Friday, June 17, 2011

भाग-४५
जान गए हैं , तुमसे शरीफ लड़का और कोई नहीं होगा,. तुम्हारी जगह पर कोई और होता तो उनके सामने ही मेरे साथ सम्बन्ध बनाने की जिद करने लगता . मामला संभालने की बजाय बावला हो जाता. हमको ब्लैकमेल करने लगता . मगर तुम सबसे अलग हो. सबसे खास हो.
जुनैब- ओह. तो अगर उनकी गैर मौजूदगी में हम दोनों अपनी इच्छाएं पूरी करते हैं तो उन्हें कोई फर्क नहीं पडता.
विनीता- समझदार के लिए इशारा काफी होता है. आज तक मैं सुहागरात के लिए तरसती रही हूँ. जब तुम आ ही गए हो तो मेरा कुंवारापन उतार दो. मुझे तार दो मेरे राजा तार दो . मुझे प्यार दो. इतना प्यार दो की मेरी जन्मों -जन्मों की प्यास बुझ जाए. मुझे कभी किसी मर्द की याद न आये. मेरे सारे अरमानों को पूरा कर दो. मेरे दिल की हर इच्छा पूरी कर दो. मुझ पर छा जाओ.
जुनैब- यह क्या कर रहे हो. मैं अनजान हूँ, बहुत छोटा सा हूँ. मुझे इतना शर्मिन्दा न करो, मैं तो ये सब बातों को जानता भी नहीं हूँ. इश्क या रोमांस का सिर्फ नाम भर सुना है. मैं कैसे कुछ कर सकता हूँ. एक बार फिर से विचार करिये, सोचिये कहीं तुम मुझसे हद से ज्यादा आशा तो नहीं रखती हो. ऐसा तो नहीं की आपने गलत आदमी को चुन लिया है.
विनीता- मैं जानती हूँ सच क्या है ? मैं आदमी चुनने में कभी गलती नहीं करती. एक नजर में ही मैंने तुमको पहचान लिया है. मैं जान गयी हूँ की तुम ही हो जिसकी मुझे तलाश थी, तुम ही हो जो मेरे दिल की बढ़ती धडकन को संभाल सकते हो. तुम ही हो जो मुझे काम क्रीडा की नदी में गोते लगवा सकते हो, मुझे मेरे होने का एहसास दिला सकते हो, मेरा जन्म सार्थक कर सकते हो, तुम ही वो हो जो मुझे प्यार का मीठा रस चखा सकते हो. तुम तो मेरे हसबेंड को मिले थे, मगर तुमने जब बंगले में प्रवेश किया मैं तभी तुम पर मोहित हो गयी थी. तभी से मेरी आँख फडक रही है. मन में भूचाल सा उठा है. जी चाहता है तुम्हें बांहों में भर लूं और आख़िरी सांस तक अपने आपको तुमसे जुदा नहीं होने दूं. या तो अपने दिल में बंद करके हमेशा के लिए यहीं कैद कर लूं., या तो कथा कहानियों की तरह तुम्हें मोम की मक्खी बनाकर तुम्हें सदा के लिये अपने आँचल में ठूंस लूंगी. आह मैं क्या कह रही हूँ, क्या मुझेकहना चाहिए और क्या करनाचाहिए , इस बात का कोई इल्म ही नहीं है. मेरी समझ में नहीं आता की मैं तुमसे किस तारह से बात करून. मुझे माफ कर दीजिए . शायद मैं दीवानी हो चुकी हूँ. मुझे कुछ पता नहीं है की क्या करना चाहिए. एक काम करो न जुनैब, मेरा तुम्हीं कोई मार्गदर्शन कीजिये न .
जुनैब- मैं तो एक आम लड़का हूँ और आप एक करोरपति-अरबपति की पत्नी हैं. आप बहुत बड़ी हैं, आपको इस तारह गिडगिडाना शोभा नहीं देता. मैं अपने आपको लज्जित महसूस कर रहा हूँ. मैं तुम्हारे किसी काम के लायक नहीं हूँ. तुम मुझसे जो आशा रखती हो शायद मैं उसके हजारवे हिस्से तक भी नहीं हूँ .
विनीता- तुम क्या हो, कौन हो और मेरे लिए क्या कर सकते हो इसका अनुमान मुझे है. मैं जानती हूँ,. तुम कुछ मत करो बस आकार मेरे सीने से लग जाओ जैसे कुछ देर पहले लगे थे. मुझे चूमते रहो, मेरी जुल्फों को सहलाते रहो. और कुछ नहीं चाहिए मुझे. मेरे लिए वही जन्नत है. वही सब कुछ है.
सलमा- आय -हाय ... उसने माँगा तो भी क्या ? बेचारी ... उसकी इतनी सी इच्छा तो पूरी कर देनी चाहिए थी. खैर, बोलो फिर क्या हुआ ? सुनने में मजा आ रहा है. कहानी में नए-नए मोड आ रहे हैं. सब कुछ मजेदार है. मुझे तो अश्लील फिल्म भी तुम्हारी बातों के सामने बेकार लग रही है. मैं और तुम नग्न अवस्था में हैं, दोनो एक दुसरे से लिपटे हुए भी हैं, इसके बावजूद भी इस क्रिया में कम और तुम्हारी बांहों में ज्यादा सुख मिल रहा है. बताओ न क्या हुआ ?
जुनैब- मैं क्या कहता ? मैं तो अवाक रह गया. मेरे सीने की धडकन और भी तेज हो चुकी थीं, मैं ऐसे काँप रहा था जैसे चोरी के बाद चोर की हालत होती है.

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