बेवफा खंडहर - 51
ूरज-अब तक तो सिर्फ यहाँ का माहोल ही रहस्यमयी लगता था मगर अब तो मुझे तुम भी रहस्मयी लगने लगी हो. हो सकता है कि यह बात बुरी लगे लेकिन सच तो यही है.
किरण- बिलकुल, तुम्हारी बात अपनी जगह सही है, लेकिन मै सिर्फ एक बात कहना चाहूंगी , भरोसा करो तो ?
सूरज- कहके तो देखिये, हर बात मानूंगा . तुम्हारी कोई बात गिरा ही नहीं सकता .
किरण- मैं कभी भी तुम्हारे साथ गद्दारी नहीं कर सकती , हमेशा ही वफ़ा करूंगी . जीवन भर तुम्हारे साथ प्त्रेम करती रहूंगी .
सूरज- मुझे कैसे भरोसा हो , यह तो बताओ . मेरे दिल को तसल्ली तो दो.
किरण- और कितनी तसल्ली दिलाऊ. जिसकी चाहो मैं कसम उठाने के लिए तैयार हूँ. मैं कभी बेवफाई नहीं कर सकती , खुद मर जाउंगी , मिट जाउंगी लेकिन तुमसे किया हुआ अपना हर वादा निभाऊंगी
.मै अपनी जुबां कटवा सकती हूँ मगर जुबान फेर नहीं सकती, यह एक सच्ची प्रेमिका का वादा है. जिस तरह और जैसे भी चाहो मै तुम्हें यकीन दिलाने के लिए तैयार हूँ. मैंने सुना है कि जब लोग वादे
निभाते हैं, तो ऐसे ही निभा देते हैं और कभी-कभी कोर्ट स्टेम्प पर लिखा भी बेकार चला जाता है.
सूरज- हाँ, ये कहावत तो मैंने भी सुनी है. उम्मीद करता हूँ कि आप जों कह रही हैं, उस पर पूरी तरह से खरा उतरेंगी .
किरण- इससे पहले तुम्हें अपना वादा निभाना होगा, एक रात में सात बार सम्बन्ध बनाने का . ऐसा करके तुम हमेशा के लिए मेरी प्यास बुझा सकते हो. तुम्हारे सिवाय इस काम को कोई और नहीं कर सकता .
तुम ही साक्षात कामदेव हो. मैंने जिस्मफरोशी का काम किया है, उस सिलसिले में बहुत से लोगों से मिली हूँ, उनमे से तुम जैसा बहादुर कोई भी नहीं है .
सूरज- क्यों ? इसमें कौन सी बड़ी बात है ? अब तक हम दोनों तीन बार प्रणय क्रीडा तो कर ही चुके हैं. चार बार बाकी है.
किरण- हाँ, मेरे राजा , और इन चारों बार लगातार आनंद लेना है. बीच में ज्यादा गैप नहीं होनी चाहिए .
सूरज- मेरे लिए तुम्हारा यह वाक्य भी किसी रहस्य से कम नहीं है. ऐसा लगता है जैसे मै किसी भुतहा किले में कैद हो गया हूँ.
किरण- जानते हो, कभी-कभी सोची हुई बात भी सच निकल जाती है.
सूरज- तुम्हारे कहने का क्या मतलब है ? मै समझा नहीं. क्या तुम ये कहना चाहती हो कि हम दोंनो वास्तव में इस भुतहा महल में है. मतलब कि यह सच्चे का भुतहा महल है ?
किरण- बिलकुल हो सकता है . वैसे भूत से तुम क्या समझते हो ? क्या धारणा है तुम्हारे मन में भूत के प्रति /
सूरज- मुझसे ज्यादा तुम बेहतर जानती हो. हर विषय में तुम्हारा ही ज्ञान सर्वाधिक है.
किरण- तारीफ़ कर रहे हो, या व्यंग्य कास रहे हो ? खैर, सर्वाधिक तो नहीं मगर जैसा है , वैसा मै बता देती हूँ.
सूरज- ठीक है अब मेहरबानी करके भूत का मतलब बताइये .
किरण- एकदम सिंपल है, भूत माने बीता हुआ . यानि जों अब नहीं है. और इसके बिना संसार की कल्पना ही नहीं की जा सकती है.
सूरज- जैसे कि ?
किरण- जैसे कि जों वक्त कल था , वह आज नहीं है. जों आअज है वह कल नहीं रहेगा. और जब तक यह वक्त जाएगा नहीं तब तक नया कैसे आएगा . क्योंकि वक्त थमता नहीं है. निरंतर चलता रहता है.
घड़ी की सुइयां आगे -पीछे हो सकती हैं, मगर समय की रफ़्तार नहीं. इसलिए भूत तो हर कोई है और हर जगह पर है. फर्ज कीजिये कि आपने किसीसे प्रेम किया और आप बेवफा निकली या आपकी
चाहने वाली बेवफा निकली, तो आप जों उसकी याद में आहें भरेंगे , वह यादें भी तो भुतहा हुई न .
सूरज- भूतकाल और भुतहा में क्या सिर्फ इतना बारीक सा अंतर है ?
किरण- समझने -समझने का फेर है. आज तक क्या कोई कह सकता है कि उसने अपनी आँखों से जागते हुए और पूरे होशोहवास में भूत नामक चिड़िया को देखा है ? जबकि सच ये है
कि सब देखे हुए होते हैं. दस मिनिट पहले हमने जों खाना खाया , उसमे जों वक्त जाया हुआ वह हमारा भूतकाल ही तो था.
सूरज- तुम कहना चाहती हो कि इस आलीशान महल नुमा होटल को भी इसी तरीके से भुतहा कहा जा सकता है ?
Sunday, February 13, 2011
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment