बेवफा खंडहर वाली , भाग-42
किरण- जी नहीं, बिलकुल नहीं. मैन तुमसे मजा तो ले सकती हूँ मगर तुम्हारा मजाक नहीं उड़ा सकती.
सूरज- यह भी क्या अजब बात बताई है आपने . जानती भी हीब सब कुछ हैं और छिपाती भी सब कुछ हैं.
किरण- अपने मन से वहम निकाल्दो मेरी जान . इससे चिंता बढ़ती है.
सूरज- क्या आसपास कोई गैरेज नहीं है ?
किरण- इतनी रात गए गैरेज की ख्वाहिश , कोई बात तो जरूर है. किस्से मिलने की इच्छा है इतनी रात ?
सूरज- अरे बाबा, मै अभी की नहीं सुबह की बात कर रहां हूँ. सुबह सवेरे ही मुझे गाड़ी ठीक करानीहै, सुबह जल्दी निकलना होगा. थोड़ी देर के लिए ही सही , मगर एक बार के लिए मुझे घर जाना होगा , बहुत
सारे काम बाकी रह गए हैं, मेरे बिना उन्हें कोई और नहीं कर सकता, इसलिए गैरेज पूछ रहा हूँ.
किरण- अच्छा सुबह की बात कर रहे हो, लेकिन सुबह होने तो दो , हो सकता है कि इस रात की कोई सुबह ही न हो. एक फिल्म भी आयी थी इस नाम की. 'इस रात की कोई सुबह नहीं ' .
सूरज- क्या ? क्या कहा आपने ? इस रात की कोई सुबह नहीं . प्रकृति से कभी कोई लड़ पाया है क्या ? अगर लड़ भी गया तो जीत भी सका है क्या. कुदरत ने दिन के बाद रात, रात के बाद दिन, अँधेरे के
बाद उजाला, गम के बा खुशी इस तरह के नियम बनाये हैं और अपना बनाया नियम भला कोई कैसे तोड़ सकता है .
किरण- मेरे रहते तुम्हें फ़िक्र करने की कोई जरूरत नहीं है, पूरा गैरेज ही उठकर तुम्हारे पास चला आएगा . यहाँ तक कि तुम्हें एक दूसरे नई गाडी दिलादी जायेगी .तुम डरते बहुत ज्यादा हो.
सूरज- तुम जोर का झटका धीरे से जों देती हो. अचानक ऐसा पंच मारती हो कि पता भी नहीं चल पाता.
किरण- हा हा हा ... अब ये न कहना कि मैं भी तुमको रहस्मयी दिखाई देती हूँ.
सूरज- सच तो यही है मगर ये बात मै अपनी जुबान से कह नहीं सकता, थरथरा जायेगीजुबान. क्योंकि तुमसे प्यार ही इतना ज्यादा हो गया है कि अब जुदाई का डर भी सताने लगा है. तुम्हारे नाराज होने की
चिंता भी सताने लगी है , सोचता हूँ कि मेरी किसी बात या व्यवहार से अगर तुम नाराज हो गयी तो मै कैसे ज़िंदा रहूंगा .
किरण- ये कैसी मोहब्बर है सूरज, एक तरफ बेंतिहाँ प्यार है तो दूसरे तरफ संदेह भी भी है. दोनों साथ -साथ कैसे चल सकते हैं. ?
सूरज- पाता नहीं, मैंने तो पहली बार किसीसे मोहब्बत की है, पहली बार किसीके साथ प्रणय सम्बन्ध बनाये हैं, मै नहीं जानता दीवानगी किसे कहते हैं,मै नहीं जानता कि मै जों कर रहा हूँ वह गलत है या सही है ,
या फिर जों कह रहा हूँ वह गलत या सही क्या है ?
किरण- अब रहने भी दो, जाने भी दो. जों हुआ सो हुआ . अब चुप रहिये क्योंकि सचमुच तुम्हें नहीं मालूम कि तुम क्या कह रहे हो. मैं ऐसा करती हूँ कि तुमको सुबह गैरेज तक पहुंचा देती हूँ, और यह काम पहली
फुर्सत में ही करूंगी, इसके बाद आप ऐसा करना कि आराम से अपने घर चले जाना , जरूरी काम निबटाना और उसके बाद मुझसे मिलने आना , ठीक है ?
सूरज- हाँ, ठीक है. ये ठीक रहेगा. मेरा भी यही विचार था.
किरण - मै अपने महबूब के दिल को पढ़ना अच्छी तरह से जान गयी हूँ. अब दिल -दिमाग कुछ हल्का हुआ ?
सूरज- अब कोई चिंता नहीं है. अब मेरे मन में से गर्दिश के बादल छंट चुके हैं.
सूरज ने सचमुच राहत की सांस ली थी, वह दिल में इस बात को लेकर घबराया हुआ था कि किरण पता नहीं उसे घर जाने की इजाजत देगी भी कि नहीं. कभी-कभी उसकी इच्छा होती कि अपनी समूची शक्ति को समेटकर
वह किसी तरह से भाग जाए, पीछे मुड़कर भी नहीं देखे, उसने अपने मन में यह निश्चय भी कर लिया था कि किरण अगर उसके घर जाने के लिए मना करती है तब भी वह सुबह होते ही भाग जाएगा . अपनी बाइक को
भी वहीं छोड़ देगा , फिर जों हो सो हो. और होगा भी क्या ? वह दौडकर सड़क पर जाएगा , वहाँ से किसी भी वाहन में बैठ सकता है, मजबूरी बताने पर कौन होगा जों उसकी मदद नहीं करेगा. रही बात बाइक की तो उसका
भी बीमा कराया हुआ था, पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करा देगा , बेंक की किश्त बीमा वाले भर देंगे, मगर इस सबकी नौबत ही नहीं आई. किरण ने खुद ही उसे सुबह घर जाने की इजाजत दे दी थी, मगर किरण का यह
वाजी उसे परेशां किये हुए था कि इस रात की कभी सुबह नहीं होती. क्यों नहीं होती ? वह बुदबुदा भी रहा था और किरण के साथ प्रणय सम्बन्ध भी बना रहा था, उसके प्रहार तेज हो चले थे, वासना की आंधी अब और भी तेज चलने
लगी थी. कामवासना का तूफ़ान उन दोनों को अपनी आगोश में लपेटे हुए था. एक क्षण ऐसा भी आया जब शब्द मौन हो गए और वे दोनों एक दूसरे में समा गए.
Thursday, February 3, 2011
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