शैली- बहक तो मैं तभी गयी थी जब रेल में तुम मिले थे, पहली ही नजर में तुम्हारा यह चेहरा मेरे जेहन में बस गया था और मैं मन ही मन ना जाने क्या- क्या खयाली पुलाव पकाने लगी थी... कोई लड़की अपनी कमजोरी मर्दों पर उजागर नहीं करती लेकिन मैं इससे अलग सोच रखती हूँ... मुझे मालूम है की मेरा दोस्त ऐसा नहीं है... दीपू सारी दुनिया के मर्दों से अलग मर्द है... जोशीला ,जवान , ईमानदार और दोस्त की इज्जत करने वाला, भावनाओं को समझने वाला और प्यार करने वाला...
दीपू- तुमने तारीफ़ करने का कहीं से डिप्लोमा लिया है क्या ? बात बनाओ , बहाने नहीं...
शैली- दिल की बात कहदी और तुमने बहाना समझ लिया... चलिए ठीक है... वैसे सच भी यही है की मैं काफी देर से अपनी मुलाक़ात के बारे में ही सोच रही थी... तुम्हसे पहली बार का मिला, फ़िर होटल आना... हम दोनों का एक साथ मस्ती करना, फिओर पुलिस की रेड वो तुम्हारा रौद्र रूप धारण कर हवलदार को थप्पड़ रसीद कर देना, वो सब बार बार आंखों में घूम रहा था... मैं सोच रही थी की जब तुम मेरे साथ टूर पर जाओगे तो मैं तुम्हारा खूब ख़याल रखूंगी, मेरे घरवाले भी इसी बहाने मुझे फ़िर से मिल जायेंगे... तुम तो बात बनाने में माहिर हो ही... सब कुछ ठीक कर ही लोगे,, मेरे माथे पर जो बदचलन का ठप्पा लगा था वह भी इस कारन हट सकता है... मेरी जिन्दगी भी फ़िर आम इंसानों की तरह चल सकती है, जिस तरह तुमने मुझे संभाला है वह बहुत उल्लेखनीय औए एतिहासिक बात है, कहने को तो सब कह ही देते हैं, मगर बात जब करने की आती है तो पीछे हट जाते हैं, हम जैसी विषयों को तो सिर्फ़ दिल बहलाने के लिए रखा जाता है, दिल भर गया तो उठाकर फेंक दिया जाता है... हम से अच्छे तो वो खिलौने भी होते हैं जो निर्जीव होकर भी घरों में स्थान पा लेते हैं... हम लोगों की किस्मत में ये सब कहाँ ... घर की चौखट लाँघने का श्राप लगा है हमें... बस हमें लेकर किसी होटल में आओ, मौज मस्ती करो , कीमत चुकाओ और फ़िर ऐसे चल पदों जैसे की हमें कभी देखा भी ना हो, जैसे कभी छुआ भी न हो... अब तक तो यही थी मेरी किस्मत ... लेकिन मुझसे शादी का वादा करके और जमाने के सडे -गले रीति रिवाजों से लड़ने की बात कहकर तुमने मेरे हौंसले बुलंद कर दिए हैं ... अब मैं भी गृहिणी बन्ने का ख्वाब देखती हूँ... ये सपने भले ही मेरे हैं, लेकिन इन्हें जिन आंखों से देख रही हूँ वे आँखें तुम्हारी हैं दीपू... तुमने मुझे सिर्फ़ आँखें ही नहीं दीं बल्कि मुझे विचार भी दिए हैं, मेरे मन मस्तिष्क में नए आदर्श दिए हैं... और नयी जिन्दगी दी है... अब भले ही तुम मुकर भी जाओ तो गम नहीं , तुमने मुझे इतनी खुशियाँ दी हैं की इन्हींके सहारे दो जीवन गुजारे जा सकते हैं...
उसके शब्दोंमें ऐसी आत्मीयता थी की दीपू को अन्दर से झकझोर दिया... वह शैली को जितनी सादा समझ रहा था वह उतनी नहीं थी, अब जाकर वह जाना की शैली उसको सचमुच चाहने लगी थी, हांलाकि उसने सुन रखा था की वेश्याएं सिर्फ़ दिखावे के लिए प्यार करती हैं, और जब मतलब निकल जाए तो मुंह भी नहीं करती, उनका सब कुछ पैसा ही होता है, लेकिन उसे शैली में ऐसा कोई अवगुण नजर ही नहीं आ रहा था... वह उसके साथ ना तो किसी लालच से सम्बन्ध बना रही थी और ना ही उससे जिस्म की फीस वसूल रही थी... वह तो अपना पूरा खर्च करने के लिए तोयार थी, उसने दीपू के सामने शादी का ऑफर भी नहीं रखा था, उसको पटाने के लिए दीपू के मुख से ही प्रस्ताव भरे शब्द निकल गए थे... अब वह पश्चाताप कर रहा था,... शैली का नग्न बदन उसकी आगोश में था...गर्म गर्न साँसों से पूरा कमरा उत्तेजित हो रहा था...
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