Tuesday, February 15, 2011

बेवफा - ५३
सूरज- मै कोई घड़ी मुहूर्त देखकर तो मिला नहीं. आप ही बता दीजिए .
किरण- तुम प्यार के मामले में सचमुच अनाड़ी हो, बावले, वैलेंटाइन दे था. यानि कि प्रेम का दिवस .
सूरज- अच्छा , हाँ, सूना तो बहुत है इस दिन के बारे में.
किरण- हाँ, अब तो सारी दुनिया में हंगामा है, सब लोग इस दिन के बारे में जानते हैं. यह दिन मेरे लिए बहुत मायने रखता है. अगर तुम न मिले होते तो मेरा अस्तित्व खतरे में पद जाता.
सूरज- मेरे न मिलने से आपका अस्तित्व खतरे में कैसे पद सकता है, मै कुछ समझा नहीं.
किरण- फिर कभी बताउंगी, तुम प्यार करो, यह प्यार का दिवस है. साथ में मुझे ये भी पता है कि इस वक्त तुम भूखे शेर की तरह टूट पड़ने के लिए बेताब हो. तुम चाहते हो कि मौक़ा मिलते ही चौका जमा दो, सही या गलत ?
सूरज- बिलकुल सही. मेरा ख़याल है कि तुम्हारे जज्बात भी कुछ इसी तरह से मचल रहे होंगे . शायद तुम भी मस्ती के समुन्दर में डूब जाने के लिए परेशां हो. जीभ पर ज्यादा कंट्रोल नहीं है, इसीलिए यह बहक जाती है
मगर दिल तो अपनी जगह पर फिट है, प्यार पाने के लालायित है. इसे प्यार देना मेरा कर्तव्य है. प्यार कहूँ या फिर संतुष्टि ? शायद संतुष्टि शब्द ठीक रहेगा क्योंकि प्यार तो जिस्म से आगे का प्रतिनिधित्व करता है, जहां स्वार्थ
खत्म होता है वहाँ से प्यार और त्याग की शुरुआत होती है.
किरण- अब तुम भी बड़ी गहरी टिप्पणियाँ करने लगे हो. निशाने पर भी मै ही हूँ. और किसीके बारे में तो कुछ कहते नहीं हो /
सूरज- सामने पर तुम ही हो तो टारगेट पर भी तुम ही रहने वाली हो. सीखा भी तुमसे है . जिससे सीखेंगे , उसी पर दाव आजमाए जाते हैं, यह मेरा अकेले का नहीं, दुनिया का दस्तूर है.
किरण- मै अपनी ये जवानी और जान तुम पर न्यौछावर करती हूँ, तुम्ही इसके योग्य हो और तुम्ही इसका सदुपयोग कर सकते हो. आज के बाद मै पराये पुरुषों की तरफ देखना भी बंद कर दूंगी , गैर मर्दों की छाया से भी
दूर भागने लगूंगी , सिर्फ तुम्हारा ही नाम जपती रहूंगी , तुम्हारे प्यार को याद करती रहूंगी. तुम्हारे लिए ही जीऊँगी, तुम्हारे लिए ही मरुंगी .
सूरज- मै तो पहले भी किसी लड़की के साथ शारीरिक सम्बन्ध नहीं बना पाया था, और अब भी तुम्हारे सिवाय किसी लड़की की तरफ नहीं निहारूंगा . पत्नीव्रता बनकर रहूंगा.
किरण- वाह, क्या बात है. इसको बोलते हैं सोहबत का असर. अब तुम भी मेरी ही भाषा बोलने लगे हो. काहिर, यह जानकर अच्छा लगा. लेकिन....
सूरज- लेकिन क्या ?
किरण- मर्दों की आदत झूठ बोलने की होती है, हसीना देखकर फिसल जाते हैं और अपने पुराने सभी वादों-इरादों, कसमों को भूल जाते हैं.
सूरज- ऐसा करने वाले कोई और होते होंगे, मैं ऐसा कतई नहीं हूँ. मैं तो तुम्हारे बिना किसीकी तरफ देखूंगी भी नहीं.
किरण- देखोगे नहीं तो क्या बिना देखे ही जिस्मानी सम्बन्ध बना लोगे ?
सूरज- तुम भी न , बड़ी शरारती हो. बात-बात में मीन मेख निकाल लेती हो.
किरण- तुमसे मुहवाद करना अच्छा लगता है. खासकर जब तुम्हारे चेहरे पर भाव उतरते -चढ़ते हैं तो मन आनंद से उछल पड़ता है.
सूरज- एक बात पूछूं, सच सच कहना .
किरण- नेकी और पूछ-पूछ. कैसे यकीन नहीं करते ? कहो न जों कहोगे सही जवाब दूंगी, तुमसे प्यारा इस जग में और कौन है ?
सूरज- तुम मुझसे इतना प्रेंम क्यों करती हो ? जग में कोई किसीसे इतना प्यार करता भी है क्या ?
किरण- यही सवाल और कितनी बार करोगे सूरज ? कितनी बार मै इसका जवाब दूंगी. तुम्हें यकीन क्यों नहीं होता कि मै तुमसे अपनी जान से भी ज्यादा प्रेम करती हूँ.
सूरज- यकीन तो बहुत होता है, मगर अपनी किस्मत पर ज्यादा यकीन नहीं है, तुम जों कहती हो, करती हो उस सब पर खूब भरोसा है. मै जीवन में जीती बाजी भी हारता ही रहा हूँ, कभी जीत नहीं पाया.
किरण- हटो, मैं कैसे मान लूं, जब तुमने मुझे जीत लिया है तो और किसीकी बात मै क्या करूं ?
सूरज- तुम मुझे बना तो नहीं रही हो ? या फिर मै कोई खाब तो नहीं देख रहा ?

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