Sunday, July 5, 2009

तड़प, भाग-84

दीपू - मैं तुम्हारे साथ भ्रमण करना चाहता हूँ... देखना चाहता हूँ की सफर में हम दोनों किस तरह एडजस्ट कर सकते हैं ? किस तरह से हम और हमारे संस्कार एक दूजे से मिलते हैं ? किस विचारधारा के साथ हम एक दूजे से पेश आते हैं... मुझे लगता है की यह टूर हम दोनों को एक नई दिशा देगा ... अगर कहो तो इस सफर की शुरुआत करते हैं... बोलो मंजूर है ? मैं चाहूँगा की तुम मेरे गाँव भी चलो , मैं भी तुम्हारे गाँव चलूँ ... फ़िर लालकिला देखें, ताजमहल देखें , वैष्णोदेवी चलें... और भी बहुत सी ऐसी जगह हैं जिन्हें देखनी की तमन्ना है... मगर अकेला नहीं जा सकता... कभी हिम्मत ही नहीं पडी... तुम साथ रहोगी तो मेरी रुचियों को अच्छी तरह से समझ जाओगी... हमें एक दूसरे को सोचने और समझने का मौका मिलेगा...
शैली- मेरे खयाल से हम दोनों एक दूसरे को हमेशा के लिए अपना बनाने का वादा कर चुके हैं...
दीपू- मुझे लगता है की यह अवसर हमें चूकना नहीं चाहिए... एक दोस्त ट्रेवल एजेंट है... टिकिट का इंतजाम फ़टाफ़ट हो जाएगा... वह वीआईपी कोटे से कन्फर्म भी करा देगा... उन लोगों के लिए यह मुश्किल काम नहीं है...
शैली- ठीक है... किसी सार्वजनिक टूर के साथ जाने से अच्छा है की हम लोग ख़ुद ही चलें... यह मजा अलग ही सुकून देगा... मैं भी ऐसे सुखद अनुभव को महसूस करना चाहती हूँ... अब देर करना ठीक नहीं है... मेरे कुछ लोग भी परिचित हैं ... अगर कहो तो मैं बुकिंग करा दूंगी....
दीपू- कुछ काम हमें भी करने दीजिये ... अगर सब कुछ औरत करे और मर्द देखता रहे तो यह भी अच्छा नहीं ...
शैली- मैं तो स्त्री और पुरूष का भेद भी भूल गयी हूँ , मुझे बस तुम ही तुम याद हो.... मैंने तो अपने गाँव कभी न जाने की कसम खा लीथी मगर तुम कहते हो तो तुम्हें जरूर दिखाउंगी....
दीपू- क्यों ... ऐसी कसम क्यों ली मेरी जान ... तुम इतनी स्वीट होकर भी ऐसे कड़वे फैसले कैसे ले सकती हो... वह गाँव है तुम्हारा ... वहाँ तुम्हारे यार दोस्त होंगे, माँ बाप होंगे, परिवार के एनी लोग होंगे... तुम्हें देखेंगे तो खुश होंगे...
शैली- पता नहीं अब क्या -क्या होगा... मेरे ख़याल से दुनिया बदल गयी होगी... जबसे आयी हूँ माँ -बाप की कोई ख़बर ही नहीं मिली... हो सकता है वे नहीं रहे हों.... आः....
दीपू- ऐसा मत कहो स्वीट हार्ट ... शुभ -शुभ बोलो, ऐसा हरगिज महीन हो सकता... मैं मान ही नहीं sakta ....
भगवान् सारे दुःख तुम्हें ही क्यों देंगे....
शैली- अगर वे जिन्दे भी हुए तो मैं उनके लिए मर चुकी होउंगी... मेरे चाल चलन से वे पहले भी परेशान रहते थे... उनकी मजबूरी थी,वरना वे कबकी मुझे ख़ुद से अलग कर देते ...
दीपू- कैसी मजबूर जान... माँ -बाप की भला क्या मजबूरी हो सकती है ?
शैली- वे मुझे बेंतीहाँ चाहते थे... चाहे इसका कारण यह भी हो की घर में कमाने वाली मैं ही थी... बाद में तो स्थिति ऐसी हो गयी की घर का चूल्हा मेरी वजह से ही चलता था ... शायद यही वजह थी की वे मुझे राजेश की हवेली में जाने से नहीं रोकते थे...हांलाकि उनका शर्म से झुका चेहरा मुझे हमेशा परेशान करता था...मैं भी हालत के सितम का शिकार थी.... अआखित्र क्या करती ? जो मजबूर होते हैं उनका फायदा उठाने वालों की कमी नहीं होती... राजेश भी मेरी हर कमी जानता था... मेरे घरवाले भी हवेली में जाने और रात -रात भर ठहरने का मतलब समझते थे.... बचपन में भी मेरे साथ बलात्कार किया गया था...
माहोल संवेदनशील होते ही दीपू का भावुक होना स्वभाविक था... उसने शैली के होठों पर अपने जलते हुए होठ रख दिए ... शैली कसमसाने लगी... उसका सीना जोर-जोर से धड़क रहा था... दीपू उसके उभारों पर हाथ फिराने लगा... जब शैली ने अंगड़ईए ली तो दीपू ने अपने हाथों का दबाब और भी ज्यादा बढ़ा दिया... अब वह प्यार से प्यार कर सकता था...




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