Friday, July 10, 2009

तड़प, भाग-89

शैली इतने जोश में थी की उसको अपना भी कोई ख्याल नहीं था...बस वह दीपू के चेहरे को चूमे जा रही थी...मन में हजारों ख्वाहिशें थीं... अब उसके सपनों में भी पर लगने लगे थे...
सिर्फ़ मौज मस्ती तक के सपने देखने वाली शैली अब घर बसाने के ख्वाब सजाने लगी थी... मन में परिंदे आकाश की सैर करने लगे...वह सोचने लगी की दीपू के साथ जब वह अपने गाँव जायेगी तो लोग कितने खुश होंगे ... उसके घरवाले गर्व का अनुभव करेंगे, उसकी पसंद की दाद देंगे... वे समझ जायेंगे की वह ग़लत नहीं है... फ़िर जब वह शादी करेगी तो पूरे गाँव के साथ-साथ आस-पास के गाँव के लोगों को भी भोज देगी...कितना मजा आएगा , जब दीपू घोडी पर चढ़कर आएगा तो लोग देखते रह जायेंगे... इत्टना सुंदर लड़का इससे पहले उसके गाँव में आया ही कब है ? उसकी जोड़ी खूब जमेगी... इसके बाद वे हनीमून पर जायेंगे... फ़िर सुंदर बच्चे होंगे... कितनी अच्छी लगेगी उनकी भाषा... जब वे तुतलाकर बोलेंगे तो कितने अथाह सुख की अनुभूति होगी... फ़िर वह सिर्फ़ अपने बच्चे को संम्भालेगी... शादी की बात पक्की होते ही वह वैश्यावृति छोड़ देगी... अब तो बस अपने दीपू को खुश करने ही वक्त बिताएगी... उसको अपने उज्जवल भविष्य की तस्बीर देखने में आनंद आ रहा था... मगर दीपू के दिल में कुछ और ही चल रहा था... शैली के प्यार के आगे वह नतमस्तक तो हो गया लेकिन फर्ज की दीवार इतनी ऊंची थी की वह उसके दूसरी तरफ़ देख भी नहीं पाटा था... कभी- कभी अपने आपको कोस्टा भी मगर इससे क्या होने वाला था... उसका दर्द तो इतना बड़ा था की उसे कोई देख भी नहीं सकता था... वह अन्दर ही अन्दर घुटकर रह जाता था... कभी उसका जी चाहता की शैली को सब कुछ साफ़-साफ़ बतादे मगर हिम्मत नहीं हुई... ऐसे समय उसका गला सूख जाता था.... जुबान लड़खडाने लगती थी और पसीने पसीने हो जाया करता था... आखिरकार वह चुप हो जाता था, कभी सोचता की वह अपने दोस्त के साथ बहुत बड़ी गद्दारी कर रहा है... उस मासूम का दिल तोड़ने का उसे कोई हक़ नहीं था... वह साहस जुटाकर फ़िर एक बार बोलने के लिए तैयार हुया, सोचा की ज्यादा नहीं तो थोड़ा सा इशारा तो कर ही दिया जाए ताकि उसका हित न हो ,, मगर ठीक उसी वक्त शैली ने उसके होठों से अपने होठ सता दिए... गरमी बढ़ने लगी... बदन तपने लगे और काम वासना की आंधी खूब जोर पकड़ने लगी... दीपू मदमस्त होकर उस कातिल हसीना के नाजुक अंगों के साथ खेलने लगा, उसकी उँगलियों का स्पर्श पाकर दीपू भी मतवाला हो गया... कुछ ही देर में वे दोनों प्यार की हसीन दुनिया में घूमने लगे... इश्क की इस आग में उन दोनों का जिस्म झुलस रहा था... मन में तृप्त होने की इच्छा थी...दीपू मस्ती के मूड में था, उसकी चिकनी जाँघों से खेल रहा था, उसके यौवन द्वार पर उंगलियों से छेड़छाड़ कर रहा था... शैली को भी खूब मजा आ रहा था लेकिनबेचैनी के कारण वह जल्दी से जल्दी इस काम से फारिग होना चाहती थी...उसने यह सोच लिया था की दीपू को निराश नहीं करेगी वह जिस तरह चाहेगा उसे संतुष्ट करेगी... दीपू ने उससे कहा-
-क्या बात है , बहुत खामोश हो...कुछ सोच रही हो क्या ?
शैली- हाँ, तुमने जीवन को इन्ज्योय करने का तरीका जो बता दिया है... अब जबकि अरमानों के पंख निकल ही आए हैं तो हवाई किले बनाती रहती हूँ... शादी के बाद हम दोनों किस तरह रहेंगे, हमारे बच्चे किस तरह रहेंगे, उन्हें हम कैसे प्यार देंगे , अच्छी शिक्षा देंगे... यही सब खयाली पुलाव बनती रहती हूँ...
दीपू- मैं तुम्हारे पास हूँ और तुम भविष्य की आगोश में ?

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