Friday, July 24, 2009

दिलफेंक पडोसन

आप लोग हारे थके हैं , अब ख़ुद चाय -कोफी बनायेंगे तो अच्छा नहीं लगेगा...

सलीम अपने पहले दांव में पास हो गया था, वह अपनी नई पडोसन का दिल जीतने में काफी हद तक कामयाब हो चुका था... फरहा के नाना रेहान और उसकी नानी को भी सलीम का व्यवहार अच्छा लगा था... चाय पिलाने के बाद वह अपने घर आ गे, रात भर उसके जेहन में फरहा का मासूम चेहरा घूमता रहा ... सुबह उसकी आँख जल्दी ही खुल गयी... धीरे से उस खिड़की पर आ गया जहाँ से उसको फरहा दिख सकती थी... उसे मन माफिक द्रश्य दिखाई दिया ... फरहा उसे देखकर मुस्करा रही थी... सलीम का चेहरा चमकने लगा... उसने फरहा की तरफ़ हवाई चुम्बन लहरा दिया... फरहा ने भी उसी तरह बेबाकी से जवाब दिया तो सलीम की खुशी का ठिकाना नहीं रहा... जल्दी-जल्दी उसने अपना काम निबटाया और उस us खिड़की पर आ गया जहाँ से फरहा दिखाई दे सकती थी... उसकी मनोकामना पूरी हुई ... फरहा सामने ही खडी होकर अंगडाई ले रही थी... सलीम जब मुस्कराया तो फरहा भी उसको देखकर मुस्करादी ... सलीम का हौसला बढ़ गया... अब वह हवाई चुम्बन उछाल रहा था... फरहा का जवाब भी उसी जोश के साथ आया... वह भी चुम्बन दे रही थी... सलीम ने अपना काम जल्दी से निबटाया और फ़िर स्कूल जाने के लिए तैयार हो गया... वह गेट खोलने ही वाला था की उसे बेल सुनाई दी , सामने फरहा खड़ी दिखाई दी, उसने बहुत अच्छी ड्रेस पहन राखी थी, उसके हाथ में कुछ था... मुस्कराते हुए वह बोली-
- अब ऐसे ही खड़े खड़े रहोगे या फ़िर मुझे अन्दर भी आने दोगे...
सलीम- अरे हाँ, सॉरी .... आइये न... आप ही का घर है... बैठिये , मैं आपके लिए पानी लेकर आता हूँ...
फरहा- फोर्मेलिती छोडिये और मेरे पास आकर बैठिये... मैं तुम्हारे लिए अपने हाथ से कुछ बनाकर लाई हूँ...
सलीम- बहुत- बहुत शुक्रिया... मगर इसकी क्या जरूरत थी ? मैं स्कूल में ही खाना खा लेता हूँ... कुछ साथी टीचर खाना लेकर आते हैं उन्हीं से मेरा भी खाना हो जाता है... अब तुम लाई हो तो ठीक है... खा लेता हूँ...
फरहा- आप क्या करते रहे हैं, इससे मुझे मतलब नहीं है... मैं तो बस इतना जानती हूँ की आज से खाने -पीने की आपकी टेंशन मेरी रहेगी... मेरे नाना कहते हैं की मास्टर जी को खाने -पीने की तकलीफ नहीं होनी चाहिए...
सलीम- ऐसा क्यों कह्तियो हैं आप ? इतना आपने सोचा वह भी मेरे लिए कम नहीं है... आप जैसे अच्छे पडौसी किसी किस्मत वाले को ही मिलते हैं, मैं बहुत खुश हूँ तुम्हें पाकर... वाह... क्या टेस्ट है तुम्हारे हाथों में, ऐसी बिरियानी मैंने आज तक कभी नहीं खाई... बिल्कुल नए ढंग से बनायी गयी है...
फरहा- एक बात पूछूं ? लेट तो नहीं हो रहे हो ?
-सलीम- कहो ना... लेट की कोई बात नहीं है, वैसे भी आजकल सिर्फ़ हाजिरी लगाकर ही लौट आते हैं...
फरहा- आप यहाँ पर अपनी पत्नी को क्यों नहीं लेकर आते हैं ? अगर वे यहाँ आएँगी तो आपका मन लगा रहेगा...
सलीम-मैंने भी कई बार ऐसा सोचा है की पत्नी और बच्चों को लाया जाए मगर इत्तेफाकन यह हो ही नहीं पा रहा है... अकेले रहने से अब तो आदत भी ऐसी ही गयी है की आराम से नींद आ जाती है...
फरहा- झूठ मत बोलिए... आपका चेहरा चुगली कर रहा है, पत्नी के बिना चैन से नींद आ ही नहीं सकती... याद तो आती ही होगी, और जब याद आएगी तो तड़प भी होगी ही...
सलीम- अच्छा, अभी तुम तो कुंवारी हो , फ़िर भी जुदाई का matlab समझती हो...सच बोलो... क्या बात है ?
फरहा- क्या हुआ अगर शादी नहीं हुयी , बरात तो बहुत की हैं... मेरा एक दोस्त था , वह बेवफा निकला ... उसकी कभी-कभी बहुत याद आती है... मन में बहुत कसक होती है...
सलीम- अगर ऐसी बात है तो हमसे दोस्ती कर लीजिये, आपकी दोस्ती का रिक्त स्थान भर जाएगा, मैं बेवफाई भी नहीं कर सकता, कुछ छिपा भी नहीं सकता... जानती ही हो की शादीशुदा और बच्चों वाला हूँ... कोई बात छिपाई या बढ़ाई हुई नहीं है...
फरहा- बहुत चालू हो ,मुझे दोस्ती का प्रस्ताव भी देदिया और कुछ एहसास भी नहीं होने दिया... ठीक है फ़िर भी आपकी बात मान लेते हैं... दोस्ती कर लेते हैं... मगर दोस्ती से आगे नहीं बढ़ेंगे...
शैली- नहीं ... ऐसी कोई बात नहीं है... मैं खुली किताब की तरह हूँ...जितना तुम कहोगी उतना ही करूँगा...
फरहा- मैं कौन सी बंद किताब हूँ... ?
सलीम- मेरा मतलब , मैं ग़लत फायदा उठाने वाला नहीं हूँ...जो चाहोगी उतना ही आगे बढूँगा...


















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