बेवफा खँडहर वाली , भाग-46
सूरज और किरण की हालत इस समय सांप और छछुंदर जैसी थी. वह न तो उसे निगल ही सकता था और ना उगल ही सकता था. वह उसके जी का जंजाल बन गयी थी. दिखने में वह हसीन थी .
कामुक थी , उसकी अदाएं बेहद दिलकश थीं, लेकिन जब उसे यह एहसास होता कि जिस कमरे में वे दोनों मौजूद हैं , वह कुछ अजीब तरह का है तो उसका हाल बेहाल हो जाया करता था . उसके
मन के संदेह को वह पढ़ भी लिया करती थी. यह बात उसके लिए और भी ज्यादा आश्चर्य जनक थी. हिम्मत करके सूरज ने एक बार कह भी दिया -
- अब तो खाना भी हो गया है, अगर आप अपनी गाड़ी भेज सकें तो मुझे गाँव तक भिजवा दीजिए . बाइक को मै बाद में ले जाउंगा .
किरण- गाड़ी भी आपकी है , मै भी आपकी हूँ, कोई गैर थोड़े ही हूँ. तुम मुझे अपना क्यों नहीं मान पा रहे हो ?
सूरज- अगर आपको अपना नहीं मानता तो भला यहाँ इस तरह क्यों नहीं होता ?
किरण- अगर तुम्हारा वश चलता तो यहाँ से भाग खड़े होते , मै गलत कह रही हूँ तो दिल पर हाथ रखकर कहदो .
सूरज- तो इसका मतलब ये हुआ कि आप मुझे यहाँ लेकर आई थीं . आया तो मै अपने मन से था, मदद मांगने आया था और इस वक्त भी सहायता की गुहार कर रहा हूँ.
किरण- भले ही अपने दिल से आये थे मगर मुझसे मिलने तो नहीं आये थे, वो तो तुम्हारी मर्दानगी पर मेरा ही मन आ गया .
सूरज- आपके साथ बिताए हर पल को मै जीवन भर भी नहीं भूल पाउँगा . आपका मै बेसब्री से इन्तजार करूँगा और जैसे ही मौक़ा मिला मिलने भी आउंगा .
किरण- क्या ऐसा नहीं हो सकता कि मेरी इस छोटी सी दुनिया में ही तुम अपना आशियाना बनालो . यहाँ तुम्हें किसी तरह की कोई चिंता नहीं होगी. मै कोई कमी नहीं रहने दूंगी
सूरज- मुझे ऐतराज नहीं है. मगर घर तो जाना ही होअगा .
किरण- तुम समझने की कोशिश क्यों नहीं करते ? जहां तक घर की बात है , मैं इनकार थोड़े ही कर रही हूँ. सच बात तो ये है कि तुमने मुझे पागल जैसी बना दिया है. अब मै तुम्हारे बिना जीने की कल्पा भी नहीं
कर सकती. ऐसा लगता है जैसे तुमने मेरी ऊपर कोई जादू सा कर दिया है.
सूरज- जादूगर तो तुम हो.
किरण- अगर ऐसा होता तो तुम मेरे साथ ऐसा व्यवहार नहीं करते. मुझे ठुकराकर इस तरह नहीं जा सकते थी.
सूरज- अपने घर तो हर किसीको जाना ही होता है. ऐसा कौन होगा जों अपने घर ना जाकर एक जगह पर ही कैद होकर रह जाएगा . क्या यहाँ कोई मोबाइल नहीं है ?
किरण- तुम्हारे मोबाइल का क्या हुआ ?
सूरज- जैसे ही मेरी मोटर साइकिल टकराई , मोबाइल भी जेब से गिर गया था, वह सीधा पानी में जा गिरा, उसे निकालने का भी कोई अर्थ नहीं था. खराब हो गया होगा .
किरण- हाँ, सो तो है. दरअसल मोबाइल तो मेरे पास है , लेकिन किसी काम का नहीं है.
सूरज- क्यों ? ऐसी क्या तकलीफ है ?
किरण- यहाँ नेटवर्क नहीं है. अभी तक टावर नहीं लग पाए हैं.
सूरज- तो फोन से काम चल जाएगा . मेरा एक नंबर लगवादों . घर में लोग परेशां होते होंगे .
किरण- तुम्हारी तबियत तो ठीक है न , अरे बेमतलब रात में किसीको तकलीफ देते हो. तुम्हींने तो कहा था कि तुम्हारे घरवालों को मालूम है कि तुम लेट सेट होते रहते हो.
सूरज- सच तो ये है कि मेरा मन बड़ा घबरा रहा है.
किरण- मुझसे डर तो नहीं लग रहा
सूरज- जिससे प्यार करते हैं, उससे डर कैसा ?
किरण- तो अपने चाहने वालों को इस तरह ठोकर मारकर जाता है क्या ?
सूरज- तुम तो मेरी जान हो . मेरे दिल में जिगर में हो, मेरी साँसों में हो, हर धडकन में बसी हो.
Tuesday, February 8, 2011
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