उसके आलावा जो भी करोगे मुझे मंजूर है... मैं अब घबराने लगी हूँ... मुझे अगर कंडोम के बारे में सच्चाई का पता होता तो मैं इसे कभी नहीं मंगाती... अब मैं इजाजत चाहती हूँ... मुझे नहीं रहना है यहाँ...
सलीम- इस बचपने में जवानी के आनंद को क्यों बिगड़ रही हो ? ऐसे हसीं क्षण फ़िर कभी लौटकर नहीं आते... एक बार अगर उम्र निकल गयी तो वापस नहीं आ सकती... इतने मौज मस्ती भरे दिन कभी नसीब नहीं होंगे तुम्हें...
फरहा- कोई बात नहीं है ... अगर यही मस्ती है तो मुझे यह स्वीकार नहीं... इस सुख को तुम्हीं भोगो... अकेले ही जवानी के सागर में गोते लगाओ ... मैं चली...
सलीम- ठीक है...मैं अब जिद नहीं करूँगा... अब मैं समझ गया की मैंने पत्थर से दिल लगाया है... पत्थर कभी पिघलते नहीं हैं... ये मेरी भूल थी... अब मैं इसका प्रायश्चित करूनगा... प्यार का ऐसा ग़लत अनुभव हुआ है की अब कभी किसी कमसिन से दिल नहीं लगाऊंगा... कभी मोहब्बत नहीं करूँगा...
फरहा- मैंने क्या किया... आप तो ऐसी बात कह रहे हैं जैसे की मैंने कोई अपराध कर दिया हो...
सलीम- तुमने नहीं फरहा , अपराध तो मैंने किया जो तुम्हें अपना समझ लिया, तुमसे प्यार किया और तुम्हें अपना सब कुछ समझ लिया... अब नहीं करूँगा यह... अब कभी यह अपराध नहीं करूंगा...
फरहा- मैंने सिर्फ़ अंदरूनी शारीरिक संबंधों के लिए मना किया है... मैं अपने वस्त्र नहीं उतारूंगी... यह मुझसे नहीं होगा... मैं जिससे निकाह करुँगी, यह काम उसी के साथ करुँगी... मैं अपना नापाक बदन अपने शौहर को कैसे सौंप सकती हूँ... अगर तुम्हारी पत्नी शादी सेपहले किसी गैर मर्द के साथ ऐसे सम्बन्ध बनाती तो क्या तुम यह मान लेते... क्या तुम उसे दिल से स्वीकार कर लेते ?
सलीम- दोनों बातों में फर्क है मेरी जान... मैं तो तुम्हें अपना बनआने की बात कर रहा हूँ... मैं कहाँ कहता हूँ की तुम दूसरी जगह पर निकाह करो... मैं हूँ ना मेरी जान...अगर तुम्हें सोचने के लिए वक्त चाहिए तो ले लो... ,मुझे ऐतराज नहीं है लेकिन तब तक के लिए पत्थर दिल तो ना बनो...मेरा दिल तो ना तोड़ो... ऊपर वाले ने हमको मिलने का यह सौभाग्य दिया है, इसे तो मत बेकार करो, प्यार करो मेरी जान प्यार करो... एक बार अगर तुम समर्पण कर डौगी तो फ़िर सारी दुनिया भूल जाओगी, कभी नहीं कहोगी की मुझे बस ये काम नहीं करना... तब तो इसी काम के पीछे भागोगी... यह कुदरत का अनमोल तोहफा है... इसमे जो खुशी मिलती है उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता... जब हम निराश होते हैं, थके- हारे या परेशान होते हैं, किसी तनाव में होते हैं या फ़िर किसी मुश्किल या अस्मान्जास में तो ये सम्बन्ध में सुख देते हैं... संतुष्टि देते हैं... इससे हमारे तन और मन तरोताजा हो जाते हैं... हमारे अन्दर एक नया हौसला पैदा होता है, एक अन्या जज्बा पैदा होता है... हम फ़िर से रीफ्रेश हो जाते हैं...
फरहा- लेकिन इससे पाप भी तो मिलता है... इससे सामाजिक बुराई का जन्म होता है... या फ़िर उसे बढ़ावा मिलता है... हम ये कैसे भूल जाएँ की यह कानूनी भी ग़लत है...
सलीम- समाज और क़ानून का सम्मान हम भी करते हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं की अपनी व्यक्तिगत रुचियों का गला ही घोंट दिया जाए... हमारी अपनी लाइफ भी तो है... उसे इंजॉय नहीं करना है... हर बार इंसान का जन्म नहीं मिलता... न जाने कैसे -कैसे मिला है तो इसको जाया नहीं होने दिया जाएगाअगर तुहें मुझ पर विश्वाश
तो इस तरह मेरा अपमान नहीं होता... अब तुम तो चली जाओगी मगर मैं अपने आपको कोसता रहूँगा... कभी maaf नही कर paaunga ख़ुद को...मुझे लगेगा जैसे मैंने कोई गुनाह कर दिया हो... बिना कुछ किए अपनी ही नजर में गिर गया मैं... मुझे बहुत तकलीफ हो रही है... आज की रात सो नहीं paaungaa मैं....
Wednesday, July 29, 2009
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