Saturday, February 26, 2011

बेवफा -६४
फिर से इन तड़प रहे जिस्मों को सुकून मिल जाए तो रूह भी निश्चिन्त रहेगी. इजाजत हो तो इस हथियार को अंधी गुफा में प्रवेश करूं ?
किरण- नेकी और पूछ-पूछ. जब तुम भी चरम सुख चाहते हो और मै भी चरम सुख के इन्तजार में हूँ तो भी मुहूर्त क्यों निकलवाना. अपने मन की सारी कसर निकाल लों सूरज, मै दीवनी हो चुकी
हूँ, जिस तरह से और जैसे भी चाहो इस मिट्टी के बदन का इस्तेमाल करो. मै कभी भी तुम्हें रोकूँगी नहीं, कभी टोकुंगी भी नहीं .
सूरज- आओ, मेरी बांहों में टो समा ही चुकी हो अब मेरी आत्मा में भी समा जाइए. आज तुम्हें सेक्स का ऐसा सुख दूंगा कि कामदेव को भी भूल जाओगी . आज मेरा हथियार भी जरूरत से ज्यादा
लंबा और मोटा होता जा रहा है. शायद यह भी तुम्हारी साइज को देखकर पाँव फैला रहा है.
किरण- तुम भी अब बहुत शरारती होते जा रहे हो. चोके पर छक्का लगाते जा रहे हैं.
सूरज- यह सब तुम्हीं से टो सीखा है. और अभी भी सीखने का प्रयास हो रहा है. मै दिल से इतना खुश हूँ कि बयां नहीं कर सकता .
किरण- मेरे यौवन की घाटी में इस वक्त घंटियाँ सी बज रही हैं. जिस्म में आग लगी है, और मन में तरंग सी उठ रही हैं.
सूरज- मैंने अपने जीवन में न टो तुम्हारे जैसी सुन्दर कोई लड़की देखी है और ना ही शायद देख ही पाउँगा. अगर मेरे वश में होता टो जीवन भर के लिए तुम्हें अपना बना लेता. उसका कारण ये है
कि मैंने अब तक अपनी जिंदगी ऐसे ही गुजारी थी. किसी भी लड़की को अपनी लाइफ में पटा ही नहीं पाया . मैं टो जानता तक भी नहीं था कि इस कामक्रीड़ा में इतना आनंद आता है. अब महसूस करता
हूब कि यह टो आनंद की भी इन्तेहाँ हो गयी है.
किरण- अभी टो कुछ नहीं है मेरे साजन . जब हम रोजाना इस जिस्म के साथ तरह -तरह के खेल खेलेंगे तब देखना क्या होता है ? तुम खुद जान जाओगे कि असली सुख किसे कहते हैं .
सूरज- सच टो ये है मेरी जान कि मैं अभी से एहसास कर सकता हूँ, मेरी समझ में समझ में सब कुछ आ गया है .
किरण - मेरी तरह अब तुम भी बातूनी हो गए हो. वैसे बिना इसके उतना मजा भी नहीं आता है. मै टो पहले ही बता चुकी हूँ कि सेक्स के दौरान अगर अश्लील बातें की जाएँ टो बेहतर होता है.
इतना बेहतर कि सेक्स करने का मजा ही कई गुना बढ़ जाता है. मेरा मानना है कि अगर सेक्स करते समय असली सुख नहीं मिल रहा हो टो सेक्स करना ही बेकार है.
सूरज- अब टो मैं भी यही महसूस करने लगा हूँ, अगर चाहो तो तुम भी मुझसे इस तरह की बातें कर सकती हैं. मै भी उस आनंद की अनुभूति करना चाहता हूँ.
किरण- हाँ, हाँ क्यों नहीं मै . समझ गयी. अब तुम्हारे हथियार को भी हवा लग गयी है. मै इस हवा में कामोत्तेजना का रस मिला दूंगी .
सूरज- क्यों नहीं, मैं भी उस रस का स्वाद चखने के लिए बेताब हूँ. वैसे तुम्हारी यौवन घाटी का रस तो चख ही चुका हूँ.
किरण- यह नमकीन स्वाद तुम्हें जीवन भर याद रहेगा . मै भी तो तुम्हारे हथियार का रस पी चुकी हूँ. बड़ा सुख मिलता है. यह इस तरह का सुख है जिसे भूलना संभव नहीं है.
सूरज- यह यौवन का रस चखने का आइडिया तुम्हें कहाँ से आया ? क्या यह भी डोली और सविता ने ही सिखाया था क्या ?
किरण- हाँ ... मै तो भूल ही गयी, मैंने तो यह भी ध्यान नहीं दिया की वो स्टोरी अभी पूरी ही नहीं हो पाई है.
सूरज- बोलो न , क्या प्रोफ़ेसर के पास सविता ने डोली को भी बुला ही लिया था या वह वैसे ही झूठ बोल रही थी ?
किरण- नहीं, नहीं, वास्तव में सविता ने डोली को बुला ही लिया था. डोली विदेश में रहती थी. उसे पश्चिम की हवा देखी थी और अब वह अपने मन की इच्छाओं को पूरा करने के उद्देश्य से यहाँ पर आई
हुई थी. उसका एक ही मकसद था- मौज मस्ती और आराम. सविता उसे ऐसी सहली मिली थी जों अपार धन के मालिक की बेटी थी और उसका स्वभाव भी आजाद किस्म का था. वह खुली हवा में उड़ने
की आदी थी. उसे शराब पीने और सिगरेट पीने का शौक था. मर्द्खोरी करने की भी आदत थी. जब उन दोनों को कोई लड़का नहीं मिलता था तो वे आपस में ही अपने जिस्म की प्यास बुझाने की कोशिश
करती थी. मुझे प्रोफ़ेसर ने यह सब बातें इतने विस्तृत में बतलाईं की मैं सब कुछ जान गयी. उसीने यह जिक्र किया था की शरीर के किस अंग को किस तरह से चूमा जाए.
सूरज- मुझे भी सिख्लाइये न ऐसे गुर. मै भी जानना चाहता हूँ की काम क्रीडा कैसे की जाती है ?
किरण- सफल कामक्रीड़ा करने का तरीके तुम्हें बताने की जरूरत ही नहीं है. तुम खुद अपने आप में श्रेष्ठ हो .
सूरज- लों, इस हथियार को एडजस्ट करो. अब ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं है. मै जान ही गया हूँ की तुम बेवजह मेरी तारीफ करने लगे हो.

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