Monday, July 6, 2009

तड़प, भाग- 85

शैली को उसने अपना प्यार ही तो माना था... शैली भी यह मान बैठी की उसका दोस्त दीपू उसकी जवानी के चक्रव्यूह में कैद हो चुका है... वह क्या जानती थी की जो दीपू उसके गर्म पहलू में आकर उसे अपनी जान कह रहा है वह भविष्य में उसके लिए कितना बड़ा खतरा बन्नने जा रहा है .... वह तो दीपू के सामने अपने जीवन का हर राज खोल रही थी... कुछ तो शराब की झोंक और कुछ अपनी तारीफ़ के लिए वह कभी- कभी अपनी बात को बढ़ा चढाकर भी बोला करती थी... दीपू की आत्मा तृप्त हो जाया करती थी... उसके होठों पर जो रहस्यमयी मुस्कान उभरती थी... उस मुस्कान को शैली भला कैसे देख पाती... वह तो प्रेम की गंगा में डुबकी लगाने से ही फुर्सत नहीं पा रही थी... वह दीपू का भरपूर फायदा उठाना चाहती थी, उसे अपनी जुल्फों के साये में हमेशा के लिए उलझाना चाहती थी... उसे क्या ख़बर थी की उसने जो शिकार चुना था वह ख़ुद ही शिकारी था... जबरदस्त शिकारी ....दीपू उसकी गोलाइयों पर प्रेशर बढ़ाने लगा...साथ ही जोश की हालत में वह पूछ रहा था-
- तुम कमाल के जादूगर हो, खूब दबाते हो मगर ज़रा भी तकलीफ नहीं होने देते इस अदा के साथ दबाव बनाते हो... मैंने ऐसी बाजीगरी बहुत कम देखी है... सच कहती हूँ बिल्कुल भी दर्द नहीं हो रहा है....
दीपू- मैं ठहरा अनाडी , इन सब बातों को क्या जानूं... मैं तो जो भी करता हूँ वह प्यार से करता हूँ ... मेरे ख़याल से जब हम कोई काम मोहब्बत से करते हैं तो उसका रिजल्ट भी मोहब्बत भरा ही होता है....
शैली की काम्भाव्नाएं भड़कने लगीं... उसने दीपू के नाजुक अंग को सहलाना शुरू कर दिया, उसके स्पर्श से दीपू का सख्त अंग और भी सख्त होकर तांडव मचाने लगा... वह बेहद कामुक हो रहा था... शैली का नग्न बदन ताजमहल की तरह चमक रहा था... अपने जिस्म को खूबसूरत बनाने के लिए शैली बहुत मेहनत करती थी... रोजाना जिम में घंटों पसीना बहाया करती थी... तभी तो वह शहर में टॉप वैश्या कहलाती थी... उसके आशिकों की संख्या भी काफी लम्बी थी... अपने ग्राहकों को वह देवता की तरह मानती थी... उसकी किसी भी मांग को नकारती नहीं थी... अगर ग्राहक ने कोई ग़लत मांग भी राखी तो वह सहज रूप से मान लिया करती थी... उसे चाहे जितनी तकलीफ हो लेकिन ग्राहक को संतुष्टि देना वह अपना परम धर्म समझती थी... उसे ग्राहक के आनंद में ही अपना सुख तलाशना होता था... वह काफी दयालु भी थी... एक दिन होटल के एक वेटर ने उसके सामने जिस्मानी सम्बन्ध बनाने की इच्छा अजाहिर की , मगर परेशानी यह थी की उसके पास उतने पैसे नहीं थे... लड़का नया था और सुंदर था... शैली को दया आ गयी... उसने वेटर के साथ पूरी रात गुजारी और उसका बिल भी चुकाया ... ख़ुद दीपू के साथ भी तो वह बिना फीस ही काम कर रही थी... दीपू उसके कातिल बदन को अपने होठों से स्पर्श कर रहा था॥ खूब आनंद की घड़ी थी... उन दोनों की साँसें गर्म हो रही थीं... काम वासना का ज्वर तेज होने लगा... खुशी की सीमा नहीं थी... शैली ने अपनी पलकें बंद कर राखी थीं ताकि वह उस अपार सुख को हमेशा के लिए अपनी स्म्रतियों में बसा सके... दीपू भी इस प्रणय क्रीडा में पूरी तल्लीनता के साथ जुटा था...वह शैली पर हावी होना चाहता था...मगर इस बार शैली कोई जल्दबाजी नहीं दिखाना चाहती थी... वह हर क्षण का भरपूर फायदा उठाने के पक्ष में थी... वह जानती थी की एक बार अगर समय हाथ से निकल जाए तो फ़िर लौटकर नहीं आता... वह जब सोच विचार में डूबी तो याद आया की दीपू ने बहुत देर से राजेश का नाम भी नहीं लिया था... पहले वह इस मामले में दीपू को शक की निगाह से देख रही थी मगर फ़िर उसे अपनी ही सोच पर तरस आ ने लगा... वह दीपू से खूब प्यार करने लगी... उसने सोचा की वह कौन सी मिनिस्टर है जिसकी कोई जासूसी करेगा... वह तो मामूली सी काल गर्ल थी... उसका कोई करेगा भी तो क्या ?

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