दीपू के जाते ही शैली की दुनिया में जैसे अँधेरा छा गया, जुम्मा -जुम्मा चार दिन की मुलाक़ात में ही शैली ने दीपू को अपने तन में ऐसे बसा इया था जैसे वह उससे सदियों से मोहब्बत करती आई हो... जैसे वही उसका देवता हो... उसकी आंखों के सामने अँधेरा छाने लगा था, दिल में आंधी -तूफ़ान सा उठ रहा था... उसकी याद ऐसे सता रही थी जैसे की वह उसे बरसों पहले छोड़कर चला गया हो और फ़िर अब कभी आने वाला नहीं, उसे अपने जीवन में ना जाने कितने आशिक मिले थे ... उसके पास आने वाला हर ग्राहक उस पर जान छिड़कने का दावा करता था, उसे भी प्यार मोहब्बत की बातें अच्छी लगती थिंज मगर दीपू का मामला ब्निल्कुल अलग था... वह उसे भूल ही नहीं पा रही थी... उसने दीपू का मोबाइल नंबर डायल कर दिया, मगर अफ़सोस उसका नंबर बंद आ रहा था, वह कार से उतरकर सड़क पर आ गयी, चारों तरफ़ निगाह दौडाई , मगर कोई फायदा नहीं हुआ... वह भी कैसी दीवानी थी जोकि उसने दीपू का पता भी नहीं पूछा था... अगर वह पूछ लेती तो कितना अच्छा होता, कार का चालाक भी हैरान था , शैली की मनोस्थिति उसे ठीक नहीं लग रही थी... उसका दिल चाहा की उससे हालचाल पूछे मगर वह चुप रहा , उसे अपने भाड़े से मतलब था और अगर खड़े-खड़े ही किराया मिले तो क्या बुराईए है ? शैली ने तो उससे गाडी बंद करने को कहा नहीं था... वह चालक आराम से गाने सुन रहा था और शैली सड़क पर दीपू को ढूंढ रही थी, उसने अन्तिम बार कोशिश की लेकिन मोबाइल फ़िर भी स्विच्ड ऑफ़ मिला, फ़िर उसको दीपू का वादा याद आया उसने रात में दोबारा मिलने को कहा था... अब जाकर उसके दिल को तसल्ली मिली... दुखी मन से वह अपने घर आ गयी... उसके साथ एक लड़की और रहती थी... वह उसकी पक्की सहेली थी... हांलाकि उस लड़की का पेशा यह नहीं था, वह तो अभी पढ़ रही थी... रीना नाम की वह लड़की जानती थी की शैली जिस्म बेचने का धंधा करती है, इसके बावजूद वह शैली से प्यार करती थी...उसको शैली की मजबूरी के बारे में पता था, उसका मानना था की जिस्म बेचने वाली लड़कियां जितनी गुनाहगार होती हैं उससे कई ज्यादा गुनाहगार वे होते हैं जो लड़कियों को जिस्मफरोशी के लिए मजबूर करते हैं, और वो भी जो की जिस्म खरीदते हैं... जब शैली घर आयी तो दरवाजे पर उसका स्वागत रीना ने किया... शैली की जान में जान आ गयी... रीना उसका चेहरा देखकर घबरा गयी थी, उसकी समझ में नहीं आया की फूल की तरह खिलने वाली शैली का चेहरा मुरझाया हुआ क्यों है ? फ़िर उसने पूछ ही लिया-
- ये क्या हुआ आज हमारी जान को, चाँद सा चेहरा इस तरह लटका हुआ क्यों है ? सब खैरियत तो है... अरे माथा तो ठंडा है, गर्दन भी ठीक .... फ़िर क्या परेशानी है ? किसी ग्राहक से झगडा हुआ है क्या ? चलो मैं तुम्हारे लिए चाय बनाकर लाती हूँ , गरमागरम... फ़िर बातें करेंगे...
शैली- नहीं रीना, मुझे चाय की नहीं शराब की जरूरत है, आज ग्राहक से झगडा नहीं हुआ, गज़ब हो गया है, ... बहुत बड़ा गज़ब... मुझे एक ग्राहक से प्यार हो गया है... उसकी मोहब्बत में मैं अंधी हो गयी हूँ...उसके सिवाय मुझे कोई दिखाई नहीं दे रहा है, चारों तरफ़ बस वाही है... मुझे अब दीपू के बिना एक पल भी नहीं रहना है....
रीना- अरे वाह, यह तो खुशी की बात है, फ़िर तुम रो क्यों रही हो... ये तो हंसने का दिन है,मई जश्न मनाने का दिन है , आखिरकार तुमको भी मन पसंद साथी मिल ही गया... क्या वह भी तुमसे बहुत प्यार करता है ?
शैली- हाँ, पूछ मत... वह तो इतना चाहता है की शब्दों में बयान करना मुश्किल है... कल से हम इंडिया टूर पर जा रहे हैं... पूरा देश घूमेंगे और फ़िर शादी कर लेंगे, मैं अभी उसे छोड़कर आ रही हूँ....रात को उसने फ़िर से मिलने का वादा किया है...
No comments:
Post a Comment