुम्हारे होठ हों.

सलमा- आह... कितनी सेक्सी बातें करते हो, कितनी मीठी और दिल में बसने बात करते हो. एक बार के लिए जिस्म ग्राम न हो तब भी हो जाएँ, तुम दीखते नहीं हो मगर हो बहुत रोमांटिक. और शब्दों का चयन तो ऐसे करते हो जैसे कोई स्वर्णकार बारीक मूंगों वाली माला बनाते समय करता है. त्तुम बहुत मजेदार इंसान हो. तुम्हारे साथ एक जन्म तो किया दस जन्म भी काटने पड़ें तो ऐसे कट जाए जैसे कि दस मिनिट ही गुजरे हों.

जुनैब- चढाने में तो तुम्हें भी महारत हासिल है. इतने भारी भरकम डायलोग मारती हो कि कुछ बचता ही नहीं है. अब हम दोनों एक फाइनल बातचीत करते हैं.

सलमा- कैसी फाइनल बातचीत ? अब क्या बचा है ? सब कुछ तो हो गया . बस मंजल पर पहुचना बाकी रह गया है.

जुनैब- जब हम दोनों ही जानते हैं कि क्या हो गया है और क्या बाकी रह गया है, तब देर किस अबत की.? यह कोई ऐसा काम तो है नहीं जिसका कि मुहूर्त निकलवाया जाए, फिर भी अगर चाहते हो कि मुहूर्त निकाला जाए तो मुझे क्या ऐतराज हो सकता है. सुबह यह काम भी कर लिया जाएगा . हहा हा हा .......

सलमा-बहुत फनी मूड के लगते हो.जो टाइम मौज मस्ती का है, आनंद लेने का है, उस समय को मजाक में गंवाना चाहते हो , तुम जानना चाहते थे न कि मैं किसी लड़के की तरफ क्यों नहीं देखती थी ?

जुनैब- जाने दो. इस वक्त हमको ये बातें अच्छी नहीं लगती . यह प्यार का मौसम है. समर्पण का वक्त है. अपने घुटनों को एक तरफ मोड दो ताकि मैं इस इश्क की गहराई में समा सकूं.

सलमा- नहीं जुनैब, ये नहीं हो सकता. बिलकुल मुमकिन नहीं है. मुझे माफ कर दीजिए. अब तक तो मैं नशे में थी, जवानी का नशा समझिए, मोहब्बत का नशा समझिए, शराब का नशा समझिए , स्वार्थ का नशा समझिए या फिर तुम्हारे प्यार का नशा जानिये. बस नशा था. लेकिन अब सारे नशा धीरे-धीरे उतर रहे हैं. अब जो भावना पैदा हो रही हैं, ये वफ़ा की भावना हैं. सच्चाई का एहसास है. अब मैं तुम्हारे साथ इस तरह का सम्बन्ध नहीं बना सकती .

जुनैब- ये तुम क्या कह रही हो. मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ. तुम्हा दिमाग तो खराब नहीं हो गया है , या फिर तुम्हें समय-समय पर हां और न जे दौरे पड़ने लगते हैं. साफ़-साफ़ कहो क्या कहना चाहती हो . मैंने तुम्हारे साथ जबरदस्ती तो नहीं की थी, जो कुछ किया तुमसे पूछकर किया . तुम्हारी सहमति के बाद ही हमने यहाँ मिलने का कार्यक्रम तय किया है.

सलमा- बात सब ठीक है, मगर मैं आज माफी चाहूंगी . मैं इस अकाम को नहीं कर पाउंगी .

जुनैब- तुम्हें इस बात का भेद बताना पडेगा. मुझे यह बताना होगा कि पहले तुमने हाँ क्यों की और अब ना क्यों कर रही हो.

जब तक इस बात का राज नहीं बताओगी , मैं किसी भी हालत में मानने वाला नहीं हूँ. भले ही मुझे जेल क्यों न जाना पड़े ?

सलमा- बात कुछ ऐसी है जिसे सुनने के बाद तुम मुझसे नफरत करने लगोगे .

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