भाग-४७
जुनैब- बस भी कीजिये, इतनी तारीफ़ भी मत कीजिये की मैं कहीं का न रहूँ. यानि कि अपनी ही नजरों में गिर जाऊं . मैं एक साधारण लड़का हूँ. हाँ, ये जरूर है कि यदि मैं तुम्हारे किसी काम आ सका तो ये मेरे लिए खुशी की बात होगी. मगर साफ़ कहूँ तो मैं अपने आपको तुम्हारे साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने के लिए माना नहीं पा रहा हूँ. सच तो ये है कि मेरा खुद के साथ ही झगडा शुरू हो गया है. ना जाने इस झगडे में किसकी जीत होगी ?
विनीता- मैं तो बस इतना ही जानती हूँ कि जीत भले ही किसी की हो या न हो मगर हार मेरी ही होने वाली है. तुम्हारे तेवर देखकर तो यही लग रहा है . शायद तुम किसी अलग ही फ़िराक में हो. तुम ज़रा भी रोमांटिक मूड में नजर नहीं आ रहे हो. तो क्या समझा जाए ? यही कि मैं हार गयी हूँ ? क्या मेरी ही किस्मत में सदा ठोकरें खाना लिखा है ? क्या मैं ही अभागी हूँ ? क्या मुझे कुछ अंश सुख का नहीं मिलना चाहिए ? क्या दुनिया के किसी भी हिस्से पर मेरा अधिकार नहीं है ? क्या मुझे औरों की तरह प्यार का सुख नहीं मिलेगा ? क्या मैं कभी किसी की प्रियतमा नहीं बनूंगी ? क्या मुझे दुनिया में कोई नहीं अपनाएगा ? कुछ जवाब दो जुनैब , कुछ तो कहो. मेरी मानसिक दशा इतनी ठीक नहीं है कि मैं अच्छी-अच्छी बातें आकर सकूं. मैं तो बस ऐसी ही हूँ. जो मुंह में आता है बकती रहती हूँ. शायद इसकी वजह ये भी हो सकती है कि इस समय मैं दिमाग से नहीं दिल से बोल रही हूँ.
जुनैब- इतनी निराशाजनक बातें न करोविनीता जी, मेरी इतनी हिम्मात नहीं है कि मैं आपको परेशान करू, या आपको हतोत्साहित कर सकूं , सच तो ये है कि कभी हतोत्साहित होना भी नहीं चाहिए. हमेशा आशावादी विचार रखने चाहिए . तुम तो ऐसी हूर परी हो जिस पर राजकुमार भी अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार हो सकता है. आपके क़दमों के नीचे अपना दिल बिछा सकता है. आपके सामने तो फिल्म इंडस्ट्री की कोई हीरोइन भी कहीं नहीं ठहरती . तुम्हारे चेहरे में गज़ब का आकर्षण है, तुम्हारी आँखों में जादू है, तुम्हारे बालों में घटाओं सी छवि है. तुम्हारे सुर्ख होठ ... आह ... इनके सामने तो दहकते हुए अंगारे भी फीके पड़ जाएँ. तुम्हारे यौवन रस को पीने के लिए कोई भी बावला हो सकता है. अगर मैं मजबूर नहीं होता तो मैं तुम्हें अपनी बांहों में भर लेता और फिर कभी तुमसे जुदा नहीं होता. तुम्हें किसी तरह से अपने सीने में बसा लेता. तुम्हें हमेशा-हमेशा के लिए अपनी बना लेता . मैं तुममें समा जाता और तुम्हें अपने में समा लेता . तुम सम्जहा करो.
विनीता- आह,.. सोचने सम्जहने का टाइम निकल चुका है. अब जो बचा है वह सिर्फ प्यार का मौसम है. सिर्फ मोहब्बत का समय बचा है. अपनी तमाम मजबूरियों को एक तरफ हटाकर बस मुझे प्यार करो. अभी-अभी जो बोल रहे तह, उसे कर डालो. मैं तो तुम्हारे इश्क में हद से गुजर चुकी हूँ, कम से कम तुम थोड़ा सा अनुसरण तो करो. मेरे राजा. , मेरे दोस्त , मेरे जीने के कारण मेरी एक फ़रियाद नहीं सुन सकते, प्यासे को पानी पिलाना तो हर धरम में पुन्य का काम माना जाता है. मुझ प्यासी की प्यास बुझाकर लगे हाथों एक पुन्य भी कमालो जुनैब. सच मानो, ये सब कहने के अलावा मेरे पास दूसरा कोई चारा ही नहीं है वरना मैं ये सब कहती भी नहीं यार , मैं भी नारी की लाज शर्म, मान मर्यादा को समझती हूँ , उसका पालन करती हूँ. मगर तुमने मुझे जिस हद तक पागल किया है उसकी कोई सीमा नहीं है,.
जुनैब- प्लीज, विनीता . मुझे मजबूर मत करो. मैंने अपने जज्बातों को किस तरह बांधकर रखा है यह सिर्फ मैं जानता हूँ,मुझे मेरी ही नजरों में गिराकर तुम सुखी नहीं रह पाउंगी .
विनीता- मैं तुम्हारे लिए अपनी तो क्या सारे जमाने की नजरों से भी गिर सकती हूँ. अगर कहो तो आसमान से पाताल में छलांग लगा सकती हूँ और तुम,... क्या तुम मेरे लिए अपने कुछ सिध्हान्तों को पल भर के लिए, सिर्फ कुछ पल के लिए नजरअंदाज नहीं कर सकते. अगर मैं ये कहूँ कि अपने सिद्धांतों को छोड़ दो, उन्हें भूल जाओ तब तो अलग बात है. मैं तो बस कुछ पल नजरअंदाज करने की बात कर रही हूँ. युम नहीं जानते , उन कुछ पलों में ही किसी बदनसीब की तकदीर बदल जायेगी , जिसे तुम सिद्धांतों का मामला समझ अहे हो वह किसी की जिंदगी और मौत का मामला है जुनैब.
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