Sunday, July 12, 2009

तड़प, भाग-91

दीपू अपने आप पर नियंत्रण रखने में अक्षम था... शैली का बदन सूखे पत्ते की तरह थर थर काँप रहा था... कमरे में काम वासना की चिंगारियां पूरे शबाब पर थीं... वह अपने ख़ास अंग को सहलाकर उसे शांत करने की कोशिश कर रहा था... उसकी कामेच्छायें घटने की बजाय बढ़ती ही जा रही थीं... शैली अब सतर्क हो चुकी थी, वह यह ध्यान भी रख रही थी की दीपू को यह न लगे की वह उसके साथ रहकर कहीं अन्यत्र सोच रही है... वह पूछ रही थी-
-अब मैंने सोचना बंद कर दिया है... कल सुबह तुम्हारे साथ टूर की तैयारी शुरू करदी जायेगी... परसों तक हम अपने गाँव के आसपास पहुच जायेंगे, अगर तुम वहीं से शुरुआत करना चाहते हो तो मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी...
दीपू- अब तो वहाँ राजेश के घरवाले भी नहीं रहते होंगे ?
शैली- क्यों , वे कहाँ जायेंगे... वे बड़े जमींदार हैं... उनकी वहाँ खेती क्यारी है... सब वहीं रहते हैं... उसका बाप तो चुनाव जीतकर विधायक भी बन चुका है... उन लोगों की ऊंची पहुच है... हम उनके सामने कोई नहीं हैं हैं, कीडे -मकौडे की तरह हैं...
दीपू- ऐसा क्यों सोचती हो? ऐसा बिल्कुल नहीं है... आज लोकतंत्र का ज़माना है... सबको अपनी बात कहने का हक़ हक़ है, आजकल सबकी शिकायतें सूनी जाती हैं... उन पर अमल किया जाता है... ऐसा नहीं है की अगर कोई बड़े घर का है तो उसके लिए कोई अलग क़ानून हो और आम आदमी के लिए कोई दूसरा क़ानून...
शैली- ये सब कहने -सुनने की बातें हैं और इनका जमीनी हकीकत से कुछ भी लेना-देना नहीं है... अखबार में इसह्तिहार देने के लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है... जिससे बीतती है, वाही जानता है... अब तुम मेरी ही कहानी लेलो। मुझे हर किसीने प्रताडित किया... जो भी मिला , उसीने मेरा इस्तेमाल किया, मगर मैं किसीका कुछ नहीं बिगाड़ पाई...
दीपू- राजेश को तो उड़ा ही दिया ना, और क्या चाहिए ? इतने पावरफुल ठाकुर को गाँव में मार देना और इसकी कहीं भनक भी नहीं लगना बहुत बड़ी बात है... कैसे किया ये सब ? तुम जासूसी उपन्यास तो नहीं पढ़ती हैं ?
शैली- इतना समय कहाँ मिला है ? कभी कभार कुछ पढ़ लिया तो पढ़ लिया... जब वक्त आता है तो इंसान सब कुछ सीख जाता है, कहीं ट्रेनिंग लेने की जरूरत भी नहीं पड़ती, ...
दीपू- ये सत्य है, मैं वह राज जानना चाहता हूँ की आख़िर ऐसा कैसे हो गया ? इतनी बड़ी प्लानिंग तुमने कैसे करदी ? क्या तुम्हारे साथ कोई दूसरा भी शामिल था ?
शैली- जी नहीं ... उसे मैंने ही मौत के घाट उतारा था... मैंने ही योजना बनायी थी... और वह सफल भी हुयी...
दीपू- जब कोई काम दिल से किया जाता है तो सफल होता ही है... धीरे-धीरे ही सही लेकिन सत्य की जीत होती है...
शैली-मैंने राजेश को इसलिए मार डाला क्योंकि उसने मेरा जीवन नर्क बना दिया था, पहले तो उसने मुझे प्यार के जाल में उलझाया और फ़िर मेरा शारीरिक शोषण करने लगा... इसके बाद वह मुझे पाने दोस्तों के सामने परोसने लगा... मैं प्यार के झांसे में आकर उसके दोस्तों को अपना जिस्म सौंपने लगी, मुझे पता ही नहीं चला की मुझे सैकडों भूखे भेदियों के सामने परोस दिया गया, इसके बाद वे बाकायदा मेरी बोली लगाने लगे... अपने काम के लिए वे लोगों को bulaate थे, मुझे दिखाते , apnaa काम और पैसा साईट करते और इसके बाद वे मुझे उन वासना के भूखे हव्सियों के सामने दाल दिया करते थे ...









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