Sunday, February 27, 2011

बेवफा -६५
उसे शराब पीने और सिगरेट पीने का शौक था. मर्द्खोरी करने की भी आदत थी. जब उन दोनों को कोई लड़का नहीं मिलता था तो वे आपस में ही अपने जिस्म की प्यास बुझाने की कोशिश
करती थी. मुझे प्रोफ़ेसर ने यह सब बातें इतने विस्तृत में बतलाईं की मैं सब कुछ जान गयी. उसीने यह जिक्र किया था की शरीर के किस अंग को किस तरह से चूमा जाए.
सूरज- मुझे भी सिख्लाइये न ऐसे गुर. मै भी जानना चाहता हूँ की काम क्रीडा कैसे की जाती है ?
किरण- सफल कामक्रीड़ा करने का तरीके तुम्हें बताने की जरूरत ही नहीं है. तुम खुद अपने आप में श्रेष्ठ हो .
सूरज- लों, इस हथियार को एडजस्ट करो. अब ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं है. मै जान ही गया हूँ की तुम बेवजह मेरी तारीफ करने लगे हो. आह , अब फिट बैठ गया न . कहो तो धक्के
लगाने शुरू करूं ?
किरण- हाँ, मेरे राजा. धक्के लगाओ मगर पहले धीरे-धीरे, इसके बाद में रफ़्तार तेज कर देना. पहले ठीक तरह से एडजस्ट हो जाने दो. तुम्हें भी तो तभी मजा आएगा न .
सूरज- मै तो इसलिए कह रहा था, क्योंकि कामक्रीड़ा के दौरान तुम्हें तेजी के साथ प्रहार करना पसंद है. यह बात भी तो तुम्हीं ने बतलाई थी, जों तुम कहती हो मै उसे गाँठ बाँध लेता हूँ. और
हाँ, तुम मेरे मजे की बात मत करो, जब तुम्हारा नग्न बदन मेरे नग्न बदन से टकराता है, मुझे तो तभी से सुख की अनुभूति होने लगती है. तुमसे स्पर्श का , तुम्हें चूमने का और तुम्हारे संवेदनशील
अंग को चूसने का आनंद ही कुछ और है. उसे तो वही महसूस कर सकता है जों इसे प्राप्त करता है.
किरण- हाँ, यह कामसुख ऐसा ही होता है . पहले-पहले तो मैं भी यकीन नहीं कर पाती थी. चूंकि मै एयर होस्टेस थी , इसलिए मेरे साथ में काम करने वाली लड़कियां बड़ी उस्ताद थीं, जब वे अपने बोयफ़्रेंड
के साथ बिताए हसीन और रंगीन पलों के बारे ,में चर्चा करती तो मुझे भरोसा ही नहीं होता था. मै सोचती थी की यह दुनिया के सबसे घृणित कार्यों में से है.
सूरज- जब तुम्हें धोखे से जिस्म बेचने के व्यापार में डाला गया तो क्या उस समय दिल के किसी कोने में मजा लेने की उत्सुकता नहीं थी ?
किरण- नहीं सूरज, उस समय ऐसा नहीं था. मैंने बताया न की अभिप्रिय और ब्रिज ने मुझे धोखे से अपने कब्जे में लिया था. उन्होंने मुझे कामोत्तेजना बढाने वाली दवा पिलाई,, अश्लील फिल्म दिखाई और
साथ एहे ऐसा माहौल बनाया की मुझे अपना जिस्म सौपना पड़ा. इसके बाद जब मै बेहोश हो गयी तो उन लोगों ने मेरे साथ सम्बन्ध बना लिए. वैसे मैंने उनसे अपना इंतकाम ले भी लिया ?
सूरज- इंतकाल ले लिया ? वो कैसे ? इस बात का जिक्र तो आपने पहले कभी भी नही किया ?
किरण- वो सब फिर कभी बतलाऊंगी . अभी तो बड़ा सोने जैसा समय है. इस वक्त को किसी हालत में बर्बाद नहीं किया जा सकता.
सूरज- समझता हूँ, तुम्हारी मजबूरी को भी और अपनी बेकरारी को. मै भी तुमसे अलग नहीं हूँ. मेरी भी हार्दिक इच्छा है की एक -एक पल को ठीक तरह से वसूल किया जाए. लेकिन मै कोताही भी तो
नहीं बरत रहा हूँ. अपना काम बदस्तूर जारी है.
किरण- अब मै प्रकृति के महत्त्व को समजह पाई हूँ. इसीलिए कहा जाता है की जों पेट देता है वह चुगा भी देता है. मेरा ख़याल था की इस देश में ऐसा कोई इंसान नहीं मिलेगा जों मुझे संतुष्ट कर सके.
मेरा मतलब सम्पूर्ण संतुष्टि से है. मै चाहती हूँ की आज की रात में कुलसात बार मेरी कामाग्नि को शांत करो , और जब मै पूरी तरह सुख भोग सकूं , उसके बाद तुमेहन संतुष्टि मिले.
सूरज- इस अकाम में मुझे कोई खास दिक्कत नजर नहीं आ रही .
किरण- तुम सच्चे मर्द हो, बहादुर हो. कामदेव हो, इसलिए ऐसा बोल रहे हो. तुम्हें हक है बोलने का. तुम मेरे जैसी लाखो हसीनों को अपना गुलाम बनाने की क्षमता रखते हो .
सूरज- अब बस भी कीजिये. मजा लीजिए ...
किरण- मुझे बोलने दो सूरज. तुम अदभुत हो . तुम्हारी शक्ति अदभुत है. जी चाहता है की सदा तुम्हारे क़दमों में पडी रहूँ.
सूरज- तुम्हारी जगह मेरे दिल में है. कहो, मजा आ रहा है की नहीं ?
किरण- हाँ, बहुत आनंद आ रहा है. ऐसा लगता है जैसे खिचड़ी में घी डाल दिया हो.
सूरज- अच्छा ... तुमने तो इस सुख को मापने का हथियार भी ढूंढ लिया.
किरण- तुम्हारे इस हथियार के सामने हर हथियार फेल है. यह गज़ब का है. इसे मै खूब प्यार दूंगी.

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