Saturday, June 18, 2011

भाग-४६
सलमा- आय -हाय ... उसने माँगा तो भी क्या ? बेचारी ... उसकी इतनी सी इच्छा तो पूरी कर देनी चाहिए थी. खैर, बोलो फिर क्या हुआ ? सुनने में मजा आ रहा है. कहानी में नए-नए मोड आ रहे हैं. सब कुछ मजेदार है. मुझे तो अश्लील फिल्म भी तुम्हारी बातों के सामने बेकार लग रही है. मैं और तुम नग्न अवस्था में हैं, दोनो एक दुसरे से लिपटे हुए भी हैं, इसके बावजूद भी इस क्रिया में कम और तुम्हारी बांहों में ज्यादा सुख मिल रहा है. बताओ न क्या हुआ ?
जुनैब- मैं क्या कहता ? मैं तो अवाक रह गया. मेरे सीने की धडकन और भी तेज हो चुकी थीं, मैं ,ऐसे काँप रहा था जैसे चोरी के बाद चोर की हालत होती है. कभी- कभी इंसान के जीवन में ऐसी स्थिति आती है की वह सही और गलत में फर्क करना ही भूल जाता है. उसने पहली बार मुझे जीवन में एक पैग व्हिस्की पिलाई . लेकिन धोखा देकर नहीं, अच्छी तरह से बताकर. उसने कहा था -
-आज पहली बार तुम जैसा सुन्दर और जवां लड़का मिला है. जी चाहता है तुम इसी तरह मेरे सामने बैठे रहो और मैं तुम्हें बस देखती रहूँ, देखती ही रहूँ. मुझे इस एहसास में ही असीमित सुकून मिल रहा है की तुम मेरे अपने हो और मुझसे दोस्ती करने के इच्छुक हो. ज़रा सोचिये , जब यह एहसास ही इतना सुन्दर है तो तुमसे दोस्ती और फिर प्यार की बात कितनी अच्छी और अजीब होगी ? मैं तो शायद मर ही जाउंगी . इतना सुख सह ही नहीं सकती. इतनी खुशियों के कहाँ संभालूं, कैसे संभालूं, कुछ समझ नहीं पा रही हूँ. तुम भी तो ऐसे समय पर कोई मदद नहीं करते . सिर्फ मुस्कराते रहते हो. होठों पर कृष्ण जैसी हंसी सजा लेते हो और मेरे मन की गहराइयों में बस जाते हो. तुम्हें तो यह भी पता नहीं होता की मैं अंदर ही अंदर कितनी टूट रही होती हूँ , बिखर रही होती हूँ और फिर खुद ही कोशिश रही होती हूँ, हौंसला दिखा रही होती हूँ और अंततः संवर रही होती हूँ. यह कोई कविता नहीं है, कहानी नहीं है. कोई विशेषण नहीं है., मेरे दिल का अफ्शाना है. जो भाव दिल में उभर रहे हैं, उन्हीको बता रही हूँ. इसमें कोई अब्नावत भी नहीं है. जो है सच है. सच के सिवाय कुछ नहीं है.
जुनैब- मैं डर रहा हूँ, क्योंकि समझ नहीं पा रहा . मैं जानना चाहता हूँ की मेरे पादस आखिर ऐसा क्या है जिस पर तुम इतनी फ़िदा हो. मैं तो एक आम लड़का हूँ, मेरे कोलेज की कोई भी हाई -फाई लड़की मुझे घास नहीं डालती. एकाध दोस्त है तो वह भी अक्सर जाली-कटी सुनाती रहती है. लेदेकर एक तुम ही वो हो जो मुझे आकाश पर चढाये ही जा रही हो, चढाये ही जा रही हो और जब गिराओगी तब न जाने मेरा क्या हाल होगा. असली हाल तो तभी पता चलेगा. तभी जान पाऊंगा की मेरा पाला आखिर किस्से पड़ा था ?
विनीता- तुम जानना चाहते हो, मैं तुम्हें क्यों इतना प्यार डे रही हूँ, क्यों तुम पर सब कुछ न्योच्छावर करने के लिए तैयार हूँ ? क्यों तुम्हें अपना सब कुछ मान रही हूँ. उसका एक ही सीधा साद जवाब ये है की तुइम करोड़ों में एक हो. हो सकता है की अरबों में भी अकेले हो. तुम्हारा शरीर तो सुन्दर है ही साथ में विचार भी बेहद खूबसूरत हैं. मैं तुमसे मिलकर धन्य हो गयी हूँ. अगर मेरे पति का दिल तुम पर आया तो अब जानी हूँ की यह कुछ ऐसे ही नहीं आया होगा. तुम द्दुनिया के सबसे सुन्दर, शानदार , आकर्षक और प्यार करने के लायक पुरुष हो. तुम्हारे साथ एक क्या दस बीस जन्म बिठाये जा सकते हैं. तुम्हारे अंदर हर वो गुण है जो कोई महिला किसी मर्द के अंदर तलाशती है.
जुनैब- बस भी कीजिये, इतनी तारीफ़ भी मत कीजिये की मैं कहीं का न रहूँ. यानी की अपनी ही नजरों में गिर जाऊं . मैं एक साधारण लड़का हूँ. हाँ, ये जरूर है की यदि मैं तुम्हारे किसी काम आ सका तो ये मेरे लिए खुशी की बा होगी. मगर साफ़ कहूँ तो मैं अपने आपको तुम्हारे साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने के लिए माना नहीं पा रहा हूँ. सच तो ये है की मेरी खुद के साथ ही झगडा शुरू हो गया है. ना जाने इस झगडे में किसकी जीत होगी ?
विनीता- मैं तो बस इतना ही जानती हूँ की जीत भले ही किसी की हो या न हो मगर हार मेरी ही होने वाली है. तुम्हारे तेवर देखकर तो यही लग रहा है .


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