Tuesday, July 7, 2009

तड़प, भाग-86

अगर वह किसी और के साथ सहवासरत होती तो इतनी बेफिक्र नहीं होती... तब तो वह हर कदम बहुत सोच समझकर ही उठाया करती थी... जब वह अनजान ग्राहक के साथ रात बिताती तो इस बात का पूरा ध्यान रखती थी की उसकी अन्तरंग तस्बीरें तो नहीं निकाली जा रही हैं... उसका अश्लील वीडियो तो नहीं बनाया जा रहा, उसको हमेशा इस बात की फ़िक्र रहती थी की जब वह शराब पीती है तो कोई मौके का फायदा उठाकर उसके साथ उल्टी सीधे हरकत ना कर दे... उसे बलेक्मैल करने का डर सताया करता था... अखबारों में उसने पढ़ रखा था की सरफिरे रईसजादे किस तरह के हथकंडे अ अपनाकर लड़कियों के साथ में ग़लत हरकत करते हैं... जीना हराम कर देते हैं... उसने टीवी पर भी काफी कुछ देख रखा था ... इसीलिए एहतियात बरतती थी... सिर्फ़ दीपू का मामला ही अलग था... वह उस पर आँख मूंदकर भरोसा करने लगी थी... वह सोचती की उसे तो दीपू अचानक ट्रेन में मिला था, फ़िर वह उसके साथ किसी तरह का कोई खेल कैसे कर सकता है... इसी एक अवधारणा ने उसको सबसे बड़े खिलाड़ी से बेखबर कर दिया था... दीपू के मन में जोरदार आंधी चल रही थी... उसको यह ज्ञान नहीं था की वह जो खेल खेल रहा है इससे उसका कर्तव्य तो पूरा हो जाएगा मगर मोहब्बत के नाम पर हमेशा के लिए कलंक लग जाएगा... वह इतने ज्यादा पशोपेश में था की शैली से कहने लगा-
- शराब का ज़रा भी नशा नहीं हो रहा है, देखो ना कैसे मेरी साँसें चलने लगी हैं... यह सब कम पीने के कारण हो रहा है... तुम्हें प्यार करते -करते सारा नशा हिरन हो गया है... कहीं यह नकली दारू तो नहीं देदी ?
शैली- शराब तो असली है लेकिन इसे ज्यादा पीना ठीक नहीं है...ऐसा न हो की लीवर फेल हो जाए...
दीपू- मुझे लगता है की शराब नहीं मिली तो जिन्दगी फेल हो जायेगी... क्या तुम चाहोगी की ऐसा हो...
शैली- कुछ नहीं होगा मेरी जान... जब मैं साथ हूँ तो कुछ नहीं हो पायेगा... मैं तुम्हारे लिए मौत से भी लड़ जाउंगी... बाल बांका भी नहीं होने दूंगी....
दीपू- इतना प्यार क्यों करती हो मुझसे ? तुमने तो दुनिया देखी है, इस जीवन के सफर में तुम्हें न जाने कितने लोग मिले होंगे , उनमे एक से बढ़कर एक होंगे... फ़िर उनमे से आपने मुझे ही भरोसे के काबिल क्यों समझा ?
शैली- सच कहूं, तुम्हारी आंखों से सच्चाई टपकती है... तुम जो कहते हो वह आत्मा की आवाज लगती है... हम इतना ही जानते हैं की तुम हमें अपने जैसे लगते हो... बिल्कुल अपने जैसे... मन कहता है, तुमसे बहुत पुराना रिश्ता है... जैसे की हम लोग जन्मों जन्मो के साथी हैं... क्या तुम्हें भी ऐसा महसूस होता है ?
दीपू- अच्छा , अगर ऐसी बात है तो मुझे ऐसा क्यों नहीं लगता है ?
शैली- प्यार का असर धीरे -धीरे होता है... एक साथ नहीं.... जब तुम्हें किसीसे प्यार हुआ ही नहीं तो....
दीपू- ऐसा मत कहो , जब नहीं था तब नहीं था... अब तो मेरी जान बन चुकी हो तुम... जब तुम मेरे ऊपर जान लुटा सकती हो तो मैं भी कुछ कम नहीं....जो भाव दिल में हैं उन्हें वक्त आने पर दिखा दूंगा...
शैली- मुझे कोई सफाई नहीं चाहिए , कोई वादा नहीं चाहिए... मैं जान चुकी हूँ तुम्हें ...
दीपू- क्या ? मेरा मतलब इतनी जल्दी तुम सब कुछ समझ गयीं , जरूर इसमे भगवान् की मर्जी होगी... उसीने तो हमें इस तरह से मिलवाया है... जोडियाँ ऊपर ही तैयार होती हैं... लोग तो बेवजह इंसान को दोस्त देते हैं... अब देखो न, अगर भविष्य में तुम्हारे सामने कोई मजबूरी आती है और तुम अपना किया कोई वादा नहीं निभा पातीं तो मुझे ऐसा नहीं सोचना चाहिए की तुम बेवफा हो... बल्कि यह सोचना चाहिए की तुम्हारी कोई मजबूरी होगी, और वह मजबूरी ऊपर वाले ने पैदा की होगी... तुमने यह गीत सुना है- कुछ तो मजबूरियां रही होंगी मेरे सनम की, यूँ ही तो कोई बेवफा नहीं होता...
शैली- तुम्हारी जबान क्यों लड़खडाने लगी ? मुझे लगता है तुम्हें सचमुच शराब की जरूरत है...








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