जीना यहा मरना यहा..
Aug 26, 11:00 pm
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मुकेश सगीत की दुनिया के उन चुनिदा गायकों में शामिल हैं जिनके गाए गीत आज भी लोगों की जुबा पर हैं। आज उनकी 35वीं पुण्यतिथि के मौके पर उन्हें हमारी श्रद्धाजलि..
गायक मुकेश का जन्म 22 जुलाई 1923 को दिल्ली में जोरावरचद माथुर और माता चादरानी के की छठी सतान के रूप में हुआ था। उनका पूरा नाम था मुकेश चद माथुर। बचपन से ही उन्हें सगीत का शौक था।
सन 1940 में मुकेश ने बबई का रुख किया। थोड़ी भागदौड़ के बाद उन्हें फिल्म मिली 'निर्दोष', जो 1941 में रिलीज हुई। इसमें अभिनय के साथ-साथ उनका गाया गीत 'दिल ही हो बुझा हुआ तो फसले बहार क्या..' भी था। पर अफसोस फिल्म को कामयाबी नहीं मिली। बतौर अभिनेता मुकेश ने दो और फिल्में 'दुख सुख' और 'आदाब अर्ज' कीं, ये भी असफल हुईं। शायद अभिनेता के रूप में ख्याति पाना उनकी किस्मत में नहीं लिखा था। सन 1945 में एक फिल्म आई 'पहली नजर'। इसके गीत 'दिल जलता है तो जलने दे..' से मुकेश लोगों की पसद बन गए। हालाकि यह गीत सुनते हुए अहसास होता है कि इसे कुंदनलाल सहगल ने गाया है।
इसके कुछ समय बाद रंजीत मूवीटोन के मालिक सेठ चदूलाल शाह ने मुकेश को दो गीत 'ऐ कातिबे तकदीर मुझे इतना बता दे..' और 'नैन हीन को राह दिखा प्रभु..' गाने को दिए, मुकेश ने ये गीत बखूबी गाए। इनमें भी वही बात थी, जो 'दिल जलता है..' में थी। सुनकर लगता था कि ये मुकेश के नहीं बल्कि सहगल के गाये गीत हैं। जब इन गीतों को खुद सहगल ने सुना, तो वे चौंक गए कि इन गीतों को मैंने कब गाया?
बतौर अभिनेता मुकेश की दो और फिल्में 'माशूका' (1953) और अनुराग' (1956) आईं, लेकिन अभिनेता के रूप में वह पसद नहीं किए गए। इन दोनों में से 'अनुराग' (1956) के निर्माता मुकेश ही थे। इससे पहले एक और फिल्म 'मल्हार' (1951) का निर्माण भी उन्होंने ही किया था, लेकिन यहा भी कामयाबी उनके हाथ नहीं लगी। हा, वह गायक के रूप में इंडस्ट्री में छा गए। फिल्म मेला (1948) में उन्होंने गीत गाया गीत गाये जा गीत मिलन के..'। इस गीत ने उन्हें पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं के बीच भी खास बना दिया।
राजकपूर ने जब अपनी पहली फिल्म 'आग' 1948 में शुरू की, तो उसमें सभी गीत मुकेश और लता मगेशकर की आवाज में थे। राजकपूर की सलाह पाकर मुकेश सहगल की छाप से मुक्त हो गए और बन गए अपनी अनोखी शैली वाले गायक। बतौर गायक मुकेश के गीतों की सख्या करीब एक हजार है, जिनमें से 970 गीत उन्होंने फिल्मों में गाये हैं। शेष गीत प्राइवेट, क्षेत्रीय गीत या भक्ति गीत के रूप में रिकॉर्ड हुए।
राजकपूर हमेशा कहते थे कि मुकेश मेरी आत्मा हैं। मुकेश जब तक जिंदा रहे, राजकपूर ने उनका साथ कभी नहीं छोड़ा। उनकी फिल्म 'सत्यम शिवम सुंदरम' (1978) के लिए मुकेश ने अपना अंतिम गीत 'चचल शीतल निर्मल कोमल सगीत की देवी स्वर सजनी..' गाया। इस फिल्म के गीत दो साल पहले रिकॉर्ड हो गए थे।
सब कुछ सीखा हमने, न सीखी होशियारी..', सबसे बड़ा नादान वही है..', जय बोलो बेईमान की..' और कभी कभी मेरे दिल में..' के लिए मुकेश को फिल्म फेयर अवार्ड और 'कई बार यूं ही देखा है..' के लिए नेशनल अवार्ड मिला। उनके गाये कुछ बेहतरीन गीतों में शामिल हैं 'जाने कहा गए वो दिन..', 'जीना यहा मरना यहा..', 'सजन रे झूठ मत बोलो..', 'सजनवा बैरी हो गए हमार..', 'रमइया वस्तावइया..', 'मेरा जूता है जापानी..', 'ओहरे ताल मिले नदी के जल में..', 'मैं पल दो पल का शायर हूं..' इत्यादि गीत।
मुकेश के अंतिम समय में पुत्र नितिन मुकेश और उनकी प्रिय मुंहबोली बहन लता मगेशकर साथ थीं। अमेरिका के मिशिगन, डेट्रायट में लता और मुकेश का शो था। शो शुरू होने से पहले ही उनके सीने में दर्द उठा और 27 अगस्त 1976 को मुकेश की खूबसूरत आवाज सदा के लिए शात हो गई। कुछ शेष रह गया, तो वे हैं मुकेश की यादें और उनके गाए मधुर गीत।
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