दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के ऎतिहासिक लाल किले पर ग्यारह साल पहले हुए हमले के अपराधी मोहम्मद अशफाक उर्फ आरिफ की मौत की सजा बरकरार रखी है। कोर्ट ने 20 अप्रैल को फैसला सुरक्षित रखा था। न्यायाधीश वी एस सिरपुरकर और न्यायाधीश टी एस ठाकुर की खंडपीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखते हुए लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी आरिफ की विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी।
आरिफ ने दिल्ली उच्च न्यायालय के 13 सितम्बर 2007 के फैसले को चुनौती दी थी। ओ पी सैनी की निचली अदालत ने 24 अक्टूबर 2005 को आरिफ और छह अन्य को भारत के खिलाफ युद्ध छेडने और हत्या का दोषी ठहराया था तथा 31 अक्टूबर 2005 को आरिफ को मृत्युदंड तथा उसकी पत्नी को सात वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। उच्च न्यायालय ने आरिफ की सजा तो बरकरार रखी थी लेकिन छह अन्य को बरी कर दिया था। आतंकियों ने लालकिले पर 22 दिसम्बर 2000 को हमला किया था। इसके अलावा संसद पर आतंकी हमले के आरोप में मौत की सजा पाए आतंकी अफजल गुरू को फांसी देने की ओर एक और कदम बढ़ा लिया गया है। गृह मंत्रालय ने अफजल की क्षमादान याचिका को राष्ट्रपति सचिवालय के पास भेज दिया है।
गृह राज्यमंत्री मुल्लापल्ली रामचंद्रन ने राज्यसभा में बताया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा मौत की सजा पाए आतंकी अफजल गुरू की दया याचिका को गृह मंत्रालय ने गत 27 जुलाई को राष्ट्रपति सचिवालय के पास भेज दिया है। एक सवाल के जवाब में रामचंद्रन ने बताया कि मौत की सजा पाए किसी आतंकी को तुरंत फांसी पर लटकाने या उसकी सजा माफ करने के लिए संवैधानिक उपाय नहीं है।
गौरतलब है कि 13 दिसंबर 2001 को संसद पर हुए हमले में सुप्रीम कोर्ट ने 2004 में अफजल को मौत की सजा सुनाई थी। अफजल की पत्नी ने मौत की सजा के खिलाफ राष्ट्रपति से क्षमादान की मांग की थी जिस वजह से उसे अब तक फंासी नहीं हो सकी है।
Wednesday, August 10, 2011
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