बेवफा खँडहर वाली , भाग-४३
वह किसी तरह से भाग जाए, पीछे मुड़कर भी नहीं देखे, उसने अपने मन में यह निश्चय भी कर लिया था कि किरण अगर उसके घर जाने के लिए मना करती है तब भी वह सुबह होते ही भाग जाएगा . अपनी बाइक को
भी वहीं छोड़ देगा , फिर जों हो सो हो. और होगा भी क्या ? वह दौडकर सड़क पर जाएगा , वहाँ से किसी भी वाहन में बैठ सकता है, मजबूरी बताने पर कौन होगा जों उसकी मदद नहीं करेगा. रही बात बाइक की तो उसका
भी बीमा कराया हुआ था, पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करा देगा , बेंक की किश्त बीमा वाले भर देंगे, मगर इस सबकी नौबत ही नहीं आई. किरण ने खुद ही उसे सुबह घर जाने की इजाजत दे दी थी, मगर किरण का यह
वाजी उसे परेशां किये हुए था कि इस रात की कभी सुबह नहीं होती. क्यों नहीं होती ? वह बुदबुदा भी रहा था और किरण के साथ प्रणय सम्बन्ध भी बना रहा था, उसके प्रहार तेज हो चले थे, वासना की आंधी अब और भी तेज चलने
लगी थी. कामवासना का तूफ़ान उन दोनों को अपनी आगोश में लपेटे हुए था. एक क्षण ऐसा भी आया जब शब्द मौन हो गए और वे दोनों एक दूसरे में समा गए. यह प्यार का मौसम था. ये पल बेहद रंगीन , बेहद खुशनुमा और
कभी न भूलने वाले थे, किरण ने सूरज को इतनी जोर से कसकर पकड़ रखा था जैसे कि उसे यह डर कि सूरज किसी भी क्षण उससे दूर चला जाएगा . सूरज भी अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर रहा था. वह जान गया था किरण
कि कमजोरी को, उसकी समझ में यह बात आ चुकी थी कि किरण सेक्सी युवती है, उसकी प्यास को हर कोई नहीं बुझा सकता. वह खुद स्वीकार कर चुकी थी कि बड़े- बड़े धुरंधर दिखने वाले और अपने आपको तीसमारखां
बताने वाले लोग भी उसको बिस्तर पर ऐसी सुख संतुष्टि नहीं दे पाए थे जिसकी उसे दरकार थी, वह उसको कामदेव जैसा मान रही थी इसका मतलब साफ़ अहि कि वह उसकी ताकत की आगे नतमस्तक हो चुकी थी. वह
सोच ही रहा था कि किरण के मुझ से आवाज निकली-
- बस, अब और नहीं. अब छोड़ भी दो, तुमने तो मेरा तूफ़ान मेल ही बनाकर रख दिया. सचमुच तुम बहुत शक्तिमान हो, क्या परफेक्स खाते हो क्या ? तभी इतना जोश हो सकता है .
सूरज- मुझे भी तुमने बहुत खुशी दी है, मै आभारी हूँ आपका.
किरण- तुम बहुत सीधे और सच्चे हो, तुम्हारे जैसे लोग जमाने में बहुत कम मिलते हैं, मेरी किस्मत से जब तुम मिल ही गए हो तो आसानी से तुम्हें छोड़ने वाली नहीं हूँ, तुम जहाँ -जहाँ चलोगे मेरा साया साथ होगा .
सूरज तुम जैसी हसीना को भी कौन कमबख्त छोड़ना चाहेगा. अब तो मैं जब भी यहाँ से गुजरा करूँगा, तुमसे मुलाक़ात जरूर किया करूँगा .
किरण- क्या गज़ब ढाते हो, इधर से निकलोगे तभी मिलोगे क्या ? मुझसे मिलने के लिए स्पेशल नहीं आओगे ?
सूराज- जरूर आऊंगा, जब भी दिल से याद करोगी , चला आऊंगा .
किरण- सच कहूँ तो अब तुम्हें छोड़ने को ही जी नहीं चाहता . जब जाओगे तब न आने की टेंशन होगी, ऐसा क्यूँ नहीं करते ...
सूरज- कैसा ? बोलिए न रुक क्यों गयी ?
किरण- तुम यहीं पर क्यूँ नहीं रह लेते ? यहाँ तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी . तुम्हारी नौकरी की टेंशन भी दूर हो जायेगी, मै तुम्हें इस होटल पर बड़े पद पर रख दूंगी, कैसा रहेगा ? और हाँ, तुम्हारी वो समस्या भी हल हो जायेगी .
सूरज- और कौन सी समस्या की बात कर रही हो ?
किरण- वही, जों तुम लड़कियों से सटकर बैठना चाहते हो. तुम्हारी आदत है न लड़कियों को बाइक पर लिफ्ट देने की, फिर इसके लिए तुम्हें कहीं देर -सवेर जाने की जरूरत नहीं होगी . मैं हूँ न, जब जी चाहा , मुझे बाइक पर
बिठाकर घुमा लाये , मै तो वैसे भी तुम्हारी से बिलकुल चिपककर बैठने वाली हूँ.
सूरज- तुम भी है न कमाल करती हो . मजाक भी उड़ा लेती हो और सामने वाले को एहसास भी नहीं होने देती.
किरण -अच्छा ये तो बताओ क तुम्हारे साथ मजाक मस्ती नहीं करूंगी तो किसके साथ करूंगी , अब तो मेरा अगर कोई इस दुनिया में है तो वो तुम हो. मै तुम्हारी हूँ, ये होटल तुम्हारा हो, करोड़ों-अरबों की मेरी जों संपत्ति
है वो सब भी तुम्हारी ही है.
सूरज- देखो मै तुम्हारी हर बात मानूंगा बस यही नहीं मानूगा , मुझे मोहब्बत से मतलब है दौलत मेरी दुश्मन है.
किरण- नाराज क्यों होते हो , मेरे कहने का मतलब तो ये है कि जों कुछ मेरा है वही तुम्हारा भी है न.
सूरज- ये दौलत बड़ी कुत्ती चीज होती है , इंसान का जीना तक हराम कर देती है.
किरण- दौलत जीने का सहारा भी तो है, इसके बिना कुछ है भी नहीं,.
सूरज- मैं नहीं मानता, दौलत बहुत कुछ हो सकती है लेकिन सब कुछ तो हरगिज नहीं.
Friday, February 4, 2011
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