Wednesday, February 9, 2011

यह अडवांस मैटर है.

बेवफा खँडहर वाली , भाग-49
सूरज- क्या करूं, तुम समझ ही नहीं पाती .
किरण- मैं सिर्फ प्यार की भाषा समझती हूँ, इतना ही जानती हूँ कि तुम्हारे सिवाय मेरा अस्तित्व ही नहीं है.
सूरज- इस प्यार के रंग में तुमने मुझे भी रंग लिया है.
किरण- काश, ऐसा होता. तुम मेरे प्यार के रंग में रंग पाते.
सूरज- और कैसा रंग होता है ?
किरण- तुम मेरे साथ रहोगे , तो जीऊँगी, वरना मेरा जीना बेकार है.
सूरज- तुम मेरे लिए जान क्यों देती हो ? जीवन के सफर में ना जाने कितने लोग आते हैं, जाते हैं. उनमे से कुछ दिल को बहुत अच्छे लगते हैं. कुछ सबसे ज्यादा अच्छे लगते हैं. लेकिन इसका मतलब ये
तो नहीं कि सबके लिए अपनी जान कुर्बान कर दी जाये . यह जान बहुत महत्वपूर्ण होती है.
किरण- यह जान तो कबकी जा चुकी है सूरज, और ये क्या क्या कहते हो / तुम कोई औरों जैसे नहीं हो, तुम वो नहीं हो जों जीवन के सफर में ऐसे ही मिल जाए . तुम तो मेरे लिए खास हो , सबसे खास.
सूरज- मेरे जीवन में आई हुई तुम पहली और आख़िरी लड़की हो. मैंने तो किसी लड़की को स्पर्श भी नहीं किया है. आज जब तुम्हें स्पर्श किया तो मै धन्य हो गया हूँ. मैं कैसे रह सकता हूँ तुम्हारे बिना .
किरण- तुम सिर्फ शब्दों पर ध्यान देते हो. शब्दों पर प्रभाव है तुम्हारा. इनको कभी जमीं पर भी उतारा कीजिये .
सूरज- मै तो चाहता हूँ कि प्यार के बीच में शब्द आयें ही नहीं , मगर कर भी क्या सकता हूँ. तुम बात भी बहुत करते हो, आओ न मेरे सीने में बस जाओ और बस अब बोलना बंद कर दीजिए .
किरण मुस्करादी , मुस्कराने की उसकी अदा बहुत उम्दा थी. सूरज के सीने में हलचल सी होने लगी . वे दोनों एक बार फिर से नग्न हो चुके थे. काम वासना की आग ने उनको झुलसा दिया था .
सूरज की आँखें लाल हो उठी, अब आंखों से वासना के लाल -लाल डोरे तैरने लगे . किरण बोली-
- क्या इतनी जल्दी तुम फिर से सेक्स के लिए तैयार हो ?
सूरज - हाँ , ये काम तो मै दिन और रात भर भी कर सकता हूँ, इसके लिए तो मै उधार का खाता हूँ.
किरण- यही तो तुम्हारी खासियत है, ऐसा जवां मर्द आसानी से नहीं मिलता , जों भी तुम्हारे साथ शादी करेगी , वह बड़ी खुशनसीब होगी .
सूरज- मेरे मन में एक सवाल उठ रहा है, कहो तो अर्ज करूं, ?
किरण- बोलो न , तुम तो मेरे दिल के मालिक हो .
सूरज- सवाल कड़वा लग सकता है , मगर करूँगा जरूर.
किरण- मै बुरा नहीं मानूंगी . कहो न प्लीज, मन में जों भी है , बेहिचक कहो .
सूरज- मैं सोचता हूँ कि तुम सिर्फ शारीरिक संबंधों पर ही ज्यादा ध्यान दे रही हो ? एक तरफ तो तुम कहती हो जिस्म की कोई उपियोगिता नहीं है और दूसरी तरफ आपका ध्यान सिर्फ जिस्म पर ही है .
किरण- हाँ, ये बात तो सही है,.
सूरज- फिर इतना विरोधाभास क्यों है ?
किरण- पता नहीं, यह बात तो मेरी समझ में भी नहीं आती है, तुम्हें देखकर मै पगला जाती हूँ.
सूरज- और फिर अपने आदर्शों से भी गिर जाते हो , यही न .
किरण- हाँ, यार . बिलकुल . तुम ऐसे जवां मर्द हो जिसे देखकर मै अपने आपसे नियंत्रण खो बैठती बैठती हूँ.
सूरज- तो मै क्या समझूं ?
किरण- सिर्फ इतना कि मै तुमसे मोहब्बत करती हूँ ,बेपनाह मोहब्बत करती हूँ और तुम्हारे बिना जी नहीं पाउंगी .

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