Sunday, June 28, 2009

तड़प, भाग-78

राजेश की उम्र भले ही कम थी मगर वह जुर्म की दुनिया में बहुत आगे तक पहुच गया था... मैंने यहाँ तक सुना की उसके सम्बन्ध माफिया सरगनाओं के साथ भी हो गए थे... मुंबई से लोग आते थे और गुंडों की भरती करके चले जाते थे... राजेश और उसका परिवार अपराधियों की pooree मदद किया करते थे... गुंडों का addaa बन चुका था उसका महल... कोई उस पर शक भी नहीं करता था, शक का सवाल इसलिए भी नहीं उठता था क्योंकि राजेश का परिवार बहुत इज्जतदार लोगों में गिना जाता था... दूर दूर तक उनकी प्रतिष्ठा का डंका बजता था, राजनीति की क्षेत्र की मुख्या धुरी यहीं थी...
अधिकारी- और पुलिस प्रशासन >? सब चुप रहते थे ?
शैली- वो तो खैर गाँव था , यह तो शहर है... जब यहाँ पर सब कुछ हो सकता है तो वहाँ क्यों नहीं ?
अधिकारी- हाँ , ये तो है... यहाँ भी तो हो ही रहा है... क्या तुम उस वक्त की दास्तान ज्यों की त्यों बता सकती हो ?

शैली- उस समय मेरी जवानी पूरे उफान पर थी... शराब के असर ने उसको और भी ज्यादा बेकरार कर दिया था... रोजी, रवि और राजेश मिलकर मुझे और भी ज्यादा बेताब करने लगे... जब मैं ने देखा की रोजी और raajesh मेरे सामने ही नग्न होकर एक दूसरे से लिपट रहे हैं तो उत्तेजक होते कहा-- ये तुम क्या कर रहे हो, मुझे भी बेशर्म बना डालोगे क्या ? तुम्हारे शहर में ये सब चलता होगा , यहाँ गाँव में नहीं ...
- क्यों यहाँ क्या परेशानी है... यहाँ के इंसान मौज मस्ती पसंद नहीं करते ? इनको जीवन का असली आनंद लेने का हक़ नहीं है क्या ?
शैली- हक़ तो है , मगर यहाँ चलन नहीं है... यहाँ पर ये सब परदे की चीजें हैं... खुलापन नहीं है..
.रोजी- हर काम की शुरुआत करनी पड़ती है, जैसे अब हमने की है... अन्य लोग इसका अनुसरण करेंगे और आनंद लेंगे... कोई तकलीफ तो महसूस नहीं हो रही ?
शैली- तुम्हारे रहते कोई तकलीफ नहीं हो सकती, लेकिन राजेश को तुम्हारी बांहों में देखकर अजीब सी फीलिंग हो रही है... जो अब तक सिर्फ़ मेरा बेड पार्टनर रहा हो उसे तुम्हारे साथ नग्न अवस्था में देखकर कुछ तो हो रहा है...राजेश- तुम इन बातों को छोड़ दो और जवानी का आनंद उठाओ... जब तक जवानी है तभी तक दुनिया पूछती है उसके बाद कोई किसी को घास तक नहीं डालता... तुमने सुना ही होगा- चढ़ते सूरज को लोग जल देंगे, और जब ढल जाएगा तो चल देंगे... यही हाल जवानी का है... जवानी का सूरज ढलते ही एक एक करके सब साथ छोड़ना शुरू कर देते है, अपना साया भी साथ नहीं देते...
शैली- इस तरह आनंद लेने के बाद जवानी का सूरज नहीं ढलेगा क्या ? हमेशा सलामत रहेगा ?
रोजी- सही समय पर तुमने चौका मारा है, सूरज को तो dhalnaa ही है , ढलेगा ही लेकिन तुम्हें इस बात का मलाल तो नहीं रहेगा की जिन्दगी में कुछ नहीं कर पाई, जो मजा बाद में लेना था वह पहले ही ले लिया... इसमे किसी की ना भी नहीं है, सभी लोग हंसी खुशी आनंद ले रहे हैं...इस तरह की और भी कई बातें हुईं और आखिरकार शैली दिल से हर वो काम करने लगी जो की रोजी, रवि और राजेश चाहते थे... जब उसने रवि के कपडे हटाये तो उसका ख़ास अंग देखकर चकित रह गयी... यह बेहद खतरनाक था... इतना ज्यादा खतरनाक की शैली का बदन काँपने लगा... रवि ने चुप रहने का कारण पुछा तो वह बोली--आह .......... डेंजर मैं बर्दाश्त नहीं कर सकती... मर जाउंगी मैं तो...तुम्हारा यह अंग तो बहुत डरावना है...
शाली के मुख से रवि की तारीफ़ सुनकर अधिकारी कहने लगा-
- क्या उसका अंग मेरे से भी बड़ा था ?
शैली- हाँ सच तो यही है.... उसे देख्कर मेरा अपने ऊपर से नियंत्रण हटने लगा... मैं असीमित सुख की कल्पना करने लगी...




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