Thursday, July 30, 2009

दिलफेंक पडोसन, भाग-8

सलीम- तो यह भरम भी मिटाती चली जाइए ... देख लीजिये क्या हासिल होता है ? आखिरकार 'हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े लिखे को फारसी क्या '.... सबूत ख़ुद मिल जाएगा... नाना- नानी तो दरवाजा नहीं खटखटाएंगे ?ऐसा ना हो की बीच राह में ही वे चले आयें और तुम्हें भी बहाना मिल जाए, जाने का...
फरहा- उनकी चिंता मत करो ... वे नहीं आयेंगे ... आने से पहले मुझे फोन करेंगे... वैसे भी मैं बाहर से कुंडी बंद करके आयी हूँ... वे निकल ही नहीं सकते... यह भी बताकर आयी हूँ की मैं आपके पास जा रही हूँ... अब जब भी उन्हें किसी प्रकार की कोई जरूरत महसूस होगी तो वे मुझे मोबाईल फोन पर बात कर लेंगे...
सलीम- अच्छा... इतनी सयानी हो फ़िर भी नाटक ऐसे करती हो जैसे की कुछ जानती ही नहीं... कंडोम मंगाती हो और कहती हो की पता नहीं था इसलिए यह मांगा लिया... कमाल है... तुम्हारा भी जवाब नहीं है...खैर, मैं अब पुरानी बातों पर नहीं जाता... वो सब बेकार की बातें हैं... मैं अब तुम्हारे वस्त्र नहीं उतारूंगा... तुम मेरी बात मानो या मना मानो मगर मैं तुम्हारी हर बात मानने का मन बना चुका हूँ... मैं यह निश्चय कर चुका हूँ की अब जीवन भर अपनी प्यारी फरहा की जिद मानता रहूँगा... कभी तो पिघलेगा तुम्हारा दिल ? और अगर नहीं भी पिघलता है तो क्या फर्क पड़ता है ? मुझे अब तुमसे कुछ नही चाहिए... बस मेरे दिल में बसी रहना ... दिल से तो कोई नहीं निकाल सकता... ख़ुद तुम भी नहीं... मुझे मोहब्बत की राह पर कुर्बान होना आता है... दोस्ती करनी आती है तो उसे निभाना भी आता है... सच्चाई तो ये है की मैं इश्क में गिरफ्तार हो चुका हूँ... तुम्हारा दीवाना बन चुका हूँ... अब अपनाओ या फ़िर ठुकराओ इससे कोई फर्क नहीं पड़ता... तुम यही चाहती हो ना की मैं तुम्हारी अन्तःवस्त्र नहीं उतारूं तो ठीक है... नहीं उतारूंगा... तुम चाहती हो की हम लोग शारीरिक सम्बन्ध नहीं बनाएं तो ठीक है... ऐसा ही होगा... तुम मुझे प्यार करने की इजाजत दे रही हो मेरे लिए यही कम है क्या ?चलो प्यार की बात करते हैं, तुम्हारी नजर में प्यार की परिभाषा क्या है ? क्या जानती हो तुम इसके बारे में?
फरहा- परिभाषा तो पता नहीं लेकिन इतना जानती हूँ की यह बहुत हसीं जज्बा है... जो पहली बार के देखने पर ही मन की गहराइयों में उतरता चला जाए , जो हमारी भावनाओं का सम्मान करे , हमारे दुःख -सुख में साथ दे , वही प्यार करने के काबिल है... और उसके साथ हम जो कर रहे हैं वह प्यार है...
सलीम- पहली नजर में तो बहुत सी चीजें भी अच्छी लगती हैं, मन में बस जाती हैं, तो क्या वे सब हमारा प्यार हो सकती हैं ? जैसे की कोई गाडी पहली बार में ही अच्छी लग सकती है... या फ़िर कोई कपडा बहुत अच्छा लग सकता है ? कोई इमारत दिल को भा सकती है ?
फरहा- तुम मुझे उलझा रहे हो... मैं इतनी गहराई से नहीं सोचती ... खासकर इस बारे में कभी नहीं सोचा ...अच्छा तुम बताओ ... तुम्हारी जिन्दगी में प्यार के मायने क्या हैं ?
सलीम- ठीक है... बताता हूँ... प्यार मतलब , कुदरत का दिया सबसे हसीं तोहफा... जिसके लिए मन में समर्पण के भाव आयें , त्याग के भाव आयें... जो दिल को सबसे अच्छा लगे वही सबसे प्यारा है... प्यार के लायक है... मैं प्यार को इबादत के रूप में देखता हूँ... प्यार मेरे लिए सबसे बढ़कर है... मैं प्यार को त्याग से जीतने की वकालत करता हूँ, सवारथ से नहीं, छल और कपट से नहीं... मैं नहीं मानता की प्यार और जंग में सब जायज होता है...
फरहा- वाह- बहुत कोमल भावनाएं हैं तुम्हारी... ये सिर्फ़ कहने वाली बातें हैं या इन पर अमल भी करते हो ?
सलीम- अपने आप क्या कहूं , अब पड़ोस में आ ही गयी हो तो आजमाकर देखना...
फरहा- इसकी जरूरत नहीं है... तुम्हारे शब्दों से सच्चाई झलक रही है... मैं इसे देख सकती हूँ... महसूस कर सकती हूँ...मैं भी तुम्हारी तरह बन्ना चाहती हूँ... तुम बहुत अच्छी स्पीच देते हो...
सलीम-मैं सेक्स के बारे में भी बहुत अच्छी राय रखता हूँ...मुहब्बत अगर एक खूबसूरत एहसास है तो एक एहसास को जाहिर करने का एक बेहतर जरिया है सेक्सं ... लेकिन सेक्स का लेकर आज भी कई भ्रांतियां हमारे समाज में बनी हुई है... सेक्स अगर एक तरफ उत्सुकता, भावना, अपनापन और प्यार को गहरा करने का माघ्यम बन सकता है... तो वहीं दूसरीतरफ ये असमंजस, अपराघबोघ, अवसाद, डर और गुस्से को भी बढा सकता है, क्योकि सेक्स के प्रति हमारा नजरिया बहुत हद तक हमारे समाज, हमारी परवरिश और सेक्स की जानकारियों के स्त्रोतों से लेकर हमारे अनुभवों और बहुत हद तक हमारी उम्र पर भी निर्भर करता है...
फरहा- ठीक है , अगर सही अवसर आया तो मैं भी इसका स्वाद चाखुंगी...
सलीम- मैं इन्तजार करूँगा...

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