दीपू- ठीक है मेरी जान... जब इस आग के दरिया से तुम पार उतर चुकी हो तो धीरे -धीरे , तुम्हारे पीछे -पीछे हम भी भावः सागर से पार उतर ही जायंगे... इश्क का स्वाद चखने को मोल ही गया है तो अब डरने या यहाँ से पीछे हटने का सवाल ही नहीं उठता है... लगता है मोहब्बत का असर हम पर अभी से होने लगा है...
शैली- अभी आगे-आगे देखिये क्या होता है , अभी तो तेल देखो, तेल की धार देखो... तब जानोगे कैसे बदल जाते हैं लोग... कैसे हम दूसरों की बातों पर आँख बंद कर यकीन कर लेते हैं... कैसे हो जाता है ये सब... यही जान पाओगे...
दीपू- तो कल से सफर की तयारी करें.... मेरे ख़याल से अब हमको देर नहीं करनी चाहिए ... जो समय निकल जाता है, वह निकल ही जाता है... इसलिए देर करने की बजाय अब हमको निकल चलना चाहिए...
शैली- अचानक ? इतनी जल्दी? कैसे मिलेंगे टिकेट...हम बहुत जल्दबाजी नहीं कर रहे हैं? क्या हमको और सोचने समझने की जरूरत नहीं है ?
दीपू- तुम किसी बात की फ़िक्र मत करो... सब कुछ ठीक हो जाएगा... मैंने बताया था ना की एक एजेंट मेरे दोस्त हैं... वे कुछ न कुछ करके जुगाड़ फिट कर ही लेते हैं...हमारे होटल के कमरे का भी इंतजाम हो जाएगा... मेरा सब उधार चलता है, चिंता की कोई जरूरत नहीं है... खाते -कमाते देता रहूँगा... रास्ते भर का खर्चा मेरे पास मौजूद है... टूर के बाद हम लोग जब मुंबई आयेंगे तो सब कुछ बदला हुआ मिलेगा...
शैली- तब का तब देखेंगे , मैं तो अभी भी बदहाल हूँ... तुम ही तुम दिखाई देते हो... आंखों में तुम, धड़कन में तुम , दिल में तुम , दिमाग में तुम, खाबों में तुम, ख्यालों में तुम... हर जगह, हर महफ़िल में तुम ही तुम नजर आते हो...
दीपू- इतने कम वक्त में ही तुम मुझे कितना चाहने लगी हो शैली.... मुझसे कभी किसीने ये बातें नहीं कहीं... अब जबकि तुम कह रही हो तो मुझे बहुत आनंद आ रहा है... मन में तरंग सी उठ रही हैं... महसूस करता हूँ जैसे की मैं कोई राजकुमार हूँ और तुम राजकुमारी हो...
शैली- मेरे लिए तो तुम राजकुमार से भी बढ़कर हो... कल का टूर फिक्स कर देते हैं... अब कुछ देर आराम कर लो, फ़िर जब फ्रेश हो जायेंगे तो शोपिंग कर करेंगे... मुझे तुम्हारे लिए जींस की पेंट और टी शर्त लेनी हैं...
दीपू- अरे नहीं , इसकी क्या जरूरत है.... मेरे पास इतने कपड़े तो हैं.... तुम्हारे लिए हम लोग मिलकर खरीददारी करेंगे... अब आराम की भी जरूरत नहीं है... अब तक जो कर रहे हैं वह आराम ही तो है और क्या है... अब हम यह होटल छोडेंगे... दोनों अपने -अपने घर जायंगे...फ़िर आआगे का सफर भी तय करना है...
शैली राजी हो गयी... दीपू ने उसके होठों का प्रगाढ़ चुम्बन लिया और फ्रेश होने चला गया... अब उसके मन में तरह -तरह के सवाल फन उठाये खड़े थे, वह ऐसे मोड़ पर खडा था जहाँ से आगे जाना भी मुश्किल है...और पीछे हटना भी नामुमकिन है... ये किस मोड़ पर ले आयी है जिन्दगी... मन में इसी तरह के सवाल थे... सवालों की लम्बी फेहरिस्त थी और जवाब कोई नहीं... उन्होंने होटल छोड़ दिया था, शोपिंग भी खूब की गयी... दीपू के लिए शैली ने खूब मंहगे कपड़े खरीदे थे... अब तक वह अपने ग्राहकों के पैसों से ही खरीदारी करती आई थी... आज पहली बार उसको एक अच्छा एहसास हो रहा था... उसे लग रहा था जैसे की वह भी समाज की ,मुख्यधारा में शामिल हो गयी है.... अपनी नेगेटिव जिन्दगी को वह पोजीटिव बनाने का हर सम्भव प्रयास कर रही थी... दीपू भी पूरे समर्पण भाव से उसकी हर बात सुन रहा था...
Friday, July 17, 2009
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