Wednesday, February 2, 2011

बेवफा खंडहर वाली , भाग-41
सूरज- तो इसका मतलब ये कहो न की राहुल अपनी बड़ी साली से कम और दौलत से ज्यादा मोहब्बत कर रहा था.
किरण- हाँ, ऐसा ही कुछ था. राहुल कहता की वह रीता को चाहता है क्योंकि वह बहुत दौलतमंद है और उसकी दौलत को भी पसंद करता है क्योंकि वह दौलत रीता की है . कुल मिलाकर वह रीता और उसकी अरबों की जायदाद
, उन दोनों से ही लगाव रखता था.
सूरज- अच्छा ... बढ़िया है. यह कौन सा दर्शन हुआ भाई ? बात कुछ समझ में नहीं आई.
किरण- आगे सुनाऊ या फिर बात को यहीं खत्म करू ?
सूरज - आगे बढ़ने के लिए ही तो मै कब से मक्खन लगा रहा हूँ. देख रही हो न , मैंने तो इसीलिए ही रफ़्तार भी कम करदी है. शायद आपको भी मजा नहीं आ रहा होगा .
किरण - मजा तो इतना आ रहा है की उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता. इस मामले में तुम कमाल के आदमी हो. तुमने तो यार मेरा ही मूड चेंज कर दिया है. दिखने में ऐसा लगता नहीं है की तुम इतने बड़े शक्तिमान
हो सकते. शक्तिमान शब्द मैंने इसलिए प्रयोग किया क्योंकि शक्ति की असली परख तो बिस्तर के मैदान पर ही होती है. यहाँ पर कई तरह के मर्द पाए जाते हैं , इनमे से कुछ तो ऐसे होते हैं जों सिर्फ जुबानी मर्द होते हैं , कुछ
ऐसे होते हैं जों शारीरिक मर्द होते हैं और कुछ तुम्हारे जैसे होते हैं. आल इन वन. तुम उन लोगों में से नहीं हो जों सिर्फ किसी एक ही चीज पर निर्भर करते हों. तुम असली मर्द हो. तुमने तो मेरी प्यास को हमेशा के लिए बुझा आ
है. अब मै तृप्त हो गयी हो . थोड़ी देर तक अगर ऐसे ही बने रहते हो. तो ये जान लीजिए कि मै हमेशा तुम्हें याद रखूंगी . कामदेव को भी फेल कर दिया है तुमने.
सूरज- मुझे इतना भी सिर पर न चढाओ कि फिर गिरू तो कभी उठ ही ना पाऊं .
किरण- आह , आराम -आराम से ही करो न मेरी जान. मुझे ज्याडा सताओगे तो मजा कैसे ले पाओगे ? आखिर तुम भी तो चाहते ही होंगे न कि इन हसीन [पलों को हम हर बार और यहाँ तक कि बार-बार इंजॉय करें.
सूरज- अब तो यकीन मानिए, मैंने रफ़्तार बहुत कम कर दी है. इतनी ज्यादा कम कि आप भी महसूस कर ही रही होंगी , इसके बावजूद भी अगर तुम इस तरह की शिकायत करती हो तो इसे मै क्या समझूं ?
किरण- ज्या कुछ समझने की जरूरत नहीं है, जैसा कहती हूँ वैसा करो , ये सब तुम्हारे हित में भी है और मेरे हित में भी.
किरण क्या का रही थी , यह सूरज ठीक तरह से नहीं सुन पा रहा था, उसका दिमाग तो भूत-प्रेत , आत्मा और रूह जैसे लफ्जों में उलझा हुआ था. वह समझ नहीं पा रहा था कि आखिरकार करे तो क्या करे ? कभी -कभी
उसके दिल के किसी कोने से आवाज आती कि वह इस रहस्यमय होटल से कहीं दूर भाग जाए, वह अफ़सोस करने लगा अपने उस फैसले पर जों उसने यहाँ आने के लिए लिया था, वह सोचता कि अगर उसकी गाड़ी खराब
नहीं होती तो वह इस होटल में हरगिज नहीं रुकता, अगर रुकता भी तो किरण से इस तरह की बात नहीं करता. अगर बातें भी कर लेता तो बातों को यहाँ तक नहीं बढाता, अंतरंग संबंधों के बारे में उसे यहाँ तक नहीं बढ़ना
चाहिए था. उसे अपने किये पर दुःख हो रहा था. यह सच था कि उसे पूरा इंद्रजाल कंठस्थ था, लेकिन इसके बावजूद उसने कुछ बातें झूठी भी कही थीं, उसने यह झूठ ही बोला था कि उसने सब मन्त्रों को सिद्ध कर लिया है.
असलियत तो यह थी कि उसे मन्त्रों की सच्चाई और शक्ति पर भी भरोसा नहीं था. उसने तो सिर्फ हावी होने के लिए यह बात बनादी थी. वह सोच ही रहा था कि उसे किरण की आवाज सुनाई दी-
-क्या सोच रहे हो ? कहीं दूर उलझ गए क्या ?
सूरज- आपको क्या मालून कि मैन सोच रहा हूँ ? मैन क्या सोचूंगा और क्यों सोचूंगा ?
किरण- सोचने के लिए तो बहुत कुछ है आपके पास . और कुछ नहीं तो ये भी सोच सकते हो कि इस हो कि इस होटल में हंगामा क्यों नहीं है ?
सूरज- आप मेरा मजाक उड़ा रही हैं ?
किरण- जी नहीं, बिलकुल नहीं. मैन तुमसे मजा तो ले सकती हूँ मगर तुम्हारा मजाक नहीं उड़ा सकती.
सूरज- यह भी क्या अजब बात बताई है आपने . जानती भी हीब सब कुछ हैं और छिपाती भी सब कुछ हैं.
किरण- अपने मन से वहम निकाल्दो मेरी जान . इससे चिंता बढ़ती है.
सूरज- क्या आसपास कोई गैरेज नहीं है ?
किरण- इतनी रात गए गैरेज की ख्वाहिश , कोई बात तो जरूर है. किस्से मिलने की इच्छा है इतनी रात ?
सूरज- अरे बाबा, मै अभी की नहीं सुबह की बात कर रहां हूँ.

No comments: