Tuesday, July 28, 2009

दिलफेंक पडोसन, भाग-6

सलीम सोच रहा था की या तो फरहा बहुत समझदार है या फ़िर बहुत नादाँ... सबसे बढ़िया बात ये थी की उसकी आंखों में सलीम अपने लिए प्यार की चमक देखता था... इस रोशनी में ही वह अपना भविष्य तलाश रहा था... उसे पूरी आशा होने लगी की फरहा उसके जीवन में खुशियाँ ही खुशियाँ भर देगी... फरहा की अल्ल्हड़ -मस्त जवानी उसकी आंखों में चुभ रही थी... वह उस अमृत सागर में हमेशा के लिए गोते लगाना चाहता था... उसके दिल में अब तरह-तरह के ख़याल उमड़ रहे थे... फरहा को इससे कोई लेना -देना नहीं था... वह तो सलीम के मजबूत बदन पर फ़िदा थी और इस वक्त सलीम की बांहों में तितली की तरह फद्फदा रही थी... सलीम उसके अन्तःवस्त्रों को उतारकर उसके मखमली जिस्म का दीदार करना चाहता था , इसीलिए उसने फरहा के होठों से अपने होठ सटादिए और हाथों से उन वस्त्रों को हटाने लगा... उसकी हैरत का उस वक्त ठिकाना नहीं रहा जब फरहा ने इसका विरोध किया , थोडी नाराज होते हुए उसने कहा-
- मुझे यह पसंद नहीं है सलीम, जितना प्यार करना है वैसे ही कर लो ... मगर मैं कपड़े नहीं उतारने दूंगी...
सलीम- कमाल है, प्यार ऐसे कैसे होगा मेरी जान ... जब तक दो जिस्म आपस में मिलकर एक नहीं हो जाते तब तक प्यार अधूरा ही रहता है... ये भी कोई मोहब्बत है?
फरहा- इतना मैं भी समझती हूँ , अनाडी नहीं हूँ, यह भी प्यार नहीं है, यह हवस है... मैं हवस की शिकार नहीं होना चाहती... मुझे इसकी कोई इच्छा नहीं है... प्यार की पुजारिन हूँ, हवस की नहीं...
सलीम- यह हवस नहीं मोहब्बत है मेरी जान... जब दो जिस्म आपस में मिलते हैं, बच्चे पैदा होते हैं, क्या वह भी हवस हो गयी ? समाज ख़ुद विवाह करके यह हक़ देता है... क्या यह अपवित्र हो गया ?
फरहा- तुम पति-पत्नी की बात कर रहे हो ? वह बात अलग होती है... वह पवित्र बंधन होता है...
सलीम- यह भी उतना ही पाक बंधन है मेरी जान,.... मैंने हमेशा के लिए तुमको अपना बना लिया है... अब तुम मेरी हो... मेरी हर चीज पर तुम्हारा और तुम्हारी हर चीज पर मेरा अधिकार हो गया है... अब मेरा जिस्म तुम्हारा है और तुम्हारा बदन मेरा है... हम दोनों अब इसका इस्तेमाल कर सकते हैं...
फरहा- लेकिन मैंने अभी इसको स्वीकार नहीं किया है... जब तक मैं भी राजी नहीं हो जाती तब तक यह सब एकतरफा है... मुझे सोचने के लिए कुछ वक्त चाहिए,,, तब तक इन्तजार करिए जनाब...
सलीम- ये ज़ुल्म है चाहने वालों पर... मोहब्बत ऐसे तो नहीं की जाती... किसीको खाने पर बुलाकर उसे खाना भी दिखाकर ऐसे तो नहीं दुत्कारा जाता ... यह अच्छी बात नहीं है... पहले अपने प्यार के जाल में उलझाना और फ़िर आशिकों को सताना ,, सुना था की यह हुस्न वालों की पुरानी आदत है...अदा है... अगर यह सब नहीं करना था तो यह कंडोम क्यों मंगाया ... मन माँ आग लगाकर अब मासूम बनती हो... मैंने तो पर्फेक्स कैप्सूल भी खरीद लिए हैं... सोचा था इनका सेवन करने के बाद तुम्हारे साथ सम्बन्ध बनाउंगा... आजकल जो कोई इस पर्फेक्स कैप्सूल का सेवन कर रहा है, वाही हीरो बनकर उभर रहा है... मर्दानगी बढ़ाने की रामबाण दवा है...
फरहा- मुझे क्या मालूम था की तुम जिस्मानी रूप से कमजोर हो...
सलीम- यह दवा इस मिथक को भी तोड़ती है... यह जरूरी नहीं है की नामर्द ही इसका सेवन करें , जो लोग हमेशा जवान बने रहना चाहते हैं वे भी तो इसका सेवन कर सकते हैं... जब हम पहले से ही सचेत रहंगे तो फ़िर कभी बीमार ही नहीं होंगे... समझी तुम... अब क्या करें , इस कंडोम से गुब्बारा-गुबारा खेलना शुरू करें...
फरहा- मैं क्या जानती थी की कंडोम इस काम आता है ? मैंने तो सोचा था की चुम्बन लेने के टाइम पर यह काम आता होगा , मैंने क्या कभी ऐसे काम किए हैं जो पता होता... मैंने आज तक कभी किसी लड़के को किस भी नहीं दिया... इसीलिए मैं जानती नहीं हूँ... अब अगर तुम कहते हो तो फ़िर कभी कुछ नहीं कहूँगी लाने के लिए ....
सलीम- तुम्हारी सहेली की हर बात मानती हो, मगर हम पर भरोसा ही नहीं... इसका मैं क्या मतलब समझूं ? जब भरोसा ही नहीं तो प्यार का सवाल ही नहीं hai... dosti ka koi matlab nahin hai...
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