बाद में पता चला की वह डीजी रैंक का अधिकारी था... उसकी वजह से मैं जिस्म के बाजार से मुक्त हो पाई ... ये देखो , सामने वाला चौकीदार मेरी पहचान का है... मैं इन्हें काका कहकर पुकारती थी...
और फ़िर उस चौकीदार ने शैली को देखते ही सलाम के लिए हाथ ऊपर उठा दिया, हवेली का गेट अपने आप खुलता चला गया... दीपू आगे- आगे और शैली पीछे-पीछे चलने लगी... चौकीदार बता रहा था की छोटे ठाकुर की मौत के बाद ज्यादातर परिवार के लोग अब शहर में ही रहते हैं...दीपू कहने लगा-
-बहुत आलिशान हवेली है यार ... करोड़ों खर्च किए होंगे तब बनी होगी....
शैली- ये तो कुछ भी नहीं... अगर अन्दर के कमरों को खोलकर देखोगे तो इसकी भव्यता का पता चलेगा... मगर फिलहाल ये खुल नहीं पायेंगे, जब ये लोग घर से बाहर होते हैं तो हवेली के इसी हिस्से तक बाहर के लोग आ -जा सकते हैं...ये जो उस तरफ़ देख रहे हो, वहाँ से प्रवेश करेंगे तो अन्दर की तरफ़ तीन होल पार करने होंगे तब जाकर रंगमहल आएगा, यहाँ तक सुरक्षा का सख्त पहरा रहता था ... किसीकी हिम्मत नहीं जो वहाँ अन्दर तक घुस सके... अन्दर गुफा भी है , जिसे इमरजेंसी द्वार कहा जा सकता है... उस गुफा से आपातकाल में बचा जा सकता है...
दीपू- कहाँ तक जाती है यह गुफा ? तुमने कभी उसमे प्रवेश किया है ?
शैली- कभी नहीं, क्योंकि कभी इसकी जरूरत ही नहीं पडी... अब तक तो ऐसा होता था की पुलिस वाले ख़ुद ही इनकी हिफाजत किया करते थे, इनके सभी काले धंधों में अधिकारियों का पूरा सहयोग रहता था...
दीपू- तुमने राजेश के गले को तकिया से कहाँ दबाया ? यहाँ पर या वहीं अन्दर ?
शैली- चलो, दिखाटी हूँ... पीछे एक गोदाम है... वहीं पर... उस हिस्से जल्दी कोई आता जाता नहीं है... शायद वह तकिया अभी तक वहीं पडा हुआ मिल जाए, वह तकिया तुम्हारे किसी काम भी आ सकता है...
दीपू- मेरे काम? चलो पहले चलकर देखते हैं...
दीपू को जोर का झटका धीरे से लगा... उसका दिमाग घूमने लगा, हाथ काँपने लगे... हलक सूखने लगा ...शैली के चेहरे पर शिकन भी नहीं थी...होठों पर रहस्यमयी मुस्कान नाच रही थी...दीपू का दिल बैठा जा रहा था... दीपू ने आख़िर पूछ ही लिया-
- ऐसे क्या देख रही हो ? मैंने क्या किया है ?
दीपू- अच्छा ये है वो तकिया? इसीसे तुमने राजेश का गला दबाकर ह्त्या की थी ? मैं तुम्हें गिरफ्तार करता हूँ... यह मेरा फर्ज है... मैं सीबीआई अधिकारी हूँ और राजेश हत्याकांड का इन्वेस्टीगेशन ऑफिसर ... मेरे विभाग ने मुझे बड़ी उम्मीद के साथ इस केस के लिए नियुक्त किया है... मैं मजबूर हूँ... मुझे अपना फर्ज निभाना ही होगा... लेकिन इसका मतलब यह नहीं की मैं तुमसे प्यार नहीं करता ... मुझे तुमसे उतनी ही मोहब्बत है , जितनी कोई अपनी पत्नी से कर सकता है...मैं तुम्हारी जमानत कराने का प्रयास करूंगा... कम से कम सजा दिलाने की कोशिश करूँगा...
शैली ने अपने हाथ खड़े कर दिए , होठों पर अब भी मुस्कान थी... दीपू उससे नजर नहीं मिला पा रहा था... उसने धीमे से पुछा-
-क्या तुम्हें पता था की मैं ...............
शैली- हाँ , मगर किस विभाग के हो और किस पद पर ? यह नहीं पता था... जब तुम बार-बार राजेश हत्याकांड की चर्चा कर रहे थे, यहाँ गाँव आने की जिद कर रहे थे मैं तभी समझ गयी थी ...
दीपू- फ़िर भी आयीं मेरे साथ ?
शैली- अपनी मोहब्बत की खातिर मैं कुछ भी कर सकती हूँ... जेल जा सकती हूँ, आत्महत्या कर सकती हूँ...कुछ भी... जो तुम जैसे स्वार्थी लोग सोच भी नहीं पायेंगे वो भी... राजेश और तुम में क्या कोई ख़ास फर्क नहीं है...उसने अपनी हवस के लिए प्यार का सहारा लिया और तुमने अपने ऑफिस का काम करने के लिए ... अब मैं किसी पर भरोसा नहीं कर पाउंगी... बात जमानत की नही है, सजा की नहीं है... वो सब तो होते चलते रहते हैं... बात है मोहब्बत की, भरोसे की... तुमने मेरा भरोसा तोडा है, मेरा दिल तोडा है... इस तड़प को मैं कैसे बर्दाश्त कर पाउंगी...?तुम भी बेदर्द निकले दीपू... मैं अपनी तड़प के साथ जेल जाने को तैयार हूँ...
Wednesday, July 22, 2009
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