Tuesday, June 30, 2009

तड़प, भाग-79

जब रवि ने मेरे उरोजों को चूसना शुरू किया तो मेरी आह निकल गयी... इतना अथाह सुख तो मैंने कभी महसूस नहीं किया था... यह बेहद सुख भरे भरे क्षण थे... मन में हिलोरें उठ रही थीं, मुझे कुछ सुध बुध नहीं थी... बस यही यही धुन सवार थी की किस तरह इस स्वर्गिक आनंद को लूटा जाए... मुझे कुछ करना भी नहीं था... रवि ही सब कुछ कर रहा था... रोजी भी कम नहीं थी, मेरी भावनाओं को भड़काने में वह भी कुछ कसार नहीं छोड़ रही थी... वह मेरे यौवन द्वार पर अपनी उँगलियों की कलाकारी दिखा रही थी... मेरी जवानी सायं -सायं करने लगी... काम वासना की आंधी जोरों से चलने लगी... मन में पंख लगने लगे... मैं सुख के आसमान पर उड़ने लगी...उस वक्त मुझे लगा की दुमिया में अगर कहीं सुख है तो वह यही है है, रोजी अश्लील बातें कर रही थी, ख़ास अंगों का नाम पुकार रही थी... इससे मेरे अन्दर कामोत्तेजना का ज्वालामुखी और भी जोर से भड़कने लगा... चारों तरफ़ हाहाकार मचा था... मैं उस बबंदर में बहकने लगी... मैंने अपने आप को भगवान् भरोसे छोड़ दिया...
अधिकारी- अच्छा, अगर ऐसी बात थी तो उन्होंने तुमको नशीला पेय भी दिया होगा, क्योंकि ऐसे गिरोह वाले अक्सर इसी तरह की हरकत करते हैं, तुम्हारे साथ भी इसी हथियार का इस्तेमाक किया होगा...
शैली- बिल्कुल सही कहा... उन्होंने मुझे ऐसा न जाने क्या पिला दिया था की मेरे अंग अंग में आग लगने लगी थी... जिस्म के अन्दर से चिंगारियां फ़ुट रही थीं... मैं चाहकर भी रवि को छोड़ नहीं पा रही थी, इसके विपरीत मैं उसको उत्साहित करने लगी... उसको अपनी तरफ़ खीचने लगी, जब वह फ़िर भी आक्रामक नहीं हुआ तो मैंने कहा-
- यह क्या कर रहे हो रवि, मेरी जान पर पड़ी है और तुम इतने ढीले नजर आ रहे हो ... अगर मेरी जिन्दगी चाहते हो तो उस आग को बुझाओ जो तुमने मेरे बदन में लगादी है...
रवि- ओह..... शैली- मैं इन खूबसूरत और कातिल पलों को हमेशा के लिए अपनी स्म्रतियों में कैद कर लेना चाहता हूँ... मैं तुम्हें ऐसा सुख देने की कोशिश कर रहा हूँ जिसे तुम हमेशा याद रखो...
शैली- इस चक्कर में किसी भी क्षण मेरे प्राण निकल सकते हैं,,,
रवि -यह तुम्हारी भूल है... ऐसा होने से पहले तो मेरे ही प्राण निकल जायेंगे... जिस प्यार से तुम सहयोग कर रही हो , ऐसे हर लड़की नहीं कर सकती... तुम्हारा हर अंग कोमल है, बेहद नाजुक है... ऐसा लगता है जैसे किसी चित्रकार ने कोई खूबसूरत चित्र बना दिया है...तुम जैसी कली का रस चखकर मैं धन्य हो जाऊँगा...
शैली- अगर तुमने मुझे संतुष्ट किया तो जीवन भर तुम्हारा उपकार नहीं भूल पाउंगी... तुम्हारे बारे में रोजी ने जो दावा किया था वह बिल्कुल सच था...
रोजी- अब समझीं ना.... मैं भी पहले नहीं माना करती थी लेकिन जब रवि ने एक ररत मुझे बेहिसाब सुख दिया तब मैंने जाना की रवि क्या चीज है... तभी तो हर बड़ी लड़की एक बार रवि के साथ सहवास करना चाहती है...
शैली- तुम ठीक कहती हो रोजी... अब तो मुझे भी रवि की आदत लग जायेगी, लेकिन रवि ने अगर मुझसे मुह फेर लिया तो मैं कैसे जिउंगी ? अब मैं रवि के बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकती...
रोजी- उसके लिए फ़िर यही एक रास्ता है , तुम राजेश के सामने मुंबई जाने का प्रस्ताव रखो ...वह मान जाएगा... मैंने उसकी आंखों में तुम्हारे लिए बेंतिहान प्यार देखा है,, तुम्हारी खुशियाँ का वह गला नहीं घोंट सकता...
शैली- रवि तो हाँ हूँ कुछ नहीं कर रहे हैं...
रवि- रोजी ने जो कहा ठीक ही है, मैं तो मुंबई ही रहता हूँ , तुम साथ में रहोगी तो जल्दी-जल्दी मुलाक़ात होती रहेगी... जब भी मौका मिला हम दोनों मिलकर चौका -छक्का लगाया करेंगे...
रोजी- सिर्फ़ दोनों नहीं, हम तीनों ... क्या तुम्हें मजा नहीं आ रहा शैली ? कहीं तुम्हें ये महसूस तो नहीं होता की मैं कबाब में हड्डी बन गयी हूँ ...
शैली- नहीं रोजी, सच तो ये है की तुमने हमारी खुशियाँ और भी बढ़ा दी हैं...

No comments: