Wednesday, July 1, 2009

तड़प, भाग-80

तुम्हारा साथ भी मेरे लिए संजीवनी के समान है... मुझे यकीन नहीं होता ऐसा भी हो सकता है... एक व्यक्ति एक ही समय में दो लड़कियों को काम सुख कैसे दे सकता है ?मगर तुम सबसे अलग हो... बिल्कुल जुदा...
रवि- असंभव को सम्भव करना ही तो हमारा मिशन है... मुंबई आओगी तब समझोगी हमारी असलियत... एक बार जो मुंबई जाता है वह वहीं का होकर रह जाता है...
रोजी- मेरा दिल कहता है , तुम वहां स्टार बन जाओगी... सुपर स्टार ... रवि ने न जाने कितनी लड़कियों का भाग्य संवारा है... न जाने कितनी कलिओं को फूल बानाकर आसमान पर चमकता हुआ सितारा बना डाला ...
रवि- तुम तो वैसे भी बम हो... पूरा पटाखा हो.... तुम्हें देखते ही लोगों के होश फाख्ता हो जायेंगे... जब मुबई में रहोगी, अच्छा खाओगी, अच्छा पिओगी और हमारी बांहों में रहोगी तो फ़िर क्या कहने...
शैली- राजेश से तुम ख़ुद बात कर लेना... वह मुझसे बेपनाह प्यार करता है... मेरी जुदाई बर्दाश्त नहीं कर पायेगा... अब तो हम लोग बहुत जल्द शादी भी करने वाले हैं....
रवि- बहुत अच्छी बात है, खुशी की बात है... बरात में हम लोग भी नाचेंगे... मगर शादी से पहले अगर कुछ बन जाती हो तो बुरा क्या है ? बड़े -बड़े और समझदार लोग पहले अपने कैरियर पर ध्यान देते हैं और फ़िर शादी करते हैं... रवि से एक बार भी तुम कहोगी वह इनकार नहीं करेगा... और अगर करता भी है तो हम किस मर्ज की दवा हैं... तुम्हारी मोहब्बत वहाँ जाने से कम थोड़े ही होगी.... और ज्यादा बढेगी ही...दूर जाने से कभी प्यार कम नही होता... और फ़िर मुंबई कोई विदेश में थोड़े ही है... रवि जब चाहेगा तुमसे मिल आया करेगा...
शैली-हाँ ये बात तो मैं सोच ही नहीं पाई... मैंने प्यार किया है रवि से...
रोजी- वह भी तो जान छिड़कता है तुम पर... कहता है अब तुम्हारे बिन जी नहीं पायेगा...
शैली-क्या प्यार में सबकी ऐसी ही हालत हो जाती है ? यार के सिवाय और कुछ अच्छा नहीं लगता ...
रवि- ठीक कहती हो... मैं भी तुम्हारे इश्क में गिरफ्तार हो चुका हूँ... ऐसा लगता है की बिना तुहें देखे अब कुछ नहीं भायेगा... सुबह तुम्हारा यह हसीं चेहरा देखकर जगना चाहता हूँ और रात को सोने से पहले भी इसे देखने की तमन्ना है... मैं अपना दिल चीरकर तो दिखा नहीं सकता.... हाँ यकीन दिलाना चाहता हूँ...
शैली- अब मैं भी आंखों की भाषा पढने लगी हूँ... तुम्हारे दिल में झाँककर देख चुकी हूँ.......
रवि- तो बताओ न क्या है मेरे दिल में ? क्या कहती हैं ये धड़कनें ? कहो तो जानूं... अब बोलो भी...
शैली- मेरी ही तस्बीर है इसमें और क्या ? धडकनों में सिर्फ़ मेरा ही नाम है...सच बोला या ग़लत ?
रवि- अरे वाह...पहचान गईं तुम तो... मेरे अंग प्रत्यंग में समा गयी हो तुम... जादू सा कर दिया है मुझ पर...
पुलिस अधिकारी काफी देर से यह सब सुन रहा था... शैली उसको अपने साथ बीते हर लम्हे को शेयर कर रही थी... उसे बता रही थी किस तरह रवि ने उसके साथ रात गुजारी... जब वह उसके विशेष अंग और ख़ास आक्रमण की बात करती तो अधिकारी और भी उत्तेजक होकर हमले करने लगता था... वह इतना ज्यादा कामोत्तेजक हो चुका था की आखिरकार मैदाने जंग से बाहर हो गया... शैली की भावनाएं सुलगती ही रह गयीं... फ़िर भी वह मुस्कराती ही रही ... उसने उफ़ तक नहीं की...वैसे भी वेश्याओं का फर्ज सामने वाले को संतुष्ट करना होता है, और वह अपनाधर्म बखूबी निभाती थी... पुलिस अधिकारी और दिनों से भी ज्यादा खुश था... शैली का कातिल बदन उसके लिए अजनबी नहीं था... इससे पहले भी कई बार वह शैली के साथ सम्बन्ध स्थापित कर चुका था...

No comments: