मैं जानती थी की राजेश के परिवार की पंहुच बहुत ऊपर तक है, अगर मैं पुलिस ठाणे में उसकी शिकायत करने जाती तो मैं ख़ुद ही भगवान् को प्यारी हो जाती ... या तो मेरे ख़िलाफ़ झूंठा केस बनाकर मुझे बदनाम किया जाता या फ़िर मुझे किसीसे मरवा दिया जाता... सभी बड़े पुलिस अधिकारी उन लोगों की जी हुजूरी करते थे ...उन्हीं के घर पर सभी अधिकारियों का सेवा सत्कार किया जाता था, उनका बिस्तर गर्म करवाया जाता था... शराब और शबाब की महफिलें जमती थीं... वे अधिकारी भला उन्हीं लोगों के ख़िलाफ़ कैसे कार्रवाई कर सकते थे, इसलिए मैंने उसकी ह्त्या करने मन बनाया... मैं जानती थी की अगर जरा भी संदेह हुआ तो वे लोग मेरे खानदान को भी ख़त्म कर डालेंगे इसीलिए मैंने विशेष सावधानी बरती, उनके पूरे खानदान का भरोसा जीता, कभी किसी के सामने उनकी shikaayat नहीं की, उन्होंने जिस tarh भी मेरा istemaal किया मैंने इनकार नहीं किया...
लेकिन मैं सही अवसर की तलाश करती रही, राजेश को मारने के लिए मैंने एक डॉक्टर की मदद से धीमे जहर का इंतजाम कर लिया था, शराब के पैग में उसे मिलाना बहुत सहज काम था...वह पहचान भी नहीं कर पाटा था...
दीपू- शराब भी कड़वी होती है और तुमने जिस धीमे जहर का सहारा लिया , जाहिर सी बात है वो भी कड़वा होगा , इसलिए वह जान नहीं पाया... नशे में उसको और भी कुछ भी ध्यान नहीं रहता होगा,पागल हो जाता होगा...
शैली- हाँ, सच कहते हो... डॉक्टर ने दावा किया था की की किसी भी हालत में यह धीमा जहर पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी सिद्ध नहीं हो पायेगा...
दीपू- क्या यह सामने वाली हवेली ही राजेश की है ? अरे इस पर तो ताला लटका हुआ है ?
शैली- हाँ , यही है... सुना है उसका बाप विधायक बन गया है, हो सकता है अब वे लोग बाहर रहने लगे हों... फ़िर भी कोई कोई तो यहाँ होगा ही... मुझे सब कर्मचारी जानते हैं,,
दीपू- तो क्या तुम इस हवेली के ताले को खुलवा भी सकती हो ?
शैली- तुम्हारे लिए मैं कुछ भी कर सकती हूँ, किसी भी हद तक जा सकती हूँ... तुम फ़िक्र मत करो इसका गेट जरूर खुलेगा... मैं दिखाउंगी उस जगह को, जहाँ मैंने नशे में धुत राजेश की गर्दन को तकिये से दबा दिया था... सबने उसकी मौत को आकस्मिक मौत ही माना था,
दीपू- उसका पोस्टमार्टम क्यों नहीं किया गया ? क्या उसमे भी तुमने कोई सैटिंग की थी ?
शैली- कोई सैटिंग नहीं, राजघराने की मजबूरी थी, सबको पता था की राजेश नशे का आदी है और अगर पोस्टमार्टम हुआ तो यह राज भी सबके सामने खुल जाएगा....ये ऐसे लोग हैं की इनको अपने खानदान की प्रतिष्ठा बहुत प्यारी होती है... जब इनको लगा की पोस्टमार्टम करने से इनका भांडा फ़ुट सकता है तो इन्होने ऐसे ही क्रियाकर्म कर दिया... मैं तो बेहोश ही हो गयी थी, यह बेहोशी डर की वजह से थी, लोगों ने समझा की मैं अपने दोस्त की मौत का सदमा सहन नहीं कर पा रही हूँ...
दीपू- और फ़िर तुम यहाँ मुंबई कैसे पंहुची ? क्या यहाँ पर अपनी मर्जी के मुताबिक आयीं ?
शैली- मुझे रवि अपने साथ लेकर आया, उसने रोजी को लेने के लिए भेजा था... यहाँ लाकर मुझे पक्की वैश्या बना दिया गया, लेकिन छोटी-मोटी नहीं हाई-फाई वैश्या , यहाँ मेरे हुस्न की चमक ने बड़े बड़े धन्नासेठों के दिल लूट लिए... इस तरह मुझको यह जीवन गुजारना पड़ रहा है...
दीपू- किसीने शक नहीं किया तुम पर ?
शैली- शायद उसके पिता को मेरे ऊपर संदेह था, मगर मैं जल्दी ही मुंबई आ गयी और उस पुलिस अधिकारी से पहचान होने पर मैं आजाद कर दी गयी ...
Tuesday, July 21, 2009
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