दीपू जब प्रणय क्रीडा करता तो शैली खुश हो जाया करती थी...इसका कारण यह था की दीपू कभी भी वक्त से पहले नहीं थकता था बल्कि शैली को संतुष्ट करने के बाद भी उसका अंग सख्त बना रहता था, शैली उसे स्पर्श कर अपार सुख का अनुभव करती रहती थी... वह हैरत भरी नजरों से उसे निहारती रहती थी... उसके दिल में ठंडक पड़ जाती थी... इतनी तसल्ली तो उसे कभी नहीं होती थी... सैकडों -हजारों ग्राहकों ने उसके बदन का सुख लूटा था मगर उसे कभी भी संतुष्टि नहीं मिल पाई थी... दीपू से तो उसको सम्पूर्ण संतुष्टि मिली थी... सम्पूर्ण सुख मिला था... कुछ ही देर में वो दोनों एक जिस्म दो जान हो गए, वासना का तूफ़ान उन्हें पूरा सुख दे गया ... अब वे पहले जैसेखेल का अनुभव कर रहे थे... दीपू उसको पूरी तरह नग्न करने के बाद आनंद लिया करता था... वह अपने बदन पर भी नाम मात्र के लिए कपड़े नहीं पहनता था... जब वे सुख भोग चुके तो शैली ने कहा-
- क्या यहाँ मुंबई में तुम्हारे कोई यार दोस्त नहीं रहते क्या ?
दीपू- कैसे जाना ? तुम्हें ऐसा क्यों लगा की मेरा यहाँ पर कोई यार दोस्त नहीं रहता ?
शैली- जबसे आए हो, तबसे तुमने किसीको कोई फोन नहीं किया ? अपना मोबाईल भी बंद करके रखा है...जबकि मैं न जाने कितने लोगों से बातचीत कर चुकी हूँ .... मुझे तब ऐसा महसूस हुआ ...
दीपू- नहीं , नहीं ... ऐसी कोई बात नहीं है... दरअसल जबसे तुम्हें मिला हूँ तबसे बाहर की दुनिया के हर शख्स को भूल गया हूँ... आंखों में तुम्हारी ही सूरत दिखाई देती है... सीने में तुम ही तुम समा चुकी हो...
शैली- समझ गयी... फ़िर भी अब से पहले के कुछ तो ऐसे करीबी होंगे ही जो तुम्हारे अचानक गायब होने से चिंतित हुए होंगे, कुछ अनिष्ट की आशंका लगा रहे होंगे...
दीपू- नहीं ... ऐसी कोई बात नहीं है... मुंबई ऐसा शहर है जहाँ अपना ख़याल रखने की फुर्सत भी लोगों को नहीं होती... फ़िर दूसरों की परवाह कौन करे...
शैली- ठीक है... मैं समझ गयी .... अब आगे का क्या इरादा है ? क्या सोचा है ?
दीपू - किस बारे में ? जिन्दगी के बारे में या अपने यार दोस्तों के बारे में ? किसकी बात कर रही हैं ?
शैली- मैं भविष्य की बात कर रही थी... जब यहाँ से जाओगे तो कहाँ जाकर रुकोगे ? क्या करोगे ?
दीपू-जहाँ रहता था वहीं जाना पड़ेगा न... और कहाँ है ठिकाना ? जहाँ कहो रुक जाऊं ...
शैली- अच्छा... कुछ देर पहले कभी साथ न छोड़ने की क़समें खा रहे थे , अब इतनी जल्दी सब कुछ भूल गए... मुझे छोड़ कतर अपने घर चले जाओगे ... फ़िर क्या होगा मेरा ... कहाँ जाउंगी मैं? तुम अकेला जाने की सोच रहे हो या फ़िर मुझे भी साथ लेकर जीने की योजना तैयार की है ? क्या मैं हमेशा ऐसे ही तड़पती रहूँ...
दीपू- हाँ- हाँ क्यों नहीं... तुम्हें भी साथ ले जाऊँगा लेकिन ऐसे अचानक भी तो कुछ नहीं किया जाता ... पहले तुम्हारा रहने का इंतजाम करूँगा उसके बाद तुम्हें अपने साथ ले जाऊँगा...
शैली- तुम्हारे चेहरे पर इस समय जो चमक आणि चाहिए वो नहीं है.... जब कोई नए घर की प्लानिंग करता है तो उसका चेहरा खुशी से दमकता है... कितना ही बोझ और जिम्मेदारियां क्यों न हों मगर वह किसी भी हालत में इतना परेशान नहीं रहता जितना की तुम दिखाई दे रहे हो .... आख़िर वजह क्या है ?
दीपू- तुम मिल गयी तो मुझे सारा जमाना मिल गया है... मेरे जीवन की सभी परेशानियां ख़त्म हो गयी हैं... मुझे लगता है आज तुमने मेरा चेहरा पढने में कहीं कमी करदी है... फेल हो गयी शैली....
शैली- काश ये सच हो.... मैं तुम्हें तनाव में नहीं देखना चाहती... तुम पर तन और मन अर्पण कर चुकी हूँ... जितना चाहो धन भी अर्पण कर सकती हूँ... अरे यार अपना जीवन अर्पित कर कर देती हूँ...
दीपू- तुम्हारा प्यार पाकर खुश हूँ....
Saturday, July 4, 2009
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