बेवफा -५२
किरण- समझने -समझने का फेर है. आज तक क्या कोई कह सकता है कि उसने अपनी आँखों से जागते हुए और पूरे होशोहवास में भूत नामक चिड़िया को देखा है ? जबकि सच ये है
कि सब देखे हुए होते हैं. दस मिनिट पहले हमने जों खाना खाया , उसमे जों वक्त जाया हुआ वह हमारा भूतकाल ही तो था.
सूरज- तुम कहना चाहती हो कि इस आलीशान महल नुमा होटल को भी इसी तरीके से भुतहा कहा जा सकता है ?अगर बात यही है तो इसमें डरने जैसी कोई बात ही नहीं है.
किरण- तो क्या तुम डर गए थे ? बिस्तर पर तो इतने बड़े फौलादी बनते हो , और सचमुच हो भी, फिर इतनी छोटी -छोटी बातों से कैसे डर जाते हो. प्यार की दुनिया के तुम कच्चे खिलाड़ी हो
जबकि बिस्तर की दुनिया के बेताज बादशाह हो. ऐसे चोके -छक्के जमाते हो कि दिल सन्न रह जाता है. आत्मा भी तृप्त हो जाती है. , देखती हूँ कब तक इस तारह के सुख देते रहते हो ? मैंने तो ठान लिया है कि
अपनी सारी चल -अचल संपत्ति तुम्हारे नाम कर दूंगी और घर पर रहकर रोजाना शाम को तुम्हारे आने की राह देखा करूंगी .
सूरज- अच्छा जी, इतना लंबा मामला सोचकर रखा है.
किरण- ये तो कुछ भी नहीं, मैंने तो बच्चों के नाम तक सोच लिए हैं. अगर आराम से घर पर बैठकर खाने में तुम्हें शर्म आती है तो कोई बात नहीं, तुम बिजनेस संम्हालना , मैं तुम्हारे बच्चों को सभाल लूंगी .
अच्छा , एक बात तो है कि तुम मर्दों में ये बू बहुत बड़ी खतरनाक होती है. . हम लोग तो अपने पुरुष साथी के दुःख को अपना दुःख , सुख को अपना सुख , उसकी दौलत को अपनी दौलत और अपनी दौलत को
उसकी दौलत समझते हैं, यानि कि भेद ही खत्म कर देते हैं लेकिन तुम लोग इसको अपने स्वाभिमान का मसला बना लेते हो. ऐसा क्यों होता है भला ? तुम दुनिया से अलग हो, सबसे अच्छे हो, सबसे हटकर
हो इसलिए मैं तुमसे पूछ रही हूँ.
सूरज- शायद और और पुरुष में एक अंतर यह भी होता है. जहां तक सुख या दुःख की बात है तो हम मर्द भी अपनी महिला साथी के दुःख को अच्छी तरह से महसूस करते हैं , उसमे साथ भी देते हैं मगर मेरा पर्सनल
ख़याल ये है कि जों मर्द अपनी औरत की कमाई पर जिन्दा रहे , उसको मर्द होने का अधिकार नहीं है.
किरण- यही वो भावना है जों हमें तुमसे हीन बनाती है.
सूरज- अब तुम पक्षपात कर रही हो.
किरण- अच्छा जी , और आप ? आप तो और भी व्यक्तिगत होते जा रहे हैं.
सूरज- शुरुआत तो आपने की है, मगर देखो, फिर भी मैं आखिर में तुम्हारा ही साथ देने वाला हूँ, क्योंकि अपनी प्रेमिका को हराना भी मै उचित नहीं मानता.
किरण- दरियादिली तो ऐसे दिकाह रहे हो जैसे कि वास्तव में हरा ही दोगे ?
सूरज- ठीक है तो फिर जोर आजमाइश हो जाए, मगर तकलीफ वही आती है कि आप पर विजय पाकर मुझे क्या हासिल होगा . इसलिए तुमसे हारना ही बेहतर है.
किरण- फ़िक्र न करो सूरज, मै अगर जीत भी गयी तो तुम्हें हारने नहीं दूंगी , जीती हुई बाजी पलट डालूंगी.
सूरज- और अगर जीत हुई तो ?
किरण- अगर मेरी जीत हो भी जाती है तो मैं अपने लिए नहीं, तुम्हारे लिए जीतूंगी . मेरा अपने लिए जीतना कोई मायने रखता .
सूरज- फिर ये लड़ाई किसलिए, जब जीत का अर्थ ही नहीं तो उसका मोह क्यों पाले हुए हो ?
किरण- अपने लिए नहीं, बिलकुल नहीं. तुम्हारे लिए . जबसे तुम मिले हो, मेरा हर पल तुम्हारे लिए समर्पित है. जानते हो , तुम मुझसे कब मिले थे ?
सूरज- मै कोई घड़ी मुहूर्त देखकर तो मिला नहीं. आप ही बता दीजिए .
किरण- तुम प्यार के मामले में सचमुच अनाड़ी हो, बावले, वैलेंटाइन दे था. यानि कि प्रेम का दिवस .
सूरज- अच्छा , हाँ, सूना तो बहुत है इस दिन के बारे में.
किरण- हाँ, अब तो सारी दुनिया में हंगामा है, सब लोग इस दिन के बारे में जानते हैं. यह दिन मेरे लिए बहुत मायने रखता है. अगर तुम न मिले होते तो मेरा अस्तित्व खतरे में पद जाता.
सूरज- मेरे न मिलने से आपका अस्तित्व खतरे में कैसे पद सकता है, मै कुछ समझा नहीं.
किरण- फिर कभी बताउंगी, तुम प्यार करो, यह प्यार का दिवस है.
Monday, February 14, 2011
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